स्वतंत्र मिश्रा पटाने और धमकाने के खेल के पुराने खिलाड़ी हैं. झूठ बोलना उनका पुनीत और परम कर्तव्य है. सुब्रत राय ने मिश्रा की तमाम कमियों के बावजूद उन पर हमेशा आंख मूंद कर भरोसा किया और सहारा के संकट के दिनों में उन्हें संकटमोचक के रूप में पेश किया. मिश्रा संकटमोचक साबित हुए भी. पर अपनी कुछ जन्मजात कमियों के कारण वे हर बार कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिससे सु्ब्रत राय को न चाहते हुए भी स्वतंत्र मिश्रा को मेनस्ट्रीम से निकाल कोने-अंतरे में फेंकना पड़ता है.
सुधारने के कई कारपोरेटी तरीकों में से एक यह भी होता है कि जो गल्ती करे उसे सजा के तौर पर कंपनी में ही लंबा बनवास दे दो. जब वह पश्चाताप की अग्नि में जल निखर कर स्वच्छ हो जाए और आगे ऐसी गल्ती न करने व परम निष्ठावान बने रहने की कसम बार बार खाए तो फिर उसे मेनस्ट्रीम में वापस ले आओ. यह फंडा राय ने कई बार आजमाया और मिश्रा हमेशा बच निकल जाते क्योंकि आइस-पाइस के इस कारपोरेटी खेल में विजेता बने रहने के कई गुप्त दरवाजे वे खोज चुके थे. सो, मिश्रा गल्तियां करने से बाज नहीं आए और राय उन्हें बनवास देने से.
इस खेल-तमाशे के दौरान मिश्रा का एक काम सतत जारी रहा, अपने साम्राज्य का विस्तार. कुछ तो सहारा के प्रताप के बूते और कुछ खुद की शातिर बुद्धि के बल पर स्वतंत्र मिश्रा ने अपना पूरा आर्थिक साम्राज्य खड़ा किया. एक दो नहीं, दर्जन भर से ज्यादा बड़े और गंभीर विवादों से सीधा रिश्ता बनाया. मकान कब्जाने से लेकर अवैध कट्टा-तमंचा बेचने तक के संगीन आरोप उन पर लगे. पर ड्रामेबाजों का किंग और झूट्ठों का देवता उर्फ स्वतंत्र मिश्रा अपने ओजस्वी शब्दजाल व हाहाकारी अभिनय के दम पर सब कुछ साधने व शांत करने में कामयाब होता रहा. सुब्रत राय उनसे पिंड इसलिए नहीं छुड़ा पाते क्योंकि स्वतंत्र मिश्रा में कुछ तो वो बात है जो सहारा के अंदर काम करने वालों दूसरों में नहीं. सो, दोनों के दोनों हाथों की मजबूरियां गलबहियां होती रहीं और अक्सर तालियों के रूप में दुनिया के सामने स्फुटित स्पंदित कंपित गुंजायमान करती रहीं.
बड़े से बड़ा मसला मैनेज करने का माहिर खिलाड़ी स्वतंत्र मिश्रा समय के साथ ज्यादा लालची और महत्वाकांक्षी होता गया. अब वह अपने कंपनी के वरिष्ठों का क्रेडिट कार्ड तक चुराने लगा था. उसे अपने मैनेज करने की कला, ड्रामा, झूठ आदि की सफलता पर इतना गुमान हो गया कि उसने आत्ममुग्धता की परम अवस्था में खुद को ईश्वर का साक्षात प्रतिरूप घोषित कर दिया और जो उसकी बात न माने व पसंद न आए, उसे दुनिया का सबसे बड़ा राक्षस. वह समय-समय पर ऐसे राक्षसों के विनाश व संहार की गर्जनाएं अपने चरण चापक दल के इर्दगिर्द करने लगा. इन दिनों अपनी कंपनी के अपने राक्षसों से ध्यान हटाकर भगवान स्वतंत्र मिश्रा ने भड़ास के यशवंत सिंह को सभी राक्षसों का संरक्षक घोषित कर इसके खात्मे की रणभेरी बजा दी है. मिश्रा को जब यशवंत ने बताया कि वह उनकी इस रणभेरी को दुनिया को सुनाना चाहता है तो मिश्रा ने अपने ड्रामा, अभिनय, झूठ, शब्दजाल आदि समस्त कलाओं को एकाकार करते हुए यूं पलटा कि यशवंत पर ही कत्ल करने की धमकी देने और ब्लैकमेलिंग करने व पैसे मांगने का आरोप लगाने लगा. (नीचे दिए गए टेप को सुनें)
असल में, दिक्कत तब शुरू हुई जब भड़ास पर सहारा क्रेडिट कार्ड चोरी प्रकरण से संबंधित खबर का प्रकाशन किया गया. सीसीटीवी फुटेज के प्रकाशन से तो यह दिक्कत चरम पर पहुंच गई. स्वतंत्र मिश्रा ने इसी खबर को लेकर घेरेबंदी शुरू कर दी. कार्ड चोरी प्रकरण की पहली खबर प्रकाशित होने पर मिश्रा ने लंबा प्रलाप किया. इस प्रकरण में भड़ास के पास कोई प्रमाण न होने की बात कही. उसके दबाव व धमकियों से कम, खुद के पास प्रमाण न होने की सच्चाई से ज्यादा प्रेरित होकर तात्कालिक तौर पर संबंधित वे खबरें भड़ास पर अप्रकाशित कर दी गईं जिनमें स्वतंत्र मिश्रा का नाम उजागर किया गया था और उन्हें आरोपी बताया गया था. खबरें यह लिखकर अप्रकाशित की गईं कि, मिलेंगे फिर, सुबूत प्रमाण के साथ. चौबीस घंटे भी नहीं बीते होंगे कि प्रमाण हाजिर. पर वह प्रमाण भी परम नाटकीय तरीके से सामने आया.
पता चला कि सहारा मीडिया के नए बॉस संदीप वाधवा की पीए के मुंबई स्थित आवास में रात में एक आदमी शीशा तोड़ कर घुसा और पूरा घर खंगाल मारा. जाहिर है, वह शख्स स्वतंत्र मिश्रा बिलकुल नहीं था, क्योंकि मोबाइल लोकेशन उनके उस दिन किसी दूसरे महानगर के मेन मार्केट के टावर से अटैच होने की सूचना दे रही थी. घुर में घुसा शख्स ज्वेलरी नगदी नहीं ले गया. वह कुछ तलाश रहा था. शायद सीसीटीवी फुटेज. उसे खबर थी की ओरीजनल सीसीटीवी फुटेज पीए के पास है. यह सूचना उसे सही मिली थी लेकिन पूरी नहीं. इस हरकत की भनक पाकर विरोधी खेमा एलर्ट हो गया और फुटेज को लीक कर दिया गया. फिर क्या, फुटेज की कई कापियां बनाकर मीडिया में बड़े पैमाने पर बांटी जाने लगी. यूट्यूब पर भी अपलोड कर दी गई. इसकी एक कापी भाई लोगों ने भड़ास के पास भी प्रेषित कर दी, लिफाफे पर सादर लिखकर.
भड़ास ने मिश्रा का बगैर नाम लिखे फुटेज दिखा दिया. फोटो वाले मिश्रा व फुटेज वाले मिश्रा में मेल नहीं था. मैं खुद पहचान नहीं पा रहा था. लेकिन मिश्रा अपनी शक्ल पहचानने से चूके नहीं. इसलिए, पहले मिन्नतें करता रहा कि 30 मार्च की शाम तक इस फुटेज का प्रकाशन भड़ास पर रोक दिया जाए. जब हम लोग नहीं माने तो उसने मिन्नत की जगह कत्ल-ओ-मौत की बातें शुरू कर दी. वह गाली-गलौज करते हुए धमाकने-नष्ट कर देने की घोषणाएं करने लगा.
अब मिश्रा जैसों को कौन समझाए कि उनका पतन कोई और नहीं, वे खुद अपने ही हाथों करते हैं. भगवान और मिथकों में भरोसा रखने वाले मिश्रा ने भस्मासुर की कहानी जरूर पढ़ी होगी. उसी कहानी को याद कर वह बस इतना जान लें कि वह खुद के कपार पर अपना हाथ रख ”ता-थैया सुन मेरे भैया” करने जा रहे हैं. अपन का घर पता ठिकाना वही पुराना वाला है. मौत और जीवन में भेद नहीं पाता क्योंकि जिस दिन से सुख-दुख और रात-दिन में भेद करना बंद कर दिया और दोनों को एक समझ लिया, उसी दिन मौत-जीवन, दोनों से मोहब्बत या भय खत्म हो गया, दोनों से निस्पृह हो गया.
आजकल स्वामी राम की जीवनी पढ़ रहा हूं. बाबतपुर एयरपोर्ट से तीन सौ रुपये में खरीदा. उसी में का एक प्रसंग याद आ रहा है. स्वामी राम कामनाओं, क्रोध आदि से मुक्त हो गए थे. भय से भी मुक्त हो चुके थे. लेकिन उनके अवचेतन में बसा एक भय गया नहीं था. वह भय था सांपों का. एक बार वह किसी दूर प्रदेश के मंदिर गए तो वहां की सिद्ध महिला ने उन्हें भी सिद्ध जान उस कमरे में रुकने को बोल दिया जिसमें ढेर सारे सांप रहते थे और बीच में एक तख्त रखा था. सोने के लिए. अंधेरे के कारण युवा स्वामी राम वहां घुस तो गए पर बाद में महसूस किया कि कई सांप कमरे में हैं. उनकी घिग्घी बंध गई. रात भर सोए नहीं, हिले भी नहीं. ध्यान साधना करते रहे. पर ध्यान साधना में भी फन काढ़े सांप नजर आते. आखिरकार सुबह होने पर जान बची तो लाखों पाए वाले अंदाज में वह वहां से नौ दो ग्यारह हुए और सीधे अपने गुरु के पास पहुंचे. वो जो कहना चाह रहे थे, गुरु उसे काफी समय से जान रहे थे. भय खत्म करने के लिए गुरु ने स्वामी राम के हाथ में कई सांप पकड़ाए और पकड़े रहने को कहा. उन्होंने समझाया- असीम शांति और असीम अहिंसा ग्रहण किए होने के कारण सच्चे साधु संतों का नुकसान कोई भी जानवर नहीं करता. किसी ने नहीं सुना होगा कि जंगलों-पहाड़ों में रहने वाले किसी सच्चे साधु को मौत किसी शेर के हमले के कारण या किसी सांप के काटने के कारण हुई है. जिस भय से स्वामी राम भाग रहे थे, वह भय तब भागा जब उन्होंने उस भय को अपने हाथ से पकड़ा, महसूस किया और जिया.
तो मिश्रा जी, भयाक्रांत करने वाला फंडा वहां आजमाइएगा जहां भय एक्जिस्ट करता हो, वहां नहीं जहां से एक्जिट कर चुका हो. भयों वाले जाने कितने सापों को अपने हाथों से पकड़ा महसूस किया और जिया है. आपके प्रति मेरे मन में पहले भी दुराग्रह नहीं था, आगे भी नहीं रहेगा, क्योंकि अपना काम किसी से आग्रह-दुराग्रह पालना नहीं बल्कि सामने आने वाली सुलभ-विकट खबरों-सूचनाओं को सबके सामने लाना है. चौथे खंभे के खबर बाजार उर्फ मछली बाजार के अंदर के शोर-शराबे-गंध-दुर्गंध को सामने लाना है. इसी का एक छोटा सा हिस्सा भर हैं आप.
आप जैसों सैकड़ों लोगों के धमकी भरे फोन और थाना-जेल झेल चुके हैं हम लोग. अब आदत-सी हो गई है. नया यह भर करने को बाकी है कि आप जैसा कोई किसी को सुपारी दे दें भड़ास वालों का डेरा-डंडा दुनिया से उठाने के लिए. मुझे पता है, ऐसा करने कराने वाले ढेर सारे अनडेमोक्रेटिक लोग मीडिया जैसे एक्सट्रीम डेमोक्रेटिक पेशे में खूब फल-फूल रहे हैं. सो यह कोई अकल्पनीय या असंभव नहीं है.
मुझे पता है कि आपका ईश्वर मेरे प्रति भी उतना ही न्यायी-अन्यायी रहेगा, जितना आपके प्रति. वह आपके-मेरे-सभी के प्रति समान नजरिया रखता है. आना-जाना तो सभी को है. किसी को सुबह, किसी को दोपहर तो किसी को रात में. सुबह जाने वालों के लिए रात को जाने के लिए लाइन में लगे थपोरी बजाएं तो समझ में नहीं आता. उदात्त नजरिया अपनाइए मिश्रा जी और इस नीचे दिए गए टेप को आप भी एक बार सुन लीजिएगा. सुन लीजिएगा कि मैंने आपसे कहा भी है कि यह टेप दुनिया को सुनाऊंगा, और मेरे इस कहने को सुनने के बाद आपने कैसे-कैसे उछलकूद दिखाए, वह भी सुन लीजिएगा. अस्थिर चित्त से अशांति बढ़ती है. सहज रहने में ही आनंद है. पर दिक्कत यह है कि आपने जितना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया है, वह साम्राज्य ही आपके दुखों का कारण बन रहा है, उसे संभालने में आपकी सहजता अचानक परम असहजता पर पहुंच जा रही है जो चरम अस्थिर चित्त का कारण बना है.
सुब्रत राय आपके बारे में जो फैसला करें. मेरा फैसला आपके बारे में आ चुका है. वह यह कि आप खुद अपने कर्मों से अपने पतन का रास्ता तैयार करेंगे क्योंकि ता-ता थैया के दौरान आत्ममुग्धता चरम पर होती ही है या इसके उलट यूं कह लीजिए कि प्रचंड आत्ममुग्धता में ही आदमी ता-ता थैया करता है.
जय हो.

यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया





