स्वतंत्र मिश्रा को मैं नहीं जानता। बिल्कुल भी नहीं। भड़ास पर क्रेडिट कार्ड की चोरी और उसपर लाखों की खरीदारी के मामले में यह नाम आने से पहले मैंने उनका नाम भी नहीं सुना था। क्रेडिट / डेबिट कार्ड खो जाने पर किसी भी व्यक्ति द्वारा उसपर खरीदारी कर लिया जाना बिल्कुल गलत है और मेरा मानना है कि यह सरकार के प्रश्रय से चल रहा है। वर्षों पहले क्रेडिट कार्ड पर कार्डधारक की फोटो लगाने की तकनीक या सुविधा देश में आ गई थी और अगर सभी क्रेडिट / डेबिट कार्ड पर धारक की फोटो लगाना जरूरी कर दिया जाए तो इसके दुरुपयोग की संभावना बहुत कम हो जाएगी।
इतना ही नहीं, दस्तखत मिलाने पर भी सख्ती कर दी जाए तो बात बन जाएगी पर उद्योग, बैंक, बाजार, सरकार सबके हित में है कि क्रेडिट कार्ड पर खूब खरीदारी हो और इसीलिए कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। क्रेडिट डेबिट कार्ड के जितने फायदे हैं वे इस लापरवाही के कारण नाकाम हो रहे हैं पर अभी तक किसी का ध्यान इस ओर नहीं है।
अपनी इस सोच के कारण जब सहारा के बड़े अधिकारी के क्रेडिट कार्ड की चोरी और फिर सहारा के ही एक अधिकारी द्वारा इसपर खरीदारी किए जाने की खबर पढ़ी तो इसमें मेरी दिलचस्पी जगी। मेरा मानना है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के फंसने पर इस मामले में कार्रवाई की संभावना है। संबंधित लोगों को समझ में आ जाए तो कार्ड पर फोटो लगाना या हस्ताक्षर मिलाना जरूरी कर दिया जाएगा और इससे क्रेडिट कार्ड की उपयोगिता काफी बढ़ जाएगी। सुरक्षित तो वह हो ही जाएगा। मुझे किसी का क्रेडिट कार्ड गिरा मिले तो मैं कभी उसका उपयोग नहीं करूंगा क्योंकि नहीं पकड़े जाने की संभावना मुझे बहुत कम नजर आती है।
छोटी खरीदारी हो तो कार्डधारक शिकायत ही न करे और मामला बन जाए ऐसा हो सकता है। पर छोटी खरीदारी में क्या लाभ। ऐसे में संपादक स्तर का कोई अधिकारी अपनी ही कंपनी के अफसर के कार्ड का दुरुपयोग करेगा इसकी संभावना मुझे बिल्कुल भी नहीं लग रही थी। लेकिन भड़ास पर यशवंत और स्वतंत्र मिश्रा की बातचीत का टेप सुनने के बाद लग रहा है कि स्वतंत्र भाई या तो बहुत ही भले हैं या फिर जैसा यशवंत ने लिखा है कई बार की कामयाबी ने उन्हें कुछ ज्यादा ही कांफीडेंट बना दिया है। उनकी अपनी संतोषी माता को लेकर भी।
भड़ास की शुरू की खबरों में उनका नाम नहीं था और वीडियो में उनकी फोटो देखकर जानने वाला उन्हें नहीं पहचान सकता है। इसके अलावा उन्होंने जो तर्क दिया वह भी संभव लगता है कि वे संयोग से वहां थे और उन्होंने तो नकद खरीदारी की थी। ये सारी बातें भड़ास की खबरों में हैं। ऐसे में उन्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं थी। फंसाया कमजोर आदमी को जा सकता है, स्वतंत्र मिश्रा जितना दमखम और संतोषी माता पर भरोसा जता रहे हैं, उन्हें कोई क्या फंसाएगा। फिर भी फंस गए हैं तो आपा क्यों खोना। जिस भरोसे से उन्होंने यशवंत को श्राप दिया है उतना ही भरोसा अपनी संतोषी माता पर करते तो शायद बच भी जाते पर अब धब्बा तो लग ही गया है।
यशवंत ने उनसे कहा भी है कि मेरा काम तो लोगों को खबर बताना है। आप मुझसे क्यों नाराज हो रहे हैं। यह तो किलिंग दि मैसेंजर वाला मामला है आदि। पर स्वतंत्र भाई यशवंत को जरा सी भी स्वतंत्रता देने को राजी नहीं हुए। शायद इसलिए कि यह कंपनी का मामला है और कंपनी के मैनेजिंग वर्कर सहारा श्री अभी वैसे ही सेबी से परेशान हैं। उसमें अपने सिपहसालारों से कहें कि आपस में निपट लो तो यह दाग जो स्वतंत्र मिश्रा पर लग गया है, पता नहीं कैसे छूटेगा। हां आर-पार की लड़ाई हो गई और स्वतंत्र भाई बेदाग बच गए तो जय संतोषी माता की।
वैसे, संतोषी माता या किसी भी भगवान के मामले में मेरा भी यशवंत की तरह यही मानना है कि आपका ईश्वर, होगा आपका मेरे प्रति भी उतना ही न्यायी-अन्यायी रहेगा, जितना आपके प्रति। वह आपके-मेरे-सभी के प्रति समान नजरिया रखेगा नहीं तो काहे का भगवान। इस मामले में भड़ास की एक और खबर अगर सही है तो काफी दिलचस्प है। सहारा मीडिया के नए बॉस संदीप वाधवा की पीए के मुंबई स्थित आवास में रात में एक आदमी शीशा तोड़ कर घुसा और पूरा घर खंगाल मारा। घर में घुसा शख्स जेवर नगदी नहीं ले गया। वह कुछ तलाश रहा था। शायद सीसीटीवी फुटेज। भड़ास के मुताबिक, उसे खबर थी की ओरिजनल सीसीटीवी फुटेज पीए के पास है। यह सूचना उसे सही मिली थी लेकिन पूरी नहीं। यानी सीसीटीवी फुटेज जहां की भी होगी, वहां से एक कॉपी बनाकर दी गई होगी और वही एक कॉपी संदीप वाधवा की पीए के पास होगी। लेकिन इसका यह मतलब कहां है कि सीसीटीवी फुटेज जहां रिकार्ड हुआ था वहां कुछ रह ही नहीं गया होगा। इसलिए, सही या गलत चाहे जिस कारण से भाई लोग परेशान हैं, बेकार ही परेशान हैं। वहां सीडी मिल भी जाती तो मामला खत्म थोड़े हो जाता। दूसरी ओर, हरकत की भनक पाकर विरोधी खेमा एलर्ट हो गया और भड़ास को अपेक्षाकृत आसानी से फुटेज मिल गया।
स्वतंत्र भाई नहीं चाहते थे कि इसे भड़ास पर अपलोड किया जाए। पर इसके लिए उन्होंने जो तरीका अपनाया वह बिल्कुल ही गैर पत्रकारीय था। यशवंत से अगर वे कुछ संयत ढंग से बात करते तो लगता कि वे निर्दोष हैं और उन्हें फंसाया गया है। पर वीडियो फुटेज अपलोड करने के लिए उन्होंने यशवंत को जो श्राप दिया है, जिस तरह इसे कर्ज बताया है और संतोषी माता में जो भरोसा दिखाया है उससे तो अब, वो कहते हैं ना, कि गेंद संतोषी माता के कोर्ट में है। स्वतंत्र भाई आपको तो अच्छी तरह सुन लिया अब आपकी संतोषी माता कैसे क्या करती हैं, का इंतजार कर रहा हूं।
संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्व-उद्यमी हैं. वे लंबे समय तक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जनसत्ता में वरिष्ठ पद पर रहे. उसके बाद उन्होंने अनुवाद की अपनी कंपनी प्रारंभ किया और लंबे समय से स्व-रोजगार के जरिए दिल्ली-एनसीआर में शान से रह रहे हैं. वे समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर बेबाक लेखन अखबारों, वेब, ब्लाग आदि पर करते रहते हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





