“नाश हो इस भड़ास का और उन तमाम सूअरों और कुत्तों का जो झुंड में चलते हैं…अरे शेर तो हमेशा अकेला चलता है…” … लानत है यशवंत भाई ऐसे शेर का आप शिकार करने निकल पड़े हैं। खुद तो कलम का निशाना साधे भड़ास की मचान पर बैठ गए हैं और शेर को फंसाने के लिए नीचे वीडियो का बकरा बांध दिया। शेर आया बकरे पर मुंह मारा और आप हैं कि ऐसे वक्त में भी शेर को गुदगुदी करने से बाज नहीं आ रहे।
शुक्र मनाइए कि शेर ने सिर्फ आपको अपना दिव्य और अलौकिक रूप ही दिखाया पंजा नहीं मारा। अब ये अलग बात है कि उसके पंजे में नाखून नहीं है, उसे आप जैसे ही सहकर्मियों ने उखाड़ फेंका है…सुना नहीं आपने..”मुझे अपनों ने ही लूटा गैरों में कहां इतना दम था”। कमाल करते हो आप भी…रंगे हाथों पकड़े जाने पर किसी से यूं मजाक नहीं किया जाता। आपको शेर के दर्द का थोड़ा भी एहसास नहीं…
मजाल क्या किसी की, छू ले दिलेर को,
वैसे तो धोखे से कुत्ते भी मार लेते हैं शेर को।
पूरी सहारा इंडिया कंपनी में मशहूर है और आप इसे चवन्नी छाप शेर बताकर खीसें निपोर रहे हैं।ये आपकी गलती नहीं है छात्र जीवन में मार्क्सवादी रहे हैं ना इसीलिए आपको इसमे कविताई नजर नहीं आ रही। तो क्या उखाड़ लिया आपने क्रांतिकारी विचारधारा से लैस होकर। पेशे से पत्रकार होकर भी आप किस चैनल में अपनी चौधराहट दिखा सके। अरे आपसे तो अच्छा ये शेर है और इसके जैसे कई सवा शेर हैं, जो ‘मसि कागद छुऔ नहीं कलम गही नहिं हाथ’ का जाप करते हुए मीडिया की मंडी में जमकर पंजीरी जीम रहे हैं। आपसे अच्छा तो ये नख दंत विहीन शेर है जो आपके विडियो के कर्ज को सूद सहित लौटाने की बात कर रहा है। वर्ना आज के दौर में कर्ज वसूलने के लिए तो सरकारी तहसीलदारों तक को नाकों चने चबाने पड़ते हैं।
लेकिन शेर इसीलिए तो शेर है कि उसने अपनी मां का दूध पिया है जबकि आप जैसे लोग मदर डेयरी का दूध भी चाय के बहाने ही पीते हैं। मैं आपकी बात नहीं, आप जैसे लोगों की बात कर रहा हूं। आपके बारे में तो मुझे अच्छी तरह से पता है कि पीने का नाम लेते ही आपके सामने शराब की बोतल नाचने लगती है। यशवंत भाई ये क्रांतिकारिता भी शराब के नशे से कम नहीं और इस नशे में आप एक स्वतंत्र शेर आदमी को वीडियो दिखाकर जला रहे हो। आपको मेरी सलाह है अगर आपमें थोड़ा सा भी धर्म कर्म बचा है तो चेत जाइये। वर्ना जिस दिन इस शेर आदमी की आभा से सामना हो गया तो पांव डगमगा जाएंगे।
एक सीधा सादा भक्त आदमी जो खुद को ईश्वर का प्रतिरूप मानता है उसके ऊपर आप लांक्षन लगा रहे हैं। खैर मनाइये कि महाप्रभु इस कलियुग में भी कोर्ट और कचहरी को नहीं मानते वर्ना सृष्टि का विनाश हो जाता। यशवंत भाई थेथरई मत कीजिए…चिकोटी काटकर चुम्मा लेने की आपको पुरानी बीमारी है। निर्मल बबवा को भी आपने इसी तरह से पलीता लगाकर हलकान किया था। लेकिन बबवा को देखिए…क्या उखाड़ लिया आपने…उल्टे आपको धोबी पछाड़ देकर फिर से कई चैनलों पर किरपा बरसाने लगा है। मुझे तो लगता है कि बबवा के सराप से ही आपको जेल की हवा खानी पड़ी थी। यशवंत भाई एक शुभचिंतक के नाते आपको जबरदस्ती सलाह दे रहा हूं…सुधर जाइए…बबवा के सराप से अभी उबरे नहीं हैं कि साक्षात दिव्य और अलौकिक परम पिता परमेश्वर के प्रतिरूप को चुनौती दे रहे हैं…कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो…कहीं आप बनारस से औघड़ई की दीक्षा लेकर तो नहीं आएं हैं ?…अगर ऐसा है तो अवधूत बाबा यशवंत की जै हो!!!
लेखक श्याम शिवनंदन मुंबई में टीवी सीरियल के लिए पटकथा लेखन से जुड़े हैं। कुछ दिनों तक मीडिया की मंडी में हाथ आजमाया और इस दौरान कई मीडिया के महारथियों को नजदीक से देखने जानने का मौका मिला। संपर्क : [email protected]
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