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यादें (एक) : देवनागरी का ज्ञान ही मेरे जीवन की बड़ी कमाई!

अतीत की यादें अक्सर हमारी स्मृति को कुरेदती हैं. और… गुजरी जिंदगी में कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जिन्हें हम चाहकर भी नहीं भूल सकते! किसी के भी जीवन में तीन अवस्थाएं बेहद खास होती हैं- बचपन, जवानी व बुढ़ापा. मैंने इनमें दो पड़ाव को, कुछ अपनी मर्जी से और कुछ जबरिया जी ही लिया है. इसलिए इनसे जुड़े किस्से का होना भी स्वाभाविक है. सही है कि जीवन कोई व्यवसाय नहीं, जिसके हर पल का हिसाब लिया जाए. लेकिन एक लेखक के तौर पर भावनाओं की पड़ताल कर, उसे लच्छेदार शब्दों में तब्दील करने की आदत सी हो चली है. सो, ना चाहने के बावजूद भी भावुक मन फ़्लैश बैक में चला ही जाता है. शुरुआत बीते बचपन से करना चाहूंगा.

अतीत की यादें अक्सर हमारी स्मृति को कुरेदती हैं. और… गुजरी जिंदगी में कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जिन्हें हम चाहकर भी नहीं भूल सकते! किसी के भी जीवन में तीन अवस्थाएं बेहद खास होती हैं- बचपन, जवानी व बुढ़ापा. मैंने इनमें दो पड़ाव को, कुछ अपनी मर्जी से और कुछ जबरिया जी ही लिया है. इसलिए इनसे जुड़े किस्से का होना भी स्वाभाविक है. सही है कि जीवन कोई व्यवसाय नहीं, जिसके हर पल का हिसाब लिया जाए. लेकिन एक लेखक के तौर पर भावनाओं की पड़ताल कर, उसे लच्छेदार शब्दों में तब्दील करने की आदत सी हो चली है. सो, ना चाहने के बावजूद भी भावुक मन फ़्लैश बैक में चला ही जाता है. शुरुआत बीते बचपन से करना चाहूंगा.

छुटपन से ही दादा का यह कथन सुनते हुए बड़ा हुआ, ‘खेलोगे-कूदोगे तो होखोगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब!’ दादा यानी आम ग्रामीण की तरह पूरे खेतिहर, स्वभाव से कर्मठ व जमीन से जुड़े एक इंसान. 20 बीघे जमीन जोतने वाले किसान थे वह. सो खेतों वाले झगड़े-फसाद में मुकदमा लड़ने को लेकर पूरे गाँव में उनकी कोई सानी नहीं थी. दूर-दराज के गरीब-गुरबे व मजदूर टाइप के लोग उनसे जमीनी विवाद से संबंधित कानूनी मशविरा लेने आते रहते थे. हालांकि मेरे दादा स्व. रामरीत सिंह किताबी जानकारी के मामले में अनपढ़ थे. लेकिन दुनियादारी के मामले में काफी व्यावहारिक व सुलझे हुए थे. कुछ इस तरह कि डिग्री वाले सज्जन भी सामने पानी भरने लगे. चाणक्य की इस नीति पर उनका अटूट भरोसा था, ‘राजा बनने से अच्छा है, दूसरे को राज-पाट दिलाओ.’ उनके दादा राम अवतार सिंह देश की आजादी के बाद से ही 33 वर्षों तक कनछेदवा पंचायत का मुखिया रहते हुए स्वर्ग सिधार गए. जब ग्रामीणों ने दादा को मुखिया (ग्राम प्रधान) पद संभालने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने सिरे से इसे ख़ारिज कर दिया. चूंकि उस वक्त मुखिया पद का चुनाव मतदान से नहीं होकर प्रत्यक्ष तरीके से होता था. उन्होंने अन्य व्यक्ति को समर्थन देकर मुखिया बनवा दिया.

अधेड़पन की बेला में दादा को गाँव की ही रात्रि पाठशाला में हिंदी भाषा का अक्षर ज्ञान मिला था. इसलिए अपना हस्ताक्षर तो करते ही थे, अख़बार व धार्मिक किताबों में छपे शब्दों की धर-पकड़ कर, उनका पाठ भी कभी-कभार कर लेते थे. मुझे वो दिन अभी भी याद हैं, जब बाबा मोतिहारी स्थित कचहरी से मुक़दमे की तारीख कर लौटते. कचहरी के वकीलों की कमाई व हकीमों के ठाट-बाट का वर्णन करते अघाते नहीं थे. शायद यह रात्रि पाठशाला में मिले ‘अक्षर ज्ञान’ का ही असर था कि दादा शिक्षा को लेकर बेहद संजीदा रहते थे, कम- से-कम मुझे तो ऐसा ही लगता है. दादा मुझे अच्छी पढ़ाई कर अफसर बनने की सलाह देते थे. उनका मानना था कि कड़ी मेहनत के बाद किसी भी महकमे में कोई बड़ा पद मिल जाएगा. तो फिर शेष जिंदगी रौब-रुआब व मजे से गुजरेगी. इस मायने में पिता जी जो कि अब इस दुनिया में नहीं हैं, तो उनसे भी बीस थे. दिल से नरम व स्वभाव से बेहद कड़क मिजाज वाले आदमी थे, पेशे से ठेकेदार. कद व चेहरा भी बिल्कुल अमिताभ बच्चन की तरह, पर थे बेहद स्मार्ट व दबंग व्यक्तित्व वाले. अक्सर ठेकेदारी के लिए टेंडर भरने जिला मुख्यालय जाना-आना व इंजीनियरों के साथ उनका उठना-बैठना लगा रहता था.

पिता जी जब देर रात घर लौटते तो प्रायः मां को सुनाकर कर कहते, यद्दपि उनका इशारा मेरी तरफ होता था. ‘अजी सुनती हो जी, फलाने एसई साहब के लड़के ने आईआईटी का एंट्रेंस निकाल लिया है!’ तो कभी किसी जेई साहब के लड़के की बीपीएससी पास कर एसडीओ बनने की बात कहते थे. मैं उस वक्त गाँव के ही ‘सैंट बोरिस विद्दालय’ (इसकी जिक्र बाद की सीरीज में करूंगा) में पांचवी का छात्र था. पिताजी की आए-दिन दी जाने वाली नसीहतें सुन-सुनकर कोफ़्त महसूस करता था. आखिर क्यों, गांव में रहने वाले एक अदने बच्चे की तुलना शहरी लड़कों से करते हैं? कहां बिजली के उजाले में रहकर अंग्रेजी कांवेंट में पढ़ने वाले वे बच्चे. और कहां प्राइमरी स्कूल में प्लास्टिक के बोरे पर बैठ देवनागरी लिपि में पढ़ने वाला यह नीचट देहाती, जो दुअरा पर ‘भुकभुकिया लालटेन’ की धूमिल रौशनी में देर रात गए बीटीसी की किताबों में उलझे हुए मच्छर मारते रहता. पता नहीं, क्यों जलन होने लगी थी, इन सब बातों से? लेकिन पिता जी का खौफ जेहन में इस कदर भरा हुआ था कि क्या मजाल हम मुंह से बगावत के एक शब्द भी निकाल सके. क्योंकि ये उम्र ही ऐसी होती है, जब डांट-फटकार से ज्यादा पिटाई का डर लगता है. मन ही मन घुटने व कोसने के अलावा चारा भी क्या था.

इसके बावजूद सच कहूं तो अपना अकादमिक सत्र बेहद ही ख़राब रहा. जाने क्यों, स्कूल के समय से ही इन कोर्स की किताबों से उबकाई आती रही है? इसी कारण ज्यादा सीरियसली पढ़ाई नहीं की कभी. बस किसी तरह स्नातक कर लिया, वह भी ताक-झांक करके. कुछ तक़दीर की भी मेहरबानी रही. वरना 28 साल की उम्र बीतने को है. बंदे को ये बात अभी तक समझ में नहीं आई कि इतने दिनों तक फिजूल में स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई में वक्त क्यों जाया किया? मैं तो देवनागरी ज्ञान यानी हिंदी की सतही जानकारी को ही जीवन की अमूल्य उपलब्धि मानता हूं. यहीं मेरी सबसे बड़ी कमाई भी है. बाकि जो भी पढ़ा महज क्लास पास करने के लिए, वह भी उस समाज के लोक-लाज के भय से जहां पला-बढ़ा, जिसका दबाव अभी भी झेल रहा हूं. यह कि पढ़-लिख कर जो सरकारी चाकरी पकड़ ले, चाहे वह चपरासी की नौकरी ही क्यों ना हो. बोले तो वही दुनिया में सबसे बड़ा ‘तीस मार खां’ है.

क्रमशः…

लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण में पत्रकारिता से जुड़े हैं. प्रस्तुत आलेख उनके ब्लॉग- मेघवाणी से साभार है. उनसे मो.न. 9473361087 पर संपर्क कर सकते हैं.

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