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वरिष्ठ पत्रकार श्याम माथुर की एक और पुस्तक : ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’

फिल्म विश्लेषक और पत्रकार श्याम माथुर की एक और किताब ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’ हाल ही प्रकाशित हुई है। इस किताब में उन्होंने दस समकालीन निर्देशकों के विस्तृत इंटरव्यू शामिल किए हैं और इस तरह आधुनिक सिनेमा की नवीन प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा के प्रचलित फॉर्मूलों के भीतर रहते हुए भी सिनेमाई मनोरंजन का एक नया मुहावरा रचने की कोशिश की है और इसमें वे किसी हद तक कामयाब भी हुए हैं।

फिल्म विश्लेषक और पत्रकार श्याम माथुर की एक और किताब ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’ हाल ही प्रकाशित हुई है। इस किताब में उन्होंने दस समकालीन निर्देशकों के विस्तृत इंटरव्यू शामिल किए हैं और इस तरह आधुनिक सिनेमा की नवीन प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा के प्रचलित फॉर्मूलों के भीतर रहते हुए भी सिनेमाई मनोरंजन का एक नया मुहावरा रचने की कोशिश की है और इसमें वे किसी हद तक कामयाब भी हुए हैं।

किताब के बारे में अपनी लंबी और जज्बाती भूमिका में  श्याम माथुर लिखते हैं, ‘….पिछले सौ वर्षों से यानी अपने जन्म से लेकर आज तक सिनेमा हमारे सुख-दुख का साथी रहा है। फिल्मों ने हमें हंसना और रोना सिखाया है, हमें अपने सपनों को नई बुलंदी देना सिखाया है, हमारी खुशियों को कहकहों की आवाज दी है, तो हमारे गमों को आंसुओं की सौगात भी दी है। ….जैसे परदे पर किरदार बदलते हैं, इधर पीढिय़ां बदल जाती हैं।….अगर कुछ नहीं बदलता है, तो वो है सिनेमा, जो हमेशा अपने सुपर हिट मेलोड्रामा के साथ नई और सार्थक संभावनाएं तलाशता रहता है।….’

कहने की शायद जरूरत नहीं है कि इधर फिल्मकारों की एक पूरी नई पीढ़ी सामने आ  गई है। करण जौहर से लेकर राजकुमार हीरानी तक या फिर  प्रकाश झा से लेकर दीपा मेहता  तक। हरेक की अपनी-अपनी प्रतिबद्धताएं  हैं और प्रतिबद्धता के बावजूद मनोरंजन के तत्व से भी उन्होंने किनारा नहीं किया है। नई पीढ़ी के फिल्मकारों में एक बात समान है और वह यह कि इस पीढ़ी ने सामाजिक विद्रूपताओं पर आंसू बहाने की बजाय उन्होने मनोरंजन के फॉर्मूलों के सहारे एक अनूठे और दिलचस्प तरीके से हमारे सामने रखा है और इन त्रासदियों को दूर करने की एक सार्थक पहल भी की है। वे अपने इस प्रयास में कहां तक कामयाब हुए हैं, यह जांचना समाज शास्त्रियों का काम है। लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि विषयों में नवीनता और मौलिकता के कारण उनकी फिल्मों ने एक बड़े दर्शक वर्ग को अपना बनाया है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जो सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर जुबान बंद नहीं रखते, बल्कि सिनेमा के जरिए और सिनेमा से इतर दूसरे मंचों पर मुखर रूप से खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि अपनी फिल्मों के जरिए परदे पर नई इबारत लिखने वाले लगभग सभी फिल्मकारों ने इंटरव्यू के दौरान अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में ईमानदारी से चर्चा की है। किताब हमें बताती है कि नई पीढ़ी के फिल्मकारों का मकसद साफ है – मनोरंजन के माध्यम से देश, दुनिया और समाज में परिवर्तन की मामूली ही सही, लेकिन उत्तेजक लहर पैदा करना।

‘सिनेमा का सफ़र’ को पढऩे के दौरान यह बात बार-बार रेखांकित होती है कि नई पीढ़ी के फिल्मकारों ने मानवीय गरिमा और जीवन मूल्यों को तरजीह देते हुए एक नए किस्म का सिनेमाई मुहावरा रचा है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जो सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं समझते। उनके लिए परछाइयों का यह खेल जीवन की सच्चाइयों को सामने लाने का एक प्रभावी जरिया है। उन्होंने यथार्थवादी संवेदनशीलता को बरकरार रखते हुए अपनी फिल्मों में अलहदा बिंब, रूपक और विधान रचे। यही कारण है कि बाहर से बहुत साधारण-सी नजर आने वाली उनकी फिल्मों में जब हम गहराई तक झांकते हैं, तो उनमें हमें हमारी जिंदगी का हर वो रंग नजर आता है, जो बेपनाह दर्द से गुजरने के बावजूद मुहब्बत की खुशबू से महकता रहा है।

ऐसे समय में जबकि भारतीय सिनेमा शताब्दी का जश्न मना  रहा है, वर्तमान दौर के चर्चित और कामयाब फिल्मकारों से गुफ्तगू करना, उनसे रूबरू होना एक अनूठे अहसास की अनुभूति कराता है। सिने प्रेमियों के साथ सिनेमा के शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। पुस्तक ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’ का प्रकाशन राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी ने किया है। पुस्तक में यथास्थान चित्रों का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है और ब्लैक एंड व्हाइट होते हुए भी तमाम चित्र आकर्षक स्वरूप में प्रकाशित किए गए हैं। 175 पेज की इस पुस्तक का मूल्य है 130 रुपए। जो सिने प्रेमी इस पुस्तक को प्राप्त करना चाहें, वे इस पते पर संपर्क कर सकते हैं– निदेशक, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्लॉट नं. 1, झालाना सांस्थानिक क्षेत्र, जयपुर – 302004 (फोन नंबर – 0141-2711129, 2710341)।

लेखक श्याम माथुर प्रिंट मीडिया का पच्चीस वर्ष का अनुभव  रखते हैं। फिल्म पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है और वे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में नियमित भागीदारी करते रहे हैं। वे समाचार वाचक के तौर पर आकाशवाणी से भी संबद्ध रहे हैं। सिनेमा, टेलीविजन और संगीत से जुड़े विषयों पर वे पिछले तीन दशकों से बहुआयामी लेखन कर रहे हैं। इससे पूर्व उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें ‘सिने पत्रकारिता’ (2009) को केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय के भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कारों की शृंखला में राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनकी एक और पुस्तक ‘वेब पत्रकारिता’ (2011) को केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है।

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