बच्चों के विकास के लिए चिंतित हैं डॉ. कलॉम : प्रो. यशपाल

जाने माने शिक्षाविद प्रो. यशपाल ने कहा है कि बच्चों के जरिये यह बात आनी चाहिए कि उनके शिक्षक कैसे हो? उसी के अनुसार अध्यापकों को प्रशिक्षण देना होगा। जब बच्चों को यह आजादी दी जायेगी तभी उनमें रचनात्मकता का विकास होगा। पूर्व यू.जी.सी. चेयरमैन और जे.एन.यू. के पूर्व चांसलर पदमभूषण प्रो. यशपाल मंगलवार को कुशीनगर आयें और प्रो. यशपाल बुधवार को बुद्ध पीजी कालेज में विज्ञान और प्रौ़द्योगिकी मन्त्रालय के सौजन्य से आयोजित इंस्पायर इंटर्नशिप कैंप में भाग लिये। ग्लोबल साइंस फोरम के लाईफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजे गये।

प्रो. यशपाल ने कहा कि बच्चों के विकास के प्रश्न पर पूर्व राष्ट्रपति डॉ0 एपीजे अब्दुल कलॉम ने विचार मांगे थे। मैने उनसे भी कहा कि बच्चों से पूछिये वे क्या चाहते हैं। उन्होने कहा कि आज के दौर में ज्यादा सोचने वाले लोग भी हैं और चालाक लोग भी हैं, किन्तु हमारी समस्यायें कुछ परिप्रेक्ष्य में अलग नही हैं। किसी क्षेत्र के पिछडेपन को आंकने को अलग-अलग मानक हैं। तथा डॉ कलाम सदैव बच्चों के विकास पर चिन्ति रहते है। पूर्वांचल की भूमि पर सतहीं पिछड़ापन किन्ही क्षेत्रो में दिखता है तो कही न कही यहां की मेधा का अपना अलग स्थान भी है।

छात्रों को विज्ञान की जानकारी देंगे

प्रो. यशपाल एक मार्च को दिग्विजय नाथ पोस्ट ग्रेजुएट कालेज गोरखपुर में शहर के विभिन्न स्कूलों के विद्यार्थियो की विज्ञान संबन्धी जिज्ञासाओं का समाधान करेगे। कार्यक्रम में प्रो. यशपाल बच्चों के प्रश्नों के उत्तर देगे। यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से शुरू होगा। मंगलवार को प्रो. यशपाल अपने पत्नी निर्मल पाल के साथ कुशीनगर पहुचे। में कहा कि बच्चों के जरिये यह बात आनी चाहिए कि उनके शिक्षक कैसे हो। उसी के अनुसार अध्यापकों को प्रशिक्षण देना होगा। जब बच्चों को यह आजादी दी जायेगी, तभी उनमें रचनात्मकता का विकास होगा।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट

राजस्व गांव के लिये बन टांगियों का धरना, सांसद चुनते हैं पर प्रधान नहीं

उत्तर प्रदेश में एक ऐसे भी समुदाय के लोग रहते हैं जो सांसद के लिये वोट देते हैं पर प्रधान के लिये मत देने का अधिकार नहीं है। यह हैं महराजगंज के सोहगी बरवॉ वन्य जीव प्रभाग के अंदर बसे बन टांगियां परिवार के लोग। महराजगंज जनपद में 42 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले जंगल में लगभग 5 हजार बन टांगियां परिवार रहते हैं। यह लोग 1937 से जंगल में टांगियां पद्धति से जंगल लगाते आये हैं।

टांगियां पद्धति अर्थात एक जगह पेड़ लगाने पर वह पौधा बडे़ हो जाने पर दूसरे जगह जाकर पुनः पौधा लगाना। इसके लिये वन विभाग इनको मजदूरी देता था तथा यह साखू के वृक्ष लगाने में माहिर होते हैं। धीरे-धीरे यह प्रथा जंगल से समाप्त हो गई। यह लोग जंगल में ही घर बनाकर रहना प्रारम्भ कर दिये। गरीब होने के कारण पैसे के अभाव में दूसरे जगह घर बनाकर भी नहीं रह सकते।

इनका जीवन भी जंगली जीवो के तरह हो गया। इनके पास मूल-भूत सुविधाओं का भी अभाव है। जंगल में यह पक्की मकान नहीं बना सकते नहीं इनके वच्चों को पढ़ने के लिये विद्यालय की कोई व्यवस्था है। इन्हे प्रधान चुनने कर भी हक नहीं है। पर ये लोग सांसद के चुनाव में अपना मत देते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इन लोगों के द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवायी करते हुये 2006-07 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन अधिकारों की मान्यता कानून नियमावली बनाकर इनके गॉवो को राजस्व गॉव का दर्जा देने के लिये राज्य सरकार को आदेश दिया। परन्तु अभी 6 वर्ष बीत जाने के बाद भी सरकार ने इनके गॉवो का राजस्व गॉव में घोषणा नहीं किया है।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

नेपाल के पूर्व युवराज गम्भीर, देश की जनता को नहीं है संवेदना

हार्ट अटैक के कारण पॉच दिन पूर्व बैंकाक के एक अस्पताल में भर्ती हुए नेपाल के पूर्व युवराज पारस शाह का अवस्था में अभी भी सुधार नहीं हुआ है। उनके शरीर का तापक्रम सामान्य से ज्यादा गर्म है। तथा ओपेन हर्ट सर्जरी करने की तैयारी चल रही है। पारस के उपचार कर रही डाक्टरों के पैनल ने आज यानि रविवार सुबज 10 बजे जानकारी दिये हैं,  कि अभी उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है।

मंगलवार के रात में पारस को बैंकाक स्थित एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डाक्टरों ने हाईपोर्थमियां विधि से शरीर को सामान्य विधि में लाने का प्रयास किया है। डाक्टरों के अनुसार उनके दिल का धड़कन एवं रक्त चांप अभी सामान्य स्थिति में नही है और उनके मस्तिष्क भी कोई प्रतिक्रिया नही दे रही है। पूर्व युवराज के मित्र एवं व्यापारी सुनिल खड़का उनके साथ अस्पताल में जमें  हुये हैं। उन्होने बताया कि आक्सीजन से उनके स्वांस प्रभाव को बनाया गया है। इसी वीच उनकी पत्नी हिमानी शाह शुक्रवार को अस्पताल पहुच गई हैं।

नेपाल के पूर्व युवराज इस समय जीवन और मृत्यु के वीच चल रहे हैं। इसी वीच उनके जीवन संबन्धी अनेक चर्चाओं से नेपाल की राजधानी काठमाण्डो में गर्मी छायी हुई है। तत्कालीन शक्तिशाली दरबार में उनके आतंक और उनका गुण्डागर्दी के कारण नेपाल जनता में उनके प्रति संवेदना समाप्त हो गया है। इस समय वह कोमा में हैं उनके जीवन के लिये जहां जनता को प्रार्थना करनी चाहिए दया दिखानी चाहिए वहीं नेपाली जनता इस समय खुशी के माहौल में दिख रही है। नेपाली जनता ने जुलुस निकालकर यह भी नारा दिया है कि भगवान के वहां देर है लेकिन अंधेर नही।

जनता का दुःखी न होना या संवेदना हीन होना छोटी बात नही है। लेकिन पारस की चरित्रहिनता ने जनता को हिलाकर रख दिया था। यह वही पारस हैं जो नेपाल की एक मॉडल को जबरन उठाकर ले गये और बलात्कार कर छोड़ दिया तथा बैंकाक में यही पारस चरस का सेवन करते हुये पकडे़ गये थे। यह सारी अव्यस्था पारस के संस्कार में  था। नेपाल में उतनी बडी़ घटना दरबार हत्या कांड  में भी पारस का हॉथ बताया जाता है।

भगवान विष्णु के अवतार कहे गये नेपाल के राजा वीरेन्द्र विक्रम शाह के हत्या से जनता तिलमिलाई हुई है। क्यों कि जनता के वीच में उनकी  एक पैठ थी। वह वेष बदल के काठमाण्डों की गलियों में जनता का हाल लेने घूमा करते थे। यह यही पारस हैं कि उसी गलियों में नेपालियों को गोली मारी तथा उनकी बहन-बच्चियों के साथ अभद्र व्यवहार भी किए। शायद आज नेपाल के पूर्व राजा होते तो नेपाल की राजशाही भी नही जाती। आज यही कारण है कि नेपालियो के वीच अपने प्यार खो देने से पारस को अपना देश भी नसीब नहीं हो रहा है। वह बैंकाक में शरण लिये हुए हैं। वही चरित्र हिनता के कारण उनकी पत्नी हिमानी भी उनसे दूर नेपाल में ही रहती है। बैंकाक में एक थाई महिला मित्र उनके साथ रहती है।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

नेपाल: प्रधान न्यायधीश ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने से किया इनकार

महराजगंज। पड़ोसी मुल्क नेपाल मे शनिवार को सर्वसम्मति से प्रधान न्यायाधीश खिलराज रेग्मी को प्रधानमंत्री चुने जाने के चौबीस घंटे बाद  रविवार की देर रात मामला विगड़ गया। श्री रेग्मी सियासी दलों के हस्तक्षेप से आजिज आकर राष्ट्रपति डा0 रामबरन यादव से मिलकर सशर्त प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया। जिससे एक बार फिर नेपाल की सियासत में अनिश्चय की स्थिति पैदा हो गयी है।

बीते वर्ष मई महीने से लेकर अब तक नेपाल की राजनीति में प्रधानमंत्री पद को लेकर उठापठक मची हुई है। जब सियासी दलो मे आपसी तालमेल नही बन पाया तो थक हार कर बीच का रास्ता निकाला गया। जिसमे यह तय हुआ कि प्रधान न्यायाधीश खिलराज रेग्मी को प्रधानमंत्री बनाकर उनके नेतृत्व में जून के पहले मुल्क में नये चुनाव करा दिये जायेंगे। शनिवार को सर्वसम्मति से मुल्क के प्रमुख दलो नेकपा माओवादी, कांगे्स, एमाले एवं मधेशी मोर्चा के नेताओं की आपसी सहमति के बाद श्री रेग्मी को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया गया। यह तय हुआ कि श्री रेग्मी शपथ लेकर मुल्क की बागडोर अपने हाथ में  लेंगे। तय कार्यक्रम के अनुसार रविवार को न्यायालय का काम  रेग्मी ने नही देखा परन्तु शाम होते-होते स्थिति दूसरी बनने लगी। नेताओं की दखलंदाजी से आजिज आकर श्री रेग्मी ने कहा कि देश इस समय संक्रमण काल की दशा से गुजर रहा है। इससे उबारने के लिए संयम की जरूरत है। दलो का हस्तक्षेप इस प्रयास को कमजोर करेगा।

श्री रेग्मी ने अपने नेतृत्व में बनने वाली सरकार के सहयोगी कौन-कौन होंगे, किसको कौन सा विभाग  मिलेगा इसके लिए स्वतंत्र निणर्य लेना चाहते है। परन्तु सियासी दल अपने हिसाब से विभाग और कार्य का बाटवारा करना चाहते है। रविवार को कई दौर की बैठक होने के बाद मामला नही बन पाया। ऊपर से जरूरत से ज्यादा दलो के हस्तक्षेप से आजिज आकर श्री रेग्मी देर रात राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति से अपनी मंशा जाहिर करते हुए सरकार का नेतृत्व करने से मना कर दिया। उन्होने साफ कहा कि मै किसी की शर्त के मुताबिक सरकार का नेतृत्व नही करूंगा। मेरी प्राथमिकता निष्पक्ष चुनाव की है। जब तक चुनाव हो नही जाता तब तक मै किसी दल का गैर जरूरी हस्तक्षेप स्वीकार नही करूंगा। श्री रेग्मी द्वारा लिये गये इस निर्णय से एक बार फिर नेपाल की सियासत में अनिश्चय की स्थिति पैदा हो गयी। दूसरी तरफ सियासी दल अब  इस उम्मीद मे है कि श्री रेग्मी ही चुनावी सरकार का नेतृत्व करे। तभी  मुल्क में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव हो सकते है।

महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

केन्द्र ने मृतकों के परिजनों के लिये भेजा 37 लाख

महराजगंज। नेपाल में  बीते 15 जुलाई को नहर में बस गिर जाने के कारण मारे गये भारतीय श्रद्धालुओं के परिजनों को प्रधानमंत्री राहत कोष से 37 लाख रूपया भेजा है।

उक्त जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय के सचिव उत्तर प्रदेश के सचिव को प्रेषित पत्र में प्रति ब्यक्ति एक-एक लाख रूपये की सहायता देने की घोषणा की है। इस संबन्ध में मुख्य सचिव के लिखे पत्र में इस बात की अपेक्षा की गई है कि नाम पता मृतकों का प्रधानमंत्री कार्यालय को बताया जाय। इस बात की जानकारी जिलाधिकारी सौम्या अग्रवाल ने दी है।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

एसपी साहब! वर्दी को संदेह से उबारिए

महराजगंज  पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी जितना भी वर्दी पर दाग लगने से बचाने के लिए कड़े निर्देश जारी कर दें पर इसका असर महकमें के नीचले पायदान पर आते आते बेअसर साबित होता है। उच्चाधिकारी अवैध शराब की बिक्री पर कभी तो इतना कड़ा निर्देश देते हैं  कि ऐसी शिकायतें मिलने पर थाना प्रभारी नपते । पर जमीनी हकीकत बिल्कुल विलोम ही है। इस पर नियंत्रण के बजाय वर्दी बकायदे इस कारोबार में शामिल हो गई है। इसका खुलासा निचलौल थानाक्षेत्र के सीमावर्ती शीतलापुर चौकी पर तैनात एक सिपाही द्वारा नेपाली शराब को चौकी से परागपुर गांव तक पहुंचाने के लिए सारी हदें पार किए जाने से हुआ है। सिपाही ने शराब न पहुंचाने पर उक्त टैम्पो चालक की पिटाई तक कर दी।

बता दें कि निचलौल थानाक्षेत्र के ग्राम करमहिया टोला अमड़ी निवासी हसमुद्दीन अंसारी पुत्र रफीक अंसारी ने बीते 11 फरवरी को सीओ निचलौल को शिकायती पत्र देकर अवगत कराया था कि आठ फरवरी की रात में 12 बजे के करीब शीतलापुर चौकी के एक सिपाही ने उसके घर आकर उसे अपना टैम्पो नेपाली शराब की तीस पेटी चौकी से परागपुर गांव तक पहुंचाने का दबाव बनाने लगा।

टैम्पो चालक द्वारा शराब लादकर पहुंचाने से इंकार किया तो उक्त सिपाही ने उसे गाली गुप्ता देते हुए उसकी पिटाई कर दिया। इतना ही नहीं उसकी पत्नी द्वारा विरोध किए जाने पर उसे भी सिपाही ने थप्पड़ से पिटाई कर दिया। पीड़ित का यह भी आरोप है कि सिपाही द्वारा अगले दिन अमड़ी पुल पर भी दुर्व्यवहार करते हुए टैम्पो को सीज करने की धमकी दी गई। इस पूरे प्रकरण से इस बात का खुलासा हो रहा है कि सीमावर्ती चौकियों पर तैनात सिपाही भी नेपाली शराब की तस्करी करा रहे हैं।

इनके द्वारा नेपाल से सीमा तक कैरियरों से नेपाली शराब मंगाकर निचलौल से सटे गांवों परागपुर, सिरौली, ओड़वलिया, बैदौली, टिकुलहियां आदि गांवों तक पहुंचाई जा रही है। इन गांवों में दुकानों पर नेपाली शराब की बिक्री जोरों पर चल रही है। सिपाहियों द्वारा थोक मात्रा में नेपाली शराब को पहुंचाकर अच्छा खासा साइड बिजनेस किया जा रहा है।

इस संबंध में पूछे जाने पर सीओ निचलौल रविन्द्र कुमार वर्मा ने बताया कि इस तरह का मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। यदि ऐसा है तो यह गंभीर मामला है। इसकी जांच की जाएगी

महराजगंग से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट

महराजगंज जिले में अमर उजाला हुआ नंबर वन

 

महराजगंज। अमर उजाला ने पाठकों को बाधते हुये अपना सर्कुलेसन भी बढा़ लिया है। मात्र कम समय में जिले में अमर उजाला के अखबार की प्रतियां 11800 से 12000 के बीच हैं। वहीं दैनिक जागरण का 8400 से 8800 के बीच हैं। हिन्दुस्तान 7400 से 7800 के बीच बिक रही है। वहीं सहारा 5500 से 5800 के बीच है। जबकि साल भर के अंदर शुरू हुयी जनसंदेश 2000 से 2200 के बीच है। महराजगंज जनपद में दैनिक जागरण का गढ़ रहा है। परन्तु अपने कुप्रबन्धक के चलते जिले में नंबर दो हो गया। वहीं बताया जाता है कि अमर उजाला के ब्यूरो प्रभारी का व्यक्तिगत संबन्ध अच्छा होने से अमर उजाला अचानक जिले में नंबर वन हो गया।    

वन्यजीव अपराधी का पुलिस से रहा है गहरा रिश्ता

 

महराजगंज  सोहगीबरवां वन्यजीव प्रभाग के निचलौल रेंज के जंगल सटे बढ़या गांव के पास मंगलवार को हिरन के खाल, सिंग, चरस व अवैध असलहे के साथ पकड़ा गया चर्चित आरोपी वर्षों से पुलिस से गहरा रिश्ता बनाकर अवैध कारोबार में लिप्त रहा है। आए दिन थाने पर दिखाई देने वाला यह व्यक्ति इतनी गंभीर  वारदात में शामिल होगा इस पर तनिक भी विश्वास नहीं हो रहा है। लेकिन इसके अन्दर की कहानी से पुलिस के रिश्तों की आड़ में अवैध कारोबार के संचालन को बल मिलना बताया जा रहा है। बताया जाता है कि बढ़या स्थित उसके घर पर नेपाल के एक आदमी का आवागमन बना रहता है जिसके माध्यम से नेपाल से तस्करी की बस्तुएं उक्त व्यक्ति व उसके लड़कों द्वारा पड़ोसी जिलों तक भेजी जाती हैं। वन विभाग के लोग इस मामले में सक्रिय नही हुए होते तो पुलिस अपनी वाली कर ही देती।

   

 बता दें कि मंगलवार की सुबह वन विभाग के अधिकारियों को सूचना मिलने पर निचलौल रेंज के वन दारोगा सरजू प्रसाद, विनय गौड़ व रविन्द्र प्रताप ने बढ़या नहर पुल पर दो मोटरसाइकिलों पर बोरे में रखकर हिरन की खाल, सिंग, चरस व अवैध बन्दूक मय जिन्दा कारतूस के साथ बढ़या टोला गेठियहवां निवासी नरेंद्र बहादुर सिंह व उसके पुत्र लक्ष्मण को पकड़ा था। वहां से निचलौल रेंज तक आते समय निचलौल एसओ पवन सिंह भी रास्ते में मिल गए। जिनके साथ ये लोग निचलौल आए पुलिस इस मामले को अपने खाते में लेकर इसकी कहानी नरेंद्र बहादुर के गांव के कुछ लोगों के साथ जोड़कर साजिश के तहत गंभीर मामले में फंसाने की बात से जोड़ रही थी। रेंजर निचलौल के कड़े रूख से पुलिस पूरे मामले को वन विभाग को सौंप दिया। बताया जाता है कि पकड़ा गया अभियुक्त नरेंद्र बहादुर सिंह आए दिन थाने पर दिखाई देता रहता है। यहां के अधिकारियों के साथ बैठकर मनमाफिक कार्य कराता रहता है। वहीं पुलिस के रिश्तों की डोर में  अवैध कारोबार के तार भी जुड़े हैं। बताया जाता है कि कुछ वर्ष पहले उसके लड़के अवैध शराब के साथ पकड़े जा चुके हैं। तथा उसके बढ़या स्थित घर पर नेपाल का एक रामू नामक व्यक्ति आता जाता रहता है। जिसके माध्यम से नेपाल से नशीले पदार्थों की तस्करी होती रही है। आसपास के गांवों के लोगों की बात माने तो उसके घर से खड्डा कुशीनगर तक जंगल के रास्ते मादक पदार्थों की तस्करी मोटरसाइकिलों के जरिए की जाती है। इधर पुलिस उक्त आरोपी के रिश्ते निभाने के चक्कर में उसके गांव के कुछ लोगों को बुलाकर प्रताड़ित भी कर रही है। पुलिस का मानना है कि नरेंद्र को गांव के कुछ लोग जिनसे नरेंद्र का भूमि विवाद है ऐसे लोगों ने साजिश करके उसे फंसाया है। निचलौल रेंजर एके मिश्र ने बताया कि हिरन की खाल व सिंग पकड़े जाने के मामले में नरेंद्र बहादुर के विरूद्ध वन्यजीव अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इसकी जांच एसडीओ वन सदर महराजगंज द्वारा की जा रही है। साथ ही चरस व अवैघ असलहे के मामले को पुलिस को सुपुर्द कर दिया गया है। वही पुलिस अधिकारी मामले को अब भी पचाने में लगे है

                                                                                                                       महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट

दो धड़ों में बंटी सपा कैसे पूरा करेगी मिशन 2014

 

 

 महराजगंज   विगत दो चुनावों में अमर मणि की चमक फीकी पड़ने के बाद भी सपा जिले में दो धड़ों में बंटी दिख रही है। नतीजा एक धड़ों के कार्यक्रमों में दूसरे धड़ों के लोग शामिल नहीं हो रहे हैं। अभी बीते रविवार को सपा के पूर्व सांसद व घोषित प्रत्याशी  कुंवर अखिलेश सिंह ने नौतनवां से धानी तक रोड शो किया। लेकिन इस रोड शो में भी पहले की ही तरह सपा के कई वरिष्ठ नेता व पदाधिकारी नहीं शामिल हुए जो सपा की जिला इकाई में चल रही अन्दरूनी वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा माना जा रहा है। निश्चित ही यह लड़ाई सपा के मिशन 2014 के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता है।  

 

   उल्लेखनीय है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह 2014 में होने वाले संसदीय चुनाव से केन्द्र में सपा की अगुआई की सरकार बनाने का ताना बाना बुनने में लगे हुए हैं। विगत विधान सभा चुनाव में जिस तरह से सपा  प्रदेश में अपने बूते पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुई उससे आगामी संसदीय चुनाव में सपा से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद सपा मुखिया ने लगा रखी है। देश का सबसे बड़ा प्रदेश होने के कारण केन्द्र में प्रधान मंत्री बनने का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है। अगर सपा विधान सभा के अपने प्रदर्शन को संसदीय चुनाव में दोहरा पाने में सफल होती है तो उसे पचास से साठ के बीच सीटें मिल सकती हैं। इस स्थिति में कांग्रेस का विकल्प बन पाने में भाजपा की असफलता देश में थर्ड फ्रंट को एक बार फिर मजबूत कर सकती है और अगर ऐसा हुआ तो सबसे बड़ा घटक होने के कारण मुलायम सिंह की प्रधान मंत्री पद की दावेदारी पर मुहर लगना आसान हो जाएगा। लेकिन इसके लिए सपा के कार्यकर्ताओं का संगठित व समर्पित प्रयास जरूरी है।

   बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में जिले के साथ साथ सपा में मणि परिवार के बढ़ते वर्चस्व ने धीरे धीरे सांसद कुंवर अखिलेश सिंह केा जिले की राजनीति में ही नहीं वल्कि संगठन में भी हाशिए पर कर दिया था। इस बीच कुंवर अखिलेश किसी न किसी कारण से राजनीति में सक्रिय भूमिका में भी नहीं रहे जिसके कारण उन्हें अब अपना जनाधार वापस पाने के लिए भी संधर्ष करना पड़ रहा है। लेकिन जबसे सपा ने जिले में उन्हें अपना प्रत्याशी घोषित किया है तबसे जिले में सपा दो धड़ों  में विभाजित हो गई है। सपा सदस्यों और पदाधिकारियों का यह विखराव पिछले दिनों हुए सभी कार्यक्रमों में स्पष्ट दिखाई पड़ा। यहां तक कि हाल में हुए रोड शो में भी सपा के कई नामचीन चेहरे नहीं दिखाई पड़े। कुवंर के अपने जनाधार का हाल भी कुछ खास नहीं रहा नवतनवां से चले काफिले में कोई नया चेहरा जुड़ता नहीं देखा गया लेकिन काफिले के आगे बढ़ने के साथ ही धीरे धीरे साथ चलने वाले चेहरों में कमी आती गई जो इस बात का संकेत है कि मिशन 2014 को फतह करने के लिए को अपनी पुरानी पहचान बदलने के साथ ही संगठन में एका हासिल करने और अपने जनाधार को व्यापक विस्तार देने के लिए भी कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। लेकिन फिलहाल तो जिले में संगठन का दो घड़ों में बंटा होना मिशन 2014 लिए शुभ संकेत नहीं है।

                                                                                           महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट …………………….

मैं प्रधानमंत्री पद की रेस में नहीं : प्रचंड

नेपाल में राजनीतिक उठापटक का दौर चल रहा है. प्रधानमंत्री पद को लेकर नेपाल में बीते कई दिनों से राजनीति गरमाई है. इन सबके बीच उठे प्रधानमंत्री पद पर प्रचंड की दावेदारी को उन्होंने ही नकार दिया. प्रधानमंत्री बाबू राम भटराई ने भी  प्रचंड का विरोध किया है, जबकि प्रचंड ही माओवाद के नेपाल में जन्मदाता हैं.

एकीकृत माओवादी के दोनों शीर्ष नेताओ ने कहा की प्रचंड के प्रधानमंत्री होने की बात केवल मजाक में कही गयी थी, इसका निहतार्थ नहीं निकाला जाना चाहिए था. विरोधी दलों के विरोध से कुछ असर नहीं पड़ने वाला है. पार्टी के भीतर कोई विवाद  नहीं है. बताया जाता है कि बैठक में प्रधानमंत्री बाबू राम भाटराई व प्रचंड के बीच नोक झोक होती रही

महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट  

महराजगंज के युवक ने राजस्थान में रेप के बाद की हत्या

राजस्थान के राजसमंद जिले में महराजगंज के घुघली थाना क्षेत्र के 32 वर्षीय युवक मनोज प्रताप सिंह की दरिन्दगी से पूरा प्रदेश हिल गया है। युवक ने एक मंद वुद्धि लड़की से रेप के वाद सबूत मिटाने के लिये ईट से कुचल-कुचल कर हत्या कर दी। परिवार जनों के संदेह पर पुलिस ने मनोज से पूछताछ की तो उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। महराजगंज में रहने वाले आरोपित के पिता बेटे के कृत्य से सदमें हैं। उन्होने कहा कि फॉसी हो या उम्र कैद, बेटे की पैरवी नहीं करूंगा। राजस्थान के राजसमंद जिले में 8 वर्षीय वच्ची से रेप का अरोपित मनोज प्रताप सिंह राजस्थान के राजसमंद जिले में मार्बल का कार्य करता था।

गुरूवार को वहॉ काकरोली थाना क्षेत्र में सब्जी वेचने वाले की 8 वर्षीय बेटी पुष्पा (काल्पनिक नाम) को चाकलेट और कुरकुरे देने के बहाने सुनसान जगह ले गया। वच्ची से दुष्कर्म के बाद युवक ने सबूत मिटाने के लिये ईट से कुचल-कुचल कर हत्या कर दी। दरिन्दगी का इन्तहा करते हुये वहसी युवक ने किशोरी को अपने जैकेट में छुपाया और पास ही पुलिया के नीचे फेंककर भाग गया। घटना शाम 6 से 10 बजे बीच की है। वच्ची के न मिलने पर परिवारजनों ने मनोज पर संदेह जताते हुये कार्यवाही की मॉग की। पुलिस की पूछताछ में मनोज ने जुर्म कबूल कर लिया।

मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की सिफारिश

पुष्पा से दुष्कर्म और हत्या के आरोपी मनोज प्रताप सिंह की निशानदेही पर वच्ची का शव बरामद कर लिया गया है। राजसमंद के कलेक्टर प्रीतम बी ने स्थानीय विधायक व सभापति के नेतृत्व में लोगों के गुस्से को देखते हुये तत्काल मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की सिफारिश गृह मंत्रालय को भेज दिया है। राजसमंद के एस.पी. राहुल काटोकी का कहना है कि अरोपी की निशानदेही पर ही पुष्पा का शव बरामद किया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 20 से अधिक घाव के निशान हैं।

बेटे की पैरवी करने नहीं जाउंगा

महराजगंज के घुघली थाना क्षेत्र के एक गांव में किसानी करने वाले अरोपी के पिता ने भडा़स4मीडिया से बातचीत में बेटे के कृत्य पर बड़ा अफसोस जताया। उनका कहना है कि क्या हुआ, कैसे हुआ, उन्हें कुछ नहीं पता है। यदि आरोप सही है तो उसे फॉसी हो जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि शुक्रवार को राजस्थान से बेटे की गिरफ्तारी का संदेश ज्ञानेंद्र त्रिपाठीआया था। तभी से पूरा परिवार सदमें में है। बेटे ने परिवार की इज्जत को तार-तार कर दिया है। कुछ भी हो जाय, हम राजस्थान कोर्ट में पैरवी करने नहीं जाएंगे। अरोपी युवक 5 साल पहले रोजी-रोटी के लिये राजस्थान के राजसमंद गया था। युवक की शादी हो चुकी है। उसके वच्चे भी हैं। गांव के ग्राम प्रधान ने बताया कि गांव पर वच्चे की साख काफी अच्छी है। स्थानीय थाने में कभी भी किसी भी प्रकार का मुकदमा दर्ज नहीं है। 

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

हजारों विदेशी पक्षियों ने बखिरा ताल में डेरा डाला

पूर्वी उत्तर प्रदेश का बखिरा ताल इस समय मेहमान पक्षियों का शरणस्थली बना हुआ है। विदेशी मेहमान पक्षी अपने साथियों के साथ कलरव करते इस ताल में दिखाई दे रहे हैं। पूर्वांचल का यह ताल 2894 वर्ग किमी में फैला हुआ है। 1990 में सरकार द्वारा इसे बखिरा पक्षी विहार घोषित किया गया है।

1085 किमी की परिधि में आस-पास के गॉवों में पक्षियों के साथ में कोलाहल मची हुयी है। लगभग 10 हजार की संख्या में एक साथ पक्षियों का उड़ना और कोलाहल करना सबको मंत्रमुग्ध करता है। इन्हें देखने के लिये स्थानीय जिलों से सैलानी तो आ ही रहे हैं, वहीं पक्षीय विशेषज्ञ भी अपना डेरा जमाये हुये हैं।

शैवाल,  अन्य छोटे पौधे, घोंघे, कीड़े और बहुतायत में मछलियां यहां पक्षियों को आकर्षित करती हैं। विभिन्न किस्मों के छोटे जलीय जीव लगभग 5000 किमी से अधिक दूर से आने वाले साईवेरियन पक्षियों के लिए खाने का माध्यम बनते हैं।  वन विभाग इनके संरक्षण एवं संवर्धन के लिये उत्सुक दिखायी दे रहा है।

क्यों आते हैं पक्षी

साईबेरिया देशों में दिसम्बर से मार्च तक तापमान लगभग शून्य से 20 डिग्री तक नीचे चला जाता है। वहां ताल नदियॉ, झीलें सब बर्फ के रूप में तब्दील हो जाती हैं। ऐसे में पक्षियों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। ठिठुराने वाली ठंड के कारण खाना बनने वाले जीव या तो मर जाते हैं जमीन में छिपकर शीतनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिये पक्षियों को अपना भोजन खोजना और जिन्दा रहना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में पक्षी भारत जैसे गरम देशों में चले जाते हैं जहॉ आसानी से अपना भोजन मिल जाता है और झीलों में पानी, हरीयाली बनी रहती है। जहॉ एक ओर ग्लोबल वार्मिंग की दिक्कत वहीं कजाकिस्तान उजबेकिस्तान और तुर्कीमिस्तान में इनके प्रतिकूल मौसम भारत के तरफ इनको खींच लाती है। दिसंबर के महीने में भी ठंडक सामान्य से भी ज्यादा ठीक रहता है। यहां इन्हे संरक्षण एवं संवर्धन भी प्राप्त होता है। बखिरा में सैलानी पक्षियों के प्रवास में दो फीसदी की वृद्धि इस वर्ष दर्ज हो चुकी है।

कैसे करते हैं यात्रा

विदेशी पक्षी लाखों की संख्या में जब हमारे देश में आते हैं तब एक प्रश्न उठता है कि यह हमें ये यात्रा के दौरान दिखाई क्यों नहीं देते? दरअसल ये रात के समय ही उड़ान भरते हैं और इनके बड़े-बडे़ झुण्ड लगभग 8 हजार मीटर से भी उपर से उडा़न भरते हैं, ऐसे में हम उन्हें देख नहीं सकते। लगभग प्रत्येक साल आने वाले ये पक्षी अपने जेनेटिक गुण के कारण रास्ते की जानकरी अच्छी तरह से याद रखते हैं।

मेहमान कैसे-कैसे

इन बखिरा ताल में आगन्तुकों में साईबेरियन सारस, किंग फिशर, गुलाबी मैना, ग्रेटर फ्लेमिंगों, कामन ग्रीन शैंक, नार्दन पिन लेट, रोजी पेलिकन, गैडवेल, कैमा हेरीवन, सुर्खाव समेंत दर्जनों विदेशी मेंहमानों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है।

बखिरा ताल की सुरक्षा

ताल की सुरक्षा के लिये विभाग ने लगभग ताल को 20 जोन में बॉट दिया है। ताल के अगल-बगल किटनाशक दवाओं का प्रयोग पूर्णतया से बंद करा दिया है। इनके संरक्षण के लिये वाच टावर से रखवाली की जा रही है। वहीं पक्षी विशेषज्ञ और बखिरा के रेन्जर आर0 एन0 चौधरी पक्षियों को सुरक्षा के लिये वर्कशाला आयोजित कर लोंगो को जागरूक कर रहे हैं।

महराजगंज से ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

टीम अन्ना ने भी प्रचार में उतरने का फैसला लिया

अन्ना हजारे की टीम ने भी चुनाव प्रचार के मैदान में उतरने का फैसला कर लिया है. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद अपने गांव रालेगन सिद्धि में आराम कर रहे अन्ना से टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल ने मुलाकात करने के बाद इस खबर का ऐलान किया.

पाँच प्रदेशों में होने वाले चुनावों के प्रचार पर उन्होंने कहा कि टीम किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में प्रचार नहीं करेगी, केवल जनता को लोकपाल बिल के बारे में ज्यादा से ज्यादा जागरूक किया जाएगा, ताकि मतदान के वक्त लोग सोच समझ कर फैसला करें. अभी तक ये तय नहीं हुआ है कि अन्ना खुद इस प्रचार अभियान का हिस्सा बनेंगे या नहीं. टीम के सदस्यों का कहना है कि ये अन्ना की तबीयत पर निर्भर करता है.

एक करोड़ में ढंकी जाएंगी मूर्तियां

हाई कोर्ट तक मामला पहुंचने के बाद भी मायावती अपनी मूर्तियों को पर्दे के पीछे जाने से नहीं रोक सकीं. चुनाव आयोग के आदेश का पालन करते हुए लखनऊ और नोएडा में आज मूर्तियों को ढंकने का काम हो रहा है. पॉलिथिन से न ढंक कर मूर्तियों के चारों ओर होर्डिंग लगाए जाएंगे, जिनका कुल खर्च करीब एक करोड़ रूपए के आसपास होगा.

गौरतलब है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि पूरे उत्तर प्रदेश में लगी ये मूर्तियां चुनावों के दौरान मायावती के लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं. उनका कहना था कि ये मूर्तियां चुनाव प्रचार में माया और उनकी पार्टी की बड़ी सहायक साबित होंगी. इसके बाद आयोग ने 11 जनवरी तक मूर्तियों को ढकने के आदेश दे दिए, जिसके खिलाफ कल इलाहाबाद हाई कोर्ट में शिकायत की गई थी और अदालत ने सुनवाई की तारीख 11 जनवरी की दी है. अब अदालत का क्या फैसला होगा और उस फैसले के बाद मूर्तियों का क्या होगा, ये तो आने वाले वक्त में ही पता चल सकेगा.

उत्तराखंड में खंडूरी और कोश्यारी की जोड़ी ने निशंक को किनारे लगाया

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की हाईटेक रणनीति व कोश्यारी की कूटनीति के चलते भाजपा के 11 विधायकों को टिकट से हाथ धोना पड़ा है. इसके अलावा आधा दर्जन विधायकों के टिकट कटने लगभग तय थे, लेकिन अंसतोष बढने की संभावनाओं को देखते हुए पार्टी थिंक टैंक को अंतिम समय में अपना निर्णय बदलना पड़ा. टिकट न मिलने वालों में दो काबीना मंत्री व दो पूर्व मंत्री भी शामिल हैं.

बेटी को टिकट न मिलने से आहत पूर्व मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी खुले तौर पर अपनी नाराजगी मीडिया में बयान कर रहे हैं. टिकट वितरण में गडकरी व कोश्यारी के साथ ही मुख्यमंत्री खण्डूरी भी अपने चहेतों को टिकट देने में कामयाब रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान निशंक खेमे को उठाना पड़ा है. टिकट से महरूम अधिकांश भाजपा विधायक बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. हालांकि कांग्रेस में भी टिकट वितरण को लेकर बवाल मचा है, लेकिन सत्ताधारी दल के मुकाबले वहां भीतरघात होने की संभावना कम है. अब देखना दिलचस्प होगा कि दोनों दलों में उपजे असंतोष से ये दल कैसे निपटते हैं.

गौरतलब है कि गडकरी के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद से ही पार्टी में नये नये प्रयोग किये जा रहे हैं. ऐसा प्रयोग वो बिहार विधान सभा चुनाव में भी कर चुके हैं. इसी फार्मूले के तहत उत्तराखण्ड में कई दौर में सर्वे कराये गये. इसमें राज्य में पार्टी की सत्ता में वापिसी की संभावनाएं बेहद कम आंकी गई. डैमेज कंट्रोल के तौर पर खण्डूरी की चुनाव से चार माह पहले ताजपोशी की गई. यहां उल्लेखनीय है कि ये गडकरी ही थे जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर लगातार लग रहे आरोपों के बावजूद उनकी पीठ ठोकते रहे. लेकिन केन्द्र में अपनी साख बचाने व संघ के दवाब के चलते उनको निशंक को हटाने का फैसला करना पडा.

खण्डूरी की वापसी में कोश्यारी की भूमिका किसी से छिपी नही है. यही कारण रहा कि टिकट बंटवारे में कोश्यारी खेमा अन्य नेताओं पर भारी पडा. केवल कुमांऊ में ही नहीं, कोश्यारी गढवाल मंडल में भी अपने चहेतों को टिकट दिलाने में कामयाब रहे. इस पूरी एक्सरसाइज में पूर्व मुख्यमंत्री जो कभी गडकरी के खासमखास थे, को सबसे ज्यादा राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ा है. खासतौर से निष्ठा बदलने व सत्ता की परिक्रमा करने वाले चाटुकारों को हाथ मलने पर विवश होना पड़ा. कभी कोश्यारी व खण्डूरी के इर्द गिर्द घूमने वाले उन छुटभैया नेताओं को नेता द्वय ने अच्छा सबक सिखाया, जिन्होंने राजनैतिक महत्वाकांक्षा के चलते निशंक का दामन थामा था. कोश्यारी के साथ भाजपा का ककहरा पढने वाले व बाद में खण्डूरी के करीब रहने वाले अधिकांश उन विधायकों को टिकट से हाथ धोना पड़ा, जिन्होंने निशंक में निष्ठा जताई थी. जिन 11 विधायकों का टिकट काटा गया उसमें से अधिकांश को इसकी कीमत चुकानी पड़ी.

कुल मिलाकर भारतीय जनता पार्टी में टिकट वितरण के बाद जो राजनैतिक हालात पैदा हुए हैं, उससे पार्टी का अंतरकहल खुलकर सामने आ गया है. यदि बगावत पर उतर आये बागियों को मनाने की कोशिश नहीं की गई तो सत्ता में वापसी की पार्टी की उम्मीदों पर ग्रहण लगना तय है.

निष्ठा बदलने वाले नेताओं को सिखाया सबक

मुख्यमंत्री खण्डूरी व कोश्यारी की जुगलबंदी ने पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की उम्मीदों पर पलीता लगा दिया है. कभी एक दूसरे के धुर विरोधी रहे इन दोनों नेताओं ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हाथ मिला लेने का नुकसान निशंक खेमे को उठाना पडा है. टिकट की मंशा पाले जिन सत्तालोलुपों ने निशंक का दामन था उनको इस पूरे खेल में मुंह की खानी पडी है. ऐसे दो दर्जन से अधिक नेता हैं, जिन्होंने अपना टिकट पक्का मानकर कई महीने पहले ही चुनाव तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन अचानक हुए सत्ता परिवर्तन की मार का असर इन नेताओं को भी झेलना पडा है.

निशंक का सिपहसलार बनने का खामियाजा आधे दर्जन से अधिक विधायकों  को उठाना पडा है. समय रहते कुछ विधायक व्यक्तिगत प्रयास न करते तो लगभग आधा दर्जन और विधायकों का टिकट कट गया था. पूर्व मुख्यमंत्री निशंक के जिन खास लोगो को टिकट से हाथ धोना पडा है उसमें कर्णप्रयाग के विधायक अनिल नौटियाल, गोविन्द लाल, केदार सिंह, फोनिया,खजान दास, का नाम प्रमुख है. इसके अलावा निशंक के मुख्यमंत्री रहते हुए जो नेता अपना टिकट पक्का मानकर चल रहे थे, उसमें उनके राजदार मनवीर सिंह चौहान – यमनोत्री से, मनोज कुलाश्री – यमकेश्वर से, टिहरी से ज्योति गैरोला, देवप्रयाग से विनोद कंडारी, हल्द्वानी से हेमंत द्विवेदी ,हरिद्वार ग्रामीण से ओम प्रकाश जमदग्नी, गंगोत्री से सूरत राम नौटियाल का नाम तय था. इसके अलावा एक दर्जन जो अन्य दावेदार थे, उसमें सुभाष, वडथ्वाल, आदित्य कोठारी, अनिल बलूनी,बलराज पासी, पंकज सहगल, रूचि भटट, एसके द्विवेदी  प्रमुख बताये जा रहे हैं.

टिकट वितरण से यह बात साफ हो गई कि खण्डूरी और भगत दा ने निष्ठा बदलने वाले नेताओं को अच्छा सबक सिखया और उनके प्रति आस्था रखने वालों को उपकृत भी किया.

देहरादून से बृजेश विजय की रिपोर्ट

दबाव में है हाथी, उड़ान पर है साइकिल

: सत्ता की लड़ाई : उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव में बाजी किसके हाथ : ज्यों-ज्यों उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों का पारा लुढ़क रहा है, वैसे-वैसे चुनावी राज्यों का सियासी पारा चढ़ता जा रहा है और ये राज्य अपनी सियासी तपिश से दिल्ली को भी गर्मा रहे हैं. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा तरजीह मिलती रही है क्योंकि यही वह प्रदेश है जहां से केन्द्रीय सत्ता की राह तय होती है. प्रदेश के चुनाव में अभी वक्त है लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच और अनुमानों का दौर चल पड़ा है. जो दल और नेता कभी अपने विरोधियों से खार खाए थे, आज उनसे गलबाहियां करने में भी कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं. जोड़- तोड़ से लेकर गठबंधन कर अपनी राजनीतिक गोटी सेट करने में लगे हैं.

इन राजनीतिक दलों की सत्ता चाह ने इनकी राजनीतिक मजबूरियां पैदा कर दी हैं कि आज कांग्रेस को न तो अजीत सिंह से गुरेज है और न ही कांग्रेस को अजीत सिंह से. समाजवादी पार्टी जहां एक के बाद एक क्रांतियात्रा कर रही है वहीं मायावती सिंहासन बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं. ऐसे में अब सारा भार जनता पर आ गया है कि वो किसे चुने किसे नहीं. इस पूरे सियासी उठा-पटक में कई सारे राजनीतिक समीकरण बनते बिगड़ते नजर आ रहे हैं. इसमें जातिगत समीकरण से लेकर विकासगत मुद्दे तक एक-दूसरे पर बारी-बारी से हावी होते नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में सबसे ज्यादा साख कांग्रेस और बसपा की लगी है. कारण है कि कांग्रेस केंन्द्र में बैठी है और बीएसपी राज्य में. ऐसे में इन दोनों दलों पर बेहतर प्रदर्शन का अतिरिक्त दबाव होगा.

जहां तक दलों की बात है तो समाजवादी पार्टी भी बढ़-चढ़कर रैलियां कर रही है तो भाजपा भी अपनी जमीन तलाशती नजर आ रही है. हालांकि बाकि के दलों की तरह अभी तक कोई बड़ी रैली या व्यापक अभियान नहीं छेड़ा है पर फिर भी कहीं न कहीं भाजपा भी हाथ-पांव मार रही है. इसके अलावा कुछ छोटे दल जो इस बार के चुनाव में प्रबल संभावना के साथ केन्द्रीय भूमिका में नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव 2012 जो लोकसभा 2014 के लिये सेमीफाइनल है और इसमें कोई शक नहीं कि सभी राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों के साथ चुनावी समर में एक-दूसरे से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं. अब इसमें गौर करने वाली बात यह है कि कौन सा दल किस मुद्दे को भुनाता है.

दबाव में है माया का हाथी

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मुख्य रूप से चार राजनीतिक दल मैदान में है जो एक दूसरे पर हावी होने की फिराक में हैं. इसमें सबसे पहली बात प्रदेश की सत्ताधरी पार्टी और मुख्यमंत्री की, जो लगातार रैलियां कर और चुनावी लॅालीपॅाप की घोषणा कर चर्चा में हैं. लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस बार प्रदेश की जनता हाथी पर सवार होगी. क्योंकि अब तक के जो रूझान सामने आए हैं उससे तो यही स्पष्ट हो रहा है कि प्रदेश की जनता अब भी जातीय प्रपंचों से उबर नहीं पाई है और यही कारण है कि कभी मायावती तो कभी मुलायम सत्ता की कुर्सी को सपने में आते देख रहे हैं.

जहां तक बात मुद्दों की है तो मायावती को खुद अपने द्वारा किए गए कार्यों को ही चुनावी मुद्दा बनाना पड़ रहा है. हां बीच-बीच में वो केन्द्रजनित भ्रष्टाचार की बात जरूर करती हैं. बसपा के बारे में देखा जा रहा है कि यहां मुख्य रूप से मायावती ही प्रदेश का दौरा कर रही हैं और अपने विकासकार्यों का मुआयना कर रही हैं. लेकिन यह राज्य की कुर्सी पर दुबारा सत्तासीन होने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि प्रदेश का विकासकार्य कुछेक शहरों में ही दिखता है, जबकि सत्ता की चाबी छोटे शहरों और गांवों के पास होती है. नोएडा या लखनऊ में जो पार्क बनाए गए हैं उससे किसी गरीब या किसान को लाभ नहीं होने वाला. ऐसे में सरकार के द्वारा किया गया यह स्वकथित विकासकार्य उन हजारों किसानों या फिर गरीबों के लिए मजाक है जो बमुश्किल दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं.

प्रदेश में एक भी ऐसा शहर नहीं है जहां कुशल या अकुशल मजदूरों को उनकी योग्यता के अनुसार कार्य मिलता हो. यही कारण है कि प्रदेश से पलायन नहीं रूक रहा है. इसके अलावा प्रदेश में अभी तक कोई निवेश कार्य भी नहीं हुआ जिससे यह माना जा सके कि प्रदेश ने राजस्व के मामले में भी तरक्की कर ली हो. ज्ञात हो कि मायावती आज भी प्रदेश के ही राजस्व और आम लोगों के पैसों को ही खर्च कर रही हैं. इन परिस्थितियों में मायावती के लिए विकासकार्य कितना कारगर मुद्दा बनेगा, आंका नहीं जा सकता. दूसरी तरफ मायावती जहां बार-बार भ्रष्टाचार की बात कर रही हैं तो शायद उन्हें अपने प्रदेश में होने वाले भ्रष्टाचार का भान नहीं है और अगर है भी तो केन्द्र जनित भ्रष्टाचार की आड़ में उसे छुपाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि आंख बंद करने से रात नहीं हो जाती. राज्य का भ्रष्टाचार भी केन्द्र से कम नहीं है. राज्य में मनरेगा का जो हश्र हो रहा है वो जगजाहिर है.

पिछले कुछ महीनों में बलात्कार और अपराध का जो ग्राफ बढ़ा है उसे राज्य सरकार बखूबी जान रही है. ऐसे में भ्रष्टाचार के मामले में भी मायावती को राहत नहीं मिलने वाली. इसके अलावा इसमें जातिगत फैक्टर भी पीछे नहीं है. मायावती कभी दलितों की राजनीति करती हैं तो कभी ब्राम्हणों की. अभी हाल ही में उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का भी दांव खेला है जो कितना प्रभावी होगा वो भविष्य के गर्भ में है. इसके अलावा अन्ना फैक्टर भी कहीं न कहीं काम करेगा, क्योंकि लोकपाल पर मायावती ने बार-बार अपना पाला बदला है और लोकपाल की सच्चाई यह है कि केवल राज्य की जनता ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता भी अन्ना के लोकपाल के मसौदे को ही उचित मान रही है. ऐसे में किसी भी पार्टी के द्वारा लोकपाल का विरोध् करना महंगा पड़ सकता है वो भी तब जब उसे विधनसभा चुनाव का सामना करना हो. बहरहाल आगे जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि आने वाले विधनसभा चुनाव में सरकार को कई महत्वपूर्ण प्रश्नों का जवाब देना होगा.

जमीन तलाशने की जद्दोजहद में कांग्रेस

कांग्रेस की विडम्बना है कि वो केन्द्र से लेकर राज्यों में अलग-थलग पड़ा हुआ है. मामला भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई तक से जुड़ा है. जहां तक राज्य में कांग्रेस की स्थिति का सवाल है तो अभी तक के रूझान कांग्रेस के लिए अच्छे साबित नहीं हो रहे हैं. कांग्रेस की समस्या यह है कि प्रदेश में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके प्रभावी नेतृत्व में वो कुछ बेहतर कर सके. दूसरी तरफ राहुल गांधी का दौरा भी मृतप्राय कांग्रेस को संजीवनी नहीं दे पा रहा है. इन परिस्थितियों में कांग्रेस चाहकर भी चारकोणीय लड़ाई के मुकाबले में खुलकर सामने नहीं आ पा रही है. नतीजतन उसे मजबूर होकर अजीत सिंह से भी राजनीतिक समझौता करना पड़ा.

लेकिन कांग्रेस के लिए बड़ा सवाल यह है कि केन्द्र में रहते हुए भी उत्तर प्रदेश में वो हाशिए पर है. इसके लिए दो बड़े मुद्दे सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं. पहला तो यह है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार से लेकर मंहगाई तक की मकड़जाल में पूरी तरह घिरा हुआ है. आज जहां भी कांग्रेस की बात आती है तो माना जाता है कि भ्रष्टाचार उसकी अनुषंगी है. खैर बात भ्रष्टाचार की हो रही है तो इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहा है ऐसे में प्रदेश में कोई भी कांग्रेसी नेता जब विकास और भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आम जनमानस उनसे जानना चाहते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है. केन्द्रीय सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को छुआ है. चाहे वो राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ा हो, टूजी स्पेक्ट्रम मामला हो या फिर राज्यों में आदर्श सोसाइटी मामला हो, सबने भ्रष्टाचार का नया अध्याय लिखते हुए कांग्रेस की विश्वसनीयता और साख पर प्रश्न चिन्ह लगाया है. इसके अलावा महंगाई ने भी कांग्रेस की साख पर बट्टा लगाया है.

कांग्रेस के लिए जो दूसरा मुद्दा है प्रदेश में प्रभावी नेता का अभाव. वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस प्रभाव की अंतर्कलह से जूझ रही है और लगभग सभी नेता एक-दूसरे से आगे आकर या तो अपनी महत्ता साबित करने में लगे हैं या फिर राहुल गांधी का सबसे करीबी होने का स्वांग भर रहा है जिसके कारण यहां के कांग्रेस कार्यकर्ता हतोत्साहित तो हो ही रहे हैं साथ ही कांग्रेस का कोई भी नेता चाहे वो रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, पी एल पुनिया या फिर सलमान खुर्शीद ही क्यों न हो सब आपसी द्वंद्व में फंसे हुए हैं. ऐसे में कांग्रेस की लड़ाई सिर्फ राहुल गांधी की सक्रियता पर आकर टिक जाती है वो भी एक सीमित दायरे में. राहुल गांधी की सक्रियता दूसरे दलों पर आरोप मढ़ने के साथ गरीबों के घर रोटी खाने तक सीमित रह गई है.

यही कारण है कि अब तक प्रदेश में राहुल गांधी के अलावा कोई दौरा भी नहीं कर रहा है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अजीत सिंह से जो सांठ-गांठ की है वो कितना फायदेमंद साबित होगा वो आने वाला समय ही बताएगा. कुल मिलाकर देखें तो अभी तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि वो केन्द्रीय भूमिका में नजर आये और अन्य विपक्षियों के लिए कड़ी चुनौती पेश कर सके. क्योंकि प्रदेश की जनता देख रही है कि केन्द्रीय सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने कोई उपलब्ध् हासिल नहीं की है. इसके अलावा प्रदेश में अब तक राहुल के अलावा कांग्रेस का कोई और नेता न तो दौरा कर रहा है और न ही सामने आ रहा है. ऐसे में कांग्रेस वन मैन आर्मी बनकर रह गई है.

उड़ान पर है साइकिल

अभी उत्तर प्रदेश में हालात ऐसे बने हुए हैं कि यहां की जनता चारों तरफ बेहतर विकल्प ढूंढ रही है और इसमें उसकी निगाह समाजवादी पार्टी पर जाकर टिकती है. इसके पीछे कारण यह है कि लोगों ने मायावती को पिछले पांच सालों में कोई खास उपलब्धि  हासिल करते हुए नहीं देखा है. दूसरी ओर न तो कांग्रेस और न ही भाजपा की तरफ से अब तक कोई विश्वसनीयता पेश की गई है. ऐसे में प्रदेश की जनता के पास सपा और मुलायम सिंह के अलावा कोई खास विश्वसनीय चेहरा सामने नहीं आ रहा है. अब यह बात समाजवादी पार्टी पर निर्भर करता है कि सपा प्रदेश के चुनाव के मानक पर कितना तैयार है. सपा जहां मुलायम सिंह के अनुभव से लबरेज है वहीं अखिलेश यादव का युवा जोश भी कार्यकर्ताओं को उत्साहित कर रहा है और जहां तक जनता की बात है तो ये पहले तय हो चुका है कि प्रदेश की जनता चेहरा बदलने की फिराक में है.

इधर बाप-बेटों के चुनावी दौरे की बात है तो एक ओर जहां अखिलेश यादव अपने पिता के अनुभवी साइकिल पर सवार होकर 250 किलोमीटर की लम्बी यात्रा कर चुके हैं वहीं उन्होंने अब तक 132 चुनाव क्षेत्रों का दौरा कर क्रांति रथ यात्रा के सात चरण चरण पूरे कर लिए हैं. इसमें दिलचस्प बात तो यह है कि इन रैलियों में हर बार लोगों का हुजूम सामने आया है, जो मायावती के लिए खतरे की घंटी तो है ही साथ ही राहुल गांधी के लिए भी जोरदार झटका है. इसका कारण भी यही है कि जहां अखिलेश यादव ने हर बार राहुल गांधी से ज्यादा भीड़ इकट्ठा किया है और बिना किसी विवादास्पद बयान के मुद्दे की बात की है. जहां तक सपा की बसपा से तुलना की बात है तो लोगों की नजर में दोनों के लिए अलग-अलग राय है. एक वर्ग जहां सपा और मुलायम सिंह को प्रदेश में विकास का वाहक समझते हैं वहीं एक वर्ग इन्हें आपराधिक शक्तियों को बढ़ावा देने का कारण भी मानता है. हालांकि कुछ का यह भी मानना है कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री रहते जो विकासकार्य हुए हैं वो सैफई तक ही सिमट कर रह गया है. जहां तक मायावती के बारे में आम जनता की सोच की है तो इनके बारे में यही कहा जा रहा है कि इनके मुख्यमंत्री रहते न तो कोई विकासकार्य हुआ है और न ही कोई बड़ा निवेश. ऐसे में जो थोड़े विकासकार्य हुए हैं वो लखनऊ तक ही सीमित रह गए हैं.

अब सवाल यह खड़ा होता है कि इन दोनों में बेहतर कौन है. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी एक लंबे समय से केन्द्र और राज्य की सत्ता से बाहर रही है इसलिए इसपर कोई खास दबाव भी नहीं बन पा रहा है कि इन्होंने कोई प्रमुख कार्य नहीं किया है. जहां तक इस पार्टी पर आपराधिक तत्वों को बढ़ावा देने का आरोप वाली बात है तो अखिलेश यादव ने अपने हर चुनाव क्षेत्र में इसका जिक्र किया है और बड़ी सफाईगोशी से इस बात को स्वीकार किया है कि सत्ता में आने के बाद इस पर पूरी तरह अंकुश लगाई जाएगी. अब पूरे सियासी उठा-पटक में सपा लाभ की स्थिति में नजर आ रही है. हालांकि इसके लिए समाजवादी पार्टी को किसी भी प्रकार की मशक्कत नहीं करनी पड़ रही है, इसके लिए मात्रा विपक्षी दलों की नीतियां ही इसे आगे ला रही हैं ऐसे में सपा इस अवसर को कैसे भुनाता है देखना दिलचस्प होगा।

अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है भाजपा

एक ओर जहां कांग्रेस प्रभावी नेताओं की कमी से जूझ रही है वहीं भाजपा नेताओं की बहुलता से. याद हो कि जब उमा भारती को उत्तर प्रदेश में भाजपा की कमान सौंपी गई थी तो वो किसी भी नेताओं के गले नहीं उतर रही थीं. और लगभग सभी ने दबी जुबान उनका विरोध किया था. भारतीय जनता पार्टी के साथ विडम्बना यह है कि यहां कई नेता कतार में खड़े हैं, हालांकि भाजपा ने आधिकारिक तौर पर किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया है. अब तक चुनावी सफर में देखा गया है कि राजनाथ सिंह चर्चा में हैं और उनकी किसानी छवि को राहुल की युवा अपील पर तरजीह दी जा रही है. हालांकि पिछले महीने कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह दोनों ने जो जनचेतना रैली निकाली थी वो मात्रा एक दूसरे पर वर्चस्व साबित करने के अलावा कुछ नहीं था. जहां तक मुद्दों की बात है तो भाजपा के पास सपा से इत्तर कोई अन्य मुद्दा नहीं है. लेकिन सपा में जहां स्पष्ट नेता है वहीं भाजपा में नहीं है. यहां आकर भाजपा की रेटिंग सपा से कम हो जाती है.

जब अन्य मुद्दों की बात करते हैं तो भाजपा भी लम्बे समय से सत्ता से दूर रही है ऐसे में उसके पास केन्द्र की कांग्रेस की और राज्य की बसपा की नीतियों को गलत साबित कर अपनी नीतियों और योजनाओं से रूबरू कराने के अलावा कोई अन्य मुद्दा भी नहीं है. हालांकि इस पूरे प्रकरन में जातिगत समीकरण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रदेश में विकास की चाहे जितनी भी बात कर ले जातीय समीकरण एक बड़े उत्प्रेरक के रूप में काम करने वाला है. गौरतलब है कि जब उमा भारती की भाजपा में वापसी हुई थी तब भी यह बात सामने आई थी कि उमा उस लोध् जाति की वोट को आकर्षित करेंगी जो कल्याण सिंह के पार्टी से हट जाने के कारण कट गए थे. इसके अलावा उमा को उत्तर प्रदेश में लाकर भाजपा ने उन मतदाताओं को भी लुभाने का कार्य किया है जिनके मन में अब भी कहीं न कहीं हिन्दूवादी विचारधरा और अयोध्या का राग है. अब विकास बनाम जाति की लड़ाई में बाजी कौन मारेगा यह कहना जल्दबाजी होगी. जब अन्य मुद्दों की बात करते हैं तो वो भी भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध जैसे मुद्दों पर ही अपने पत्ते बिछा रही है, जिसके बारे में जनता पहले से ही वाकिफ है. ऐसे में भाजपा किसी खास मुद्दे के साथ लोगों तक नहीं जाने वाली. हां अगर प्रभावी चेहरे की आड़ में चुनाव लड़ती तो माना जा सकता था कि इसका लाभ उसे मिलता लेकिन हाल की परिस्थितियों वो इनसे काफी दूर है.

इन पर भी रहेगी नजर 

ज्ञात हो कि 2007 के विधनसभा चुनाव में करीब 112 छोटे दल चुनाव में थे, ये अलग बात है कि इनमें से कुछ दलों को ही सदन तक पहुंचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. इनमें से सबसे प्रमुख पार्टी थी पूर्व प्रधनमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और राजबब्बर की अगुवाई वाली जनमोर्चा, जिसने 118 सीटों पर चुनाव लड़ा था ये अलग बात है कि उनमें से 116 सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी. लेकिन आज सबकुछ बदल चुका है. आज प्रदेश की जनता किसी नए चेहरे की तलाश में है. हालांकि आज भी उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में ऐसा कोई छोटा दल नहीं है जो अपने बूते सत्ता बदल दे. लेकिन इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि ये छोटे दल ऐसा नहीं कर सकते हैं.

आज के बदले परिदृश्य में कई सारे छोटे दल हाथ अजमा रहे हैं जो या तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं या फिर अपनी जातीय संकट को बचाने के लिए या फिर यूं कहें अपने पुराने साथियों से बदला लेने के लिए. खैर जो भी हो यहां लड़ाई आसान नहीं होने वाली क्योंकि इस बार नौ राजनीतिक दल ऐसे हैं जो बाकि के चार बड़े दलों के चेहरे पर शिकन ला सकते हैं. इनमें से पीस पार्टी, अपना दल और बुंदेलखंड कांग्रेस ने गठजोड़ कर जो नया मोर्च खड़ा किया है वो बाकि के दलों के लिए वाकई खतरे की घंटी है. पीस पार्टी के अध्यक्ष जहां कांग्रेस और बसपा के भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं, सपा को गुंडागर्दी और आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने का दोषी मान रहे हैं वहीं भाजपा को साम्प्रदायिक ताकतों का बढ़वा देने का भी बड़ा कारण मान रहे हैं ऐसे में उनका तीन दलों का यह नया मोर्चा पांचवें विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहा है और शोषितों, पीड़ितों और मुख्य धरा से कटे लोगों को उभारने के लिए भी बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं. इतना ही नहीं इस मोर्चे ने अन्य छोटे दलों के लिए भी दरवाजे खोल रखे हैं जो आने वाले समय में बड़े दलों को कड़ी चुनौती देंगे.

दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक अमर भारती में उप संपादक पद पर कार्यरत अजय पांडेय की रिपोर्ट.

पूर्व मंत्री और कांग्रेस प्रत्याशी के घर से कुख्यात इनामी बदमाश गिरफ्तार

बदायूं : चुनाव से पहले यूपी पुलिस को एक बड़ी सफलता मिली है। पूर्व राज्यमन्त्री और शेखुपूर से कांग्रेस प्रत्याशी भगवान सिंह शाक्य के आवास से कुख्यात बदमाश हरीश पहाड़िया को गिरफ्तार किया गया। पहाड़िया प्रशान्त मर्डर केस में वांछित था और उस पर पंद्रह हजार रूपये का इनाम भी था। पुलिस के लिये एक चुनौती बन चुके हरीश को पकड़ने के लिए बदायूं पुलिस हर हथकन्डे अपना चुकी थी और अंततः आज उसे सफलता मिल गई। इस समय जब चुनावी वक्त पूरे जोर पर है ऐसे में पूर्व राज्यमंत्री के घर से एक अपराधी की गिरफ्तारी ने मंत्री जी को बड़ी परेशानी में डाल दिया है।

उधर हरीश पहाड़िया का कहना है कि वो कई दिनों से पूर्व राज्यमन्त्री के आवास पर ही रह रहा था। हालांकि पूर्व राज्यमन्त्री आरोपी को शरण देने की बात से इन्कार कर रहे हैं और इसे विरोधियों की साजिश बता रहे हैं। शहर के प्रशांत का अपहरण कर उसे मौत के घाट उतारने के मामले में मुख्य आरोपी पंद्रह हजार का ईनामी हरीश पहाड़िया को पुलिस अभी तक इसलिए गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी कि उसका ठिकाना पूर्व राज्यमंत्री और कांग्रेस के विधान सभा प्रत्याशी भगवान सिंह शाक्य के घर था। पुलिस को कई दिनों से उसके ठिकाने की सूचना मिल रही थी, लेकिन पुख्ता सुबूत न होने के कारण वह हाथ नहीं डाल पा रही थी, पर सर्विलांस के जरिए सबूत पुख्ता हो जाने पर पुलिस ने उसे मंत्री के ही घर से गिरफ्तार कर लिया।

कल्यान नगर के रहने वाले अशोक सैनी के बेटे प्रशांत का अपहरण भैया दूज वाले दिन कर लिया गया था। अपहरणकर्ताओं द्वारा मांगी गई फिरौती से उसके परिजनों ने पुलिस की शरण ली। सारा मामला जानने के बाद पुलिस ने उसकी बरामदगी के लिए अपना जाल बिछा दिया। पुलिस इस केस की तह तक नहीं पहुंच पा रही थी। काफी दिनों की मशक्कत के बाद पुलिस ने सिविल लाइन थाना क्षेत्र के गांव शेखूपुर निवासी अशोक मौर्य को गिरफ्तार किया तो पता चला इन लोगों ने प्रशांत को मार दिया है। उसकी निशानदेही पर पुलिस ने शेखूपुर के पास से ही प्रशांत का शव एक गड्डे से बरामद किया था। अशोक ने इस केस में मास्टर माइंड हरीश पहाड़िया की मुख्य भूमिका बताई थी। अशोक को जेल भेजने के बाद पुलिस के लिए पहाड़िया चुनौती साबित हो रहा था।

इसी दौरान इसके पकडऩे की जिम्मेदारी सीओ सिटी श्रीश चंद्र को दी गई। सीओ ने इसे चेलेंज मानते हुए काम शुरू कर दिया। सीओ सिटी ने पहाडिय़ा का मोबाइल सर्विलांस पर लगा रखा था, साथ ही मुखबिरों का जाल भी बिछा दिया। कई दिनों से मुखबिर सूचना दे रहे थे कि पहाड़िया पूर्व मंत्री भगवान सिंह शाक्य के घर पर रुका हुआ है। सूचना के साथ कोई पुख्ता सुबूत के हाथ में नहीं थे। लिहाजा वह पूर्व मंत्री के घर दबिश नहीं दे पा रहे थे। चूंकि पहाड़िया का मोबाइल बंद था, इसलिए उसकी मोबाइल लोकेशन भी नहीं मिल पा रही थी। शनिवार सुबह उसकी मोबाइल लोकेशन और मुखबिर की सटीक सूचना पर सीओ सिटी श्री चंद्र ने पुलिस टीम बनाकर भारी फोर्स के साथ दोपहर के वक्त पूर्व मंत्री भगवान सिंह शाक्य के घर छापा मारा, जहां से हरीश पहाड़िया को गिरफ्तार कर लिया गया। इसको गिरफ्तार कर पुलिस थाने ले आई पुलिस ने भगवान सिंह शाक्य के खिलाफ भी अपराधियों को संरक्षण देने का मुकदमा दर्ज किया है।

छावनी बनी पूर्व मंत्री की कोठी

हरीश पहाडिय़ा को गिरफ्तार करने के दौरान पूर्व राज्यमंत्री और कांग्रेस के शेखूपुर के विधान सभा प्रत्याशी भगवान सिंह शाक्य की कोठी पूरी तरह छावनी बनी रही। भारी मात्रा में फिल्मी स्टाइल की तरह पहुंचे फोर्स को देखकर सभी हैरान रहे गए। तलाशी के दौरान पुलिस ने हरीश पहाडिय़ा के बताए सभी ठिकानों पर गहनता से छानबीन की।

फोर्स देख सहम गए सभी

पहाड़िया को गिरफ्तार करने के लिए सिविल लाइन और कोतवाली के अलावा पुलिस लाइन का रिजर्व फोर्स भी लगाया गया था। एक साथ इतना फोर्स देखकर सभी सहम गए, लोगों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि यह फोर्स कहां जा रहा है। लोग एक दूसरे से इसके बारे में पूंछने के बाद दूर खड़े होकर नजारा देख रहे थे।

फुर्ती के साथ पुलिस ने किया गिरफ्तार

पुलिस ने पहाडिय़ा को गिरफ्तार करने में बहुत ही फुर्ती का काम किया। इसे गिरफ्तार कर पुलिस पूरी चौकसी के साथ गाड़ी में डालकर थाने ले आई। पुलिस की यह फुर्ती देख सभी हैरान रहे गए।

बोला पहाड़िया- बूथ कैप्चरिंग को बुलाया था मुझे

पूर्व मंत्री भगवान सिंह शाक्य के ऊपर उस समय काले बादल छा गए, जब मीडिया के सामने हरीश पहाड़िया ने मुंह खोला। पहाड़िया ने स्पष्ट लफ्जों में बगैर भय के बताया कि उसे पूर्व मंत्री और शेखूपुर से कांग्रेस प्रत्याशी भगवान सिंह शाक्य ने बूथ कैप्चरिंग के लिए बुलाया था। उसके इस बयान ने सभी को हैरत में डाल दिया। बूथ कैप्चरिंग की बात सुनकर पुलिस प्रशासन से लेकर मीडिया जगत में भी हलचल मच गई। हरीश पहाड़िया से प्रशांत को मार देने का कारण पूछा गया तो उसने अपना गुनाह कुबूल लिया। पहाड़िया ने बताया कि छात्र प्रशांत उसकी भांजी से प्यार करता था। यह बात उसे पता चल गई और उसने प्रशांत को ठिकाने लगाने की सोच ली। समस्या यह थी कि उसे प्रशांत कैसे मिले। इसके लिए उसने अपने रिश्तेदार अशोक मौर्या जो इसी केस में जेल में बंद है, का सहारा लिया। चूंकि अशोक और प्रशांत की गहरी दोस्ती थी, इसलिए अशोक के बुलाने पर प्रशांत उनके ठिकाने पर आ गया। दो दिन उसे बंधक बनाए रखने के बाद इन लोगों ने प्रशांत का मर्डर कर दिया। मर्डर करने के बाद इन लोगों ने प्रशांत के परिजनों को गुमराह करने के बाद फिरौती मांगनी शुरू कर दी, लेकिन वह इस चाल में नाकाम रहे।

खाकी का एक कारिंदा भी है मददगार

हरीश पहाड़िया के द्वारा लिखे गए जो पर्चे पुलिस ने प्रशांत के परिजनों से लिए और वही लिखावट के पर्चे जेल में बंद अशोक मौर्या के पास से बरामद होने की बात पर पहाड़िया ने एक खाकीदारी का नाम भी आम कर दिया। उसने बताया कि प्रशांत के परिजनों को पर्चा वही भेजता था और जेल के अंदर बंद इस केस के ही आरोपी अशोक मौर्या को भी पर्चे वही भेजता था। अंदर पर्चा ले जाने का काम जेल के ही एक सिपाही का था, हालांकि पहाड़िया ने उस सिपाही का नाम भी बताया है, लेकिन पुलिस कार्रवाई न होने से उसका नाम गोपनीए रखा गया है।

गैंगस्टर की भी की जाएगी कार्रवाई : पांडेय

प्रभारी एसएसपी परेश पांडेय ने बताया कि हरीश पहाड़िया एक खूंखार अपराधी है। वह किडनैपिंग के साथ साथ लोगों से वसूली भी करता है। श्री पांडेय ने बताया कि पहाड़िया पर गैंगस्टर की भी कार्रवाई की जाएगी।

चुनाव के दौरान तबाही फैलाने की थी साजिश

हरीश पहाड़िया के गिरफ्तार होने के बाद उसके बूथ कैप्चरिंग करने के दिए गए बयान ने सभी को हिला के रख दिया। एक ओर भयमुक्त चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग एक दम सख्ती से कार्य कर रहा है, इसका जीता जागता उदाहरण पिछले विधानसभा के चुनाव में दिख गया था। चुनाव आयोग की सख्ती ने पिछले चुनाव में अपराधिक किस्म के लोग पैरामिलिट्री की सख्ती से कुछ भी न कर सके थे, इसी के चलते कहीं से भी बूथ कैपचरिंग की खबर नहीं आई थी।

अब सवाल है कि पूर्व राज्यमंत्री और कांग्रेस से शेखूपुर के विधान सभा प्रत्याशी भगवान सिंह ने इतना बड़ा साहस कैसे कर लिया। पहाड़िया कोई साधारण सा बदमाश नहीं है, उस पर पहले से कई मर्डर जैसे संगीन वारदातों के मुकदमें दर्ज हैं। वह भगवान सिंह के चुनाव को फायदा पहुंचाने के लिए कुछ भी कर सकता था। यह बात उसने मीडिया के सामने खुद स्वीकार की उसने बताया कि वह यहां बीस दिनों से ठहरा हुआ था। उसे एक हजार रुपए रोज का खर्चा मिलता था। उसे चुनाव के दौरान वलबा करना बूथ कैप्चरिंग करने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर भगवान सिंह के मंसूबों पर पानी फेरने के साथ चुनाव के समय फैलने वाली तबाही को भी रोक लिया।

बीपी गौतम की रिपोर्ट.

चुनाव आयोग की गलती से लाखों वोटर न कर पाएंगे मतदान

चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश में जहाँ एक ओर आम लोगों को जागरूक करने तथा वोटर बनाने के लिए जोरदार अभियान चला चुका है वहीं उसकी खुद की गलती से प्रदेश के लाखों वोटर्स के मतदान से वंचित रहने की समस्या खड़ी हो गयी है। उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग की इस गलती अथवा लापरवाही का खुलासा वाराणसी में समाजवादी जनपरिषद के कैंट से उम्मीदवार अफलातून देसाई ने पत्रकारों से बातचीत में किया।

अफलातून के अनुसार 16 अक्टूबर 2011 के आसपास मतदाता पुनरीक्षण का कार्य कराया गया, इस क्रम में नये नाम जोड़ने तथा संशोधित और सुधारने का काम बीएलओ (बूथ इलेक्शन आफिसर) के माध्यम से कराया गया। इस नयी लिस्ट को 20 दिसम्बर तक चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर देना था। इसके लिए जिलास्तर पर कंसर्निंग आफिसर को एक पासवर्ड दिया गया था किन्तु तकनीकी कारणों से गत 5 दिसम्बर से ही आयोग की वेबसाइट डिस्टर्ब हो गयी। इससे संशोधित वोटर्सलिस्ट अपलोड नहीं की जा सकी। यह लापरवाही निश्चित रूप से चुनाव आयोग से हुई है।

आयोग की इस लापरवाही की लिखित जानकारी अफलातून ने चुनाव आयोग को भेजी है, जिसमें उन्होंने इलेक्शन नोटिफिकेशन जारी होने के पहले ही संशोधित वोटर्सलिस्ट को वेबसाइट पर अपलोड कराने की गुजारिश की थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। हकीकत यह है कि पुनरीक्षण परीक्रिया के दौरान मतदाता सूची की प्रविष्टियां जोड़ने, सुधारने तथा मतदाता फोटो परिचय पत्र हेतु लिए गये प्रारूप तथा चित्रों की पूरी तरह उपेक्षा की गयी है। इस संबंध में बूथ स्तरीय अधिकारियों का कहना है कि उनके पास पुनरीक्षण के दौरान निर्वाचन कार्यालय में जमा किये गये दस्तावेजों के प्रमाण तो हैं लेकिन यह गत 2 जनवरी को जारी सूची में जोड़े अथवा सुधारे नहीं गये हैं। परिणामस्वरूप प्रदेश के लाखों मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका को बल मिल रहा है।

वाराणसी से अजय कृष्ण त्रिपाठी की रिपोर्ट

वर्दी के नशे में चूर थाना प्रभारी ने पत्रकार को पीटा

: पीड़ित ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर लगायी न्याय की गुहार : बाराबंकी। थाना सफदरगंज अंतर्गत स्कूल समय में सड़क पर घूम रहे शिक्षक का फोटों खीचने पर एक पत्रकार की वर्दी के नशे में चूर थानाध्यक्ष ने सरेआम जमकर लातो घूसों से पिटाई कर दी। इतना ही नहीं थानाध्यक्ष ने उसको पूरी रात हवालात में रखने के बाद दूसरे दिन धारा 151 के तहत चालान करके जेल भेज दिया। पीड़ित पत्रकार ने प्रदेश की मुख्यमंत्री सहित उच्चाधिकारियों को शिकायती पत्र भेजकर दोषी थानाध्यक्ष के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की मांग की है।

30 दिसम्बर की दोपहर को थाना जैदपुर क्षेत्र के ग्राम अकबरपुर धनेठी निवासी प्रेम नारायन (फैजाबाद से प्रकाशित एक हिन्दी दैनिक का स्थानीय पत्रकार) घर से बाराबंकी आ रहा था। करीब 11 बजे उसने सफदरगंज चौराहे पर जूनियर माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक विश्वनाथ वर्मा को चौराहे पर टहलते देखा। जिसकी फोटो प्रेम नारायन ने अपने कैमरे में खींच ली। यही फोटो खींचना उसको काफी महंगा पड़ गया। विश्वनाथ के साथ में बैठे एक मास्टर के सहयोगी ने पहले तो प्रेम नारायन को धमकाकर कैमरा छीनने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं बनी तो उसने इसकी सूचना थाना प्रभारी सफदरगंज को दी। सूचना मिलते ही थाने से थाना प्रभारी सफदरगंज निर्भय सिंह पूरे दलबल के साथ आ गये और बिना कुछ जांच पड़ताल किये ही प्रेम नारायन को भद्दी-भद्दी गालियां देनी शुरू कर दी। जब प्रेम नारायन ने गालियां देने से मना किया तो थाना प्रभारी ने बीच चौराहे पर प्रेम नारायन की जमकर लातो घूसों से दौड़ा-दौड़ा कर पिटाई करनी शुरू कर दी। पिटाई करने के बाद जबरदस्ती प्रेम को अपनी जीप में बैठाने के बाद थाने लाकर हवालात में डाल दिया। 

 दूसरे दिन थाना प्रभारी ने धारा 151 के तहत उसका चालान करके जेल भेज दिया। पूरे घटनाक्रम के बारे में पीड़ित ने बताया कि थाना प्रभारी ने यह सब इसलिए किया है कि उसने दो माह पूर्व जानवरों को लादकर ले जा रही ट्रक को पकड़वाया था। जिस पर थाना प्रभारी उससे नाराज चल रहे थे। उसने यह भी बताया कि वह एलआईसी का एजेंट भी है, उसकी मोटरसाइकिल की डिग्गी में रखे पचास हजार रूपया थाना प्रभारी ने हड़प लिया। उसने आगे बताया कि थाना प्रभारी ने धमकी दी है कि अगर कहीं शिकायत करोगे तो तुमको आधा किलो मारफीन के साथ जेल भेज देंगे। सारी जिन्दगी जेल में सड़ जाओगे। आज किसी तरह से प्रेम ने जिला मुख्यालय पर आ करके एसपी को शिकायती पत्र दिया और कार्यवाही की मांग की। वैसे इस संबंध में थाना प्रभारी निर्भय सिंह का कहना है कि प्रेम ने शिक्षक के साथ बदतमीजी की थी, शिक्षक की शिकायत पर उसके विरूद्ध 151 के तहत कार्यवाही की गयी। चौराहे पर पीटने की बात व 50 हजार रूपया छीनने की शिकायत को उन्होंने झूठा बताया। वैसे पीड़ित ने यह चेतावनी दी है कि अगर एक पखवारे के अंदर दोषी थाना प्रभारी के विरूद्ध मुकदमा नहीं लिखा जाता तो वह विधानसभा के सामने आमरण अनशन पर बैठेगा। 

बाराबंकी से रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट

यूपी भाजपा : भ्रष्ट और हत्यारे नहीं हो सकते नायक

भारतीय जनता पार्टी वास्तव में नैतिकता वाली पार्टी है। इस प्रदेश के लोग भरोसा कर रहे थे कि अब ऐसी पार्टी सत्ता में आने की बात कर रही है जो खुद को ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बताती है। पार्टी के सभी नेता बहुत दिनों से जोर शोर से ऐलान कर रहे थे कि इस चुनाव में वे उन सभी लोगों को बेनकाब कर देंगे जो यूपी में भ्रष्टाचार का तांडव मचाते आये हैं। पार्टी बड़े जोर शोर के साथ दागी नेताओं को सबक सिखाने की बात भी कर रही थी। मगर जिस घोटाले ने पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश भर में हंगामा मचा दिया था उसके सूत्रधार को पार्टी में शामिल करके देश भर के लोगों को संदेश दे दिया कि भाजपा के दांत खाने के और तथा दिखाने के और हैं। इस एक कदम ने पार्टी को उन साफ सुथरे लोगों से बहुत दूर कर दिया जो इस पार्टी से तनिक भी परिवर्तन की उम्मीद लगाये  बैठे थे।

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी पूरे देश में केन्द्र सरकार के खिलाफ अभियान चलाते हुए निकले थे। उनका यह अभियान भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ था। देश भर में घूम-घूम कर आडवाणी जी ने साफ तौर पर कहा कि कांग्रेस ही भ्रष्टाचार की जननी है और इसका एकमात्र विकल्प भाजपा ही है। आडवाणी की रथ यात्रा के बाद भाजपा के लोग इस उम्मीद से खुश हो गये थे कि जो भ्रष्टचार के विरुद्ध खड़े होने की बात करेगा वे भाजपा को विकल्प के तौर पर अपनाने की बात सोचेगा।

भाजपा के वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया नें बड़ी मेहनत करके माया सरकार के खिलाफ दस्तावेज जुटाये थे। लखनऊ में जब सोमैया ने इसे जारी किया तो सरकार की कंपकपी चढ़ गयी थी। इन दस्तावेजों से साफ था कि बाबू सिंह कुशवाहा और बसपा सरकार के कई लोगों ने मिलकर फर्जी कंपनियां बनायी और उसमें अरबों का गोलमाल किया। सोमैया ने सबके सामने बाबू सिंह कुशवाहा की कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा रखा। पूरी भाजपा सिद्ध करने पर जुटी थी कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में हुए अरबों के घोटाले एवं तीन सीएमओ की हत्या के पीछे बाबू सिंह कुशवाहा का ही हाथ है। पार्टी के बड़े नेता उस समय बड़े खुश हो गये थे जब बाबू सिंह कुशवाहा को मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उनको लगता था कि अब कुशवाहा मायावती के साथ अपनी पार्टनरशिप उजागर कर देंगे।

मगर इसी बीच पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव विनय कटियार ने घोषणा कर दी कि बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल कर लिया गया है। इनके अलावा बसपा से भ्रष्टाचार के आरोप में निकाले गये मंत्री अवधेश वर्मा और दद्दन मिश्रा को भी भाजपा में शामिल कर लिया गया। बादशाह सिंह बुंदेलखंड में अपनी इंसाफ सेना बनाकर जमीन हथियाने के मामले में खासे चर्चित रहे हैं। इस घोषणा से पार्टी के यूपी के नेता ही नहीं आम जन भी भौंचक्के रह गये। दरअसल गलती भाजपा की नहीं है। सभी राजनैतिक दलों को यह यकीन हो चुका है कि जनता को जब चाहो तब मूर्ख बना सकते हो। उनकी बात करने वाला कोई नही है। उनको अपने लुभावने भाषण सुनाकर रंगीन सपने दिखाओ और किसी तरह से अपना उल्लू सीधा कर लो। अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा बाबू सिंह कुशवाहा जैसे दागदार राजनैतिक व्यक्ति को लेने से पहले हजार बार सोचती। बाबू सिंह कुशवाहा मायावती की सबसे कमाऊ नोट छापने की मशीन थे। पूरे प्रदेश में खदानों के ठेकों में उन्होंने तथा उनके चेलों ने अरबों रुपये के वारे-न्यारे किये। खदान के ठेकों का मामला कई बार न्यायालय तक गया मगर कुछ नहीं हो सका। और कर्नाटक की तर्ज पर यूपी में भी अवैध खनन निर्विवाद रूप से जारी रहा।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना में जिस तरह से घोटाले किए गये उसकी कोई सपने में भी कल्पना नहीं कर सकता। इस विभाग में गर्भवती महिलाओं के लिए टीके, जिन लोगों की आंखो की रोशनी चली गयी है उनके इलाज के लिए दवाएं, बेसहारा और बीमार लोगों के लिए एम्बुलेंस, जननी सुरक्षा योजना के तहत मां बनी महिलाओं एवं उनके बच्चों का अनुदान जैसी कई चीजें शामिल थीं। जिन लोगों की आंख में जरा भी शर्म होगी तो वह इन गरीब और बेसहारा लोगों के लिए आये पैसे में बेईमानी की कल्पना भी नहीं कर सकते। मगर बाबू सिंह कुशवाहा और उनके कुछ दलाल आईएएस अफसरों ने मानो सारी नैतिकता और मानवता की हदें पर कर दी थीं। यह लोग सिर्फ एक ही बात समझ रहे थे कि दुनिया में सबसे बड़ी ताकत पैसा है और वह पैसा गरीब से लूटो या फिर अमीर से। पैसा अपने पास होना चाहिए। मगर कहा जाता है कि उपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। जिस पैसे के दम पर गरीबों का खून चूसा गया वही पैसा अब बाबू सिंह कुशवाहा और उनके दलाल अफसरों के काम नहीं आ रहा। जिन तीन सीएमओ की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गयी कि वह पैसा कमाने की राह में रोड़ा बन रहे थे शायद उनके परिजनों की बददुआ अब इन लोगों को लग रही है।

मगर धन्य है भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता। भाजपा के लिए एक बात बहुत दिनों से कही जाती रही है कि उन्हें दुश्मनों की जरूरत नहीं है। भाजपा के नेता ही एक दूसरे को निपटाने के लिए काफी हैं। जाहिर है बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लाने का आत्मघाती फैसला इन जैसे ही किसी नेता ने लिया होगा। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि बाबू सिंह कुशवाहा के आने से कुशवाहा वोट भाजपा को मिल जाएगा।

अन्ना के सुर में सुर मिलाकर नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा के नेता अब क्या यह भी नहीं समझ पा रहे कि यह परिवर्तन का दौर है। कोई भ्रष्ट, हत्यारा नेता किसी जाति का नायक नहीं हो सकता। अगर बाबू सिंह कुशवाहा पर इस योजना में करोड़ों के घोटाले और हत्याओं का आरोप सिद्ध होता है तो फिर उन्हें कुशवाहा समाज का नेता कहना इस समाज का अपमान करना है। ऐसा ही काम पहले मायावती मुख्तार अंसारी को गरीबों का मसीहा तथा बेनी प्रसाद वर्मा ने कुख्यात डकैत ददुआ को कुर्मी नेता मानते हुए उसकी प्रशंसा की थी। जाहिर है न तो मुख्तार अंसारी ही मुसलमानों के नेता हैं और न ही डकैत ददुआ को कुर्मी समाज का नेता माना जा सका। जो बात आम चौराहे पर खड़ा हुआ व्यक्ति और ठेले पर चाय बेच रहा साधारण नागरिक समझ रहा है वह भाजपा नहीं समझ पा रही कि अब लोग जागृत हो रहे हैं और वह भ्रष्ट तथा अपराधी लोगों को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं अब विनय कटियार की महिमा वही जानें जब कांग्रेस के लोग कह रहे हैं कि बाबू सिंह कुशवाहा को पैसा लेकर पार्टी में शामिल कराया गया है तो लोगों को रायबरेली का वह चुनाव याद आता है जब विनय कटियार पर आरोप लगा था कि पार्टी से मिले पैसे हजम करके वह अपनी जमानत गंवा बैठे थे। उम्मीद है गडकरी शायद वह घटना याद करके सबक ले सकें।

लेखक संजय शर्मा वीकएंड टाइम्‍स के संपादक एवं लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. 

एक दिन संपादकीय प्रकाशित नहीं होने से क्या होता है

मणिपुर में उग्रवादियों से मिल रही लगातार धमकियों के विरोध में मंगलवार, 3 जनवरी को वहां के अखबारों में संपादकीय प्रकाशित नहीं हुए। आल  मणिपुर वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के एक प्रवक्ता ने बताया कि विभिन्न गुटों के उग्रवादी अखबारों पर आरोप लगाते हैं कि वे उनके बयानों को जगह नहीं देते हुए उनके विरोधियों से जुड़ी बातों को प्रकाशित करते हैं और इसके लिए ये गुट स्थानीय अखबारों को धमकियां देते हैं।

ऐसी ही एक घटना के तहत एक उग्रवादी गुट ने 2 जनवरी को एक लोकप्रिय दैनिक के परिसर में एक शक्तिशाली ग्रेनेड फेंका था, जिसके साथ एक पत्र भी था। इस पत्र के मुताबिक कि संपादक, यह अंतिम चेतावनी है, अगली बार ग्रेनेड फट जाएगा। प्रवक्ता ने कहा कि यूनियन ने सरकार से मीडिया संस्थानों को उचित सुरक्षा देने को कहा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

इस खबर को पढ़ कर मुझे आश्चर्य हुआ। जिन अलगावादियों के संरक्षण में राष्टीय स्तर की मुख्यधारा की खबरे दबा देने वाले मणिपुर के पत्रकारों को जब अपने ऊपर बात आई तो सरकार संरक्षण मांग रहे हैं। केंद्र सरकार से सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि मणिपुर के अधिकतर पत्र किसी न किसी अलगावादी गुटों के संरक्षण में हैं। अखबार संरक्षण पाने वाले अलगावादी गुट के प्रतिस्पर्धी की नकारात्मक खबरें ज्यादा प्रकाशित करता है तो टकराव होना स्वाभाविक है। खूंखार लोगों से दोस्ती में भला प्रेम की नसीहत कहां मिलती है। 

वे शांतिपूर्ण विरोध की करना कहां जानते हैं, वे तो सीधे ग्रेनेड फेंक कर अपनी आवाज सुनाना चाहते हैं। यह घटना अखबारों को संरक्षण देने वाले अलगावादी गुटों की आपसी लड़ाई की एक छोटा का उदहारण भर है।
मणिपुर का चौथा खंभा लोकतंत्र का नहीं, अलगावादियों का पाया बना हुआ है। अब एक अलगावादी गुट दूसरे के पाये को तोड़ कर अपना बर्चस्व दिखाना चाहते हैं।

वर्ष 2009 के उतराद्ध में करीब एक सप्ताह मणिपुर प्रवास पर रहा। स्टॉल पर जो भी अखबार मिले, सब खरीद कर गहनता से पढ़ा। अधिकतर अखबार अंग्रेजी के थे, एक दो असमी और बांग्लाभाषा के मिले जिनके संस्करण बाहर से आए थे। वहां से हिंदी का एक भी पत्र प्रकाशित नहीं हो रहा है। कभी-कभार किसी ब्लॉग पर यह चर्चा होती है कि मणिपुर में हिंदी की पत्रिका निकलती है, पर मुझे मणिपुर में कोई पत्र मिला न पत्रिका मिली। संभव है किसी संस्थान का विभाग हिंदी में पत्रिका निकाल कर पूरे मणिपुर स्तर का होने का शाबासी पाता हो। यहां तक की केबल पर हिंदी चैनल नहीं दिखते हैं। डिश टीवी से दिखते हैं, पर डिश टीवी वाले उपभोक्ताओं की संख्या नागण्य हैं।

मणिपुर के अखबारों में बड़ी खबरे चीन से ज्यादा प्रभावित दिखी। इसके दो कारण हो सकते हैं, या तो वहां के पाठक चीन के खबरों में रुचि रखते है या फिर अखबार जानबूझ कर चीन बातों को मणिपुर के लोगों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे कि उनकी मनोदशा पूरी तरह चीन के अनुकूल बनी रहे। खुफिया विभाग कह ही चुका है कि मणिपुर समेत पूर्वोत्तर भारत के अलगावादियों को खूब संरक्षण दे रहा है। 

यदि आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि पूर्वोत्तर से बाहर के अखबरों में मणिपुर की जितनी भी खबरें आती हैं, वे अधिकतर सैन्य गतिविधियों की होती है या फिर किसी न किसी तरह से केंद्र सरकार के उपेक्षित व्यवहार का उजागर करने वाली वाली रहती है। जो पत्रकारबंधु किसी समाचार पत्र में किसी एजेंसी की खबरें प्रतिदिन देखते होंगे तो निश्चय ही उन्हें इस बात का आभास होगा कि जिस तरह से गैर-हिंदीभाषी क्षेत्र असम, कोलकाता अथावा उत्तर भारत से जम्मू-कश्मीर, पंजाब आदि की खबरें आती है,कभी भी मणिपुर या पूर्वोत्तर राज्यों की खबरें नहीं आती है। घटनापरक या आयोजन की खबरें तो मिलेगी, पर व्यवस्था की हकीकत रू-ब-रू कराने वाली मणिपुर की खबर कभी नहीं आती है? 

दरअसल मणिपुर के अखबार ही नहीं चाहते हैं कि उनकी धरती के लोग राष्टÑ की मुख्यधारा की खबरे पढ़ें। यदि उनकी ऐसी मंशा नहीं होती तो मणिपुर के अखबारों में ऐसी खबरें गायब नहीं रहती। राष्टÑ की मुख्यधारा तो छोड़िये राज्य सरकार पूरी तरह से अलगावादियों के सामने पंगु है। सप्ताह भर मणिपुर प्रवास में कभी ऐसी खबर नहीं मिली कि जो जनहित से जुड़ी और विकास के लिए सरकार को प्रेरित करती हो। जिन खुंखार अलगावादियों को मणिपुरी पत्रकारों ने अपनी कलम की धार से डराया नहीं, अब वे उन पर ही ग्रनेड फेंके तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसके विरोध में यदि पूरे अखबर एक दिन संपादकीय नहीं लिखते हैं तो इससे अलगावादियों हृदय नहीं पसीजने वाला है। उनका एकमात्र मकसद है पूर्वोत्तर की स्वायत्ता। 

संजय स्वदेश की रिपोर्ट 

एनबीटी ने एनसीआर के लिए लांच किया विशेष संस्‍करण

टाइम्स समूह के अखबार नवभारत टाइम्स ने एनसीआर में अपनी स्थिति को और मजबूत बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. एनबीटी ने सोमवार को एनसीआर के लिए अपना विशेष अति स्‍थानीय संस्करण शुरू किया है. अखबार के दाम में कोई वृद्धि नहीं की गई है. अखबार मैनेजमेंट की कोशिश है कि पाठकों को उतने ही मूल्‍य में उनकी हर छोटी-बड़ी खबर पढ़ने को मिले.

 अखबार के अधिकारियों का कहना है कि इस पहल से पाठकों के साथ विज्ञापनदाताओं को भी फायदा होगा. एनसीआर संस्करण उत्तर प्रदेश और हरियाणा के राज्य स्तरीय खबरों को भी पूरी प्राथमिकता देगा. एन‍बीटी का यह विशेष एनसीआर संस्करण सभी पांच उपनगरों गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, ग्रेटर नोएडा और नोएडा में एक साथ उपलब्ध होगा. यह विशेष संस्‍करण मुख्‍य संस्‍करण के साथ ही पाठकों को उपलब्‍ध कराया जाएगा. संभावना जताई जा रही है कि जिस तरह से एनसीआर में विकास हो रहा है उसमें एनबीटी का यह प्रयास सफल होगा. 

चुनाव के दौरान अफवाह फैलने से रोकने में मदद करे मीडिया

गोण्डा। जिलाधिकारी/जिला निर्वाचन अधिकारी राम बहादुर ने कहा है कि लोकतंत्र के सफल संचालन में मीडिया की महती भूमिका है। इसलिए आगामी विधानसभा के चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न कराने के लिए आप सबको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समाज में किसी प्रकार का अफवाह न फैले और यदि कहीं से भी इसकी शुरुआत हो गई है तो इस पर तत्काल अंकुश लगे।

वे आज यहां सिंचाई विभाग फील्ड हास्टल में उप्र. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की जिला इकाई द्वारा आयोजित बैठक में जनपद के कोने-कोने से आए पत्रकारों को आसन्न विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भारत निर्वाचन आयोग तथा भारतीय प्रेस परिषद द्वारा जनसाधारण व मीडिया के लोगों के लिए जारी किए गए नवीनतम दिशा निर्देशों की जानकारी दे रहे थे।

जिलाधिकारी ने कहा कि मीडिया में आने वाली हर अच्छी व बुरी बात का प्रभाव उसके पाठक व दर्शक पर पड़ता है। इसलिए चुनाव कवरेज के दौरान हमें पक्ष विशेष के महिमामंडन तथा दूसरे पक्ष को निरुत्साहित करने की कोशिशों से बचना चाहिए। उन्होने कहा कि मीडिया को समाज का आईना कहा जाता है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम जहां पर जो चीज जैसी है, वैसी ही दिखाएं। इससे हमारी विश्वसनीयता बढ़ती है। जिलाधिकारी ने बताया कि इस बार चुनाव आयोग का पूरा ध्यान प्रत्याशियों द्वारा किए जाने वाले अनाप-शनाप खर्चों पर अंकुश लगाने का है। इसलिए इसकी रोकथाम के लिए कई स्तरीय जांच प्रणाली विकसित की गई है तथा मतदाताओं को मतदान के प्रति जागरूक करने के लिए आगामी 25 जनवरी को मतदाता दिवस मनाया जाएगा। जिलाधिकारी ने मीडिया के लोगों से अपील किया कि अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों को अधिकाधिक मतदान के लिए प्रेरित करें। चुनाव कवरेज के लिए मतदान के दिन उन्होंने संगठन के सभी सदस्यों को पास जारी किए जाने का आश्वासन दिया। पत्रकारों की मांग पर उन्होंने जिले भर में प्रेस व पत्रकार लिखाकर चल रहे दोपहिया व चौपहिया वाहनों की जांच कराने का भी आश्वासन दिया।

अपर जिलाधिकारी/उपजिला निर्वाचन अधिकारी विवेक पाण्डेय ने बताया कि जिला स्तर पर गठित मीडिया प्रमाणन एवं व्‍यय अनुवेक्षण समिति का केबिल कनेक्शन, टेलीविजन, डीवीडी प्लेयर, कम्प्यूटर इंटरनेट आदि सुविधाओं से सुसज्जित कक्ष तैयार हो गया है, जहां पर बैठकर कमेटी के सदस्य सभी प्रकार के विज्ञापनों/पेड न्यूज समेत उम्मीदवारों व राजनीतिक दलों के निर्वाचन से सम्बंधित समाचारों व साक्षात्कारों की समीक्षा करेंगे। उन्होंने बताया कि किसी भी इलेक्ट्रानिक चैनल, केबिल नेटवर्क, रेडियो और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व प्रसारित किए जाने वाले विज्ञापन संवीक्षा समिति से पूर्व अनुमति मिल जाने के बाद ही प्रसारित होंगे। यदि मीडिया अनुवीक्षण सेल को लगता है कि कोई विज्ञापन समुचित अनुमति के बिना किसी अभ्यर्थी के पक्ष में प्रकाशित किया गया है तो यह समिति तुरंत रिटर्निंग आफिसर को सूचित करेगी तथा रिटर्निंग आफिसर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 127 (क) के अधीन अभ्यर्थी को नोटिस जारी करेगा।

बैठक में वरिष्ठ पत्रकार एसपी मिश्र, संजय तिवारी, अचंल श्रीवास्तव आदि ने भी अपने विचार ब्यक्त किए। अध्यक्षता व आभार प्रदर्शन यूनियन के जिलाध्यक्ष कैलाश वर्मा तथा संचालन महामंत्री जानकी शरण द्विवेदी ने किया। इस मौके पर खराब मौसम के बावजूद जिले के कोने-कोने से 100 से अधिक पत्रकार मौजूद रहे। प्रमुख रूप से उपस्थित रहने वालों में टीपी सिंह, अमित मिश्रा, अकील सिद्दीकी, अमित श्रीवास्तव, विजय कुमार शुक्ला, गनी मोहम्मद, दिवाकर सिंह, राजेन्द्र मिश्र, संजीव शर्मा, श्याम त्रिपाठी, अशोक कुमार मिश्र, श्याम प्रकाश तिवारी, चन्द्र प्रकाश शुक्ल, डा. सतीश चन्द्र, पूरन चन्द्र गुप्ता, धर्मेन्द्र गुप्ता, जटा शंकर सिंह, प्रदीप पाण्डेय, प्रदीप कुमार गुप्ता, आरएन पाण्डेय, अरविन्द शुक्ल, अजय शुक्ल, सौरभ शुक्ला, लखन लाल शुक्ल, केके मिश्र, देव प्रकाश मिश्र, यज्ञ नरायन तिवारी, महेन्द्र तिवारी, आरके मिश्रा, पंकज सिन्हा, दिनेश कुमार पाण्डेय, रघुबर दयाल तिवारी आदि मौजूद थे।

ऐसे खतरनाक समय में मैं शुभकामनाएं दूं तो किसे दूं

आप को नये साल की शुभकामनाएं। शुभकामनाएं सबको अच्छी लगती हैं, जाहिर है मेरी शुभकामना आप को अच्छी लगेगी। पर किन्हीं खास मौकों पर ही क्यों? होली, ईद, दीवाली या नये साल पर ही क्यों? हम निरंतर शुभकाम क्यों नहीं रह सकते। कुछ चुने हुए लोगों के लिए, मित्रों के लिए ही शुभकामनाएं क्यों? तमाम अनाम, अनजान लोगों के जीवन में होली, दीवाली, नया साल जैसे आता ही नहीं।

उन्हें दुख इतना मौका ही नहीं देता कि वे इस बारे में सोचें। उन्हें अपनी जिंदगी की लड़ाई इतना वक्त ही नहीं देती कि वे समय को टुकड़ों में देख पायें। वे जीवन को भी टुकड़ो में नहीं देख पाते। रोटी की लड़ाई में उन्हें नया साल तो क्या रात और दिन, सुबह और शाम का फर्क नहीं मालूम पड़ता। कब सूरज उगता है, कब डूब जाता है, उन्हें पता ही नहीं चलता। उनके लिए मौसम भी बेमानी होते हैं। शीत, ग्रीष्म और बरसात का उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। खूबसूरती उन्हें रोमांचित नहीं करती, बदसूरती उन्हें पागल नहीं करती। मेहनत, थकान और रोटी के अलावा उनकी जिंदगी में कुछ खास नहीं। रोटी भी कई बार उनके लिए सपनों की चीज होती है। बेशक केवल शुभकामनाओं से उनकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आने वाला है लेकिन उनके लिए हमारे पास शुभकामनाएं भी तो नहीं हैं।

दुख, संघर्ष सारी दीवारें तोड़ देता है, सारे बँटवारे उसके लिए अर्थहीन होते हैं। वंचित लोगों की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, इन बेकार की चीजों पर सोचने का उनके पास समय ही नहीं होता। रात को सड़कों के किनारे अपने रिक्शों की बाहों पर टंगी हुई जिंदगियों को देखिये कभी। आप पता नहीं लगा पायेंगे कि इनमें कौन मुसलमान है, कौन हिंदू, कौन सिख है, कौन ईसाई। भूख की लड़ाई में सिर्फ आदमी होता है, गरीबी सारे बनावटी मुखौटों से मुक्त कर देती है। पर इनके लिए अब कहाँ हैं शुभकामनाएं? सत्ता, शक्ति, सुख और समृद्धि जीवन को, समय को, मनुष्य को बाँटते हैं। ये अक्सर मनुष्य से उसकी दृष्टि और सरोकार छीन लेते हैं। ऐसे में वह समय, जीवन और मनुष्य से खेलता है। हर नये साल पर पैसे वाले महंगे होटलों में नाचते हैं, गाते हैं, पूरी रात महंगी शराब पीते हैं, झूमते हैं, कई बार बेहोश हो जाते हैं। अरबों रुपये आतिशबाजी में उड़ा दिये जाते हैं। हवा बारूद की गंध से बोझिल हो जाती है। ऐसा अराजक मनोरंजन आखिर किस तरह सड़कों, फुटपाथों, झोपड़ियों की थकी हुई जिंदगियों की ओर देखने देगा, गाँवों और जंगलों में रहने वालों की कठोर जीवनचर्या के प्रति संवेदित करेगा।

 वैभव के आकर्षण और अमीर बनने की उत्कंठा ने समाज में भारी हलचल मचा रखी है। जिनको भी मौका है, वे एक ऐसी अंधी गली की ओर भागे चले जी रहे हैं, जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं। इसी आकांक्षा ने भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दिया है। हम अचानक नहीं बिगड़े हैं,  ये जहर धीरे-धीरे हमारी धमनियों में उतरा है, कोकीन की तरह। और अब हम सब लाचार हैं। बिना धन के, बिना वैभव के, बिना संपदा के सब सूना है। जिसको एक बार इस नशे का स्वाद मिल गया, वह इसके बिना रह नहीं सकता। बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, ऊंची अट्टालिकाएं, जहाजों में उड़ना। जो लोग दूर से देख रहे हैं, वे भी इसका मजा चखना चाहते हैं, वे अपने गंदे सपनों में व्यस्त हैं, उन्हें सच करने के तरीकों में व्यस्त हैं। मध्यवर्ग अपनी लपलपाती जीभ से हवा में घुली ऐश्वर्य की गंध लेकर मस्त है, वह कोई मौका चूकना नहीं चाहता। स्कूल जाते बच्चों को प्रारंभ से ही भविष्य की सपनीली कहानियों के देश में सफर कराना शुरू कर दिया जाता है। सारे गुण कंचन में हैं, धन आना चाहिए। चाहे जैसे आये। जिसके पास धन है, उसके पास ताकत है, उसके पास उड़ान है, उसके पास सब कुछ है। इसी नाते बच्चों के जीवन में भी तनाव है। वे अपनी सहजता से वंचित होते जा रहे हैं। उनके सपनों में ऐसी बड़ी जगहें हैं, जहाँ पहुंचकर वे अपनी तिजोरियाँ भर सकें। इस दृष्टिहीनता में वे गलत रास्ते पर भी जाते दिख रहे हैं। वे गाड़ियाँ चुरा रहे हैं, एटीम तोड़ रहे हैं। उन्हें जीवन नहीं चाहिए, पैसा चाहिए। पैसे की यह भूख उन्हें तनाव और खुदकुशी तक भी ले जा रही है।

गरीब के पास रास्ते नहीं हैं क्योंकि पैसे नहीं हैं। पूंजी की नयी सभ्यता में यह स्वीकार किया जा चुका है कि पैसे से ही सारे रास्ते खुलते हैं। इसी सोच के चलते मनुष्य केंद्र से हाशिये पर चला गया है। उसके हाशिये से बाहर हो जाने के खतरे सामने हैं। उसे बचाने के लिए जो लोग सामने आते हैं, उन्हें देशद्रोही, नक्सली कहकर मार देने की कोशिशें जारी हैं। ऐसे खतरनाक समय में इस नये साल पर मैं शुभकामनाएं दूं तो किसे दूं। बस इतनी उम्मीद कर सकता हूं कि सब शुभकाम हों, सब एक दूसरे के साथ खड़े हों, मनुष्य की पहचान स्मृति से बाहर न होने दें। बदलाव की इसी कामना के साथ इस नये साल में आप सबका स्वागत है।  

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 08853002001 के जरिए किया जा सकता है.   

गोविंद पंत राजू ने साधना न्यूज संग शुरू की नई पारी

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू के बारे में खबर है कि उन्होंने साधना ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. वे साधना न्यूज यूपी-उत्तराखंड के हेड के बतौर काम करेंगे. गोविंद के साधना ज्वाइन करने की पुष्टि साधना न्यूज के एडिटर इन चीफ एनके सिंह ने की. गोविंद पंत राजू आजतक न्यूज चैनल के लिए यूपी-उत्तराखंड ब्यूरो चीफ के रूप में लंबी पारी खेल चुके हैं. वे बीच में कई अखबारों चैनलों में सलाहकार की भूमिका में रहे.

माना जा रहा है कि गोविंद पंत राजू के आने से साधना न्यूज की धमक और बढ़ेगी. एनके सिंह के साधना ज्वाइन करने के बाद से इस चैनल की साख काफी बढ़ी है. कंटेंट के मामले में भी चैनल ने पढ़े-लिखे लोगों के बीच अच्छी पहचान बनाई है. गोविंद पंत राजू के यूपी हेड के रूप में ज्वाइन करने के बाद लखनऊ में साधना का काम देख रहीं अग्निमा दिल्ली आफिस आकर अपने दायित्व का निर्वाह करेंगी. उनसे पहले पंकज वर्मा लखनऊ में साधना न्यूज का काम देखते थे लेकिन फिलहाल वे चैनल से अलग हैं और साधना ग्रुप की अन्य कंपनियों से संबद्ध हैं.

विष्णु नागर ने कविता के जरिए याद किया जनकवि नागार्जुन को

नोएडा : अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन की राष्ट्रीय राजधानी इकाई ने नव वर्ष की पूर्व संध्या पर एक सरस-सबरंग गीतों और ग़ज़लों का एक रोचक कार्यक्रम नोएडा स्थित रायटर्स डेस्क के सभागार में आयोजित किया जिसका श्रोताओं ने देर रात तक मंत्र मुग्ध होकर आनंद लिया। पी7 न्यूज चैनल के निदेशक शरद दत्त की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम का प्रारंभ कविताओं से हुआ जिसकी शानदार शुरूआत ओजस्वी कवि अरविंद पथिक ने की, जिसमें उन्होंने नए वर्ष का स्वागत और बीते साल से शिकवे-शिकायतें भी की। इसके बाद संस्कार सारथी के संपादक मुकेश परमार मंच पर आए।

प्रवासी संसार के संपादक राकेश पांडेय मजदूरों के दर्द को अपनी कविता में बयां किया। संचालन कर रहेपंडित सुरेश नीरव ने सिलसिला आगे बढ़ाते हुए दार्शनिक भावभूमि की गज़लें सुनाकर वातावरण को जीवंत-जाग्रत कर दिया। उनके बाद माइक संभाला डी.डी. भारती के निदेशक और ख्यात कवि श्री कृष्ण कल्पित ने जिन्होंने अपनी ग़ज़लों के जरिए महफिल के लुत्फ को और गाढ़ा कर दिया। शुक्रवार के संपादक सुकवि विष्णु नागर ने इस अवसर पर जनकवि नागार्जुन को कविता के जरिए याद किया।

इस अवसर पर पाकिस्तान से आए संगीतकार शायर रईस मिर्जा ने भी बेहद संजीदा ग़ज़लें सुनाईं और वातावरण को शायराना बनाया। रायटर्स डेस्क के सीईओ योगेश मिश्रा ने अपनी चुटीली और धारदार कविताएं पढ़कर माहौल में हंसी का रंग घोल डाला। कार्यक्रम के दूसरे चरण में पंडित ज्वाला प्रसाद ने उपने संगीत का जादू बिखेरते हुए चुनिंदा ग़ज़लों का गायन कर महफिल की पुरजोर वाहवाही लूटी।