भड़ास के 5 वर्षों का यह संघर्षमय सफर प्रेरणा है हम सभी पत्रकारों के लिए

अब से लगभग ५ साल पहले मैं भी दिल्ली-नोएडा के मीडिया दफ्तरों के दरवाजे खटखटाया करता था। उम्मीद, उर्जा और आत्मबल से लबरेज जब इन दफ्तरों में घुसता था तो लगता था, कभी इसी ऑफिस में काम करूँगा, पत्रकारिता करूँगा, मगर ऑफिस से निकलते वक्त नैसर्गिक गालियां ही जुबान पर होती थी। किसके लिए अभी तक नहीं जान पाया, खुद के लिए थी या उनके लिए जो नौकरी पर नहीं रखते थे।

भड़ास का जन्म होते ही लगने लगा की अभी भी पत्रकारिता हो सकती है

यशवंत भाई जी, नमस्‍कार। भड़ास के पांच साल (17 मई 2008 से 17 मई 2013) पूरे होने पर मेरी दिल से बधाई स्‍वीकार करें। यशवंत जी जिस जज्ज्बे के साथ अपने ये मुहिम चलाया हम सभी उसके लिए आपका तहेदिल से सुक्रगुजार हैं। भाई हम लोग तो पत्रकारिता पढ़े, लेकिन जब करने की बारी आई तो..हमारा हम पर ही हक न रहा।