जो कारवां सजा था संगम की दुकान के नाम पर वहां तो संगम था ही नहीं

: त्रिवेणी के विलाप का यह विन्यास : कल हम भी प्रयाग हो आए। गए थे एक पारिवारिक काम से। पर थोड़ा समय मिला तो कुंभ नगरी भी गए। जा कर कुंभ का जायज़ा भी लिया। गए थे संगम नहाने, गंगा नहा कर लौटे। पहले तो नाव नहीं मिली। पर जब ध्यान से देखा तो पता चला कि बीच नदी में जो नावों का कारवां सजा था संगम की दुकान के नाम पर वहां तो संगम था ही नहीं। पर क्या साधू-संन्यासी, क्या भक्तजन या कोई अन्य भी संगम नहीं नहाया इस पूरे कुंभ में। क्यों कि संगम तो अपनी जगह बदल गया था। संगम की जगह किले के पास आ गया है। उस संगम पर कोई नहाने गया ही नहीं। न ही प्रशासन ने इस पर कोई ध्यान दिया, न ही कोई व्यवस्था की। क्या यह सब भीड़ के नाते हुआ या लापरवाही के नाते?

समझना बहुत आसान है। प्रशासन नपुंसक हो चुका है और लोग यथास्थितिवादी। तटस्थता की भी यह हद है। चकित तो धार्मिक गुरुओं का रवैया भी करने वाला है। किसी मीडिया का भी इस तथ्य पर कोई ध्यान क्यों नहीं गया यह भी हैरतंगेज़ है। संगम की शालीनता को इस सिस्टम ने कायरता क्यों मान लिया है यह समझना भी कुछ बहुत कठिन नहीं है। एक कविता की याद आती है:

राजा ने कहा रात है
मंत्री ने कहा रात है
सब ने कहा रात है
यह सुबह-सुबह की बात है

तो क्या यही हो गया है? कि सब ने सुबह-सुबह को रात स्वीकार लिया है। क्यों कि सरकार ऐसा चाहती है?  कि सरकार और प्रशासन ने नहीं देखा कि कि संगम की जगह बदल गई है तो फिर किसी ने भी यह संगम के जगह बदलने पर गौर नहीं किया और संगम के बजाय गंगा में ही नहा-नहा कर धन्य होते रहे? पाप धोते रहे, पुण्य कमाते रहे। जान गंवाते रहे। यह कौन सी आस्था है या यह कौन सा धर्म है? कि किसी ने यह सोचने या देखने या कहने की ज़रुरत भी नहीं समझी कि संगम की जगह बदल गई है और कि सब को संगम में ही नहाना चाहिए? और कि प्रशासन को संगम में नहाने की व्यवस्था करनी चाहिए?

सोचिए कि संगम पर क्या अदभुत नज़ारा है कि एक तरफ से गंगा बहती हुई आती है पूरे वेग से और दूसरी तरफ से पूरे वेग से  बहती आती है यमुना । न गंगा यमुना को डिस्टर्ब करती है न यमुना गंगा को। कोई अतिक्रमण नहीं। दोनों ही एक दूसरे को न रोकती हैं न छेंकती हैं। बड़ी शालीनता से दोनों मिल कर काशी की ओर कूच कर जाती हैं। और एक हो जाती हैं। प्रकृति का यह खूबसूरत नज़ारा औचक कर देता है। इस का औचक सौंदर्य देख मन मुदित हो जाता है। यह अलौकिक नज़ारा देख मन ठहर सा जाता है। दूधिया धारा गंगा की और नीली धारा यमुना की। मन बांध लेती है। मन में मीरा का वह गीत गूंज जाता है-चल मन गंगा यमुना तीर! मन गुनगुनाने लगता है- तूं गंगा की मौज मैं जमुना की धारा! गंगा-जमुनी तहज़ीब का चाव भी यही है। और यहां तो विलुप्त सरस्वती का भी संगम  गंगा और यमुना के साथ है। त्रिवेणी का तार बजता है। मन उमग जाता है। अब भी जब संगम की जगह बदल गई है। तो यह संगम की जगह का बदलना भी क्या प्रकृति से निरंतर छेड़छाड़ का ही नतीज़ा है? या कि संतों और न्यायालय के दबाव के चलते गंगा का पानी ज़्यादा छोड़ दिया गया और यमुना का पानी कम छोड़ा गया। गंगा का प्रवाह प्राकृतिक होने के बजाय कृत्रिम हो गया, तेज़ हो गया और वह यमुना के क्षेत्र में ज़्यादा घुस गई। पर दोनों बहनों का बहनापा फिर भी नहीं गया। और आपस में शालीनता को वह समोए रहीं।

संगम की पवित्रता और शालीनता जगह बदलने के बावजूद बनी रही। तो क्या विलुप्त सरस्वती ने भी अपनी जगह बदल ली होगी? विलुप्त सरस्वती का यह विलाप है कोई सुनने वाला? कोई पर्यावरणविद, कोई साधू-संन्यासी, कोई प्रशासन या फिर कोई और सही? प्रकृति का यह विलाप जो नहीं सुना गया तो प्रकृति हमारे साथ क्या करेगी, यह अंदाज़ा है क्या किसी को? सभी नदियां धारा बदलती हैं। गंगा और यमुना भी। पाट और पेट बदलती हैं। संगम की धारा और जगह भी बदलती है। पर इस तरह और इतना तो नहीं ही। बीते कई वर्षों से मैं जब भी कभी इलाहाबाद जाता हूं तो थोड़ा समय निकाल कर संगम भी ज़रुर जाता हूं। संगम की शालीनता को निहारने। संगम की शांत शालीनता मन को असीम शांति से भर देती है। दिन हो, दोपहर हो, शाम हो या सुबह, यह मायने नहीं रखता, संगम की शालीनता को मन में समोने के लिए। चल देता हूं तो बस चल देता हूं। खास कर शाम को उस की नीरवता मन में नव्यता से ऊभ-चूभ कर देती है। इक्का-दुक्का लोग होते हैं। और संगम की शालीनता को निहारने के लिए शांति का स्पंदन शीतलता से भर देता है।

संगम को मन में समोना हो, उस की शालीनता को मन में थिराना हो तो शांति ज़रुर चाहिए। भीड़-भाड़ नहीं। सचमुच भीड़ से बच कर ही संगम का सुरुर मन में बांचने का आनंद है, सुख है और उस का वैभव भी। भीड़ में भी उस का वैभव हालां कि कम नहीं होता। तो कल जब भीड़ में भी गया तो संगम का वैभव कम नहीं हुआ। उस की शालीनता, उस का संयम भी बदस्तूर था। इस लिए भी कि संगम तो बिलकुल खाली था। निर्जन था। ऐसे जैसे किसी वन में हो, नगर में नहीं। भीड़ चाहे घाट पर हो चाहे सो काल्ड संगम पर, पर संगम की शांति बदस्तूर तारी थी उस पर। उस की शालीनता और शांति को सरस्वती घाट से आती-जाती नौकाएं भी चीर नहीं पा रही थीं। संगम का यह विलाप मेरे मन में और गहरा गया यह सब देख कर। संगम में नहाने की साध की तरह यह विलाप भी साथ हो लिया है और मैं मन मार कर गंगा में डुबकी मार कर निकल लेता हूं। उस गंगा में जिस गंगा को लोग और तमाम पर्यावरणीय रिपोर्टें चीख-चीख कर कह रही हैं कि  गंदी हो गई है। राज कपूर अपनी फ़िल्म में गाना सुनवा गए हैं राम तेरी गंगा मैली हो गई। उस मैली गंगा में नहा कर, डुबकी मार कर मन फिर भी मुदित है। नहा कर निकलता हूं। कपड़े पहन कर जब चलने को होता हूं तो मेरे सहयात्री श्रीधर नायडू कहते हैं कि, 'सर, आप की एक फ़ोटो ले लूं?' मेरे हां कहने पर वह अपनी टेबलेट से मेरी फ़ोटो खींच लेते हैं।

श्रीधर से बस अभी रास्ते में ही टैंपो में परिचय हुआ है। हैदराबाद के रहने वाले हैं। रायपुर में रहते हैं। एक  कंपनी में नौकरी करते हैं। किसी काम से बनारस जा रहे थे। रास्ते में इलाहाबाद पड़ा तो उतर गए। कुंभ का पुण्य कमाने के लिए। और रास्ते में मुझे मिल गए। शाम को मेरी भी लखनऊ वापसी की ट्रेन है और उन के बनारस जाने की। बात ही बात हम तय कर लेते हैं कि नहाते समय हम बारी-बारी एक दूसरे का सामान देखेंगे। वी आई पी घाट पर आ कर पता चलता है कि नाव तो सरस्वती घाट पर मिलेगी। यमुना पुल के पास। श्रीधर बहुत हैरान परेशान होते हैं संगम जाने के लिए। पर यहा से संगम जाने के लिए। पर सरस्वती घाट जाने के लिए फिर वापस तीन चार घंटे का उपक्रम होगा। रास्ते भर जाम का लफड़ा है। शाम की ट्रेन है। छूट जाने खतरा है। फिर वह और मैं खुद बहुत सारे जुगाड़ लगाते हैं संगम पर जाने खातिर नाव के लिए। पर कोई जुगाड़ बनता नहीं। फिर किले तक आते-जाते इस घाट से उस घाट तक मेरी नज़र अचानक संगम की बदली जगह पर पड़ती है। तो मैं हैरान परेशान हो जाता हूं। जिन पुलिस वालों से नाव की बात पहले कर रहा था उन्हीं से संगम के सवाल पर उलझ जाता हूं। तो एक पुलिस वाला वी आई.पी. घाट को इंगित कर के कहता है कि, 'सारे साधू संन्यासी यहीं नहा कर गए हैं। शंकराचार्य से लगायत सारी वी.आई.पी. तक। किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि संगम तो वहां है यहां क्यों नहाऊं? आप ही एक नए आए हो जो यह सवाल पूछ रहे हो !'

मैं फिर जब यमुना की नीली धारा और गंगा की दूधिया धारा किले के पहले की तरफ दिखाते हुए कहता हूं कि, 'संगम तो वह देखिए  उधर है। न कि जहां नांवें लगी हैं उधर।'  यह सुन कर वह पुलिस वाला उस तरफ ध्यान से देखते हुए चुप लगा जाता है। तो मैं उसे टोकता हुआ कहता हूं संगम जब इधर है तो नहाने के लिए भी इधर ही नावें लगा कर व्यवस्था करनी चाहिए थी।' और जब कई बार यही बात कहता  हूं तो वह पुलिस वाला भन्ना जाता है। कहता है यह सब जा कर अखिलेश यादव से पूछिए। उन के पिता जी मुलायम सिंह से पूछिए। शिवपा्ल सिंह से, आज़म खान से पूछिए !  और मेरे पास से चला जाता हे तेज़-तेज़ कदमों से। श्रीधर नायडू जो संगम जाने के लिए लालायित हैं समझाता हूं कि कोई फ़ायदा नहीं वहां जाने से। संगम तो वह है नहीं। संगम तो इधर है जहां नहाने, जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। सो यहीं नहाते हैं गंगा में। श्रीधर बड़बड़ाते हैं कि गंगा तो मुझे बनारस में भी मिल जाती। फिर यहां उतरना बेकार गया। मैं तो संगम नहाने आया था। अब यहां क्यों नहाऊं?  खैर, पहले मैं नहाता हूं। श्रीधर मेरा सामान देखते हैं। नहा धो कर जब मैं ने कपड़े पहन लिए तो अचानक श्रीधर भी मचल गए। बोले, सर मैं भी नहा लेता हूं। और वह भी नहाने चले गए। नहा कर आए तो कपड़े पहनने के बाद बोले, सर आप की फ़ोटो खींच लूं? मैं ने कहा कि बिलकुल। फिर उन्हों ने अपनी टेबलेट से न सिर्फ़ फ़ोटो मेरी खींची बल्कि मेरी आई.डी. पूछ कर वहीं से तुरंत मुझे मेल भी कर दी।

अब हम लोग लौट रहे हैं। मेला हालां कि उजड़ चला है। धूल उड़ रही है। पर भीड़ बनी हुई है। इतवार होने के नाते  स्थानीय लोग ज़्यादा हैं। पर बाहरी लोग भी कम नहीं हैं। भीड़ चल रही है अपनी गति से। अपने मूड से। अपने रंग से। कैलाश गौतम की कविता अमौसा क मेला मन में तिर जाती है- अमौसा नहाए चलल गांव देखा ! भीड़ चल रही है। साथ ही यात्रियों से लूट-पाट भी। क्या रिक्शा वाले, क्या आटो वाले और क्या नाव वाले सब के सब आने वालों को लूटने में एक दूसरे से आगे थे। एक किलोमीटर के लिए भी कोई दो सौ रुपए भी ले सकता था, पाच  सौ रुपए भी। नाव वाले भी आठ सौ ले सकते हज़ार भी, दो हज़ार भी। प्रशासन और पुलिस मूक दर्शक थी।

स्टेशन पर भी भीड़ बहुत है। नहा कर लोग लौट रहे हैं और रेल के डब्बों में भेड़-बकरी की तरह ठुंस रहे हैं। कोई व्यवस्था नहीं है। कोई इधर हांक रहा है कोई उधर। यह दबे-कुचले निर्बल वर्ग के लोग हैं। एक ट्रेन में लोग सामान रखने वाले डब्बे में चढ़ गए हैं। बिलकुल भूसे की तरह। औरतें और बच्चे ज़्यादा हैं इन में। वृद्ध और अधेड़ लोग। कुछ रेल कर्मचारी आते हैं उन्हें कुत्तों की तरह दुत्कार-दुत्कार कर उतार रहे हैं। लोग इधर उधर भाग रहे हैं। ट्रेन के डब्बों में जगह नहीं मिल पा रही है। ट्रेन चल देती है। लोग प्लेटफ़ार्म पर दौड़ते रह जाते हैं। गिरते-पड़ते। पर ट्रेन नहीं मिलती, निकल जाती है। जो कुछ चढ़ गए हैं वह भी कूद-कूद कर चलती ट्रेन से उतर रहे हैं। क्यों कि बाकी परिजन प्लेटफ़ार्म पर रह गए हैं। चेहरे पर अब कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे! का भाव है। प्लेटफ़ार्म पर अब दूसरी ट्रेन आ गई है। लोग फिर इधर-उधर भाग रहे हैं। झोला, झंझट लिए हुए। चलने की क्षमता नहीं है पर दौड़ने की कोशिश जारी है। कुंभ में संगम नहाने के लिए, पुण्य कमाने के लिए यह यातना, अपमान और नर्क भुगतते लोगों को देख कर मन तकलीफ़ से भर जाता है। संगम की शालीनता का सारा सौंदर्य, औचक सौंदर्य मन से तितर -बितर हो जाता है।

मुझे नौचंदी से लौटना है। अचानक उस का प्लेटफ़ार्म बदल जाता है। लोग इधर-उधर हो रहे हैं। अजब अफ़रा-तफ़री है। अमावस्या की शाम का हादसा याद आ जाता है। मरे हुए लोगों के जूते-चप्पल और उन के परिजनों की चीख-पुकार याद आ जाती है। साथ ही दयाशंकर शुक्ल सागर की हिंदुस्तान में लिखी वह खबर भी मन में तैर जाती है एक भयावह दु:स्वप्न की तरह कि स्टेशन पर कफ़न पहले आ गए, डाक्टर और दवाएं बाद में। खैर कोई हादसा नहीं होता। हम सही-सलामत अपने डब्बे में आ जाते हैं।

मन में सवाल बदकता हुआ-सा बाकी है कि संगम की जगह तो बदल गई है मय अपनी शालीनता के। पर यह व्यवस्था कब बदलेगी भला? अपमान, यातना और नरक का यह कौन सा संगम है भला? कि आप संगम तक लोगों को पहुंचा तो देते हैं पर संगम नहाने की व्यवस्था नहीं करते। लोगों के सम्मान से आने-जाने की सुविधा नहीं दे सकते। अपमान, तिरस्कार और मृत्यु की इस त्रिवेणी के तार कब टूटेंगे भला? गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी का विलाप भी यही है शायद ! सुबह-सुबह को रात कहने की यह रवायत और राजा की ज़िद अब टूटनी ही चाहिए। राजा की रात की बात को मानने का सूर्यास्त अब बहुत ज़रुरी हो गया है।  आखिर् यह कब तक चलेगा कि कफ़न पहले आ जाएंगे और डाक्टर और दवाएं बाद में। त्रिवेणी के विलाप के इस विन्यास को अब सूर्योदय में बदलना ही होगा।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरती दयानंद पांडेय की कहानियाँ

झूठे रंग रोगन में चमकते चेहरे और मनुष्यता को लीलते हुए बाजार पर पैनी निगाह रखे हुए कथाकार दयानन्द पाण्डेय वस्तुतः स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरने वाले अनोखे कथाकार हैं। अनोखापन इसलिए कि एक तरफ तो वे आम आदमी की पक्षधरता ले बैठे हैं। तो दूसरी तरफ ज्वलंत समस्याओं की अग्नि में सीधे हाथ डालते हैं। इस कार्य से उपजे दुख विडम्बना और संत्रास से वे खुद भी पीड़ित होते हैं। इस प्रकार कथाकार दयानन्द पाण्डेय मानवीय पीड़ा को समूची संवेदना के साथ उभारते हैं। उनकी कहानियों में कोई झोल नहीं होता वे सहजबोध के असाधारण लेखक हैं।

अपने उपन्यास, कहानी संग्रह संपादन तथा अनुवाद के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करानेवाले लेखक दयानन्द पाण्डेय डेढ़ दर्जन से भी अधिक पुस्तकों की रचनाकर हिन्दी साहित्य की दुनिया में एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में उनका कहना है कि, ‘‘मैं मानता हूँ कि लेखक की कोई रचना फैसला नहीं होती और न ही अदालती फैसला रचना। फिर भी लेखक की रचना किसी अदालती फैसले से बहुत बड़ी है, और उसकी गूँज, उसकी सार्थकता सदियों में भी पुरानी नहीं पड़ती।’’ भूमिका पृ.सं. 8

उनका यह कथन साहित्य संचरण, संप्रेषण, सामर्थ्य और शाश्वतता की ओर संकेत करता है। प्रकारान्तर से वे इस बात का स्वीकार करते हैं कि लेखक ऐक्टिविस्ट नहीं होता है जो समस्याओं को ऊपर-ऊपर से देखकर नारे-पोस्टर लिखकर क्रान्ति कर दे। उनका स्पष्ट मन्तव्य है कि लेखन महज उबाल या प्रतिक्रिया न होकर प्रौढ़ प्राँजल और गम्भीर्य युक्त होना चाहिए। ऐसा ही लेखन दयानन्द के साहित्य में मिलता है। अपनी कहानियों के माध्यम से वे सामाजिक और व्यक्तिगत विसंगतियों के जकड़न को धीरे-धीरे खोलते हैं। वे मरती हुई अुनभूतियों और भावनाओं के खालीपन को रचते हुए यथा तथ्य का वर्णन करते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियों के स्त्री-पुरुष और परिस्थितियाँ बेहद साधारण और जानी पहचानी लगती हैं। फिर भी उनकी कहानियों के विषय वस्तु में वैविध्यता है। जिसकी सरसता को लेकर वे हरदम चर्चा में रहते हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह, ‘फेस बुक में फंसे चेहरे’ में कुल आठ कहानियाँ हैं। ‘फेस बुक में फंसे चेहरे’ कहानी अर्न्तजाल के जाल में फंसे मनुष्य की विडम्बना को उभारती है, जिसका पहला संवाद है, ‘‘आदमी के आत्म विज्ञापन की राह क्या उसे अकेलेपन की आह और आँधी से बचा पायेगी।’ पृ. 31

यहाँ झोंक जाता है दयानन्द के भीतर का सजग कहानीकार जो छोटी-छोटी घटना, भाव अथवा बड़बड़ाहट के भीतर छिपे मानवीय सत्य को सुनने का प्रयास करता है। रामसिंगार भाई यह जानकर मुदित होते हैं कि बड़े बाबू ने अकेले ही गाँव के विकास में बहुत योगदान दिया, जिससे गाँव में बिजली सड़क स्कूल आदि सुलभ हो गया है। राम सिंगार भाई सोचते हैं कि ….यह फेसबुक पर नहीं है। फेसबुक पर वे लोग हैं जो आत्म विज्ञापन के चोंचले में डूबे हुए हैं। वहाँ अतिरिक्त कामुकता है, अपराध है, बेशर्मी है। ऐसे लोगों के मुखौटे उधेड़ती यह कहानी वहाँ खत्म होती है, जहाँ एक मॉडल की कुछ लिखी हुई नंगी पीठ की पोस्ट लगाते ही सौ से ज्यादा कमेन्ट आ जाते हैं, लेकिन जब जन सारोकार सम्बन्धी गाँव की पोस्ट लगाई जाती है तो उस पर सिर्फ दो कमेन्ट आते हैं, वह भी शिकायती अन्दाज में। मजे की बात यह है कि सब जानने के बाद भी राम सिंगार भाई फेसबुक पर उपस्थित हैं। ‘‘तो क्या राम सिंगार भाई फेसबुक के नशे के आदी हो गये हैं।’’ पृ. 44

इस वाक्य के साथ कहानी का अन्त हो जाता है, जो देर तक पाठक को झकझोरता है। कहानीकार कई बातें कहने में सक्षम हुआ है। एक, सोशल नेटवर्किंग के द्वारा बहुत सी चीजे बर्बाद हो रही है। दूसरे, कोकीन, चरस, गाँजा, अफीम सभी कहीं ज्यादाखतरनाक है फेसबुक। और तीसरे फेसबुक मनुष्य को पहचान नहीं देता केवल फँसाता है।

इस कहानी संग्रह की सशक्त कहानी है–‘‘सूर्यनाथ की मौत’’ इसमें मॉल कल्चर की अमानवीयता को दिखाया गया है। निर्मम उपभोक्ता संस्कृति मासूम सम्भावनाओं को ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा की आग में झोंकने का काम कर रही है। इतना बड़ा बाजार इतने प्रोडक्ट मनुष्य को बौना बना रहे हैं। उनकी मौलिकता के पंख को नोचकर उनमें केवल क्रेता या विक्रेता के भाव भर रहे हैं। कहानी का नायक सूर्यनाथ है जो सूर्य की तरह प्रकाशमान, न्यायी और खरा है, इसीलिए वह धीरे-धीरे मौत की ओर खिसक रहा है। सूर्यनाथ जैसा कद्दावर चरित्र जिसे दयानन्द ने आजादी के समय की बची खुची मिट्टी से लेकर गढ़ा है। ‘फ्लेक्सिबल’ होने की बात पर वह अपना क्रोध पी जाता है। उसके मन में आता है कि ‘बिरला भवन’ में ‘गाँधी स्मृति’ चला जाये जहाँ गाँधी को गोडसे ने गोली मारी थी, वहीं खड़ा होकर प्रार्थना के बजाय चीख-चीख कर कहे कि –हे गोडसे आओ, हमें और हम जैसो को भी मार डालो। इस कहानी के माध्यम से दयानन्द पाण्डेय अपने देश की जनता की सबसे कमजोर और दुखती रग पर अँगुली रख देते हैं।

‘‘कोई गोडसे गोली नहीं मारता। सब व्यस्त हैं, बाजार में दाम बढ़ाने में व्यस्त हैं। सूर्यनाथ बिना गोली खाये ही मर जाते हैं।’’ पृ. 62

कहानी मर्मान्तक पीड़ा देकर समाप्त हो जाती है। स्वार्थ पर टिके हुए विवाहेत्तर सम्बन्ध कभी-कभी जीनियस से जीनियस को भी पतन के गर्त में जाकर पटक देते हैं, जहाँ मौत भी पनाह नहीं देती, उसे हत्या या आत्महत्या के दौर से गुजरना होता है। इसी बात को सच करती है कहानी ‘एक जीनियस की विवादस्पद मौत’।

प्रेम की विभिन्न आकृतियों और विकृतियों की कहानी है ‘बर्फ में फँसी मछली’। मोबाइल और इन्टरनेट से उसकी शाखायें और भी फूली-फैली हैं। इस कहानी का नायक देखता है कि समूचा अन्तरजाल सेक्स को समर्पित है, चैट करते हुए वह देखता है कि ‘सेक्स की एक से एक टर्मानोलाजी कि वात्स्यायन मुनि भी शर्मा जायें। एक से एक मैथूनी मुद्रायें कि ब्लू फिल्में भी पानी माँगे’। पृ.93

कई लड़कियों से प्रेम, फ्लर्ट, चैटिंग और उनसे पीछा छुड़ाते हुए आखिर उसे एक रशियन लड़की से प्यार हो जाता है। रशियन पुरुषों से अतृप्त रीम्मा भारतीय पुरुष से प्यार पाना चाहती है, वह हिन्दुस्तान आना चाहती है। उसके कैंसर की खबर सुनते ही नायक उससे मिलने जाता है लेकिन उससे पहले ही वह देह छोड़ चुकी होती है। प्रेम में डूबा हुआ नायक कहीं का नहीं रहता। उसके दिल का समझ कर भी उससे कोई सहानुभूति नहीं रखता। अब वह बर्फ में फँसी हुई मछली की तरह तड़पता है वैसे ही जैसे रीम्मा तड़पती थी।

दयानन्द पाण्डेय भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के प्रति सजग समर्थ कहानीकार हैं। उनकी लेखनी इतिहास के उन पन्नों को छूती है, जिस पर राही मासूम रजा ने ‘आधा गाँव’, कुर्रतुल हैदर ने ‘आग का दरिया’ लिखा था। ‘मन्ना जल्दी आना’ कहानी विभाजन एवं पूर्वी पाकिस्तान बनने के समय की त्रासदी झेलते हुए ‘अब्दुल मन्नान के विस्थापन की कहानी है। हिन्दुस्तान में जुलाहे जाति क गोल्ड मेडलिस्ट अब्दुल मन्नान अपने ससुराल पूर्वी पाकिस्तान जाते हैं। वहाँ उन पर हिंदुस्‍तानी जासूस होने का दाग लगता है लेकिन ससुर के दबदबे के कारण शीघ्र मिट जाता है। बाँगला देश के दंगे में उनके ससुर व साले की हत्या हो जाती है। मकान जला दिया जाता है और वे वापस हिन्दुस्तान भाग आते हैं। यहाँ पर वे पहले से ही पाकिस्तानी डिक्लेयर्ड हैं। यहाँ से उन्हें सपरिवार बाहर भेज दिया जाता है। मन्नान के विस्थापन में साथ देने वाले शहर के लोग, पड़ोसी, इष्ट मित्र, पारिवारिक सदस्य, मिट्ठू मियां (तोता) आदि के मर्मस्पर्शी चित्रा रचने में कहानीकार को सफलता मिली है।

‘घोड वाले बाऊ साहब’ कहानी विकृत होती, ढहती सामंती व्यवस्था की कहानी है। यह खोखले अहंकार और नैतिकता के टूटने की कहानी है। इस कहानी में झाड़-फूँक, संन्यासी, आश्रम, पुलिस स्टेशन आदि के दोगलपन का वर्णन है। ‘लगाम अपने हाथ में रखना चाहिये’ ऐसा कहने वाले ड्राइविंग का शौक रखनेवाले ‘बाऊ साहब’ को पता ही नहीं था कि उनके और वंश की गाड़ी कोई और लोग हाँक रहे थे। इस संग्रह की सबसे लम्बी कहानी है, ‘मैत्रोयी की मुश्किलें’ मैत्रोयी जितना ही प्रेम, सम्मान और सुरक्षा पाना चाहती है, उतनी ही मुश्किलों में फँसती जाती है। इस कहानी में नाटकीयता है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध पल-पल बदलते हैं, स्वार्थ, धन, यौनेच्छा, उम्र तथा प्रतिष्ठा के चलते ये हरदम दाँव पर लगे रहते हैं।

संग्रह की पहली कहानी और बेहतरीन कहानी है, ‘हवाई पट्टी के हवा सिंह’। यह कहानीकार के पत्राकार जीवन की सजीव कहानी है। खिलदंड़े अन्दाज में रची गई इस कहानी में अशिक्षित, बेलगाम युवाओं की समस्या उठाई है। ऐसे युवा अक्सर हमें जान जोखिम में डाले रेल की छतों पर यात्रा करते पाये जाते हैं। कहानी में नेता जी मुख्य मंत्री के प्रोग्राम में शामिल होने के लिए कुछ पत्रकारों को लेकर बिहार की ऐसी हवाई पट्टी पर उतरने का प्रयास करते हैं, जहाँ गोबर पाथा गया है, चारपाइयां हैं और भारी संख्या में लोग। पायलट अपने को और जहाज को बचाने के लिए कुछ दबंग लड़कों को बुलाता है। लड़के भीड़ को तो भगा देते हैं लेकिन पायलट से कहते हैं, ‘‘अच्छा एक काम करो, इस जहाज में एक बार हम लोगों को बैठाकर उड़ा देना। ….ज्यादा नहीं..तीन-चार चक्कर।…धोखा मत देना।….नहीं तो पेट्रोल डाल कर दियासलाई दिखा देंगे तुम्हारे जहाज को।’’ बाद में पी.ए.सी. के जवानों ने उन्हें काबू में किया और जहाज उड़ान भरने लगा। पायलट ने उन लड़कों को हवा सिंह कहा, जिनका चीखना, चिल्लाना, रोब गांठना, प्रार्थना करना, गालियाँ देना सब हवा हो गया। सवाल यह है कि जिन्हें हवा सिंह कहा जा रहा है, वे कौन हैं? क्या उनके भविष्य के साथ देश का भविष्य नहीं जुड़ा है।

दयानन्द की सभी कहानियां उत्तम हैं। कथ्य तो सार्थक और सामायिक है ही, शिल्प भी उसके अनुसार है। दयानन्द की भाषा में प्रवाह है, पाठक को बाँध लेने की क्षमता है। उनके संवाद तीखे हाजिर जवाब एवं प्रभावपूर्ण हैं। भाषा किस्सागोई तो अद्भुत है और यही उनकी भाषा की जान है, जिससे पाठक एकाकार हो जाता है। कहीं कहीं अखबारी भाषा खटकती है और एकाध वाक्य भी, जैसे- उन्होंने डी.एम. को बुलाया जो एक सरदार था। अपनी कहानियों के माध्यम से दयानन्द पाण्डेय एक तरफ नकली संस्कृति से सावधान करते हैं, तो दूसरी तरफ स्याह होती संवेदनाओं को उभार कर उनमें फिर रंग भरते हैं। हिन्दी साहित्य को उनसे बहुत सी उम्मीदें हैं।

पुस्तक: फेसबुक में फंसे चेहरे: लेखकः दयानन्द पाण्डेय
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि., मूल्य: रु. 350/-
पता: 65, आवास विकास कालोनी, माल एवेन्यू, लखनऊ, मो. 09450246765

डा. ऊषा राय की यह समीक्षा लमही पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है. वहीं से साभार.

सहजता ही दयानंद पांडेय की कहानियों की शक्ति है

सहजता ही दयानंद पांडेय की कहानियों की शक्ति है। उन की कहानियों में व्यौरे बहुत मिलते हैं। ऐसा लगता है, जीवन को यथासंभव विस्तार में देखने की एक रचनात्मक जिद भी उन के कहानीकार का स्वभाव है। इस शक्ति और स्वभाव का परिचय देती उन की यह कहानियां इस संग्रह में पढ़ी जा सकती हैं। इन कहानियों में समकालीन समाज के कुछ ऐसे बिंब हैं जिनमें ‘अप्रत्याशित जीवन’ की अनेक छवियां झिलमिलाती हैं।

‘स्त्री’ दयानंद पांडेय की कहानियों के मुख्य सरोकारों में से एक है। यह बात अलग है कि सुमि, मैत्रेयी,बडकी बबुआइन, छोटकी बबुआइन और बडकी दी जैसे चरित्र जीवन का अनुसरण करते हैं। किसी घोषित आंदोलन का नहीं। हो सकता है किसी पाठक-आलोचक को इन कहानियों और चरित्रों में बौद्धिक मारकाट या सैद्धांतिक संघर्ष ऊपरी सतह पर तैरता न दिखे, फिर भी शीर्षक लगा कर निष्कर्ष देने के स्थान पर ये रचनाएं जीवन को समस्त विचलनों के साथ सामने लाती हैं।

फेसबुक में फंसे चेहरे की बुनावट दिखने में बहुत साधारण है पर इस की जो मार है वह है बड़ी सांघातिक। जो खोखलापन हमारे समाज में व्याप रहा है, आदमी का जो अकेलापन सामने आ रहा है, जो हमारे सामाजिक सरोकार नष्ट हुए जा रहे हैं, एक सोशल नेटवर्किंग को कथ्य बना कर रामसिंगार भाई के बहाने जो इस की निर्मम पड़ताल दयानंद पांडेय ने की है वह भयावह तस्वीर पेश करती है। यह कहानी हमारे समय का एक निर्मम दस्तावेज भी कही जा सकती है। तो ‘सूर्यनाथ की मौत’ कहानी इसी दारुण सच का और बडी तसवीर पेश करती है। उपभोक्ता संस्कृति की जो मार हमारे जीवन पर पड़ रही है, समूचा बाज़ार कैसे तो किसी गोडसे में तब्दील हो कर किसी सांप की तरह मनुष्य और उस की इच्छाओं पर वज्राघात कर रहा है, इसके कई-कई दृश्य सूर्यनाथ की मौत में अपनी पूरी तल्ख़ी के साथ उपस्थित हैं। दरअसल सूर्यनाथ की मौत एक ऐसा क्रूर दर्पण है जिसे तोड़ने की जिद में ही सूर्यनाथ की शिनाख्त धूमिल होती जाती है। माल कल्चर का जो सर्वग्रासी रूप है वह सूर्यनाथ की मौत में बड़ी बेबाकी से बांचा जा सकता है।

हवाईपट्टी के हवा सिंह में भी यह गूंज आसानी से सुनी जा सकती है। मीडिया दयानंद पांडेय का हमेशा ही से प्रिय विषय रहा है। हवाईपट्टी के हवा सिंह में वह मीडिया के कार्पोरेट कल्चर की आग में झुलसने की बू साफ तौर पर देते दिखते हैं। कि कैसे तो रिपोर्टिंग सिर्फ भडुआगिरी बन कर रह गई है। इस कहानी में तमाम दृश्यों की तिरुपाई जिस तरह दयानंद पांडेय ने की है और उस में जो जगह-जगह गिरह लगाई है वह कहानी की ताकत को और बढ़ा देता है। मुख्यमंत्री, पायलट समेत समूचे प्रशासन की हिप्पोक्रेसी की आंच बांचती यह कहानी हमें कई कई नए पड़ावों से भी गुज़ारती है। हवाईपट्टी के हवा सिंह पढ़ते हुए दयानंद पांडेय की एक और कहानी मुजरिम चांद की याद आ जानी भी सहज-स्वाभाविक है। ‘मुजरिम चांद’ भी प्रशासन, पत्रकारिता और समाज की एक रोचक कहानी है। ‘हवाईपट्टी के हवा सिंह’ में मुख्यमंत्री हैं तो ‘मुजरिम चांद’ में राज्यपाल। किस तरह एक छोटी सी ‘त्रुटि’ के बाद पत्रकार राजीव का उत्पीड़न होता है और कैसे विशिष्ट के सामने सामान्य व्यक्ति उच्छिष्ट बन कर रह जाता है, इसे किस्सागोई के अंदाज में लेखक ने रेखांकित किया है। राज्यपाल और दिलीप कुमार के प्रसंग बेहद दिलचस्प हैं। पत्रकारिता के हुनर का सार्थक प्रयोग लेखक ने किया है। विवरण बहुत हैं, कई जगह बेवजह।

‘सुमि का स्पेस’ की सुमि का संघर्ष किसी भी मध्यवर्गीय परिवार की महत्वाकांक्षी लड़की का यथार्थ है। परिवार और समाज के बीच मित्र व शत्रु की पहचान करती सुमि अपना लक्ष्य तो प्राप्त करती ही है, दूसरी लड़कियों के लिए भी युक्तियों के रास्ते खोलती है। विवाह नामक संस्था की स्त्री जीवन में अनिवार्यता विषय पर बिना किसी वाचाल बहस के, सुमि ‘स्त्री अस्मिता’ का अर्थ बदल देती है। दयानंद पांडेय ने परिवेश की छोटी बड़ी प्रामाणिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से रचना को विकसित किया है। सुमि के पापा शुक्ला जी का अंतर्द्वंद्व से भरा चरित्र यह बताता है कि लेखक की समझ सोलह आना दुरूस्त है। मैत्रेयी एक दूसरी तरह का स्त्री पक्ष है। ‘मैत्रोयी की मुश्किलें’ जैसी कहानी किसी को स्त्री विरोधी भी लग सकती है। मैत्रेयी का वर्जनाहीन यौनाचरण विचित्र लग सकता है, लेकिन है नहीं।

स्वच्छंद जीवन जीने की कामना और कुंठाओं से भरे पुरुष प्रधान समाज के बीच मैत्रेयी की मुश्किलें आकार लेती हैं। कई पुरुषों के साथ रह कर भी वह एक ईमानदार साहचर्य से वंचित है। रस, रहस्य और रौरव से भरी यह कहानी कहीं चौंकाती है….कहीं करुणा से भर देती है। अर्थात, ‘मैत्रेयी’ की यादें उस के साथ ऐसे चल रही थीं जैसे आकाश में बसे तारे,चांद और खुद आकाश भी साथ-साथ चलता है।….और क्या धरती भी साथ-साथ नहीं चलती?….हां धरती का भूगोल जरूर बदलता रहता है। बदलता तो आकाश का भी है पर पता नहीं पड़ता। जैसे मैत्रेयी का पता नहीं पड़ता।’ प्रेम और प्रवंचना के कठिन पाटों के बीच पिसती मैत्रेयी एक स्मरणीय चरित्र है। ‘मन्ना जल्दी आना’ भारत, बांगलादेश और पाकिस्तान के त्रिकोण में छटपटाते जाने कितने हिंदुओं-मुसलमानों के दुखों का बयान है। अब्दुल मन्नान और उन के परिवार की कहानी में जाति, धर्म, सियासत के कई समकालीन धब्बे भी दिखते हैं। सहज विवेक से दयानंद पांडेय ने इस कहानी को ‘सांप्रदायिकता’ से बचा लिया है। लेखक ने एक पुरानी युक्ति के रूप में तोते का इस्तेमाल किया है, जो तोताचश्म जमाने को देखते हुए एक नया अर्थ भी दे सकता है।

‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ में घोड़े वाले बाबू गोधन सिंह और उन की दो पत्नियां अपनी-अपनी विसंगतियों में कैद हैं। ग्रामीण जीवन व्यवस्था में ध्वस्त होती कुलीनता, कम होती सवर्ण ठसक और कामनाओं के व्यग्र एकांत इस कहानी के मुख्य बिंदु हैं। संतान सुख से वंचित गोधन सिंह की पत्नी बड़की बबुआइन पहले ‘छोटकी बबुआइन’ लाती हैं, फिर ‘नियोग’ पद्धति से पहले स्वयं बाद में छोटकी को संतान सुख उपलब्ध कराती हैं। इन सब के साथ वह परंपरागत पुरुष दर्प है जो गोधन सिंह की तरह बजिद है, ‘बैलगाड़ी हो, घोड़ा हो, बीवी हो या कुछ और सही, लगाम अपने हाथ में होनी चाहिए।’ कुछ टूटती छूटती लगामों की पहचान लेखक ने पूरी ईमानदारी से की है। ‘मेड़ की दूब’ और संवाद में कठिन स्थितियों के बीच जीते संबंधों, खेतों और विचारों की चर्चा है। ‘बड़की दी का यक्षप्रश्न’ संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कहानी है। भारतीय समाज में स्त्री के समेकित अस्तित्व का परीक्षण करती यह रचना विमर्श के इलाके में कुछ नए सूत्र उजागर करती है। बड़की दी का चरित्र कहीं-कहीं शरत के स्त्री पात्रों की याद दिलाता है। लंबे वैधव्य को जीती बड़की दी परिवार नामक संस्था की कई असफलताओं को पहचानने में मददगार है। नई पीढ़ी की ऊर्जा बड़की दी के साथ है। कहानी में एक पक्ष बनाती अन्नू की बहू कहती है, ‘आखि़र वह अपनी बेटी ही के पास तो गई हैं….रही बात जमीन जायदाद की तो वह भी अगर बेटी को लिख दिया तो क्या बुरा कर दिया?’ बड़की दी जैसे स्त्री के स्वतंत्र निर्णय की प्रतीक बन जाती है।

इन कहानियों की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहां जीवन न तो सिद्धांतों से त्रस्त है न रचना के प्रचलित आलोचक रिझाऊ मुहावरों से आक्रांत। कहानियां अधिकांशतः चरित्र प्रधान हैं। यह कहना होगा कि दयानंद पांडेय अपने पात्रों के हत्यारे नहीं हैं,जैसा कि हिंदी के कुछ कहानीकारों के लिए प्रसिद्ध है। मैत्रेयी जैसा बहुपुरुषगामी स्त्री पात्र भी अवसर मिलते ही निष्कलुष लगने लगता है। कहानी में यह स्पेस दयानंद ने अपने सहज बोध से अन्वेषित किया है। यहां से पाठक मैत्रेयी को पाप और अपराध की पाखंडी अवधारणाओं से ऊपर उठ कर देखता है। दयानंद अपने पात्रों का आख्यान रचते हैं, उन का इस्तेमाल नहीं करते। विवरण उन का रचना स्वभाव है। किस्सागोई का एक नया संस्करण उन में मिल सकता है। भाषा प्रवाहपूर्ण है। यही कारण है कि विवरणप्रियता के चलते कुछ लंबी हो गई कहानियां भी रोचक बनी रहती हैं। ‘प्रतिनिधि कहानियां’ की कुछ कहानियां मुख्यधारा की कथात्मक सक्रियता के सम्मुख चुनौतियां भी प्रस्तुत करती हैं। यह और बात है कि हिंदी आलोचना सूचीबद्ध, तयशुदा एवं उपयोगी कहानीकारों में व्यस्त है।

[दयानंद पांडेय के कहानी संग्रह 11प्रतिनिधि कहानियां संग्रह की भूमिका]

ग्यारह प्रतिनिधि कहानियां
प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन
३०/३५-३६, गली नं. ९, विश्वास नगर
दिल्ले-११०३२
पृष्ठ संख्या-२४०
मूल्य-४०० रुपए

सुशील सिद्धार्थ लेखक, कवि और आलोचक है. राजकमल प्रकाशन में संपादक हैं.

जिय रजा कासी!

काशीनाथ सिंह का उपन्यास अपना मोर्चा जब पढ़ा था तब पढ़ता था और उस का ज्वान उन दिनों रह-रह आ कर सामने खड़ा हो जाता था। उन का कहानी संग्रह आदमीनामा भी उन्हीं दिनों पढ़ा। माननीय होम मिनिस्टर के नाम एक पत्र या सुधीर घोषाल जैसी कहानियां एक नया ही जुनून मन में बांधती थीं। बाद के दिनों में काशी का अस्सी सिर चढ़ कर बोलने लगा। अब तो चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इस पर एक फ़िल्म भी बना दी है।

प्रसिद्ध रंगकर्मी ऊषा गांगुली ने इस के पांडे कौन कुमति तोहें लागी नाम से जाने कितने शो किए हैं। फिर नामवर पर लिखे उन के संस्मरणों ने मुझे उन का मुरीद बना दिया। खास कर भाभी यानी नामवर सिंह की पत्नी की यातना और उन की करुणा जिस तरह उन्हों ने परोसी है, पढ़ते समय जाने क्यों मुझे अपनी अम्मा याद आती रहीं। जैसा नामवर ने अपनी पत्नी की उपेक्षा की जीवन भर, शायद उन की समूची पीढ़ी ने यही किया है। इसी लिए नामवर की पत्नी के अक्स में मुझे अपनी अम्मा की याद आती रही। खैर यह एक दूसरा विषय है।

काशीनाथ सिंह का खांटी बनारसीपन, उन की साफगोई और भाषा की चाशनी आदि मिल कर उन का एक ऐसा रुप उपस्थित करती है कि बस पूछिए मत। हमारे सामने ज़मीन से कटे लेखकों को देख लीजिए और काशीनाथ सिंह को देख लीजिए, फ़र्क साफ दिखेगा। न सिर्फ़ लेखन में वह सहज और पूरे बांकपन के साथ उपस्थित रहते हैं बल्कि जीवन में भी उसी ऊर्जा और उछाह के साथ मिलते हैं। बनारसीपन तो उन में से हरदम टपकता है ऐसे गोया कोई पान खा ले और पान की लार टपक जाए, लगभग ऐसे ही।

सोचिए कि मैं उन से उम्र और रचना दोनों ही में कच्चा हूं। पर जब उन्हें कभी फ़ोन करता हूं और नमस्कार करता हूं तो वह छूटते ही जोर से – पालागी बाबा! बोल पड़ते हैं। एक बार बनारस के एक गुरु की चर्चा करते हुए वह बताने लगे कि अगर कोई उन के पांव छूने लगता है तो वह कहते हैं चरण ही चूना आचरण नहीं! अब इन्हीं काशीनाथ सिंह को उन के उपन्यास रेहन पर रग्घू पर आज साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। उन्हें बधाई देने का बहुत मन कर रहा है। बहुत बधाई काशी जी! कि तनी देरियै से सही मिलल तs! जिय रजा काशी!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है.

हिंदी फ़िल्मों की खाद भी है, खनक भी और संजीवनी भी है खलनायकी

खलनायक जैसे हमारी समूची ज़िंदगी का हिस्सा हैं। गोया खलनायक न हों तो ज़िंदगी चलेगी ही नहीं। समाज जैसे खलनायकों के त्रास में ही सांस लेता है और एक अदद नायक की तलाश करता है। सोचिए कि अगर रावण न होता तो राम क्या करते? कंस न होता तो श्रीकृष्ण क्या करते? हिरण्यकश्यप न हो तो बालक प्रह्लाद क्या करता? ऐसे जाने कितने मिथक और पौराणिक आख्यान हमारी परंपराओं में रचे बसे हैं।

आज के समाज और आज की राजनीति में भी ऐसे जाने कितने लोग और रुप मिल जाएंगे, जो नायकत्व और खलनायकत्व को नए-नए रंग रुप और गंध में जीते भोगते और मरते मिल जाएंगे। तो हमारी फ़िल्में भला कैसे इस खलनायक नामक तत्व से महरुम हो जाएं भला? वह भी हिंदी फ़िल्में? जिन की नींव और नाव दोनों ही खलनायक की खाद पर तैयार होती है। जितना मज़बूत और ताकतवर खलनायक उतनी ही मज़बूत और सफल फ़िल्म। कोई माने या न माने यह एक प्रामाणिक सत्य है। कन्हैया लाल, जीवन से लगायत प्राण, प्रेमनाथ, प्रेम चोपड़ा, रंजीत, अजीत, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्‍हा, अमजद खान, डैनी, अमरीश पुरी, उत्पल दत्त, कादर खान, शक्ति कपूर, गुलशन ग्रोवर, गोगा कपूर, सदाशिव अमरपुरकर, परेश रावल, मोहन आगाशे, अनुपम खेर, नाना पाटेकर, मनोज वाजपेयी और आशुतोष राणा तक यह सिलसिला बरकरार है और जारी भी। ललिता पवार, शशिकला, बिंदु और अरुणा इरानी आदि को भी जोड लें तो कोई हर्ज़ नहीं है।

मदर इंडिया में खलनायकत्व का जो ग्राफ़ कन्हैयालाल ने गढ़ा उस का रंग इतना चटक, इतना सुर्ख और इस कदर कांइयांपन में गुंथा था कि नर्गिस के हिस्से की तकलीफ और यातना भी उस में ऐसे छिप जाती थी जैसे बादलों में चांद। बाढ़ की विपदा में सब कुछ नष्ट हो गया है, दुधमुहा बच्चा भी चल बसा है लेकिन कन्हैया लाल को अपने सूद और वासना का ज्वार ही दिखता है, कुछ और नहीं। वह खेत में चने ले कर पहुंचता है और बच्चों को चने का चारा भी फेंकता है। लेकिन बात बनती नहीं। फिर भी वह हार नहीं मानता। तीन-तेरह करता ही रहता है। कन्हैयालाल का यही तेवर फिर व्ही शांताराम की फ़िल्म दुनिया ना माने में भी और तल्ख हुआ है, और सुर्खुरु हुआ है। हम त्वार मामा वाला संवाद जो उन के हिस्से है वह अलग अलग शेड में इस कदर गज़ब ढाता है कि पूछिए मत। जिस भांजी को वह एक वृद्ध से व्याहता है और फिर उस का वैभव देख और उस से मिले तिरस्कार से तिलमिलाया जब एक गधे के सामने पड़ते ही गधे से भी हड़बड़ा कर हम त्वार मामा कहने लग जाता है। ठीक उसी तर्ज़ में जो कहा जाता है कि मौका पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। तो इस में जो सहज ही कसैलापन उभर कर आता है उस में शांताराम का निर्देशन तो है ही कन्हैयालाल की अदायगी और उन का अभिनय भी सर चढ़ कर बोलता है। पर जल्दी ही कन्हैयालाल के कांइयांपन को भी सवा सेर मिल गया हिंदी फ़िल्म को जीवन के रुप में। इंतिहा यह थी कि परदे पर जब जीवन आते थे तो औरतें और बच्चे सहम जाते थे। मर्द बेसाख्ता चिल्ला पडते थे, 'हरमिया!' जीवन की पहचान कांइयां और हरामी दोनों के रुप में थी। चश्मा ज़रा नाक के नीचे तक ला कर जब वह आधा चश्मा और आधा बिना चश्मा के देखते हुए अपने कांइयांपन को बड़ी सरलता और सहजता से परोसते, जिस में धीरे से, मनुहार से बोले गए संवादों का छौंक लगा कर जब वह अपना हरामीपन दर्शकों से शेयर करते तो खलनायकी का एक नया आकाश रच डालते। पौराणिक फ़िल्मों में जब वह नारद के रुप में नारायण-नारायण कहते परदे पर अवतरित होते तो सुस्त पडी फ़िल्म में जैसे जान आ जाती। उन का मुनीम हो या नारद सब कहीं उन का कांइयांपन ऐसे छलकता जैसे आधी भरी गगरी में से पानी।

लगभग उसी समय एक और खलनायक हिंदी फ़िल्मों में आए के. एन. सिंह। पूरी नफ़ासत और पूरे शातिरपन के साथ शूटेड-बूटेड जब वह परदे पर आते तो लोग मारे दहशत में दांतों तले अंगुली दबा लेते। शराफ़त का मुखौटा पहन कर बहुत आहिस्ता से वह अपना कमीनापन परदे पर परोसते तो बिल्कुल किसी पिन की तरह चुभते। रहमान भी इसी नफ़ासत और शराफ़त के मुखौटे के सिलसिले को खलनायकी में आज़माते थे। कई बार वह के. एन. सिंह से इस मामले में बीस पड़ जाते थे। बिन बोले आंखों से ही कोई खलनायक अपना काम कर जाए यह आज के दौर के खलनायकों को देख कर सोचा भी नहीं जा सकता। पर के. एन. सिंह और रहमान दोनों ही इसे बखूबी करते थे। के. एन सिंह की हावडा ब्रिज़ हो अशोक कुमार वाली या फिर रहमान की गुरुदत्त वाली चौदवीं का चांद हो या साहब बीवी गुलाम, मल्टी स्टारर वक्त हो या कोई और फ़िल्म इन दोनों की शराफ़त और नफ़ासत में पगी खलनायकी का ज़हर साफ देखा जा सकता है। बहुत कम खलनायक हैं जिन पर गाना भी फ़िल्माया गया हो। रहमान उन्हीं में से हैं। दिल ने फिर याद किया जैसा गाना भी उन के नसीब में है। असल में असल ज़िंदगी के खलनायक भी इसी तरह के होते हैं, जिन्हें हम सफ़ेदपोश के विशेषण से नवाज़ते हैं।

प्राण ने इस सफ़ेदपोश खलनायक के सफ़र को और आगे बढ़ाया पर शराफ़त के मुखौटे को उन्हों ने खलनायक के लिबास से उतार फेंका। एक तरह से वह एक साथ कई खलनायकों के सम्मिश्रण बन कर उभरे। कन्हैयालाल और जीवन का कांइयांपन, के.एन.सिंह और रहमान का सफ़ेदपोश चेहरा और संवाद में कसैलापन, व्यवहार में हरामीपन सब कुछ एक साथ लेकर वह परदे पर उपस्थित हुए तो खलनायकी के वह एक बडे़ प्रतिमान बन गए। खलनायकी का जो शिखर छुआ और एक तरह से जो कहूं कि खलनायकी का स्टारडम जो प्राण ने रचा वह अप्रतिम था। कह सकते हैं कि खलनायकी के खल में उन्हों ने प्राण डाल दिया। इतना कि जीवन, के. एन. सिंह, रहमान वगैरह खलनायक प्राण के आगे बेप्राण तो नहीं पर बेमानी ज़रुर हो गए। उस ज़माने में तो अशोक कुमार हों, दिलीप कुमार हों, देवानंद या राजकपूर या फिर शम्मी कपूर, सुनील दत्त, मनोज कुमार या कोई और सब के बरक्स खलनायक तो बस प्राण ही प्राण थे। कोई और नहीं। खलनायकी की लंबी पारी खेली उन्हों ने। इतनी कि वह इस से ऊब गए। सार्वजनिक जीवन में भी उन से बच्चे, औरतें दूर भगते, देखते ही डर जाते। प्राण में उन्हें एक जालिम और जल्लाद दिखता। इस जल्लादी से उन्हें मुक्ति दिलाई मनोज कुमार ने उपकार में। अब वह जल्लाद और जालिम नहीं रह गए। एक चरित्र अभिनेता बन कर वह गाने लगे थे कस्मे वादे प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातों का क्या! फिर तो वह ज़बरदस्त चरित्र अभिनेता बन कर उभरे। लगभग सभी चरित्र अभिनेताओं की जैसे छुट्टी करते हुए। उन के खलनायकी के समय में ही प्रेम चोपड़ा का बतौर खलनायक परदे पर आगमन हो चला था। उपकार में वह ही खलनायक हुए। पर प्राण को वह जो कहते हैं कि रिप्लेस नहीं कर पाए। अब खलनायकी में भी हीरो की ही तरह हैंडसम दिखने वाले लोग आने लगे।

विनोद खन्ना और शत्रुध्‍न सिन्‍हा ऐसे ही लोगों में शुमार थे। लेकिन अफ़सोस कि इन खलनायकों की दिलचस्पी खलनायकी में नहीं हीरो बनने में थी। सत्तर के दशक में इन दोनों ने ही खलनायकी को एक नया तेवर और नई तकनीक दी और छा से गए। यह खलनायक भी अपने हीरो की तरह ही सजते संवरते और हीरो की तरह ही दिखते थे। हीरोइन की तरफ प्यार की पेंग यह भी मारते। पर तरीका बस दुर्योधन वाला हो जाता। खलनायक जो ठहरे। अनोखी अदा में जीतेंद्र के पलट रेखा के लिए विनोद खन्ना भी उतने ही मोहित हैं और उसी तेवर में पर दुर्योधन वाली अप्रोच के साथ। ऐसे ही ब्लैकमेल में शत्रुध्‍न सिन्‍हा भी राखी के लिए उतने ही बेकरार हैं जितने कि धर्मेंद्र। पर बाद में शत्रु रेखा की उन्हें लिखी चिट्ठियों पर ही ब्लैकमेल करने लग जाते हैं तो खलनायक बन जाते हैं। विनोद खन्ना को तो फिर गुलज़ार मेरे अपने में हीरो बना देते हैं पर उसी मेरे अपने में शत्रु विनोद खन्ना के पलट खलनायक बने रह जाते हैं। दोनों ही योगिताबाली के बालों में गिरफ़्तार हैं। खैर शत्रुध्‍न सिन्‍हा भी ज़्यादा समय तक खलनायकी की खोल में नहीं रहे। जल्दी ही वह भी नायक बन कर छा गए। लेकिन दिलचस्प है यह याद करना भी कि विनोद खन्ना की चौड़ी छाती और उन की लंबाई पर औरतें उन की खलनायक के टाइम से ही थीं जब कि शत्रुध्‍न सिन्‍हा के घुंघराले बालों की स्टाइल भी उन के खलनायक टाइम पर ही लोकप्रिय हो गई थी। और देखिए न कि शत्रुध्‍न सिन्‍हा को फ़िल्मों में प्रमोट करने वाले खलनायक तिवारी और अनिल धवन शत्रुध्‍न सिन्‍हा के बतौर हीरो परदे पर छाते ही गुम से हो गए।

शत्रुध्‍न सिन्‍हा की बात हो और हम खलनायक अजीत को भूल जाएं भला कैसे मुमकिन है? जिस को पूरा शहर लायन के नाम से जानता था, कालीचरन में उन की याद हिंदी फ़िल्मों के दर्शक मोना डार्लिंग सोना कहां है, के संवाद से भी करते हैं। सोचिए कि कभी यही अजीत नायक होते थे हिंदी फ़िल्मों के। हिरोइन के साथ गाना भी गाते थे। फिर वह सहनायक भी हुए। याद कीजिए मुगल-ए-आज़म या नया दौर की। जिस में वह दिलीप कुमार के साथ होते हैं। यादों की बारात से खलनायकी की बादशाहत कमाई थी अजीत ने। जंज़ीर में अमिताभ बच्चन के बरक्स वह खलनायक हुए। अमिताभ फ़िल्म लूट ले गए। अजीत पीछे रह गए। ऐसे ही वह कालीचरन में शत्रुध्‍न सिन्‍हा के बरक्स हुए। फ़िल्म शत्रुध्‍न सिन्‍हा लूट ले गए, अजीत फिर पीछे रह गए। खलनायकों के साथ यह बार-बार हुआ। अकेले अजीत के ही साथ नहीं। नायक आगे होते गए, खलनायक पीछे, बहुत पीछे। प्रेम नाथ भी कभी नायक थे हिंदी फ़िल्मों के, पर समय ने उन्हें खलनायक बना दिया। जानी मेरा नाम जैसी फ़िल्मों में खलनायकी करते करते वह भी चरित्र अभिनेता बन बैठे। अब जब फ़िल्में नायकों के हवाले पूरी तरह हो गईं तो अब खलनायक रह गए अजीत, प्रेम चोपड़ा, रंजीत और मदनपुरी। हां इसी बीच डैनी डैंगजोप्पा भी बतौर हीरो असफल हो कर खलनायकी में हाथ आज़माने लगे। जीवन के बेटे किरन कुमार भी असफल नायक हो कर खलनायकी आज़माने लगे। कि तभी आई शोले! और यह देखिए कि इस फ़िल्म ने तो जो कीर्तिमान और प्रतिमान गढ़ने तोड़ने थे तोडे़ और गढे़ ही एक सुपर खलनायक भी ला कर परदे पर उपस्थित कर दिया। गब्बर सिंह के रुप में अमजद खान को। जिधर देखिए गब्बर सिंह की धूम। यह पहली बार हो रहा था कि किसी खलनायक के डायलाग जनता सुन रही थी। और कैसेट कंपनियां गाने के बजाय डायलाग की सी.डी. बाज़ार में उतार रही थीं। गब्बर के डायलाग। गब्बर सिंह जैसा सुपर खल चरित्र अभी तक फिर हिंदी फ़िल्म के परदे पर उपस्थित नहीं हुआ। गब्बर आज भी खलनायकी का बेजोड़ चरित्र है हमारी हिंदी फ़िल्म का। जैसे कि पौराणिक आख्यानों में कभी रावण या कंस थे।

इस गब्बर के जादू से खुद सिप्पी इतने प्रभावित हुए कि जल्दी ही उन्हों ने एक और फ़िल्म बनाई शान। और शान में शोले से भी ज़्यादा ताम-झाम से एक खलनायक परोसा शाकाल के रुप में कुलभूषण खरबंदा को। सारा ज़ोर पूरी फ़िल्म में खलनायक को ही पेश करने में खलनायक को ही प्रोजेक्ट करने में सिप्पी ने लगा दिया। पर यह सारा कुछ फ़िल्म में दाल में नमक की जगह नमक में दाल की तरह हो गया। मल्टी स्टारर फ़िल्म होने के बावजूद फ़िल्म धडाम हो गई और शाकाल भी अपने सारे स्पेशल इफ़ेक्ट सहित स्वाहा हो गया। बाद के दिनों में अमजद खान और कुलभूषण खरबंदा चरित्र अभिनेता की राह पर चल पडे़। अमजद खान तो कामेडी भी करने लग गए। लव स्टोरी और चमेली की शादी की याद ताज़ा कीजिए। खैर अब फ़िल्मों का ट्रेंड भी बदल रहा था। मल्टी स्टारर फ़िल्मों का दौर तो था ही, एंटी हीरो का भी ज़माना आ गया। अब खलनायक और कामेडियन दोनों ही खतरे में थे। यह अमिताभ बच्चन के स्टारडम का उदय और उन के शिखर पर आ जाने का समय था। वह स्मगलर, मवाली और जाने क्या क्या बन रहे थे। कालिया से लगायत……. तक। वह खलनायकों वाले काम भी कर रहे थे और कामेडियनों वाला भी। उन के आगे तो सच कहिए हीरोइनों के लिए भी कोई काम नहीं रह गया था। सिवाय उन के साथ चिपट कर गाने या सोने के। एक नया ही स्टारडम था यह। जिस में सिवाय नायक यानी अमिताभ बच्चन के लिए ही काम था। बाकी सब फ़िलर थे। मदन पुरी और रंजीत, कादर खान और शक्ति कपूर जैसे बिचारे खलनायक ऐसे परदे पर आते, इस बेचारगी से आते गोया वह अभिनय नहीं कर रहे हों किसी नदी में डूब रहे हों और डूबने से बचने के लिए उछल कूद या हाय-तौबा मचा रहे हों। कि अस्सी के दशक में आई अर्धसत्य। ओमपुरी के पलट बतौर खलनायक आए सदाशिव अमरापुरकर। ओमपुरी सरीखे अभिनेता पर भी भारी। पर बस याद ही रह गई उन के अर्धसत्य के अभिनय की। बाद में वह अमिताभ बच्चन के ही साथ आखिरी रास्ता और धर्मेंद्र के साथ भी एक फ़िल्म में आए पर जल्दी ही वह भी चरित्र अभिनेता की डगर थाम बैठे।

पर यह देखिए इसी अस्सी के दशक में एक फ़िल्म आई शेखर कपूर की मिस्टर इंडिया। और मिस्टर इंडिया में अवतरित हुए मुगैंबो! गब्बर की धमक के वज़न में ही यह मुगैंबो भी छा गया परदे पर। और सचमुच लगा कि जैसे हिंदी फ़िल्मों में खलनायकी की वापसी हो गई है। हुई भी। प्राण के बाद अगर खलनायकी की इतनी सफल इनिंग किसी ने हिंदी फ़िल्म में खेली है तो वह अमरीश पुरी ही हैं जो मदन पुरी के छोटे भाई हैं। अमरीश पुरी मिस्टर इंडिया में हिंदी फ़िल्मों के लिए कोई नए नहीं थे, वह पहले ही से हिंदी फ़िल्मों में थे। और श्याम बेनेगल की निशांत और भूमिका जैसी फ़िल्मों में खलनायक रह चुके थे। तमाम और फ़िल्मों में उन्हों ने छोटी बड़ी तमाम भूमिकाएं की थीं पर मिस्टर इंडिया में जो उन का खलनायक शेखर कपूर ने उपस्थित किया वह अविरल ही नहीं महत्वपूर्ण और नया मानक भी बन गया। इतना महंगा कास्ट्यूम हिंदी फ़िल्म के किसी खलनायक ने नहीं पहना था, न ही इतना स्पेस किसी खलनायक को हिंदी फ़िल्म में मिल पाया था। कहते हैं कि फ़िल्म बजट का एक बड़ा हिस्सा अमरीशपुरी के कास्ट्यूम पर खर्च किया गया था। उतना कि जितना अमरीशपुरी को पारिश्रमिक भी नहीं मिला था। इतना चीखने-चिल्लाने वाला खलनायक भी हिंदी सिनेमा पहली बार देख रहा था। फिर तो अमरीश पुरी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। हां वह ज़रूर चरित्र भूमिकाओं में भी बार-बार दिखे। और सचमुच मेरे लिए यह कह पाना कठिन ही है कि वह खलनायक की भूमिका में ज़्यादा फ़बते थे कि चरित्र भूमिकाओं में। मुझे तो वह दोनों में ही बेजोड़ दीखते थे। पर बावजूद इस सब के उन का मोगैंबो उन पर भारी था यह भी एक सच है।

परेश रावल भी कभी बेजोड खलनायक बन कर उभरे। पर जल्दी ही वह भी चरित्र भूमिकाओं मे समा कर रह गए। उन्हों ने अभिनय के अजब गज़ब शेड हिंदी फ़िल्मों में परोसे हैं जिन का कोई सानी नहीं है। अमानुष जैसी कुछ फ़िल्मों में खलनायक की भूमिका में उत्त्पल दत्त की भी याद आती है। पर बाद में वह भी चरित्र भूमिकाओं में आने लगे। यही हाल कादर खान और शक्ति कपूर जैसे खलनायकों का भी हुआ। वह भी कामेडी से लगायत सब कुछ करने लगे। नाना पाटेकर की परिंदा और मनीषा कोइराला के साथ वाली फ़िल्मों में वह खलनायक के ज़बरदस्त शेड ले कर उपस्थित हुए। पर वह भी चरित्र अभिनेता ही बन गए। अनुपम खेर भी कर्मा में डा. डैंग की भूमिका में आए और वापस वह भी चरित्र अभिनेता हो गए। मोहन अगाशे, पुनीत इस्सर, अरबाज़ खान जैसे तमाम अभिनेता हैं, जिन्हें खलनायक के बजाय चरित्र अभिनेता की राह ज़्यादा मुफ़ीद लगी। आशुतोष राणा ने भी खलनायकी में नई इबारत दर्ज़ की है। तो मनोज वाजपेयी ने सत्या और रोड में रामगोपाल वर्मा के निर्देशन में खलनायकी की एक नई भाषा रची। पर मौका मिलते ही वह भी नायक बनने के शूल में बिंध गए। पर शूल ने भी हिंदी फ़िल्मों को एक नया और हैरतंगेज़ खलनायक दिया। रज़ा मुराद ने भी खलनायकी में अपनी आवाज़ बुलंद की है। डर्टी मैन फ़ेम गुलशन ग्रोवर और गोगा कपूर भी याद आते हैं। पर जाने क्या बात है कि ज़्यादातर खल चरित्र जीने वाले अभिनेता या तो नायक हो गए या चरित्र अभिनेता। कभी यह सोच कर हंसी भी आती है कि क्या अगर रावण या कंस सरीखे लोग भी इस हिंदी फ़िल्म के चौखटे में आते तो क्या वह भी चरित्र अभिनेता तो नहीं बन जाते बाद के दिनों में?

खैर यहां यह जानना भी खासा दिल्चस्प है कि कुछ चरित्र अभिनेताओं ने भी खलनायकी के पालने में पांव डाले हैं। और तो और सीधा-साधा और अकसर निरीह चरित्र जीने वाले अभिनेता ए.के. हंगल ने भी खलनायकी की भूमिका की है। एक दीवान के रुप में राजकाज पर कब्जा जमाने के लिए इस खूबसूरती से वह व्यूह रचते हैं कि कोई उन पर शक भी नहीं करता और वह कामयाब होते भी दीखते हैं, पर जैसी कि हिंदी फ़िल्मों की रवायत है आखिर में उन का भेद खुल जाता है। हंगल के खलनायक का इस फ़िल्म को फ़ायदा यह मिला कि सस्पेंस आखिर तक बना रहा। वह सस्पेंस जो कभी हमराज या वह कौन थी जैसी फ़िल्मों में क्रिएट किया जाता था। कुछ नायकों ने भी कभी कभार खलनायकी की भूमिका में अपने को सुपुर्द किया है और कामयाब भी खूब हुए हैं। जैसे कि ज्वेल थीफ़ में अशोक कुमार। दर्शक आखिर तक सस्पेंस की अनबूझ चादर में फंसा रहता है। फ़िल्म के आखिरी दृष्यों में राज़ फास होता है कि ज्वेल थीफ़ तो अपने अशोक कुमार हैं। अमिताभ बच्चन भी अक्स में खलनायकी को बखूबी निभाते हैं तो शाहरुख खान डर में खलनायक बन कर खूब डराते हैं। ऐसे ही अजय देवगन कंपनी में खलनायकी का रंग जमाते हैं। सनी देवल भी खलनायक बन जाते हैं तो संजय दत्त तो खलनायक फ़िल्म मे खलनायकी के लिए कई शेड्स बिछाते हैं। इतने कि हीरो लगने लगते हैं और गाने भी लगते हैं कि नायक नहीं खलनायक हूं मैं! वास्तव में भी उन की खलनायकी का सिक्का खूब खनखनाता है।

खलनायकी की बात हो और अपनी आधी दुनिया की बात न हो तो बात कुछ जमती नहीं है। ललिता पवार, बिंदु, शशिकला या अरुणा इरानी ने अपने खल चरित्रों को जिस तरह से जिया है और अपने चरित्रों के लिए जो नफ़रत दर्शकों में बोई है उस का भी कोई जवाब है नहीं। काजोल की खल भूमिका की भी याद ज़रूरी है। बात फिर वही कि बिना खलनायक के नायक नहीं बनता। तो फ़िल्म चाहे जैसी भी हो खलनायक के बिना न उस की नींव तैयार होगी न ही उस की नैया पार लगेगी। प्रतिनायक की यह भूमिका हमारी हिंदी फ़िल्मों की संजीवनी भी है, इस से भला कौन इंकार कर सकता है?

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. उनका यह लेख हमार सिनेमा में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

तो क्या प्रणव मुखर्जी या कोई और सही विश्वनाथ प्रताप सिंह को दुहरा सकता है?

तो क्या प्रणव मुखर्जी या कोई और सही विश्वनाथ प्रताप सिंह को दुहरा सकता है? हालां कि इस की तुरंत कोई संभावना नहीं दिखती। पर आशंका भरपूर है। और इस बात की ज़रुरत भी। प्रणव मुखर्जी के अंदर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा तो बहुत दिनों से है। बस जो नहीं है उन के अंदर वह साहस नहीं है। बगावत का साहस। बाकी तो सब कुछ है उन के अंदर। और देश की राजनीतिक स्थितियां भी उन के मनोनुकूल हैं।

यह वालमार्ट, यह जनलोकपाल, यह चिदंबरम, यह राजा, यह कलमाड़ी वगैरह के नज़ारे देख कर दुष्यंत कुमार का शेर याद आता है कि 'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, इस कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।' और कि यह सब देख कर अब जाने क्यों विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद भी आने लगी है। और सोच रहा हूं कि आज की तारीख में कांग्रेस में कोई एक भी साहसी राजनीतिज्ञ क्यों नहीं है? एक भी राजनारायन जैसा हनुमान क्यों नहीं है जो इस अनीति की लंका में आग लगा दे? सोचिए कि साठ हज़ार करोड़ के बोफ़ोर्स घोटाले में अभूतपूर्व और प्रचंड बहुमत पाने वाले राजीव गांधी की सरकार एक विश्वनाथ प्रताप सिंह की बगावत में बह गई थी। और अब लाखों-लाख करोड़ के एक नहीं अनेक घोटाले-घपले हमारे सामने रोज-ब-रोज सामने आते जा रहे हैं तो यह जोड़-तोड़ के बूते चलने वाली गठबंधन सरकार की चूलें फिर भी कोई हिलाने वाला क्यों नहीं हमारे पास है? इंदिरा गांधी ने बांग्‍ला देश की विजय, प्रीवीपर्स, बैकों के राष्ट्रीयकरण, गरीबी हटाओ जैसे लोकप्रिय नारे के बावजूद जब तानाशाही और फ़ासिज़्म की बयार बहाई तब एक लोकनायक हमारे बीच उपस्थित हुआ। और आमार दीदी, तोमार दीदी, इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद के मिथ को तोड़ कर उन की तानाशाही ऊखाड़ फ़ेंका था। १९७७ के चुनाव के तुरंत बाद खिंची गई रघु राय की वह फ़ोटो अब भी आंखों में बसी हुई झूल रही है जिस में एक जमादार झाडू लगा रहा है और इंदिरा गांधी की फ़ोटो वाली पोस्टर उस के झाडू में समाई कूडे़दान के हवाले हो रही है।

खैर, जनता पार्टी की सरकार आई और अपनी ही बार-बार की मूर्खताओं और खुराफ़ातों की कढ़ाई में चढ़ कर बलि चढ़ गई। इंदिरा जी फिर लौट आईं। सत्ता में। उन का दुलारा राजकुमार हवाई जहाज गलत ढंग से उड़ाने की ज़िद में जब मौत से दोस्ती कर बैठा तब वह अपने जहाज चलाने वाले बेटे को राजनीति में ले आईं। वह आया और बेमन से आया। पर जल्दी ही मिस्टर क्लीन बन कर छा गया। देश का दुर्भाग्य देखिए कि खलिस्तान आंदोलन को कुचल कर रख देने वाली इंदिरा जी की हत्या हो गई। और यह उन का जहाज उड़ाने वाला लड़का ही प्रधान मंत्री बन बैठा। और कुर्सी संभालते ही बोल दिया कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिल जाती है। इंदिरा जी की हत्या के बाद सिखों के प्रति लोगों के मन में क्षोभ तो था ही राजीव के इस बयान के बाद उन के चापलूस दरबारियों ने इस का यह अर्थ लगा लिया कि सिखों को मारो। और देश भर में सिखों को ज़िंदा जलाया जाने लगा। उन्हें लूटा जाने लगा। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने तो बाद में मुस्लिमों को घेर घेर कर मरवाया। सबक सिखाया गोधरा का। कहा गया कि सरकार ने दंगे करवाए। पर इस का देशव्यापी पहला सबक अपने कांग्रेसी राजीव गांधी ने ही सिखाया। मोदी पर आज आरोप लगाने वाले कांग्रेसी यह शायद भूल गए हैं। लेकिन चैनलों पर जब बहस होती है गुजरात दंगों को ले कर तो भाजपाई कांग्रेसियों को सिख दंगा याद दिलाना नहीं भूलते।

खैर यह दूसरा विषय है अभी। लेकिन तभी एक घटना और घटी थी। यह आज के परेशान प्रणव मुखर्जी जो इंदिरा सरकार में वित्त मंत्री रहे थे। और जैसे कि कभी कामराज और द्वारिका प्रसाद मिश्र ने इंदिरा गांधी को बच्ची मान कर गलती कर अपनी राजनीतिक हत्या कर ली थी, वही गलती प्रणव मुखर्जी ने इंदिरा जी की हत्या के बाद कर ली। उसे आज तक भुगत रहे हैं। अमूमन वित्त मंत्री या फिर गृह मंत्री को प्रधान मंत्री के बाद नंबर दो मानने की एक परंपरा सी रही है। तो तब प्रणव मुखर्जी ने अपने नंबर दो होने की आड़ में दबी जबान प्रधान मंत्री पद की दावेदारी कर दी। राजीव गांधी और उन की मित्र मंडली चौंक गई। और राजीव के राज में प्रणव मुखर्जी किनारे लगा दिए गए। खैर, अगर इंदिरा गांधी खलिस्तान आंदोलन को कुचलने के फेर में शहीद हुईं तो राजीव गांधी लिट्टे को लपेटने के चक्कर में शहीद हुए। लोकसभा के ऐन चुनाव में। बहरहाल चुनाव बाद चुनाव न लड़ने वाले नरसिंहा राव की न सिर्फ़ लाटरी खुल गई वह प्रधानमंत्री हुए और अल्पमत की सरकार को निर्बाध चलाने का हुनर भी दिखा गए। शिबू सोरेन, अजीत सिंह जैसे घटक उन के काम आए। और इस सब के बीच जो बड़ी घटना घटी वह यह कि मनमोहन सिंह को नरसिंहा राव ने धो-पोछ कर निकाला और वित्त मंत्री बना दिया। और मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की नदी बहा दी। वह आर्थिक उदारीकरण की नदी अब समुद्र से मिल कर समुद्र में तब्दील है। हम आप आज मंहगाई, भ्रष्टाचार की नाव के साक्षी बने गोते खा रहे हैं। पर इन नावों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।

आप याद कीजिए नरसिंहा राव को। तमाम घटनाएं घट जाती थीं पर वह बोलते नहीं थे। अटल विहारी बाजपेयी उन्हें चुहुल में मौनी बाबा कहने लग गए। और देखिए न आप अब मनमोहन सिंह को मौनमोहन कहने ही लगे हैं। नरसिंहा राव गए तो मिली जुली सरकारों को ज़माना आ गया। अटल विहारी, देवगौडा, गुजराल आदि के बाद कांग्रेस लौटी तो सोनिया गांधी की मनाही के बाद मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्री बनने के कयास लगने लगे। प्रणव मुखर्जी फिर मिस टाइम हो गए। बोल पडे़ कि मनमोहन को तो उन्हों ने रिज़र्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया था। फिर घपला हो गया। लेकिन सोनिया की शतरंजी बुद्धि ने, चेक एंड बैलेंस की रणनीति में मनमोहन पर चेक प्वाइंट के मद्देनज़र प्रणव मुखर्जी को मंत्रिमंडल में बैठा दिया। और मनमोहन ने उन्हें सर-सर कह कर उन का इगो मसाज़ भी किया और साथ ही उन को चेक एंड बैलेंस के लिए चिदंबरम को उकसा दिया। अब इसे प्रणव मुखर्जी का बर्दाश्त कहिए, धैर्य कहिए या कुछ और कि वह इतने दिनों से मार आसूसी-जासूसी के बावजूद चिदंबरम और मनमोहन को निरंतर न सिर्फ़ झेल रहे हैं, मौके बेमौके सरकार के लिए संकटमोचक भी बने ही रहते हैं। अपने ज़मीन से जुडे होने और चुनावी ठोंक-पीट की गणित का अनुभव वह आज़माते रहते हैं। और जब तब ज़्यादा हो जाता है कूटनीतिक चालें भी चल कर चिदंबरम जैसों की नकेल भी कस ही देते हैं। चिदंबरम की नाव के छेद दुनिया को दिखा ही देते हैं। इस बहाने वह मनमोहन की चूडियां भी जब तब कसते रहते हैं। लेकिन सब कुछ के बावजूद, सारी लानत-मलामत के बावजूद वह हस्तिनापुर की निष्ठा से बंधे भीष्म पितामह की तरह लाचार दिखते हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह की भूमिका को दुहराने से कतरा जाते हैं।

तय मानिए कि तमाम भ्रष्टाचार, मंहगाई, जनलोकपाल और आतंकवाद को ले कर ऐन कांग्रेसियों के चेहरे पर छाई लाचारी साफ पढ़ी जा सकती है। अधिकांश इस सब से उकताए हुए हैं। पर सब बेबस हैं। हस्तिनापुर की निष्ठा से बंधे हुए। महाभारत में भी भीष्म पितामह को कोई समझाने वाला नहीं था कि हस्तिनापुर की निष्ठा से बंधे रहने का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि आप धृतराष्ट्र और दुर्योधन की अनीति से भी बंधे रहें। अंधे आदमी के बताए रास्ते पर चलते ही रहें। और इस समय प्रणव मुखर्जी समेत उन तमाम कांग्रेसियों को भी कोई समझाने वाला नहीं है कि देश और जनता रहेगी तभी कांग्रेस और नेहरु परिवार भी रहेगा। तभी हस्तिनापुर की उन की निष्ठा भी दिखेगी। तब तो एक विदुर भी कोई था यह सब संकेतों में ही सही कहने वाला। अब कोई एक विदुर भी नहीं दिखता। सवाल फिर भी छूटा रह जाता है कि क्या प्रणव मुखर्जी या कोई और सही विश्वनाथ प्रताप सिंह की भूमिका को दुहराने की कवायद या दुस्साहस कर सकता है? और यह भी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह तो मंडल -कमंडल में फंस कर एक असफल प्रधानमंत्री साबित हुए और फ़ुसफ़ुसा कर रह गए। अपनी लिफ़ाफ़ा शीर्षक कविता, ' पैगाम उन का/ पता तुम्हारा/ बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा!' की तर्ज़ पर लिफ़ाफ़ा की गति पा कर फट कर रह गए। पर अगला बागी भी क्या विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह लिफ़ाफ़ा न बन पाए यह भी कैसे सुनिश्चित हो, यह भी एक यक्ष प्रश्न है। पर यह प्रश्न तो अब समाधान चाहता ही है कि एक विश्वनाथ प्रताप सिंह की दरकार कब पूरी होगी? क्या यह समाधान प्रणव मुखर्जी ही देर सवेर बनेंगे या कोई और?

क्यों कि मनमोहन सिंह न तो अच्छे प्रधानमंत्री साबित हुए हैं न अच्छे अर्थशास्त्री। समूचे देश को जिस तरह उन्हों ने मंहगाई और भ्रष्टाचार की भट्ठी में झोंका है और बेहिसाब झोंका है उस का कोई और प्रतिकार या कोई और रास्ता देश ढूंढ रहा है। क्यों कि वह अटलविहारी बाजपेयी और थे जो अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री को राजधर्म पालन करने की फटकार लगा देते थे पर यह मनमोहन सिंह तो राजा, कलमाडी या चिदंबरम जैसों का भ्रष्टाचार धृतराष्ट्र बन कर देखता रहता है और चुप रहता है इस डर से कि कहीं प्रधानमंत्री की नौकरी न चली जाए। और परमाणु समझौता इस डर से सरकार दांव पर लगा कर करता है कि अमरीका कहीं नाराज न हो जाए। वालमार्ट लाने की ज़िद इस लिए करता है कि अमरीका नाराज न हो जाए। अब तो लोग कहने भी लगे हैं कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं वर्ल्ड बैंक के नौकर की तरह काम करने लगे हैं। देश और जनता उन की प्राथमिकता में नहीं है। दरअसल चुनाव बिना लडे़ अगर कोई प्रधानमंत्री बनेगा, जिस की जवाबदेही जनता के प्रति नहीं होगी, वह ऐसे ही काम करेगा।

आप में से कोई अगर राहुल में देश का प्रधानमंत्री ढूंढता है तो वह अपनी आंख का मोतियाबिंद उतार ले। राहुल गांधी अपने पिता राजीव गांधी की तरह बातें तो अच्छी अच्छी कर लेते हैं पर राजनीतिक ज़मीन की हकीकत उन की समझ से बहुत दूर है। वह उत्तर प्रदेश में तो आ कर भडकाऊ भाषण झोंक जाते हैं और पूछ जाते हैं कि आप को गुस्सा क्यों नहीं आता? पर केंद्र के बूते मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन की ज़ुबान को काठ मार जाता है, लकवा मार जाता है। उन को किसी 'परम होशियार' ने समझा दिया है कि उत्तर प्रदेश ही उन्हें प्रधानमंत्री बना सकता है। सो वह अपनी सारी प्रतिभा और ऊर्जा उत्तर प्रदेश में उडे़ल रखे हैं। बिना यह सोचे कि नरसिंहा राव, देवगौड़ा, गुजराल से लगायत मनमोहन सिंह तक उत्तर प्रदेश के बिना ही प्रधान मंत्री पद की मलाई गट कर ली है तो भैया आप काहें उत्तर प्रदेश की धूल फांकने में निपट रहे हो? और बंदोबस्त देखिए कि अमेठी जाते हैं तो अपने सांसद संजय सिंह को साथ लेते नहीं। सिद्धार्थ नगर जाते हैं तो वहां के सांसद जगदंबिका पाल को साथ ले जाना भूल जाते हैं। और चले हैं उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस को ज़िंदा करने। जिस आदमी में इतनी भी राजनीतिक समझ न हो उस से आप इतनी बड़ी उम्मीद भला कैसे लगा सकते हैं?

हां, अगर आप अन्ना हजारे में बदलाव की कोई आहट ढूंढ रहे हैं तो भी दिन में तारे देखने की कसरत में लग गए हैं। यह ज़रुर है कि जनता का ज्वार उन के आंदोलन में दिखा है। पर यह जानिए कि जनता का यह ज्वार बेलगाम मंहगाई और भ्रष्टाचार की उपज है न कि अन्ना हजारे के आंदोलन की कमाई है यह। वह तो जनता ने अन्ना नाम का एक कंधा ढूंढा है जिस पर वह सर रख कर अपना गुस्सा, अपनी विवशता का इज़हार कर सके। पर यह सब अन्ना के वश का है नहीं। कारण कई हैं। एक तो वह अतार्किक बातें करते हैं। अहं ब्रह्मास्मि की भी गंध वह बार-बार देते रहते हैं। निरपेक्ष नहीं हैं। तराजू कई हैं उन के पास और घटतौली के वह आदी हैं। नहीं जब मुंबई में उत्तर प्रदेश या बिहार के मज़दूर पिटते हैं तब उन की ज़ुबान खामोश क्यों हो जाती है? सांस तक नहीं लेते? उन के सहयात्रियों पर आरोप प्रत्यारोप, अंतर्विरोध की अनंत फेहरिस्त अलग है। दूसरे राजनीतिज्ञ भी नहीं है वह न ही राजनीतिक सोच है। न ही कूटनीतिक कौशल है उन के पास। और यह लिख कर रख लीजिए कि जैसा जनलोकपाल वह चाहते हैं वैसा जनलोकपाल किसी सूरत में यह सरकार तो क्या कोई भी सरकार नहीं बना पाएगी। और न यह बनवा पाएंगे। झुनझुना बजाना और बात है, काम हो जाना और बात है। वैसे भी इस देश में अगर कोई बदलाव होगा या हो सकता है तो राजनीतिक तौर तरीकों से ही संभव है। लोकनायक जय प्रकाश नारायन ने जो बदलाव किया वह राजनीतिक ढंग से ही संभव हुआ था। हालां कि उन के राजनीतिक आंदोलन में कई गैर राजनीतिक लोग भी शामिल थे। तो भी तौर तरीके सब राजनीतिक ही थे। तो अब भी कोई बदलाव संभव है तो राजनीतिक तौर पर ही संभव है। अब अलग बात है कि राजनीतिक पार्टियां और संसदीय राजनीति दोनों ही बहुसंख्यक जनता के बीच अपनी साख गंवा बैठी हैं। तो भी दुष्यंत कुमार फिर याद आ जाते हैं: ' कौन कहता है आकाश में सुराख नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!' इस लिए भी कि राजनीति हमेशा एक संभावना है। तो क्या प्रणव मुखर्जी या कोई और सही संभावना बनेंगे? या यह संभावना शून्य है? यह देखना दिलचस्प होगा। यह भी कि बिल्ली के गले घंटी कौन बांधेगा? यानी साहस कौन दिखाएगा। बदलाव की आग तो समूचे देश में दिख रही है। अब इस बदलाव का नेतृत्व किस के हाथ जाता है, जाता भी है कि नहीं क्या पता? क्या पता प्रणव मुखर्जी ही साहस दिखा जाएं? यह कौन जानता है?

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

हिंदी लेखकों और पत्रकारों के साथ घटतौली की अनंत कथा

हिंदी में अजब घटतौली है। कमोवेश हर जगह। क्या प्रकाशक, क्या संपादक, क्या अखबार या पत्रिकाएं। सब के सब एक लेखक नाम के प्राणी को गरीब की जोरु को भौजाई बनाने का सुख लूट रहे हैं। जाने कब से। पहले जब लिखना शुरू किया था तब लगता था कि लिख कर हम अपने को कागज पर रख रहे हैं। सब के सामने आने के लिए। एक स्वर्गानुभुति भी कह सकते हैं। छपने का तो शुरू में सोचते भी नहीं थे। लिखना ही लिखना था। बाद के दिनों में कहीं छपना भी एक सपना हुआ करता था। छपना ही। पैसा नहीं। पैसे का सपना नहीं। लिख कर पैसा भी मिलेगा ऐसा कभी तब सोचा भी नहीं था। पर जब पहली बार एक कविता आज अखबार में छपी तो लगा कि क्या पा गए हैं।

दस रुपए का मनीआर्डर भी बाद में आया। तब के दिनों में दस रुपए की नोट का आकार भी आज के सौ रुपए के लगभग हुआ करता था। और उस का मूल्य तो आज के सौ रुपए से निश्चित ही ज़्यादा था। यह १९७७ या १९७८ की बात है। बहुत दिनों तक क्या कई महीनों तक वह दस रुपए भी कभी इस किताब, उस किताब के पन्नों में सहेज कर रखे रहा था। जल्दी ही आकाशवाणी से युववाणी कार्यक्रम में कविता पढ़ने पर पचीस रुपए का चेक मिला। रेडियो पर कविता पढ़ने का सुख अलग और पैसा पाने का सुख अलग। कवि सम्मेलनों में तो कभी कभार सौ रुपए तक मिले। मार्ग व्यय अलग। पर कविता पढ़ने और छपने का ही सुख ज़्यादा बड़ा था। पैसे का नहीं। क्यों कि मुझे याद है कि वह पहला चेक भी जो आकाशवाणी से मिला था, बहुत दिनों तक सहेज कर रखे रहा था। बाद में लोगों ने बताया कि तीन महीने बाद चेक की वैल्यू खत्म हो जाएगी। तब कहीं स्टेट बैंक जा कर वह चेक भुनाया था। तब विद्यार्थी था और कोई ऐसी वैसी आदत थी नहीं कि पैसे उड़ा देता। बाद के दिनों में तो छपना भी नियमित हो गया। और पारिश्रमिक कहिए, मानदेय कहिए वह बढ़ कर कहीं पचीस तो कहीं तीस रुपए का हो गया। आज, दैनिक जागरण या इन की कंचनप्रभा या अवकाश पत्रिकाओं में भी। नवभारत टाइम्स या हिंदुस्तान अखबार में भी। आकाशवाणी पर भी चालीस रुपए मिलने लगे। नाटक लिखने के तो डेढ़ सौ रुपए मिलने लगे। और १९७८ में ही सारिका में प्रेमचंद पर एक फ़ीचर छपा तो डेढ़ सौ रुपए मिले। धर्मयुग, दिनमान और साप्ताहिक हिंदुस्तान से भी कभी डेढ़ सौ रुपए से कम का भुगतान नहीं मिला। रविवार ने तभी दो सौ रुपए का भी चेक भेजा था। बावजूद इस सब के तब भी पैसा नहीं, रचना का छपना ही मह्त्वपूर्ण था।

नया प्रतीक में अज्ञेय जी ने एक गीत छापा उन्हीं दिनों। सव्यसाची ने उत्तरार्द्ध में कविता छापी। एक पैसा नहीं मिला। पत्रिका भी खरीदनी ही पड़ी। लेकिन यहां छपने का सुख और ज़्यादा था। उन्हीं दिनों एक रिपोर्ट दिनमान को भेजी थी। वह मत सम्मत में छप गई। मुझे बहुत बुरा लगा। मैं ने तब रघुवीर सहाय को एक चिट्ठी लिख कर अपना कड़ा प्रतिरोध दर्ज करवाया था। मैं ने लिखा था कि संपादक के नाम पत्र नहीं रिपोर्ट भेजी थी आप को। और आप ने उसे पत्र बना दिया। सहाय जी का जवाब आया था। उन्हों ने लिखा था कि दिनमान का मत सम्मत भी महत्वपूर्ण होता है। आप की रिपोर्ट तभी छापनी ज़रुरी लगी और अन्यत्र जगह थी नहीं, बाद में विलंब हो जाता इस लिए मत सम्मत में प्रकशित की गई। आप निश्चिंत रहें आप को पारिश्रमिक भी समय से भेजा जाएगा। समय से मुझे डेढ़ सौ रुपए का चेक मिला भी। उन दिनों लगभग परंपरा सी थी तब सभी जगह कि रचना छपने के तीन महीने बाद ही भुगतान मिल जाता था। किसी से कुछ कहना या लिखना नहीं होता था। मुझे याद है कि अमृत प्रभात तो तब मनीआर्डर का कमिशन भी काट लेता था। पोस्‍टमैन को दिक्कत होती थी चालीस रुपए के पेमेंट में सैंतीस रुपए कुछ पैसे देने में। दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं तो रचना स्वीकृत करने के साथ ही डेढ़ सौ रुपए का चेक भेज देती थीं। रचना चाहे जब छपे। बाद के दिनों मैं गोरखपुर से दिल्ली चला गया सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में नौकरी करने लगा। वहां यह देख कर मुदित हो गया कि एक लेख के पांच हज़ार रुपए से भी अधिक का पारिश्रमिक मिलता था। यह १९८१ की बात है। बाद में जनसत्ता गया नौकरी करने। १९८३ में। तो वहां भी एक लेख के तब तीन सौ से पांच सौ तक का पारिश्रमिक दिया जाता था। और पूरे सम्मान से। न संपादक घिघियाते थे न लेखक। हां यह ज़रुर कई बार देखा कि अगर लेखक को ज़रुरत है तो रचना या लेख छपते ही संपादक एक चिट्ठी प्रबंधन को लिख देते थे और उस का भुगतान तुरंत मिल जाता था। मुझे खुद कई बार ऐसा सुख मिला है। दिनमान में रघुवीर सहाय और सारिका में कन्हैयालाल नंदन ने ऐसी कई चिट्ठियां मेरे लिए लिखीं और मुझे तुरंत भुगतान मिल गया।

यही हाल प्रकाशकों का भी तब के दिनों था। मेरा पहला उपन्यास दरकते दरवाज़े १९८३ में प्रभात प्रकाशन के श्यामसुंदर जी ने छापा था। उपन्यास स्वीकृत होते ही उन्हों ने अनुबंध किया और ढाई हज़ार रुपए तुरंत नकद दिए। यही काम हिंदी पुस्तक संस्थान के प्रकाशक ने किया। जिस ने मेरा पहला कहानी संग्रह संवाद और दूसरा उपन्यास जाने अनजाने पुल छापा था। किताब छपने के पहले ही पैसा दे दिया। हिंद पाकेट बुक्स के दीनानाथ जी ने भी यही किया। पर अब? अब यह सब बीते समय की बातें हैं। कहें कि बीता युग है। प्रकाशक कहते हैं कि किताब अब बिकती नहीं। पैसा कहां से दें? हालत यह है कि प्रकाशक कागज़ से लगायत छपाई, बाइंडिंग तक के पैसे कई बार ऐड्वांस दे देता है। दुकानदारों को ४० से ५० प्रतिशत कमिशन देता है। सरकारी खरीद के लिए अफ़सरों को अस्सी प्रतिशत तक रिश्वत देता है। खरीद के पहले ही। कई बार यह पैसा डूब भी जाता है तो भी देता है। पर नहीं देता तो सिर्फ़ लेखक को सो काल्ड रायल्टी नहीं देता। उस को पसीना आ जाता है। तमाम किस्म की दिक्कतें आ जाती हैं। और वह घुमा देता है। तो क्यों? और तो और अब तो बहुतायत में लोग लोग प्रकाशक को पैसा दे कर किताबें छपवाने लगे हैं। सारा खर्च लेखक का और सारा फ़ायदा प्रकाशक का। निर्मल वर्मा ने अपने निधन के कुछ समय पहले राजकमल प्रकाशन से अपनी रायल्टी का हिसाब मांगा। उन का निधन हो गया पर राजकमल वाले माहेश्वरी बंधु ने उन की रायल्टी का हिसाब नहीं दिया। उन के निधन के बाद उन की पत्नी गगन गिल ने हिसाब मांगा। राजकमल के स्वामी ने देश भर के लेखकों को चिट्ठी लिख कर दुनिया भर की बातें बताईं पर गगन गिल को रायल्टी का हिसाब नहीं दिया। राजकमल वालों ने अपने पत्र में गगन जी की चरित्र हत्या तक की कोशिश की। और प्रकारांतर से यह जताने की कोशिश की कि गगन गिल निर्मल वर्मा की पत्नी नहीं रखैल हैं। चिट्ठी में कहा कि निर्मल जी की व्याहता पत्नी की एक बेटी भी है। गगन गिल को भी मजबूर हो कर देश भर के लेखकों को चिट्ठी लिख कर अपनी सफाई देनी पड़ी। गगन जी को विवश हो कर लिखना पड़ा कि मैं निर्मल वर्मा की व्याहता पत्नी हूं। और कि वह अपनी वसीयत में सब कुछ मुझे सौंप गए हैं। किताबों की कापीराइट भी। और कि उन की बेटी को भी किसी बात पर ऐतराज़ नहीं है। फिर भी राजकमल ने उन्हें रायल्टी नहीं दी। फिर तो हर पुस्तक मेले में वह निर्मल जी की किताब ले कर राजकमल के खिलाफ़ खडी होने लगीं, लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। फिर कहीं राजकमल से निर्मल जी की सारी किताबें उन्हों ने वापस लीं। निर्मल वर्मा ने अपने निधन के पहले एक लेख भी लिखा था इस मामले पर। इस लेख में उन्हों ने बताया था कि दिल्ली में हिंदी के कई प्रकाशकों को वह व्यक्तिगत रुप से जानते हैं। जिन के पास हिंदी की किताब छापने और बेचने के अलावा कोई और व्यवसाय नहीं है। और यह प्रकाशक कह्ते हैं कि किताब बिकती नहीं। फिर भी वह यह व्यवसाय कर रहे हैं। न सिर्फ़ यह व्यवसाय कर रहे हैं बल्कि मैं देख रहा हूं कि उन की कार लंबी होती जा रही है, बंगले बडे़ होते जा रहे हैं, फ़ार्म हाऊसों की संख्या बड़ी होती जा रही है तो भला कैसे?

निर्मल जी के इस सवाल का किसी प्रकाशक ने आज तक पलट कर जवाब देने की ज़रुरत नहीं समझी। एक बार नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले में रवींद्र कालिया ने कहा कि प्रकाशक अब पांच सौ से तीन सौ प्रतियों के संस्करण पर आ गए हैं। बाद में जब वह मंच से उतर कर चाय वाय पीने लगे तो मैं ने उन से कहा कि उत्तर प्रदेश में आप के कुछ मित्र आई. ए. एस. अफ़सर हैं। कुछ सरकारी खरीद की जानकारी मैं आप को दे रहा हूं। आप चाहें तो अपने दोस्तों से कह कर यह तो पता करवा ही सकते हैं कि किस किस खरीद में आप की कौन- कौन सी किताब कितनी- कितनी खरीदी गई है। पता चल जाएगा कि किताब कितनी छपती है? पर जाने क्यों कालिया जी ने बात को सुन कर अनसुना कर दिया। कुछ बोले नहीं। शायद वह हमाम का नंगापन जानते रहे होंगे तभी चुप रहे। सचाई यह है कि प्रकाशक किसी किताब का पहला संस्करण ज़रुर पांच सौ का छापते हैं। पर यह बेचने के लिए नहीं। सिर्फ़ सबमिशन के लिए। इतनी योजनाओं में इतनी खरीदें हैं कि यह पांच सौ किताबें भी सबमिशन के लिए कम पड़ जाती हैं प्रकाशकों को। फिर तो जैसे -जैसे आर्डर मिलता जाता है किताबें छपती जाती हैं। एक- एक हफ़्ते में कई -कई संस्करण एक किताब के छप जाते हैं। लेकिन प्रकाशक के यहां लेखक के लिए वही पहला संस्करण दिखता रहता है। दस साल बाद भी अगर उसी किताब का पहला संस्करण बिल्कुल ताज़े कागज़ पर दिख जाए तो हैरत में बिलकुल नहीं पड़ें। आप का ही कहानी संग्रह आप ही के नाम से किसी और प्रकाशक या किसी और शीर्षक से छपा मिल जाए तो भी मत चौंकिए। सरकारी खरीद का गुणा-भाग मान लीजिए इसे। लेखक छोटा है या बड़ा इस से भी इन बातों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मेरा पहला उपन्यास जब छपा था तो कह सुन कर उस की समीक्षा कई जगह छपवा ली। अच्छी-अच्छी। कुछ जगह अपने आप भी छप गई। तो मेरा दिमाग थोड़ा खराब हुआ। मन में आया कि अब मैं बड़ा लेखक हो गया हूं। कोई  पचीस-छब्बीस साल की उम्र थी, इतराने की उम्र थी, सो इतराने भी लगा। प्रभात प्रकाशन के श्यामसुंदर जी ने इस बात को नोट किया। एक दिन मेरे इतराने को हवा देते हुए बोले, 'अब तो आप बडे़ लेखक हो गए हैं! अच्छी-अच्छी समीक्षाएं छप गई हैं।' मैं ने ज़रा गुरुर में सिर हिलाया। और उन से बोला, 'आप का भी तो फ़ायदा होगा!'

'वो कैसे भला?'

'आप की किताबों की सेल बढ़ जाएगी !' मैं ज़रा नहीं पूरे रौब में आ कर बोला।

'यही जानते हैं आप?' श्यामसुंदर जी ने अचानक मुझे आसमान से ज़मीन पर ला दिया। अमृतलाल नागर, अज्ञेय, भगवती चरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर आदि तमाम बडे़ लेखकों की किताबों के साथ मुझ जैसे कई नए लेखकों की कई किताबें एक साथ मेज़ पर रखते हुए वह बोले, 'इन में से सभी लेखकों की किताबें बेचने के लिए मुझे एक जैसी तरकीब ही लगानी पड़ती है।'

'क्या?' मैं चौंका।

'जी!' वह बोले, 'बिना रिश्वत के एक किताब नहीं बिकती। वह चाहे बड़ा लेखक हो या घुरहू कतवारु। सब को रिश्वत दे कर ही बेचना होता है। बाज़ार का दस्तूर है यह। बड़ा लेखक दिखाऊंगा तो दो चार किताबें खरीद ली जाएंगी। तो उस से तो हमारा खर्च भी नहीं निकलेगा।'

हकीकत यही थी। मैं चुप रह गया था तब। पर तब श्यामसुंदर जी, दीनानाथ जी या अन्य प्रकाशक भी लेखक को रायल्टी के नाम पर कुछ पैसा देते ज़रुर थे। उन दिनों यह एक चलन सा था कि अगर हज़ार पांच सौ रुपए की तुरंत ज़रुरत हो तो बच्चों की पांच सात छोटी-छोटी कहानियां लिख कर प्रकाशक के पास चले जाइए पैसा मिल जाता था। श्रीलाल शुक्ल बताते थे कि एक बार वह दिल्ली गए तो राजकमल प्रकाशन की मालकिन शीला संधु मिलने आईं। नई किताब मांगी। बेटे ने एडवांस के रुप में पचास हज़ार मांग लिया। दूसरे दिन शीला जी ने पचास हज़ार रुपए भिजवा भी दिए। यह अस्सी के दशक की बात है। अब मैं खुश कि हिंदी के लेखक की यह हैसियत हो गई है कि एक किताब के पचास हज़ार रुपए एडवांस भी मिल सकते हैं। पर बाद में पता चला कि यह खुशी बेकार ही थी। साल के आखिर में जब किताबों की रायल्टी का हिसाब हुआ तो वह पचास हज़ार रुपया उस में एड्जस्ट हो गया। एक घटना और। श्रीलाल जी बाद में प्रकाशकों और अखबार वालों की कृपणता से इतने उकता गए कि एक बार अमर उजाला में उन का इंटरव्यू छपा तो उन्हों ने बाकायदा अखबार को नोटिस दे कर उस इंटरव्यू का पैसा मांग लिया। हिंदी में अभी तक यह चलन नहीं है कि आप किसी को इंटरव्यू लेने के लिए पैसे दें। हां उलटे कुछ फ़िल्म स्टार या कुछ व्यवसायी ज़रुर ऐसा करते हैं कि पैसा दे कर इंटरव्यू छपवाते हैं। पर कई सारी भाषाओं में चलन है कि इंटरव्यू लेने के लिए भी संबंधित व्यक्ति को पैसे देने पड़ते हैं। याद कीजिए फूलन देवी के इंटरव्यू जिस पत्रकार ने लिए थे और उस की बायग्राफी लिखी थी उस ने फूलन देवी को बाकायदा और अच्छा खासा भुगतान दिया था, एडवांस। साथ में रायल्टी भी शेयर की थी। तो श्रीलाल जी ने नोटिस दे कर पैसा मांगा। अखबार के हाथ पांव फूल गए। रिपोर्टर को तलब किया गया। सब कुछ किया गया पर अंतत: श्रीलाल जी को अखबार ने पैसा नहीं दिया तो नहीं दिया। माफी मांग कर इतिश्री कर ली। श्रीलाल जी को जब लगातार कुछ पुरस्कार मिले तो वह एक बार बहुत प्रसन्न हो कर कहने लगे कि इतना पैसा तो रायल्टी में भी नहीं मिला अब तक। एक बार मनोहर श्याम जोशी को एक अखबार ने एक पुरस्कार योजना के निर्णायक मंडल में मनोनीत किया तो उन्हों ने छूटते ही पूछा कि पैसा कितना मिलेगा? सुनने वालों को यह अच्छा नहीं लगा। लोगों को लगा कि हिंदी का लेखक पैसा भी मांग सकता है? यह सब हिंदी के लेखकों के साथ ही क्यों होता है भला?

सोचिए कि उत्तर प्रदेश में हिंदी संस्थान के ८३ पुरस्कारों में से ८० पुरस्कार मायावती ने एक झटके में खत्म कर दिए। अशोक वाजपेयी ने इस के विरोध में भारत भारती जैसा संस्थान का सर्वोच्च पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया। पर मायावती सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगा। जब कि यहीं उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का एक भी पुरस्कार छूने की हिम्मत मायावती की नहीं हुई। उलटे पुरस्कार राशि में बढ़ोतरी कर उसे पांच लाख का कर दिया। जब कि हिंदी में भारत भारती ढाई लाख का ही है। यही नहीं आप देख लीजिए कि हिंदी में दिए जाने वाले साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ या व्यास सम्मान धनराशि के मामले में भी बुकर, मैगसेसे या नोबल के आगे किस कदर बौने की हैसियत में भी खडे़ नहीं हो पाते। तब जब कि यह दुनिया में सब से ज़्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। और तो छोडिए कौन बनेगा करोड़पति समेत जाने कितने शो हैं जिस में लोग आनन फानन जाने लाखों रुपए पा जाते हैं। बताते हुए खुशी होती है कि कहानी उपन्यास आदि की मेरी कोई १८ किताबें हैं। पर प्रकाशक से जब कभी रायल्टी की बात चलाता हूं तो बस एक ही जवाब होता है। प्रकाशक कहता है कि आप की रायल्टी तो यह अफ़सर खा जाते हैं। इन अफ़सरों से छुट्टी दिलवाइए तो आप को रायल्टी देता हूं। इस में सारा संकेत यह होता है कि मैं अपनी किताबों की सरकारी खरीद खुद करवाऊं कह सुन कर या जैसे भी। तो वह कमीशन या रिश्वत जो सरकारी अमला खाता है उस का कुछ टुकड़ा मेरे हिस्से भी आ जाएगा। सो मैं हाथ जोड़ लेता हूं। और बिना रायल्टी के ही संतोष करता हूं। पैसा दिए बिना किताब छप जाती है यही सोच कर खुश हो लेता हूं।

असल में हुआ यह कि इधर के दिनों में तमाम सरकारी अफ़सर-कर्मचारी भी लेखक हो चले हैं। सो वह किताब छापने के लिए पैसे भी देते है, खरीद भी करवाते हैं। खुद भी कमाते हैं और प्रकाशक को भी कमवाते हैं। पहले के दिनों में ऐसा ऐसा कुछ विश्वविद्यालयों के अध्यापक करते थे। पाठ्यक्रम की चार किताबों के साथ अपनी कोई कविता कहानी की किताब भी थमा देते थे। खरीद समितियों में भी वह होते ही होते थे। सो प्रकाशक उन्हें उपकृत करते रहते थे। पर यह सब कुछ दबे ढंके था। पर अफ़सरों के लेखक बनने और विश्वविद्यालयों के अध्यापकों को प्रोन्नति किताब के आधार पर कर देने से खुला खेल फरुखाबादी हो चला है। बहुतेरे प्रकाशक तो लेखकों से किताब छापने का पैसा ले कर डकार भी जाते हैं। किताब नहीं छापते। पैसा भी वापस नहीं देते। कई बार कुछ प्रकाशक पैसा ले कर भाग भी जाते हैं। अकसर ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं। लेखकों में खेमेबाज़ी का नमो अंधकारम अलग है। रिश्वत अब ग्लोबलाइज़ है। हिंदी किताबें भी इस का शिकार हैं। लेकिन यही भर कह देने से काम नहीं चलता। हकीकत यह है कि यही हिंदी प्रकाशक जब अरुंधति राय या तसलीमा नसरीन को छापने पर आते हैं तो उन के पास घुटने टेकते हुए पहुंचते हैं और एडवांस और मुंहमांगी रायल्टी दे कर किताब का आनन फानन अनुवाद एडवांस दे कर सर के बल हो कर करवाते हैं। तो क्या हिंदी में किताब बिकती है? कोई इन प्रकाशकों से नहीं पूछता। सोचिए कि बांगला के विमल मित्र तक के परिवार के लोगों को यही हिंदी प्रकाशक रायल्टी देते नहीं अघाते। तो फिर यह सारी नौटंकी सिर्फ़ हिंदी लेखकों के लिए ही है?

कारण साफ है कि सरकार भी नहीं चाहती कि लोग पढ़ें। वह चाहती ही है कि लोग टी.वी. के सास बहू, लाफ़्टर चैलेंज, बिग बास टाइप के फालतू कार्यक्रम देख कर नपुंसक विचारों के हवाले हो जाए। क्यों कि अगर लोग पढ़ेंगे तो सोचेंगे। सोचेंगे तो सिस्टम और सरकार के खिलाफ ही तो सोचेंगे? पर लोग हैं कि लिखना छोड़ नहीं रहे। तो सरकार लोगों के लिखे को सरकारी लाइब्रेरी में कैद करती जा रही है। प्रकाशक मालामाल होते जा रहे हैं। अफ़सरों की ज़ेब भरती जा रही है। अब कितने लोग जानते हैं कि सिर्फ़ साक्षरता की हिंदी किताबों के नाम पर ही एक-एक ज़िले में करोडों रुपए का बजट हर साल स्वाहा हो जाता है! बाकी की तो खैर बात ही क्या? हालत यह है कि सभी प्रदेशों में तमाम विभागों के अलग-अलग बजट हैं हिंदी किताबों खातिर। मानव संसाधन विभाग राजा राममोहन राय योजना की खरीद में हर साल न सिर्फ़ करोडों-करोड़ रुपए हिंदी किताबों की खरीद पर खर्च करता है बल्कि किताब रखने के लिए आलमारी तक खरीदने का बजट भी देता है। जो लेखक या अधिकारी इस की खरीद समिति में आते हैं एक ही साल में मालामाल हो जाते हैं। बहुतेरे विदेशी भाषाओं की किताबें भी प्रकाशक इस खरीद में पाट देते हैं। वह किताबें जो रायल्टी से फ़्री हैं। टालस्टाय, हेमिंग्वे से लगायत प्रेमचंद, शरतचंद आदि भी। यानी जो रायल्टी से फ़्री हो गई किताब हो प्रकाशक को मुफ़ीद पड़ती है। नामा और नाम दोनों ही उन के हिस्से आ जाते हैं। सरकारी अमला आंख मूंद कर खरीद जारी आहे! की मुनादी करता रहता है। बताते हुए तकलीफ़ होती है कि एक बार तो इस खरीद समिति के अध्यक्ष एक नामवर आलोचक बनाए गए थे। सारी खरीद उन्हों ने अपने एक चहेते प्रकाशक को ही थमा दी। इतनी कि दाल में नमक हो गया। जांच शुरु हो गई। जेल जाने की नौबत आ गई। कि एक नामवर कवि और आलोचक ने अपने प्रशासनिक अधिकारी होने का हुनर दिखाया। और अध्यक्ष महोदय बच गए। बचाने वाले को ज़िंदगी भर खारिज़ किए रहे थे, उस से उपकृत हो कर उसे साहित्य अकादमी से नवाज़ दिया। बात चर्चा-कुचर्चा में ही निपट गई। यह और ऐसे तमाम प्रसंग किताब खरीद के किस्सों से रंगे पडे़ हैं। रेलवे, सेना, बैंकों और दूतावासों में भी हिंदी किताबों की भारी खरीद होती है। और हमारे प्रकाशक लोग जब लेखकों को रायल्टी देने की बात आती है तो कहते हैं कि क्या करें किताबें बिकती ही नहीं। और गुस्सा तब आता है जब इन खरीद कमेटियों में शामिल मठाधीश लेखक भी यह सब कान में तेल डाल कर न सिर्फ़ सुनते रहते हैं बल्कि यथास्थितिवादी बन आंख भी मूंदे रहते हैं।

एक समय जब दूरदर्शन का ज़माना था तब के दिनों धारावाहिकों में काम करने वाले कलाकारों का शोषण बहुत बढ़ गया था। ज़्यादातर निर्माता कलाकारों का पारिश्रमिक घाटा हो गया के नाम पर मार देते थे। जब अति हो गई तब दूरदर्शन ने एक नियम बना कर निर्माता को कलाकारों की तरफ़ से एन.ओ.सी. देना अनिवार्य कर दिया। अगर कोई कलाकार निर्माता के खिलाफ अगर झूठ भी शिकायत कर देता तो उस का प्रसारण और भुगतान रोक दिया जाता था। कलाकारों का शोषण लगभग रुक गया। अब कोई शोषण करवाने पर ही आमादा हो तो बात और है। तो क्या यह सरकारें भी ऐसा कुछ नहीं कर सकतीं? कि लेखकों की एन.ओ.सी. कि किताब की रायल्टी मिली, तभी किताबों का भुगतान  करे। और कि यह भी ज़रुर सुनिश्चित करे सरकार कि उस किताब का सचमुच ही पहला संस्करण है और कि वह अनुदित किताब नहीं है। अनूदित किताब का कोटा भी सुनिश्चित कर दिया जाए। न सही पूरी तरह अधिकांश समस्या तो खत्म होगी ही। नहीं अपने देश में हिंदी के लेखकों की हैसियत किसानों मज़दूरों से भी गई बीती है। कि उन्हें अपने काम की मज़दूरी नहीं मिलती बल्कि इस बारे में प्रकाशक, लेखक, सरकार या समाज सोचता भी नहीं। यह कौन सा समाज हम गढ़ रहे हैं? इस पर अब सोचना बहुत ज़रुरी हो गया है।

अब दखिए इन दिनों एक अखबार निकला है लखनऊ से जनसंदेश टाइम्स। सुभाष राय इस के संपादक हैं। खुद कवि, लेखक हैं सो अखबार में भी साहित्य के लिए, विचार के लिए भरपूर स्पेस रखते हैं। शुरु के दिनों में ज़्यादातर लिफ़्ट कर के छापते थे। अब कुछ लोगों को जोड़ कर कुछ नया भी करने लगे हैं। अखबार में विज्ञापन नहीं के बराबर है सो खाली जगह का स्पेस वह साहित्य से भरने की कोशिश करते हैं। लगभग अति उत्साह में हैं कि वह कुछ नया और हटके कर रहे हैं। ऐसा वह जब -तब यत्र -तत्र लिख कर जताते भी रहते हैं। अपनी संपादकीय में, ब्लाग पर, फ़ेसबुक आदि पर भी। इधर लगभग दूसरी बार उन्हों ने लिख कर लेखकों से कहा है कि वह सब को पारिश्रमिक नहीं दे पा रहे और कि देर सवेर देंगे ज़रुर। उन्हों ने अपनी पीठ भी ठोंकी है साथ में अपने एक सहयोगी हरे प्रकाश उपाध्याय का नाम भी नत्थी किया है और कहा है कि मैं जानता हूं कि आप लोग मेरे लिए और हरे के लिए ही लिखते हैं, आदि आदि। और फिर वही कि पैसा नहीं दे पा रहे हैं। एक बार ऐसा वह अखबार के संपादकीय में भी लिख चुके हैं, अब की फ़ेसबुक पर लिखा देखा। और फ़ेसबुकियों को तो आप लोग जानते ही हैं, सब साथ हो लिए हैं उन की इस पैसा न दे पाने की मुहिम में कंधा देने को, शहीद बनने को पूरे वीर रस में तैयार! एक सज्जन तो जाने कितना वेतन पाते हैं कि अपना वेतन देने को भी तैयार बता गए हैं। अजब है यह सब! एक आदमी है कि मंहगाई के विरोध में शरद पवार को थप्पड़ रशीद कर देता है। और यह जनाब हैं कि ऐसे में अपना वेतन बलिदान कर देने पर आमादा हैं। खुद क्या खाएंगे और परिवार को क्या खिलाएंगे इस की फिकर नहीं है। अखबार छपता रहे इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हैं। खैर। लेकिन पूछने को मन करता है सुभाष राय से उन की सारे नेक इरादे के बावजूद कि यह अपील सिर्फ़ लेखकों से ही क्यों कर रहे हैं? हाकरों से भी क्यों नहीं करते कि बिना कमीशन लिए अखबार बेचें। कागज़ जहां से खरीदते हैं उस से भी यह अपील क्यों नहीं दुहराते। या ऐसे ही तमाम तमाम और लोगों से जो अखबार छापने के मद्देनज़र खर्च करवाते हैं उन से भी यह अपील क्यों नहीं करते कि भैय्या हम साहित्य संस्कृति को छाप रहे हैं, बढ़ावा दे रहे हैं आप हम से कुछ नहीं लें या थोड़ा लें या बाद में लें! अदभुत है यह। एक गया गुज़रा अखबार भी छापने में रोज लाखों रुपए खर्च होते ही हैं, यह सब जानते हैं। और लेखक के मद में कोई अखबार ज़्यादा से ज़्यादा दो चार पांच हज़ार से ज़्यादा कम से कम हिंदी में तो नहीं ही खर्च करता। तो यह क्या है? अरे आप मत दीजिए एक भी पैसा लेखक को। पर यह बार-बार लिख कर आप क्या जताना चाहते हैं? हिंदी के तमाम अखबार और पत्रिकाएं नहीं देते लेखकों को एक भी पैसा। प्रकाशक भी नहीं देते तो क्या लोग लिख नहीं रहे? लिखना क्या खत्म हो गया? कि हो जाएगा? यह सारा उपक्रम सिर्फ़ ऐसे लेखकों के लिए है जो बाज़ार में नहीं हैं। नहीं कौन नहीं जानता कि कुछ व्यंग्यकार और लेखक बिना पैसे लिए कहीं नहीं लिखते। और वह जनसंदेश टाइम्स में न सिर्फ़ छप रहे हैं बल्कि नियमित छप रहे हैं। यह सब उन्हीं लेखकों से आप कह सकते हैं जो पैसे के लिए नहीं लिखते, या फिर सिर्फ़ छपास के मारे हुए हैं। सब से नहीं। देवेंद्र कुमार की एक कविता है, ' अब तो अपना सूरज भी / आंगन देख कर धूप देने लगा है।' तो माफ़ कीजिए सुभाष राय जी आप का जनसंदेश भी आंगन देख कर ही भुगतान कर रहा है, यह आप के कलियोगी गणेश भी जानते ही होंगे। तो यह सब बार- बार लिख- लिखा कर अपना मन क्यों खराब करते रहते हैं? आप का प्रबंधन अखबार में साहित्य को इतना स्पेस देने को तैयार है इस संकट के समय में यही बहुत है। हालां कि अगर आप प्रबंधन को यह समझा सकते हैं कि अखबार दो रुपए का करने से ज़्यादा बिक सकता है तो यह भी समझाना कोई मुश्किल काम नहीं है कि लेखकों को उन की मज़दूरी भी क्यों न दी जाए? लेकिन लेखक चूंकि सब से कमज़ोर कड़ी है गरीब की लुगाई है सो भौजाई है ही सब की।

एक समय था कि अखबार लेखकों न सिर्फ़ मान देते थे बल्कि ज़्यादातर अखबारों में लेखक ही संपादक भी होते थे। इलाचंद्र जोशी, रामानंद दोषी, गोपाल प्रसाद व्यास से लगायत अज्ञेय, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, कन्हैयालाल नंदन, राजेंद्र अवस्थी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, भैरव प्रसाद गुप्त, अमरकांत आदि की एक लंबी सूची है। किस किस का नाम गिनाएं। वह तो जब से संपादक का काम दलाली और लायजनिंग हो गया तो यह परंपरा टूट गई। छूट गया अखबारों से यह साहित्य, संस्कृति आदि का स्पेस। इस की भी कथा बहुत पुरानी नहीं है। हुआ यह कि जब अखबारी सिस्टम भी ग्लोबलाइज़ेशन के हत्थे चढ़ गया तब संपादक नाम की संस्था प्रबंधन के हाथ लाचार हो गई। संपादक नाम की संस्था का क्षरण हो गया। मैनेजर लोग तय करने लगे कि क्या छपेगा और क्या नहीं। यह पेड न्यूज़ का घड़ा जो बीते दिनों फूटा है वह तो बहुत दिनों से चल रहा था। शुरुआत अंगरेजी अखबारों में कामर्स की खबरों से हुई। उन्हीं दिनों क्रिकेट में भी पैसे का ज्वार आया तो क्रिकेट के अपने सचिन तेंदुलकर टाइप लोग भी सक्रिय हो गए। और देखिए न कि सिर्फ़ पैसे के लिए जीने वाले लोग भगवान होने लगे। तो यह सब प्री पेड न्यूज़ का ही चमत्कार था। फ़िल्मों में प्रायोजित खबरों का चटखारा पहले ही से था। सोचिए कि राजेश खन्ना जैसे अभिनेता देवयानी चौबल जैसी पत्रकार को रखैल बना कर रखते थे और अपने मन मुताबिक खबरें प्लांट करवाते थे। ऐसी अनगिनत कहानियां बिखरी पड़ी हैं। बाद के दिनों में तो पी आर एजेंसियों का चलन ही हो गया और खुल्लमखुल्ला। तो इन पी आर एजेंसियों ने ऐड एजेंसियों से फ़िल्मी पन्ने बनवा कर अखबारों को प्रायोजित करना शुरु किया। धीरे-धीरे आग फैल गई। सभी अखबार इस आग की चपेट में आ गए। संपादक जो बिठाए गए थे इन अखबारों में प्रबंधन की हां में मिलाते रहे। टी.वी धारावाहिकों के प्रायोजित पन्ने भी अखबारों पर धावा बोल बैठे। अब नंगी अधनंगी औरतों की फ़ोटो आम हो गई हर अखबार में। अब साहित्य कौन सी चिडिया थी, कौन सी गौरैया थी जो इन अधनंगी फ़ोटुओं में फ़ुदकने की हिमाकत करती भला? प्राण ले लिए अखबारों ने इस गौरैया के, इस चिडिया के। अब देखिए न कोई फ़िल्म रिलीज़ होती है तो फ़ौरन सभी चैनलों पर उन के प्रमोशन कार्यक्रम के तहत सारे हीरो हिरोइन बैठ जाते हैं। एक से एक बकवास फ़िल्में करोड़ों रुपए बटोर कर चंपत हो जाती हैं।

राजनीति में भी अमर सिंह और राजीव शुक्ला जैसे लोगों की आमद हो गई। तो इन लोगों ने नमक में दाल की रवायत राजनीतिक खबरों में भी चला दी। कि एक ग्राम सच में कुंटल भर का गप्प। इसे प्रायोजित खबर का नाम दिया गया। धीरे-धीरे इसे पेड न्यूज़ का नाम दे दिया। खास कर चुनावी दिनों में। कुछ अखबार तो रेट कार्ड छाप कर घूमने लगे। अब खुला खेल फरुखाबादी हो गया तो भांडा फूट गया। प्रभाश जोशी जैसे लोग खडे़ हो गए। इस पेड न्यूज़ के खिलाफ। अब काटजू ही क्या जिस को देखिए वही पेड न्यूज़ के नाम पर शुरु हो जाता है। अब काटजू की हिप्पोक्रेसी देखिए कि पेड न्यूज़ जिस की नींव इतनी पक्की हो गई है कोई अभी हाल फ़िलहाल तो कुछ नहीं कर सकता पर उस पर वह बोल रहे हैं। लेकिन मजीठिया वेज बोर्ड को सभी अखबार मालिक धता बताए बैठे हैं, उस पर वह सांस नहीं ले रहे। चाहिए तो उन को यह कि मजीठिया वेज बोर्ड को ले कर हल्ला बोल दें। पर नहीं पेड न्यूज़ की फटी ढोलक बजाना उन्हें ज़्यादा मुफ़ीद लग रहा है। क्यों कि इस में मालिकों से सीधे उन्हें टकराना नहीं पडे़गा। तो पेड न्यूज़ की प्याज खा रहे हैं फ़िलहाल। नहीं मुझे याद है कि जब पहले पालेकर और फिर बाद में बछावत लगा था तो कोशिश यही थी कि एक सब एडिटर का वेतन कम से कम यूनिवर्सिटी के लेक्चरर बराबर तो हो ही। पर अब क्या है? एक प्राइमरी स्कूल का अध्यापक भी पहली तनख्वाह बीस हज़ार रुपए की पाता है। विश्वविद्यालयों में तो लोग लाखों का वेतन पाने लगे हैं। पर दिल्ली जैसी जगह में बडे -बडे अखबारों में लोग पांच -पांच हज़ार रुपए में काम कर रहे हैं। लखनऊ में तो दो-दो हज़ार रुपए में। सोचिए कि आज की तारीख में मनरेगा में काम करने वाला मज़दूर भी इस से ज़्यादा ही कमा लेता है, वह भी अपने गांव घर में बैठ कर ही। एक रिक्शा वाला भी इस से ज़्यादा कमा लेता है। काटजू साह्ब इस पांच हज़ार या दो हज़ार की पगार पाने वाले से आप कैसे उम्मीद कर रहे हैं कि वह अर्थशास्त्र और इतिहास भी जाने ही जाने। हां एक से एक स्वनामधन्य भी हैं जो लाखों रुपए महीने की पगार पा रहे हैं। और कि मीडिया को बरबाद कर रहे हैं। हालां कि एक समय था कि डेढ, दो सौ या ढाई सौ रुपए पा कर भी वह पत्रकार सिर पर स्वाभिमान टांगे घूमते थे और सेठों की नौकरियों को जब चाहते थे लात मार कर निकल जाते थे। नौकरी की खाक परवाह नहीं करते थे। और वह लोग अर्थशास्त्र या इतिहास ही नहीं और भी बहुत कुछ जानते थे। अपने अपने फ़ील्ड के टापर लोग थे। पर आज एक से एक चश्मे नूर हैं कि साक्षर होने के बूते ही लाखों की सेलरी पा कर भी स्वाभिमान किस चिडिया का नाम है जानते ही नहीं। और काटजू साहब हैं कि उन से अर्थशास्त्र और इतिहास भी जान लेना चाहते हैं। यहां तो एक से एक रणबांकुरे हैं कि बीच क्रिकेट मैच में मैन आफ़ द मैच की फ़ोटो मांग बैठते हैं फ़ोटोग्राफ़र से और ग्रुप एडीटर की कुर्सी पर शोभायमान हो जाते हैं। यह समस्या अपनी हिंदी में ही कुछ क्या बहुत ज़्यादा है। और ऐसे में हमारे सुभाष राय लेखकों को पैसा न दे पाने के दुख में मरे जा रहे हैं। तब जब एक से एक स्वनामधन्य संपादक हैं कि अपनी तनख्वाह बढ़वाने के चक्कर में चार छह लोगों को नौकरी से ऐसे निकलवा देते हैं गोया देह से चिल्लर निकलवा रहे हों।

अब यह घटतौली भी कैसे जाए भला? वह भी हिंदी से? यह सब तब है जब हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा भले न हो बाज़ार की सब से बड़ी भाषा है इस दुनिया में। हिंदी से ज़्यादा न सिनेमा बनता है, न धारावाहिक, न अखबार हैं हिंदी से ज़्यादा, न हिंदी से ज़्यादा किताबें छपती हैं इस देश में न हिंदी से ज़्यादा खुदरा बाज़ार है यहां। फिर भी हिंदी का लेखक रायल्टी नहीं पाता। गिनती के कुछ लोग पाते भी हैं तो कैसे और कितना पाते हैं, वह ही जानते हैं। सच यह है कि पाठ्यक्रम जो न हो हिंदी का तो रायल्टी शब्द भी हिंदी किताबों की दुनिया से उठ जाए। हिंदी फ़िल्मों के पटकथा और संवाद लेखकों की हैसियत कुछ बहुत अच्छी नहीं है। हिंदी पत्रकारों की तो और बुरी गत है। देश के किसानों के लिए सरकार कम से कम न्यूनतम समर्थन मूल्य तो घोषित करती है, हिंदी के पत्रकारों को तो न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता। एक रिक्शे वाले से भी कम वेतन है उस का। और बहुत सारे संवाद सूत्रों को तो वेतन भी नहीं मिलता। मुफ़्त में काम करते हैं। और अब यह नई मार है हिंदी अखबारों में लिखने वाले लोगों पर कि ऐलानिया उन से यह अपील कर दी जा रही है कि आप बिना पैसे के लिखें! हद है सुभाष राय जी, यह क्या कर दिया आप ने? तमाम पत्रिकाएं और अखबार लेखकों को पैसा नहीं देते, ये तमाम ब्लागर या साइटें भी किसी को एक पैसा नहीं देते। हां, पाठक संसार देते हैं। लेखक पैसे के लिए लिखते भी नहीं पर वह अखबार या पत्रिका या साइटें ऐलान कर के नहीं कहते कि हम पैसा नहीं दे पा रहे। पर आप ऐलान कर के कह रहे हैं। बार -बार कह रहे हैं। क्या जनसंदेश टाइम्स का प्रबंधन हंस से भी गया गुज़रा है? हंस एक तरह से एकल प्रयास है। व्यावसायिक नहीं है। राजेंद्र यादव २५ बरस से भी ज़्यादा समय से इसे अकेले अपने बूते निकाल रहे हैं। और बताते हुए अच्छा लगता है कि वह अपने रचनाकारों को किसी भी अखबार से खराब पारिश्रमिक नहीं देते। लिखते ज़रुर हैं चिट्ठी में कि यह पारिश्रमिक नहीं है, बस यूं ही है। आप खर्च समझ लें। तो हंस क्या सहित्यिक स्पेस नहीं देता? हां पर लेखकों के साथ घटतौली नहीं करता।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं.   दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

 

साहित्यपुर के संत और उन के रंगनाथ की दुनिया

विश्रामपुर के संत ने जब आज अंतिम विश्राम ले ही लिया है तो यह सोचना लाजिमी हो गया है कि क्या श्रीलाल शुक्ल ही रंगनाथ भी नहीं थे? जी हां, मैं उनके रागदरबारी के नायक रंगनाथ की बात कर रहा हूं। सच यह है कि जब रागदरबारी मैंने पढ़ा था तब तो लगता था कि मैं भी रंगनाथ ही हूं। ‘पाव भर का सीना और ख्वाहिश सायराबानो की’ जैसे संवाद में धंसे व्यंग्य की धार और रंगनाथ के दर्पण में अपना अक्स देखना तब बहुत भला लगता था।

कई बार लगता था कि वैद्य जी से, उनकी मान्यताओं, उनकी उखाड़-पछाड़ से रंगनाथ ही नहीं, मैं भी टकरा रहा हूं। तो यह सिर्फ श्रीलाल जी के रचे पात्र रंगनाथ का जादू भर नहीं था, यह सिस्टम से टकराने का चाव भी था। उन दिनों तो हर युवा रंगनाथ ही था। कम से कम मेरे आसपास के युवा। उन दिनों विद्यार्थी था। प्रेमचंद के बाद अगर कोई आहट मन में भरता था तो कथा- कहानी में श्रीलाल जी और उनका रागदरबारी ही। हालांकि तब कविताएं लिखता था और धूमिल और दुष्यंत का रंग ज्यादा चटक था पर रागदरबारी का लंगड़ भी रह-रह कर सामने खड़ा हो जाता था। क्या तो चरित्र है लंगड़ का! वह लंगड़ जिसे कचहरी में नकल लेने के लिए रिश्वत नहीं देनी थी। चाहे जितने भी पापड़ बेलने पड़े। नकल नहीं मिलती है तो न मिले। सोचिए भला कि बिना रिश्वत दिये भला आज भी किसी को नकल मिल सकती है किसी कचहरी में?

वह लंगड़ आज भी दौड़ रहा है और नकल नहीं पा रहा। और रागदरबारी के समय कचहरी भर ही रिश्वत का प्रामाणिक स्थल थी। अब तो समूचा सिस्टम ही लंगड़ के खिलाफ खड़ा है। अब जहां भी जाएं कोई काम करवाने कचहरी का दस्तूर मुंह बाए खड़ा है। पहले नजराना, शुकराना था, अब जबराना है। जनता लंगड़ है और सारा सरकारी अमला कचहरी। यह प्रतीक और गहरा, और मारक, और यातनादायक बनता गया है। श्रीलाल जी के रागदरबारी का तंज तेग बन कर अब हमारे सामने उपस्थित है। कोई अब इसे हिला नहीं सकता। सरकारी नौकरी मे रहते हुए ऐसी कालजयी रचना लिखना आसान नहीं था। खतरे बहुत थे। पर श्रीलाल जी ने उठाये। बार-बार उठाये। रागदरबारी सीधे-सीधे सरकार और उसकी मशीनरी के खिलाफ बजाया गया बिगुल है, सिर्फ एक उपन्यास भर नहीं। और हम सब जानते हैं कि श्रीलाल जी प्रशासनिक अधिकारी थे। न सिर्फ लिखने में वरन व्यवहार में भी वह रंगनाथ ही थे। वह तब के दिनों पीसीएस अधिकारी थे।

तब का एक वाकया सुनिये। अब के दिनों की तरह तब भी पीसीएस एसोसिएशन की सालाना मीट थी। हेमवतीनंदन बहुगुणा तब मुख्यमंत्री थे। पीसीएस एसोसिएशन की मीट में कुछ मांगें रवायत के मुताबिक मानते हुए बहुगुणा जी ने ऐलान किया कि नगरपालिकाओं में प्रशासक का पद भी पीसीएस अधिकारियों को दिया जाएगा। और कि लखनऊ नगर पालिका का पहला प्रशासक श्रीलाल शुक्ल को नियुक्त किया जाता है। श्रीलाल शुक्ल फौरन उठ कर खड़े हो गये और मुख्यमंत्री से साफ तौर पर कहा कि, ‘क्या यह आप हमारे संवर्ग पर एहसान कर रहे हैं? कि भीख दे रहे हैं? अगर ऐसा है तो यह लीजिये और रखिये अपना यह पद अपने पास। हमें ऐसी बख्शीश नहीं चाहिये।’ यह सुनते ही लोग सकते में आ गये। सन्नाटा फैल गया पूरी सभा में। तब के मुख्यमंत्री बहुगुणा को हार मान कर कहना पड़ा कि, ‘यह पद कोई बख्शीश में नहीं दे रहे हम। यह आपका हक है।’

उस मीट में उपस्थित तब के एक अधिकारी दिवाकर त्रिपाठी यह वाकया सुनाते हुए अजब उत्साह से भर उठते हैं। वह बताते हैं कि तब छाती चौड़ी हो गयी थी यह सोच कर कि हमारे कैडर में भी ऐसा निर्भीक अधिकारी है। दिवाकर त्रिपाठी तब नये-नये पीसीएस हुए थे। सिस्टम से टकराना एक आम आदमी का मुश्किल होता है तो श्रीलाल जी तो नौकरशाह थे। पर वह सिस्टम से बार-बार टकराना जानते थे। टकराते ही थे। ‘मकान’ और ‘विश्रामपुर का संत’ जैसी रचनाओं में भी उनकी यह टकराहट की आंच अपनी पूरी त्वरा में उपस्थित है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि श्रीलाल जी के रागदरबारी का शिवपालगंज अधिकांशत: गोरखपुर की तहसील बांसगांव का है। जहां वह 1956-58 में एसडीएम रहे थे। लोग तो मोहनलालगंज का भी कयास लगाते हैं शिवपालगंज के बाबत।

हो सकता है कुछ मिट्टी मोहनलाल गंज की भी हो शिवपालगंज में पर बांसगांव की मिट्टी- पानी रागदरबारी के शिवपालगंज में कुछ ज्यादा है। लंगड़ या आटा चक्की वाले मास्टर साहब, वैद्य जी, पहलवान सब के सब चरित्र एक समय बांसगांव की हवा में तलाशे जा सकते थे। बल्कि कुछ सूत्र अभी भी शेष हैं। जैसे रंगनाथ अपने गांव जा रहा है। अंधेरा हो चुका है। सड़क पर से जब उसका ट्रक गुजरता है, तो रास्ते में सड़क किनारे शौच के लिए बैठी औरतें उठ खड़ी होती हैं। ऐसे गोया सलामी दे रही हों। औरतों का यह कष्ट अभी भी बदस्तूर है। हालांकि रागदरबारी जैसी किसी कृति को किसी बांसगांव या किसी मोहनलाल गंज के एक फ्रेम में कैद करना असंगत ही है, पर बातें तो होती ही है, उन्हें भला कैसे बिसरा दिया जाए। खैर।

रागदरबारी का पहला मंचन गोरखपुर में गिरीश रस्तोगी के नाट्य रुपांतरण और निर्देशन में किया गया। जिसे देखने श्रीलाल जी भी गोरखपुर पहुंचे थे। यहीं मैं उनसे पहली बार मिला भी। तब के मंचन से वह संतुष्ट नहीं थे। तो भी उसी नाट्य रुपांतरण पर बाद में दूरदर्शन पर एक धारावाहिक भी दिखाया गया। श्रीलाल जी इस धारावाहिक पर बहुत कुपित भी थे। कुछ विवाद भी हुआ। फिर उनकी किसी रचना पर कोई फिल्म या नाटक किया गया हो, मुझे याद नहीं आता। हां याद आती है उन की रंगत, उनकी रंगीनमिजाजी। वह जब सुर में आ जाते थे, गाने भी लगते थे। गालिब का एक बहुत मशहूर शेर है ‘आगे आती थी हाले दिल पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’ वह कई बार इस शेर की पैरोडी बना कर गाते थे ‘आगे आती थी एक इशारे पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’ कई बार तो अचरज होता था कि कितना तो वह संगीत के बारे में जानते हैं। संगीत ही क्यों, नाटक या किसी और कला पर, वह पूरा ठहर कर बोलते थे और अनायास ही। यह नहीं कि अपनी विद्वता बताने या जताने के लिए।

अचानक कोई प्रसंग आ जाता और वह एक से एक डिटेल देना शुरू कर देते कि मुंह खुला का खुला रह जाता। क्या संस्कृत क्या अंग्रेजी! जब वह धाराप्रवाह बोलने लगते तो लगता जैसे किसी हरहराती पहाड़ी नदी के बीच से आप गुजर रहे हों। और यह हरदम नहीं ही होता। होता कभी-कभी ही। घर जाने पर अकसर लोग चाय आदि से आप का स्वागत करते हैं। पर श्रीलाल जी अकसर मदिरा आदि से स्वागत करते। एक बार मैं भरी दोपहरी पहुंच गया उनके घर। दो किताबें छप कर आयी थीं, देने गया था। बहुत मना किया पर वह माने नहीं। कहने लगे कि दो किताबें लाए हैं तो कम से कम दो पैग तो होना ही चाहिए। मैंने ऑफिस जाने की आड़ ली। पर वह बोले, ‘कुछ नहीं, पान खा लीजिएगा।’ मैंने फिर भी हाथ जोड़े तो बोले, ‘ठीक है। पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।’ माननी पड़ी उनकी बात। हर बार कमोबेश ऐसा ही होता।

मदिरा प्रेम उनका खूब मशहूर है। तरह-तरह के किस्से हैं। वह जब 75 के हुए तो दिल्ली में बाकायदा समारोह मना कर हुए। लौटे तो कहने लगे कि अब प्रतिष्ठित मौत मिलेगी। नहीं पहले मर जाता तो लोग कहते कि शराबी था, मर गया! और कह कर हंसने लगे थे। मुझे याद है कि जब सफदर हाशमी की हत्या हुई थी तब मुख्यमंत्री का घर घेरने कुछ लेखकों और सांस्कृतिककर्मियों का जुलूस गया था। विरोध वक्तव्य श्रीलाल जी ने लिखा था। बहुत ही मारक और सरकार की धज्जियां उड़ाने वाला। पर जब पढ़ना हुआ तब तक वह मुश्किल में आ गये थे और वह वक्तव्य वीरेंद्र यादव ने पढ़ा। पर वह हाथ उठा-उठा कर अपना विरोध दर्ज करते रहे। लगातार। अभी इस साल भी जब एक साथ मेरे दो उपन्यास छप कर आये तो उन्हें देने गया। उस दिन कोई क्रिकेट मैच हो रहा था। वह लेटे-लेटे देख रहे थे। मैं चुपचाप बैठ गया। जब ब्रेक हुआ तब उनको नमस्कार किया। बेटे की मदद से वह उठे। और बैठ गये। फिर मैं ने जरा तेज आवाज में दो-तीन बार अपना नाम जोर- जोर से बता कर याद दिलाना चाहा उन्हें। वह अचानक नाराज हो गये। धीरे से बोले, ‘स्वास्थ्य खराब हुआ है, याददाश्त नहीं। जरा धीरे बोलिए सुन रहा हूं।’

फिर खुद ही बधाई देते हुए कहने लगे कि, ‘सुना है आप के दो उपन्यास आए हैं।’ मैं ने सिर हिलाते हुए कहा कि, ‘जी आपके लिए भी लाया हूं।’ उन्होंने अपने हाथ बढ़ा दिए। मैं भाग कर बाहर गया। गाड़ी से किताबें लाकर उनका नाम लिख कर उन्हें देने लगा तो वह फिर नाराज हो गये। कहने लगे, ‘आप मेरे लिए तो लाये नहीं थे। रख लीजिए मत दीजिए।’ मैंने उनसे क्षमा मांगी। कहा कि, ‘आप से मिलने की धुन में बाहर ही भूल गया था किताबें।' वह मुस्कुराए और कहने लगे, ‘अच्छा-अच्छा। तो भी रहने दीजिए। पढ़ने लायक अब नहीं रह गया हूं।’ तो भी मैंने उन्हें जब किताब दी तो उनके चेहरे पर निराशा आ गयी। बीते दिनों की याद में जाते हुए बोले, ‘सेलीब्रेट तो अब की नहीं हो पाएगा! माफ कीजिए। जश्न नहीं हो पाएगा।’ मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि, ‘कोई जरूरत भी नहीं है। आपको किताब दे दी यही जश्न है।’ वह मुस्कुरा कर रह गये। फिर वह देश दुनिया बतियाने लगे। बात राजनीति की आयी तो मुख्यमंत्रियों की भी। वह बोले, ‘अभी तक जितने मुख्यमंत्री मैंने देखे उनमें बेटर रामनरेश यादव ही थे। कम से कम बेइमान तो नहीं थे।’

उनका लोगों के बारे में विजन बहुत साफ होता था। ऐसे ही एक बार बात चली लखनऊ के लेखकों पर तो मैंने बात ही बात में चंद्रकिरण सोनरिक्सा का नाम ले लिया। वह नाम सुनते ही मगन हो गये। फिर मैंने उनके पति सोनरिक्सा जी का जिक्र किया। यह तब की बात है जब सोनरिक्सा जी की आत्मकथा पिंजरे की मैना नहीं आयी थी। मैंने जितना उनको जद्द-बद्द कहना था कहने लगा। उन्होंने प्रतिवाद किया। मैंने कहा कि, ‘आप के कैडर के हैं इसलिए आप उनका पक्ष ले रहे हैं।’ वह धीरे से बोले, ‘आप कभी मिले भी हैं उस आदमी से?' मैंने सिर हिला कर हां कहा और फिर शुरू हो गया। श्रीलाल जी सुनते-सुनते उठ कर खड़े हो गये। बोले, ‘मेरे साथ आइए।’ अंदर के अपने बेडरूम में ले गए। अपनी एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो दिखाई, जो पत्नी के साथ थी। फोटो दिखाते हुए बोले, ‘यह फोटो कैसी है?’ मैने फोटो गौर से देखी और मुंह से बेसाख्ता निकल गया, ‘बेमिसाल’ वह धीरे से बोले, ‘मेरी है इसलिए?’ मैंने कहा कि, ‘नहीं, फोटो भी बेमिसाल है।’ वह धीरे से बोले, ‘है ना!’ फिर जैसे उन्होंने जोड़ा, ‘यह उसी सोनरिक्सा ने खींची है।’ मैं चुप हो गया।

फिर वह सोनरिक्सा जी की फोटोग्राफी पर विस्तार से बतियाने लगे। फोटोग्राफी पर भी उनके पास अनेक विस्मयकारी जानकारियां थीं। मैं चकित था उनका यह रूप देख कर। अभी तक उनका संगीत और संस्कृत सुना था, अब फोटोग्राफी सुन रहा था। ठीक वैसे ही जैसे कभी साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित भगवतीचरण वर्मा पर लिखित पुस्तक पढ़ कर चकित हुआ था, अब फिर चकित हो रहा था। वह चले गये हैं इसका दुख भी भरपूर है पर इस बात का संतोष भी है कि उन्हें वह सब कुछ मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था। साहित्य अकादमी सम्मान तो उन्हें जवानी में ही मिल गया था, बाकी सम्मान भी। बस पद्मभूषण और ज्ञानपीठ में देरी जरूर हुई। और उन्होंने कहा भी कि हर्ष तो है पर रोमांच नहीं, तो ठीक ही कहा था। मुद्राराक्षस से उनके मतभेदों की र्चचा अक्सर चलती रही है। पर सच यह है कि मुद्राराक्षस के अध्ययन और उनकी जानकारी के जितने मुरीद श्रीलाल जी थे, कोई और नहीं।

बहुत समय पहले उनके गांव अतरौली गया था। यह कोई 1986 की बात है। श्रीलाल जी के बड़े भाई मिले, जो फौज से रिटायर हुए थे। हम कुछ पत्रकारों को प्रशासन द्वारा ले जाया गया था। विकास कार्यक्रमों का जायजा लेने के लिए। लेकिन श्रीलाल जी के गांव अतरौली में मोहनलालगंज से शुद्ध सड़क तक नहीं थी। लौट कर रिपोर्ट लिखने के पहले उनसे बात की और कहा कि आप के गांव की सड़क तक शुद्ध नहीं है। वह बेपरवाह हो कर बोले, ‘क्या पता! 22 साल से मैं भी नहीं गया हूं अपने गांव’। मैंने पूछा, ‘ऐसा क्यों?’ वह बोले, ‘क्यों क्या नहीं गया तो नहीं गया। होगी कोई बात!’ और वह टाल गये। ऐसे ही जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया। पर श्रीलाल जी टाल गये। मैंने पूछा, ‘यह प्रस्ताव क्यों टाल गये?’ वह बोले, ‘मुलायम अपने अधीन काम करवाना चाह रहे थे। मैंने उनसे कहा कि आप तो हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा दिए हुए हैं। तो उपाध्यक्ष बना रहे हैं कि अपना मातहत? यह नहीं हो पाएगा।’

अभी तो जाते-जाते श्रीलाल जी को ज्ञानपीठ मिला। पर जब उन्हें व्यास सम्मान मिला तो एक दिन ‘जश्न’ में थे। कुछ और लखटकिया पुरस्कार उन्हीं दिनों उन्हें मिले थे। तो कहने लगे कि, ‘इतना पैसा तो अब तक रायल्टी में भी मुझे नहीं मिला।’ मैंने कहा कि, ‘रागदरबारी तो आप का बेस्ट सेलर है।’ वह खीझ गये। बोले, ‘बेस्टसेलर नहीं मेरे गले में पत्थर बन कर लटका है। कोई रागदरबारी से आगे की बात ही नहीं करता!’ वह जरा रुके और बोले, ‘आप रायल्टी की बात कर रहे हैं? तो सुनिए रायल्टी की भी हकीकत! एक बार मैं दिल्ली गया। राजकमल की शीला संधु आईं मिलने। नयी किताब मांगने लगीं। बेटा साथ था। वह बोल पड़ा, ‘ 50 हजार रुपये एडवांस दे दीजिए।’ वह बोलीं, ‘ठीक है।’ दूसरे दिन उन्होंने 50 हजार रुपये भिजवा भी दिये। अब मैं खुश कि, ‘हिंदी के लेखक की इतनी हैसियत हो गयी है कि 50 हजार एडवांस भी मिलने लगा है एक किताब का। पर जल्दी ही यह गुमान टूटा। पता चला कि साल के आखिर में सारी किताबों की रायल्टी के हिसाब में वह 50 हजार माइनस हो गया था। कोई एक किताब का एडवांस नहीं था वह। ऐसे ही एक बार मन में आया कि छुट्टी ले कर पहाड़ पर चलूं और कुछ लिखूं। गया भी। पर जल्दी ही यह एहसास हो गया कि जो खर्चा होगा किताब लिखने पर प्रकाशक तो उतना भी नहीं देगा। और फिर लौट आया वापस।’

‘विश्रामपुर का संत’ लिखने वाले इस संत की इतनी बातें उमड़-घुमड़ कर सामने उपस्थित हो रही हैं कि अब क्या कहूं और क्या न कहूं कि स्थिति है। बस यही कह सकता हूं कि रागदरबारी का वह दरबार तोड़ने वाले श्रीलाल शुक्ल अब कोई दरबार तोड़ने के लिए हमारे बीच नहीं है। जो कि सिस्टम में रह कर भी सिस्टम तोड़ने की बात कर सके और कि कह सके-यह ठीक नहीं है। बंद कीजिए यह सब! साहित्यपुर के इस संत को शत-शत नमन! इसलिए भी कि रागदरबारी का वह रंगनाथ जो हम युवाओं में कभी गूंजता था, उसकी गूंज कभी जाने वाली तो है नहीं, वह अक्स कभी मिटने वाला तो है नहीं। न ही उस वैद्य की साजिशें, न लंगड़ की वह लड़ाई खत्म होने वाली है। वह सारी इबारतें समय की दीवार पर अभी भी चस्पा हैं जो श्रीलाल जी लिख गये हैं। उन का कथात्मक और व्यंग्यात्मक गद्य अभी भी हमारे सामने जस का तस उपस्थित है अपने पूरे वेग और वजन के साथ।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. इसे वहीं से साभार लिया गया है. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.