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साहित्यपुर के संत और उन के रंगनाथ की दुनिया

विश्रामपुर के संत ने जब आज अंतिम विश्राम ले ही लिया है तो यह सोचना लाजिमी हो गया है कि क्या श्रीलाल शुक्ल ही रंगनाथ भी नहीं थे? जी हां, मैं उनके रागदरबारी के नायक रंगनाथ की बात कर रहा हूं। सच यह है कि जब रागदरबारी मैंने पढ़ा था तब तो लगता था कि मैं भी रंगनाथ ही हूं। ‘पाव भर का सीना और ख्वाहिश सायराबानो की’ जैसे संवाद में धंसे व्यंग्य की धार और रंगनाथ के दर्पण में अपना अक्स देखना तब बहुत भला लगता था।

विश्रामपुर के संत ने जब आज अंतिम विश्राम ले ही लिया है तो यह सोचना लाजिमी हो गया है कि क्या श्रीलाल शुक्ल ही रंगनाथ भी नहीं थे? जी हां, मैं उनके रागदरबारी के नायक रंगनाथ की बात कर रहा हूं। सच यह है कि जब रागदरबारी मैंने पढ़ा था तब तो लगता था कि मैं भी रंगनाथ ही हूं। ‘पाव भर का सीना और ख्वाहिश सायराबानो की’ जैसे संवाद में धंसे व्यंग्य की धार और रंगनाथ के दर्पण में अपना अक्स देखना तब बहुत भला लगता था।

कई बार लगता था कि वैद्य जी से, उनकी मान्यताओं, उनकी उखाड़-पछाड़ से रंगनाथ ही नहीं, मैं भी टकरा रहा हूं। तो यह सिर्फ श्रीलाल जी के रचे पात्र रंगनाथ का जादू भर नहीं था, यह सिस्टम से टकराने का चाव भी था। उन दिनों तो हर युवा रंगनाथ ही था। कम से कम मेरे आसपास के युवा। उन दिनों विद्यार्थी था। प्रेमचंद के बाद अगर कोई आहट मन में भरता था तो कथा- कहानी में श्रीलाल जी और उनका रागदरबारी ही। हालांकि तब कविताएं लिखता था और धूमिल और दुष्यंत का रंग ज्यादा चटक था पर रागदरबारी का लंगड़ भी रह-रह कर सामने खड़ा हो जाता था। क्या तो चरित्र है लंगड़ का! वह लंगड़ जिसे कचहरी में नकल लेने के लिए रिश्वत नहीं देनी थी। चाहे जितने भी पापड़ बेलने पड़े। नकल नहीं मिलती है तो न मिले। सोचिए भला कि बिना रिश्वत दिये भला आज भी किसी को नकल मिल सकती है किसी कचहरी में?

वह लंगड़ आज भी दौड़ रहा है और नकल नहीं पा रहा। और रागदरबारी के समय कचहरी भर ही रिश्वत का प्रामाणिक स्थल थी। अब तो समूचा सिस्टम ही लंगड़ के खिलाफ खड़ा है। अब जहां भी जाएं कोई काम करवाने कचहरी का दस्तूर मुंह बाए खड़ा है। पहले नजराना, शुकराना था, अब जबराना है। जनता लंगड़ है और सारा सरकारी अमला कचहरी। यह प्रतीक और गहरा, और मारक, और यातनादायक बनता गया है। श्रीलाल जी के रागदरबारी का तंज तेग बन कर अब हमारे सामने उपस्थित है। कोई अब इसे हिला नहीं सकता। सरकारी नौकरी मे रहते हुए ऐसी कालजयी रचना लिखना आसान नहीं था। खतरे बहुत थे। पर श्रीलाल जी ने उठाये। बार-बार उठाये। रागदरबारी सीधे-सीधे सरकार और उसकी मशीनरी के खिलाफ बजाया गया बिगुल है, सिर्फ एक उपन्यास भर नहीं। और हम सब जानते हैं कि श्रीलाल जी प्रशासनिक अधिकारी थे। न सिर्फ लिखने में वरन व्यवहार में भी वह रंगनाथ ही थे। वह तब के दिनों पीसीएस अधिकारी थे।

तब का एक वाकया सुनिये। अब के दिनों की तरह तब भी पीसीएस एसोसिएशन की सालाना मीट थी। हेमवतीनंदन बहुगुणा तब मुख्यमंत्री थे। पीसीएस एसोसिएशन की मीट में कुछ मांगें रवायत के मुताबिक मानते हुए बहुगुणा जी ने ऐलान किया कि नगरपालिकाओं में प्रशासक का पद भी पीसीएस अधिकारियों को दिया जाएगा। और कि लखनऊ नगर पालिका का पहला प्रशासक श्रीलाल शुक्ल को नियुक्त किया जाता है। श्रीलाल शुक्ल फौरन उठ कर खड़े हो गये और मुख्यमंत्री से साफ तौर पर कहा कि, ‘क्या यह आप हमारे संवर्ग पर एहसान कर रहे हैं? कि भीख दे रहे हैं? अगर ऐसा है तो यह लीजिये और रखिये अपना यह पद अपने पास। हमें ऐसी बख्शीश नहीं चाहिये।’ यह सुनते ही लोग सकते में आ गये। सन्नाटा फैल गया पूरी सभा में। तब के मुख्यमंत्री बहुगुणा को हार मान कर कहना पड़ा कि, ‘यह पद कोई बख्शीश में नहीं दे रहे हम। यह आपका हक है।’

उस मीट में उपस्थित तब के एक अधिकारी दिवाकर त्रिपाठी यह वाकया सुनाते हुए अजब उत्साह से भर उठते हैं। वह बताते हैं कि तब छाती चौड़ी हो गयी थी यह सोच कर कि हमारे कैडर में भी ऐसा निर्भीक अधिकारी है। दिवाकर त्रिपाठी तब नये-नये पीसीएस हुए थे। सिस्टम से टकराना एक आम आदमी का मुश्किल होता है तो श्रीलाल जी तो नौकरशाह थे। पर वह सिस्टम से बार-बार टकराना जानते थे। टकराते ही थे। ‘मकान’ और ‘विश्रामपुर का संत’ जैसी रचनाओं में भी उनकी यह टकराहट की आंच अपनी पूरी त्वरा में उपस्थित है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि श्रीलाल जी के रागदरबारी का शिवपालगंज अधिकांशत: गोरखपुर की तहसील बांसगांव का है। जहां वह 1956-58 में एसडीएम रहे थे। लोग तो मोहनलालगंज का भी कयास लगाते हैं शिवपालगंज के बाबत।

हो सकता है कुछ मिट्टी मोहनलाल गंज की भी हो शिवपालगंज में पर बांसगांव की मिट्टी- पानी रागदरबारी के शिवपालगंज में कुछ ज्यादा है। लंगड़ या आटा चक्की वाले मास्टर साहब, वैद्य जी, पहलवान सब के सब चरित्र एक समय बांसगांव की हवा में तलाशे जा सकते थे। बल्कि कुछ सूत्र अभी भी शेष हैं। जैसे रंगनाथ अपने गांव जा रहा है। अंधेरा हो चुका है। सड़क पर से जब उसका ट्रक गुजरता है, तो रास्ते में सड़क किनारे शौच के लिए बैठी औरतें उठ खड़ी होती हैं। ऐसे गोया सलामी दे रही हों। औरतों का यह कष्ट अभी भी बदस्तूर है। हालांकि रागदरबारी जैसी किसी कृति को किसी बांसगांव या किसी मोहनलाल गंज के एक फ्रेम में कैद करना असंगत ही है, पर बातें तो होती ही है, उन्हें भला कैसे बिसरा दिया जाए। खैर।

रागदरबारी का पहला मंचन गोरखपुर में गिरीश रस्तोगी के नाट्य रुपांतरण और निर्देशन में किया गया। जिसे देखने श्रीलाल जी भी गोरखपुर पहुंचे थे। यहीं मैं उनसे पहली बार मिला भी। तब के मंचन से वह संतुष्ट नहीं थे। तो भी उसी नाट्य रुपांतरण पर बाद में दूरदर्शन पर एक धारावाहिक भी दिखाया गया। श्रीलाल जी इस धारावाहिक पर बहुत कुपित भी थे। कुछ विवाद भी हुआ। फिर उनकी किसी रचना पर कोई फिल्म या नाटक किया गया हो, मुझे याद नहीं आता। हां याद आती है उन की रंगत, उनकी रंगीनमिजाजी। वह जब सुर में आ जाते थे, गाने भी लगते थे। गालिब का एक बहुत मशहूर शेर है ‘आगे आती थी हाले दिल पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’ वह कई बार इस शेर की पैरोडी बना कर गाते थे ‘आगे आती थी एक इशारे पर हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती।’ कई बार तो अचरज होता था कि कितना तो वह संगीत के बारे में जानते हैं। संगीत ही क्यों, नाटक या किसी और कला पर, वह पूरा ठहर कर बोलते थे और अनायास ही। यह नहीं कि अपनी विद्वता बताने या जताने के लिए।

अचानक कोई प्रसंग आ जाता और वह एक से एक डिटेल देना शुरू कर देते कि मुंह खुला का खुला रह जाता। क्या संस्कृत क्या अंग्रेजी! जब वह धाराप्रवाह बोलने लगते तो लगता जैसे किसी हरहराती पहाड़ी नदी के बीच से आप गुजर रहे हों। और यह हरदम नहीं ही होता। होता कभी-कभी ही। घर जाने पर अकसर लोग चाय आदि से आप का स्वागत करते हैं। पर श्रीलाल जी अकसर मदिरा आदि से स्वागत करते। एक बार मैं भरी दोपहरी पहुंच गया उनके घर। दो किताबें छप कर आयी थीं, देने गया था। बहुत मना किया पर वह माने नहीं। कहने लगे कि दो किताबें लाए हैं तो कम से कम दो पैग तो होना ही चाहिए। मैंने ऑफिस जाने की आड़ ली। पर वह बोले, ‘कुछ नहीं, पान खा लीजिएगा।’ मैंने फिर भी हाथ जोड़े तो बोले, ‘ठीक है। पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।’ माननी पड़ी उनकी बात। हर बार कमोबेश ऐसा ही होता।

मदिरा प्रेम उनका खूब मशहूर है। तरह-तरह के किस्से हैं। वह जब 75 के हुए तो दिल्ली में बाकायदा समारोह मना कर हुए। लौटे तो कहने लगे कि अब प्रतिष्ठित मौत मिलेगी। नहीं पहले मर जाता तो लोग कहते कि शराबी था, मर गया! और कह कर हंसने लगे थे। मुझे याद है कि जब सफदर हाशमी की हत्या हुई थी तब मुख्यमंत्री का घर घेरने कुछ लेखकों और सांस्कृतिककर्मियों का जुलूस गया था। विरोध वक्तव्य श्रीलाल जी ने लिखा था। बहुत ही मारक और सरकार की धज्जियां उड़ाने वाला। पर जब पढ़ना हुआ तब तक वह मुश्किल में आ गये थे और वह वक्तव्य वीरेंद्र यादव ने पढ़ा। पर वह हाथ उठा-उठा कर अपना विरोध दर्ज करते रहे। लगातार। अभी इस साल भी जब एक साथ मेरे दो उपन्यास छप कर आये तो उन्हें देने गया। उस दिन कोई क्रिकेट मैच हो रहा था। वह लेटे-लेटे देख रहे थे। मैं चुपचाप बैठ गया। जब ब्रेक हुआ तब उनको नमस्कार किया। बेटे की मदद से वह उठे। और बैठ गये। फिर मैं ने जरा तेज आवाज में दो-तीन बार अपना नाम जोर- जोर से बता कर याद दिलाना चाहा उन्हें। वह अचानक नाराज हो गये। धीरे से बोले, ‘स्वास्थ्य खराब हुआ है, याददाश्त नहीं। जरा धीरे बोलिए सुन रहा हूं।’

फिर खुद ही बधाई देते हुए कहने लगे कि, ‘सुना है आप के दो उपन्यास आए हैं।’ मैं ने सिर हिलाते हुए कहा कि, ‘जी आपके लिए भी लाया हूं।’ उन्होंने अपने हाथ बढ़ा दिए। मैं भाग कर बाहर गया। गाड़ी से किताबें लाकर उनका नाम लिख कर उन्हें देने लगा तो वह फिर नाराज हो गये। कहने लगे, ‘आप मेरे लिए तो लाये नहीं थे। रख लीजिए मत दीजिए।’ मैंने उनसे क्षमा मांगी। कहा कि, ‘आप से मिलने की धुन में बाहर ही भूल गया था किताबें।' वह मुस्कुराए और कहने लगे, ‘अच्छा-अच्छा। तो भी रहने दीजिए। पढ़ने लायक अब नहीं रह गया हूं।’ तो भी मैंने उन्हें जब किताब दी तो उनके चेहरे पर निराशा आ गयी। बीते दिनों की याद में जाते हुए बोले, ‘सेलीब्रेट तो अब की नहीं हो पाएगा! माफ कीजिए। जश्न नहीं हो पाएगा।’ मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि, ‘कोई जरूरत भी नहीं है। आपको किताब दे दी यही जश्न है।’ वह मुस्कुरा कर रह गये। फिर वह देश दुनिया बतियाने लगे। बात राजनीति की आयी तो मुख्यमंत्रियों की भी। वह बोले, ‘अभी तक जितने मुख्यमंत्री मैंने देखे उनमें बेटर रामनरेश यादव ही थे। कम से कम बेइमान तो नहीं थे।’

उनका लोगों के बारे में विजन बहुत साफ होता था। ऐसे ही एक बार बात चली लखनऊ के लेखकों पर तो मैंने बात ही बात में चंद्रकिरण सोनरिक्सा का नाम ले लिया। वह नाम सुनते ही मगन हो गये। फिर मैंने उनके पति सोनरिक्सा जी का जिक्र किया। यह तब की बात है जब सोनरिक्सा जी की आत्मकथा पिंजरे की मैना नहीं आयी थी। मैंने जितना उनको जद्द-बद्द कहना था कहने लगा। उन्होंने प्रतिवाद किया। मैंने कहा कि, ‘आप के कैडर के हैं इसलिए आप उनका पक्ष ले रहे हैं।’ वह धीरे से बोले, ‘आप कभी मिले भी हैं उस आदमी से?' मैंने सिर हिला कर हां कहा और फिर शुरू हो गया। श्रीलाल जी सुनते-सुनते उठ कर खड़े हो गये। बोले, ‘मेरे साथ आइए।’ अंदर के अपने बेडरूम में ले गए। अपनी एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो दिखाई, जो पत्नी के साथ थी। फोटो दिखाते हुए बोले, ‘यह फोटो कैसी है?’ मैने फोटो गौर से देखी और मुंह से बेसाख्ता निकल गया, ‘बेमिसाल’ वह धीरे से बोले, ‘मेरी है इसलिए?’ मैंने कहा कि, ‘नहीं, फोटो भी बेमिसाल है।’ वह धीरे से बोले, ‘है ना!’ फिर जैसे उन्होंने जोड़ा, ‘यह उसी सोनरिक्सा ने खींची है।’ मैं चुप हो गया।

फिर वह सोनरिक्सा जी की फोटोग्राफी पर विस्तार से बतियाने लगे। फोटोग्राफी पर भी उनके पास अनेक विस्मयकारी जानकारियां थीं। मैं चकित था उनका यह रूप देख कर। अभी तक उनका संगीत और संस्कृत सुना था, अब फोटोग्राफी सुन रहा था। ठीक वैसे ही जैसे कभी साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित भगवतीचरण वर्मा पर लिखित पुस्तक पढ़ कर चकित हुआ था, अब फिर चकित हो रहा था। वह चले गये हैं इसका दुख भी भरपूर है पर इस बात का संतोष भी है कि उन्हें वह सब कुछ मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था। साहित्य अकादमी सम्मान तो उन्हें जवानी में ही मिल गया था, बाकी सम्मान भी। बस पद्मभूषण और ज्ञानपीठ में देरी जरूर हुई। और उन्होंने कहा भी कि हर्ष तो है पर रोमांच नहीं, तो ठीक ही कहा था। मुद्राराक्षस से उनके मतभेदों की र्चचा अक्सर चलती रही है। पर सच यह है कि मुद्राराक्षस के अध्ययन और उनकी जानकारी के जितने मुरीद श्रीलाल जी थे, कोई और नहीं।

बहुत समय पहले उनके गांव अतरौली गया था। यह कोई 1986 की बात है। श्रीलाल जी के बड़े भाई मिले, जो फौज से रिटायर हुए थे। हम कुछ पत्रकारों को प्रशासन द्वारा ले जाया गया था। विकास कार्यक्रमों का जायजा लेने के लिए। लेकिन श्रीलाल जी के गांव अतरौली में मोहनलालगंज से शुद्ध सड़क तक नहीं थी। लौट कर रिपोर्ट लिखने के पहले उनसे बात की और कहा कि आप के गांव की सड़क तक शुद्ध नहीं है। वह बेपरवाह हो कर बोले, ‘क्या पता! 22 साल से मैं भी नहीं गया हूं अपने गांव’। मैंने पूछा, ‘ऐसा क्यों?’ वह बोले, ‘क्यों क्या नहीं गया तो नहीं गया। होगी कोई बात!’ और वह टाल गये। ऐसे ही जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया। पर श्रीलाल जी टाल गये। मैंने पूछा, ‘यह प्रस्ताव क्यों टाल गये?’ वह बोले, ‘मुलायम अपने अधीन काम करवाना चाह रहे थे। मैंने उनसे कहा कि आप तो हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा दिए हुए हैं। तो उपाध्यक्ष बना रहे हैं कि अपना मातहत? यह नहीं हो पाएगा।’

अभी तो जाते-जाते श्रीलाल जी को ज्ञानपीठ मिला। पर जब उन्हें व्यास सम्मान मिला तो एक दिन ‘जश्न’ में थे। कुछ और लखटकिया पुरस्कार उन्हीं दिनों उन्हें मिले थे। तो कहने लगे कि, ‘इतना पैसा तो अब तक रायल्टी में भी मुझे नहीं मिला।’ मैंने कहा कि, ‘रागदरबारी तो आप का बेस्ट सेलर है।’ वह खीझ गये। बोले, ‘बेस्टसेलर नहीं मेरे गले में पत्थर बन कर लटका है। कोई रागदरबारी से आगे की बात ही नहीं करता!’ वह जरा रुके और बोले, ‘आप रायल्टी की बात कर रहे हैं? तो सुनिए रायल्टी की भी हकीकत! एक बार मैं दिल्ली गया। राजकमल की शीला संधु आईं मिलने। नयी किताब मांगने लगीं। बेटा साथ था। वह बोल पड़ा, ‘ 50 हजार रुपये एडवांस दे दीजिए।’ वह बोलीं, ‘ठीक है।’ दूसरे दिन उन्होंने 50 हजार रुपये भिजवा भी दिये। अब मैं खुश कि, ‘हिंदी के लेखक की इतनी हैसियत हो गयी है कि 50 हजार एडवांस भी मिलने लगा है एक किताब का। पर जल्दी ही यह गुमान टूटा। पता चला कि साल के आखिर में सारी किताबों की रायल्टी के हिसाब में वह 50 हजार माइनस हो गया था। कोई एक किताब का एडवांस नहीं था वह। ऐसे ही एक बार मन में आया कि छुट्टी ले कर पहाड़ पर चलूं और कुछ लिखूं। गया भी। पर जल्दी ही यह एहसास हो गया कि जो खर्चा होगा किताब लिखने पर प्रकाशक तो उतना भी नहीं देगा। और फिर लौट आया वापस।’

‘विश्रामपुर का संत’ लिखने वाले इस संत की इतनी बातें उमड़-घुमड़ कर सामने उपस्थित हो रही हैं कि अब क्या कहूं और क्या न कहूं कि स्थिति है। बस यही कह सकता हूं कि रागदरबारी का वह दरबार तोड़ने वाले श्रीलाल शुक्ल अब कोई दरबार तोड़ने के लिए हमारे बीच नहीं है। जो कि सिस्टम में रह कर भी सिस्टम तोड़ने की बात कर सके और कि कह सके-यह ठीक नहीं है। बंद कीजिए यह सब! साहित्यपुर के इस संत को शत-शत नमन! इसलिए भी कि रागदरबारी का वह रंगनाथ जो हम युवाओं में कभी गूंजता था, उसकी गूंज कभी जाने वाली तो है नहीं, वह अक्स कभी मिटने वाला तो है नहीं। न ही उस वैद्य की साजिशें, न लंगड़ की वह लड़ाई खत्म होने वाली है। वह सारी इबारतें समय की दीवार पर अभी भी चस्पा हैं जो श्रीलाल जी लिख गये हैं। उन का कथात्मक और व्यंग्यात्मक गद्य अभी भी हमारे सामने जस का तस उपस्थित है अपने पूरे वेग और वजन के साथ।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. उनका यह लेख राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है. इसे वहीं से साभार लिया गया है. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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