आईआईएमसी अल्युमिनाई मीट के निहितार्थ और हास्‍टल की मेरी मांग

भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में बहुप्रतीक्षित अल्युमिनाई मीट यानी पूर्व छात्र सम्मेलन का आयोजन आईआईएमसी अल्युमिनाई एसोशिएसन द्वारा किया गया. मैं नियत समय पर संस्थान पहुंच गया. मेरी कक्षा (वर्ष 2007-08) के तीन विद्यार्थी वहां मौजूद थे. हल्की बूंदा-बांदी के बीच कार्यक्रम शुरू हुआ. इस कार्यक्रम को सफल बनाने में मेरे कई सीनियर और अनुज छात्रों ने महती भूमिका निभाई. पूरे समारोह के दौरान उनकी व्यस्तता देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि किसी भी कार्यक्रम को सफल बनाने में एड़ी-चोटी की मेहनत करनी पड़ती है.

आईआईएमसी में होने वाले किसी भी कार्यक्रमों का इंतजार संस्थान से शिक्षा प्राप्त कर चुके पूर्व छात्रों को होता है. ख़ासकर अल्युमिनाई मीट जैसे कार्यक्रम की प्रतीक्षा तो रहती ही है. अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो यह जरूर कह सकता हूं कि कोई भी पूर्व छात्र अगर वह दिल्ली या नजदीकी शहरों में रहते हैं, अगर कार्यक्रम के दिन उनकी विशेष व्यस्तता नहीं रहती है तो वे जरूर कोशिश करते हैं कि कुछ ही घंटे के लिए सही वे IIMC जरूर आएं. इस तरह के कार्यक्रमों में मैंने दो बार शिरकत की, हर दफा मुझे अलग-अलग तजुर्बा हासिल हुआ.

रविवार 17 फरवरी, 2013 को संपन्न हुए अल्युमिनाई मीट में मैं आखिरी समय तक मौजूद रहा. हालांकि इस बार मुझे आईआईएमसी के छात्रों को यथाशीघ्र हॉस्टल की सुविधा प्राप्त हो संबंधी मुद्दे की मांग मंच सभागार में उपस्थित सभी अग्रजों, अनुजों और संस्थान के वरीय अधिकारियों एवं अध्यापकों के समक्ष रखनी थी. इस बाबत जानकारी मैंने अपने फेसबुक वॉल पर भी पोस्ट लिखकर दिया था. लगभग छह साढ़े छह घंटे तक चले इस कार्यक्रम में काफी कुछ देखने और सुनने को मिला. छात्रावास के मुद्दे को मैं किस तरीके से उठाऊं, रह-रहकर यह सवाल मेरे जेहन में तैर रहा था.

मंच सभागार में अपनी सीट से खड़े होकर और बग़ैर अनुमति के अगर मैं इस मुद्दे पर अपनी बात कहना शुरू करता तो, शायद यह अनुशासनहीनता समझी जाती. लिहाजा दोपहर के भोजनावकाश से चंद मिनट पहले मैंने प्रोफेसर आनंद प्रधान जी से अनुरोध किया कि कृपया वे मुझे मंच से अपनी बात रखने के लिए सिर्फ दो मिनट का वक्त दें. उन्होंने मेरी भावनाओं को समझा और तत्काल मंच संचालक अग्रज साथियों से मुझे अपनी बात कहने दने के लिए कहा. मुझे छात्रावास के मुद्दे पर बोलने के लिए समय दिया गया और मैंने अपनी बात दो-ढ़ाई मिनट में प्रकट कर दी. निःसंदेह आईआईएमसी पत्रकारिता प्रशिक्षण का एक प्रतिष्ठित संस्थान है. जेएनयू की गोद में बसा यह संस्थान न सिर्फ अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है, बल्कि आज की तारीख में यहां से अध्ययन कर चुके छात्र देश-विदेश के शीर्ष मीडिया घरानों में अच्छी जगहों पर है.

आज आईआईएमसी में सब कुछ है, यहां कि तक कि ढेंकनाल (उड़ीसा) के अलावा अमरावती, ऐजौल और श्रीनगर में भी इस संस्थान के नए कैंपस बन चुके हैं. इन सभी जगहों पर छात्र और छात्राओं को छात्रावास की सुविधा है. वहीं मुख्य परिसर नई दिल्ली में लड़कों को हॉस्टल की सुविधा नहीं है. नब्बे के दशक तक यहां छात्र-छात्रा दोनों को यह सुविधा प्राप्त थी. करीब 23 वर्षों से आईआईएमसी नई दिल्ली के छात्रों को वंचित रखा गया है. आश्चर्य की बात यह है कि कोई भी इसकी सही वजह बताना नहीं चाहता. ऐसा नहीं है कि छात्रावास का मुद्दा मैंने ही पहली बार उठाया है. मेरे से पूर्व कई सीनियर बैच के छात्रों ने भी अध्यापकों और संस्थान के वरीय अधिकारियों से इस मुद्दे पर बात की, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला. हॉस्टल विहीन छात्र शाम में पढाई खत्म करने के बाद जेएनयू हॉस्टलों का रुख करते हैं, खासकर पूर्वांचल हॉस्टल की ओर वे जल्दी कूच करते हैं, इसलिए कि सबसे नजदीकी हॉस्टल वही है.

मैं वर्ष 2007-08 सत्र में हिंदी पत्रकारिता संकाय का छात्र था. पहली बार उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली महानगर आया था. यहां नामांकन कराने के बाद किसी पूर्व छात्र ने मशविरा दिया कि शाम का खाना और सुबह का नाश्ता जेएनयू के हॉस्टल में कर लिया करो, क्योंकि यहां शुद्ध और सस्ता भोजन मिलता है. मैंने उनसे पूछा कि, मैं तो वहां का छात्र नहीं हूं, फिर वे मुझे क्यों खाना खाने की इज़ाजत देंगे. उन्होंने कहा कि फिक्र नहीं करो, मैंने भी ऐसा ही किया और पूर्व के छात्रों ने भी इसी तरह अपने भोजन की व्यवस्था की थी. उनकी सलाह मानने के सिवा मेरे पास औऱ विकल्प नहीं था, क्योंकि मुनिरका में एक छोटा का कमरा किराए का था, उसमें भी एक रूम पार्टनर, इसलिए खुद से खाना बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकता था.

खैर, धीरे-धीरे जेएनयू के हॉस्टलों में मुंह छुपाकर खाना खाना मेरी आदतों में शुमार हो चुका था. मैं आईआईएमसी का अकेला ऐसा छात्र नहीं था, बल्कि पेट पूजन के इस अभियान में कई छात्र और थे. इसलिए यह शर्मनाक क्षण भी एक नया अनुभव सा लगने लगा. हां, कभी-कभी जेएनयू हॉस्टल के कैंटीन संचालक खाना देने से मना कर देते थे, तब घोर निराशा होती थी और पैदल चलकर दूसरे हॉस्टल में खाने पर टूट पड़ता था. कभी-कभी यह बात दिल को सालने लगती थी. एक दिन मैंने संस्थान की तत्कालीन निदेशक स्तुति कक्कड़ से इस बाबत चर्चा की. हालांकि संस्थान में उनका दर्शन दुलर्भ होता था. एक दिन संस्थान के मुख्य द्वार पर मुझे दिख गईं और मैंने बिना मौका गवांए उनसे कहा कि मैडम आखिर हम लोगों को हॉस्टल क्यों नहीं दिया जा रहा है.

उन दिनों मुरली की दुकान के नीचे नया छात्रावास बन रहा था. चावला सर से अक्सर पूछा करता था कि सर, क्या ये नया हॉस्टल बनने के बाद लड़कों को मिल जाएगा. वे हमेशा छात्रों का दर्द समझते थे, इसलिए मेरे चेहरे को पढ़ते हुए कहा करते थे, हां बेटा जल्दी ही हॉस्टल मिल जाएगा. इतना ही नहीं दोपहर लंच के समय कभी-कभी नीचे उतरकर राजमिस्त्री से पूछता था, कि भाई साहब यह हॉस्टल कब तक बन जाएगा? उनका जवाब होता था, संस्थान चाहे तो जल्द ही इमारत खड़ी हो जाएगी. देखते ही देखते सत्र समाप्त हो गया और हॉस्टल में रहने की तमन्ना अधूरी ही रह गई. आज वह नया हॉस्टल बन चुका है, लेकिन उसमें भी लड़कों की जगह लड़कियों को जगह दी गई है. मुझे आईआईएमसी से शिक्षा प्राप्त किए पांच साल हो गए, लेकिन आज भी किसी नए बैच के छात्रों को देखता हूं तो, उनकी जगह खुद को पाता हूं. सभी पूर्व और मौजूदा छात्र चाहते हैं कि आईआईएमसी नई दिल्ली में पढ़ने वाले लड़कों को भी छात्रावास मिले, लेकिन यह कैसे मिले इस बारे में हम सभी को सोचने की जरूरत है.

आईआईएमसी अल्युमिनाई मीट 2013 मुझे एक अच्छा मौका दिखा, इसलिए मैंने मंच से छात्रावास की जरूरत पर अपनी बात कही. मैं जानता हूं कि मंच से अपनी मांग रख देने मात्र से ही छात्रावास मिलने वाला नहीं. इसके लिए जरूरी है कि हम सभी को संस्थान के निदेशक और मंत्रालय से बात करनी होगी. उससे भी बात नहीं बनेगी तो इस बाबत आरटीआई के तहत संस्थान से जवाब मांगना होगा. अगर संस्थान के वरीय अधिकारी फिर भी छात्रों की अनदेखी करते हैं तो, उसके बाद कलम उठाना पड़ेगा. हालांकि मुझे नहीं लगता कि ऐसी नौबत आएगी? आज आईआईएमसी में छात्रावास का मुद्दा एक बड़ा सवाल है. इस मसले पर सभी पूर्व छात्रों को एक साथ मांग करनी चाहिए, ताकि संस्थान के छात्रों को खाना खाने और सिर छुपाने के लिए मशक्कत न करनी पड़े. इसलिए दिनकर जी की पंक्तियों के साथ अपनी बात का अंत करना चाहता हूं- जो तटस्थ है समय लिखेगा, उसका भी अपराध.

लेखक अभिषेक रंजन सिंह आईआईएमसी के पूर्व छात्र हैं. इनसे संपर्क मो. 9313174426 के जरिए किया जा सकता है.

थी..हूं..रहूंगी के लिए वर्तिका नंदा को ऋतुराज सम्मान

डॉ.वर्तिका नंदा को प्रतिष्ठित परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित किया गया है.  वर्तिका जी को यह सम्मान उनके कविता संग्रह 'थी.. हूं… रहूंगी' के लिए मिला। सम्मान समारोह दिल्ली में हुआ। यह कविता संग्रह महिला अपराध पर आधारित है। इस विषय पर लिखा जाने वाले यह अपने तरह का अनूठा कविता संग्रह है। हर साल यह सम्मान दिया जाता है। वर्तिका नंदा को पुरस्कार देने का निर्णय तीन सदस्यी निर्णायक मंडल ने की। इसमें राजनारायण बिसारिया, डा. अजित कुमार और डॉ. कैलाश वाजपेयी शामिल थे।

इससे पहले विजय किशोर मानव, डा. अनामिका, नरेश सक्सेना, बालस्वरूप राही, पवन करण व विष्णु नागर आदि परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। परंपरा ऋतुराज सम्मान के साथ एक लाख रुपये की राशि भी दी जाती है।  डॉ. वर्तिका नंदा इस कविता संग्रह को लेकर पिछले काफी वक्त से उत्साहित रही हैं. अपने कविता संग्रह के बारे में उन्होंने कहा कि, थी ..हूं..रहूंगी की कहानी अपने आप में एक अलग तरह की रचना है. बतौर वर्तिका, "पिछले साल एक मरजानी मर गई और तब यह लगा कि कई बार मरते-मरते कोई औरत जब बच जाती है, तो बदल जाती है। अपराध की रिपोर्टिंग ने यही सिखाया और बताया। इस लिए इस बार अनायास ही कविताएं एक नए भाव के साथ उग आईं। वर्तिका आईआईएमसी की छात्रा रही हैं। मीडिया में लंबे वक्त तक सक्रिय रहने के बाद उन्होंने पढ़ाने के लिए आईआईएमसी को चुना। यहां वह कई सालों तक विद्यार्थियों को टीवी पत्रकारिता पढ़ाती रही हैं।