मैं सरकारी नौकर नहीं हूं, मुझे बोलने का अधिकार है : काटजू

नई दिल्‍ली : प्रेस काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि अक्सर ये बोला जाता है कि वो सरकारी कर्मचारी हैं इसलिए किसी के खिलाफ नहीं बोल सकते. काटजू ने कहा कि प्रेस काउंसिल के चेयरमैन पद पर रहते हुए भी उन्हें बोलने का अधिकार है. अंग्रेजी अखबार 'द हिन्दू' अखबार में लिखे लेख में काटजू ने कहा है कि कुछ लोगों की तरफ से लोगों के बीच ये भ्रम फैलाया जा रहा है इसीलिए उन्होंने ये जवाब दिया है.

काटजू के मुताबिक, 'प्रेस काउंसिल के चेयरमैन की नियुक्ति सरकार नहीं करती बल्कि इस पद के लिए चयन राज्य सभा के सभापति, लोकसभा स्पीकर और प्रेस काउंसिल के प्रतिनिधि करते हैं. इस कमेटी ने प्रेस काउंसिल अध्यक्ष के लिए मेरा चयन किया है, इसलिए मैं सरकारी कर्मचारी नहीं हूं. हर सरकारी कर्मचारी का कोई बॉस होता है, मेरा कोई बॉस नहीं है. स्वतंत्र कमेटी ने मुझे स्वतंत्र अधिकार दिए हैं.'

उन्‍होंने कहा, 'ये तर्क दिया जा सकता है कि मैं सरकार से सैलरी लेता हूं, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज को भी तो सरकार से ही तनख्वाह मिलती है तो क्या वे सभी सरकारी कर्मचारी हो गए और सरकार के खिलाफ कोई फैसला नहीं सुना सकते? कुछ लोग कह रहे हैं कि मैंने सिर्फ गैर कांग्रेसी सरकारों की आलोचना की है तो मैं उनको ये बताना चाहता हूं कि मैंने महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली की सरकार की भी आलोचना की है.' (एबीपी)

अब पाकिस्‍तानी अखबार में लेख लिखकर मोदी को घेरा काटजू ने

नई दिल्ली। प्रेस काउंसिसल के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने अब पाकिस्तान के अखबार में लिखे लेख में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। उन्होंने लेख में मोदी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनकी तुलना हिटलर से कर दी। काटजू अपने इस लेख से एक बार फिर बीजेपी के निशाने पर हैं। काटूज के इस लेख से आगबबूला बीजेपी ने कहा कि वह अब पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। बीजेपी ने इसे राष्ट्रविरोधी लेख करार दिया है।

गौरतलब है कि जस्टिस काटजू ने इससे पहले भारत के ही एक राष्ट्रीय दैनिक में लेख लिखकर मोदी पर निशान साधा था। इसके बाद बीजेपी और काटजू के बीच ठन गई थी। राज्यसभा में बीजेपी नेता अरुण जेटली ने तो जस्टिस काटजू को बर्खास्त करने की मांग कर डाली थी। काटजू का यह ताजा लेख पाकिस्तान के अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' में छपा है। लेख का हेडिंग है 'मोदी और 2002 का नरसंहार।' इस लेख में काटजू ने लिखा है, 'मोदी के समर्थक दावा करते हैं कि गुजरात में जो कुछ हुआ वह गोधरा में ट्रेन में 59 हिंदुओं की हत्या की तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। मैं इस कहानी पर यकीन नहीं करता। पहली बात यह अभी भी रहस्य है कि गोधरा में क्या हुआ था। दूसरी बात जो लोग भी गोधरा कांड के दोषी थे, उनकी पहचान होनी चाहिए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलने चाहिए। लेकिन इससे गुजरात के मुस्लिम समुदाय पर हमले को कैसे जायज ठहराया जा सा सकता है?'

काटजू आगे लिखते हैं, 'गुजरात की कुल आबादी में मुसलमान 9 पर्सेंट हैं। बाकी ज्यादातर हिंदू हैं। 2002 में मुसलमानों का नरसंहार किया गया, उनके घर जलाए गए और उन्हें कई तरीके से निशाना बनाया गया। 2002 में मुसलमानों की हत्या को तात्कालिक प्रतिक्रिया कहना नवंबर 1938 में जर्मनी के क्रिस्टालनाष्ट की घटना की याद दिलाता है। जब जर्मनी में पूरे यहूदी समुदाय पर हमला किया गया था। तब नाजी सरकार ने दावा किया था कि ये एक तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। लेकिन सच्चाई यह थी कि नाजी शासन ने योजनाबद्ध तरीके से उन्मादी भीड़ का इस्तेमाल कर इस घटना को अंजाम दिया था। मैं भारत के लोगों से अपील करता हूं कि अगर वह वाकई भारत के बारे में चिंतित हैं तो इन बातों का ख्याल रखें।' (एनबीटी)

जूं ने काटा नहीं कि केमिकल लोचा शुरू!

ए जूं पूरे हिंदुस्तान को काट लेकिन जज साहब को मत काट जू। तू काटेगी और जज साहब के उर्वर दिमाग़ में कुछ ना कुछ केमिकल लोचा होगा, केमिकल लोचा होगा तो बयानों के गोले फूटेंगे और यत्र-तत्र सर्वत्र गिरेंगे, कई लोग घायल होंगे। देश भर में खलबली मचेगी, न्यूज़ चैनल सबकुछ छोड़कर इसी गोलाबारी की ख़बर पर लाइव-लाइव खेलने लगेंगे। तेरे काटते ही जज साहब एकदम कटखने हो जाएंगे, इसलिए करबद्ध और कातर प्रार्थना है, और किसी को काट लेकिन जब साहब को मत काट जू।

जज साहब हर बात पर और बिना बात बोलते हैं। उस पर भी कमाल ये कि जब भी बोलते हैं, पॉलिटिकली इनकरेक्ट ही बोलते हैं। ये भला कैसे मुमकिन है? दुनिया का कोई भी गेंदबाज़ चाहकर भी एक ओवर में छह वाइड बॉल नहीं फेंक सकता, लेकिन जज साहब इतनी कंसिसटेंसी ना जाने कैसे मेंटेन कर लेते है? उन्हे पता होता है कि वो बोलेंगे और दुनिया राशन-पानी लेकर उनके पीछे पड़ जाएंगे। लेकिन जज साहब को इसकी तनिक भी परवाह नहीं। जैसे सूरज रोज़ ढलता है, जैसे चांद रोज़ निकलता है, जैसे रोज़ किसी ना किसी नये घपले-घोटाले की ख़बर आती है, वैसे ही जज साहब रोज़ बोलते हैं। जज साहब का इस तरह बोलना एक बहुत उलझा हुआ सवाल था, लेकिन रात-दिन गहन चिंतन और शोध के बाद इस नाचीज़ ने इस रहस्य का पता लगा लिया है कि जज साहब आखिर इतना क्यों बोलते हैं। इस शोध के साथ इस नाचीज़ ने यह भी साबित कर दिया है कि वो इस देश के 90 फीसदी नहीं बल्कि 10 फीसदी लोगों में है।

निष्कर्ष का संकेत उपर दिया जा चुका है। एक मच्छर के बाद एक जूं इस देश की असली समस्या है। यह जूं एक विशेष प्रजाति की है। यह जूं नेताओं और अफसरों के कानों पर रेंगने से तो साफ इनकार करती है, लेकिन मौका पाकर कुछ चिंतक किस्म के लोगों के सिर में जा छिपती है और मौका पाते की काट लेती है। जूं ने काटा नहीं कि केमिकल लोचा शुरू। बयानों के तीर ऑटोमैटिक वेपन की तरह चलने लगते हैं। पहला हमला इस देश की मूर्ख मीडिया पर, दूसरा हमला अहमक आवाम पर, तीसरा हमला जम्हूरियत के जमूरों पर। देश भर में भूचाल आ जाता है। लोग कहने लगते हैं कि जज साहब नौकरी यूपीए की करती हैं, लेकिन अंदाज़-ए-बयां एकदम दक्षिणपंथी है, ये लीजिये अगला बयान जज साहब मोदी जी पर दाग देते हैं। हमारी भी जय-जय तुम्हारी भी जय-जय के बदले सिर्फ क्षय-क्षय। जो सामने दिखा कर दी उसकी धुलाई। जूं के काटने से केमिकल लोचा जज साहब को हुआ है, लेकिन मारे दर्द के ना जाने कितने लोग काट जू काट जू चिल्ला रहे हैं।

जज साहब पर भले ही जूं का असर हो, लेकिन मुझे उनकी कई बातें ठीक लगती हैं। जज साहब सोशल मीडिया पर पाबंदी के सख्त ख़िलाफ हैं। जज साहब मुंह में माइक ढूंसे जाने के भी ख़िलाफ हैं। इन दोनों बातों पर मेरी सहमति है। फिर भी समझ नहीं आता कि उन्हे अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रतीक मानूं या इलीट के अहंकार का?

पत्रकार राकेश कायस्‍थ के एफबी वॉल से साभार.

काटजू को अपने पद की गरिमा का ख्‍याल रखना चाहिए : नीतीश

पटना : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने बारे में भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष माकेर्ंडय काटजू द्वारा की गई टिप्पणी पर बुधवार को सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि उन्हें पद की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए। बिहार विधानमंडल के संयुक्त सत्र के दौरान परसों दिए गए राज्यपाल के अभिभाषण पर वाद-विवाद के बाद आज सरकार की ओर से जवाब देते हुए नीतीश ने बिहार में प्रेस की आजादी को लेकर पीसीआई दल की रिपोर्ट को पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार बताते हुए अपने बारे में काटजू द्वारा की गई टिप्पणी पर आज सख्त ऐतराज जताया और कहा कि उन्हें पद की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए।

काटजू द्वारा बिहार के नीतीश की धनानंद और नंदवंश से तुलना किए जाने पर कहा ‘मुझे बहुत तकलीफ हुई है, इतिहास पढ़ने वालों को मालूम है कि धनानंद क्यों कहा गया किसी को’। उन्होंने कहा ‘हमारी धनानंद या नंदवंश से तुलना किस बात की, हम तो चांदी का चम्मच मुख में लेकर पैदा नहीं हुए’। नीतीश ने कहा, संभव कि कोई धनानंद बन सकता है। किसने अधिकार दिया है। किसी संवैधानिक संस्था के पद पर बैठे हुए व्यक्ति को क्या यह अधिकार है कि जो मर्जी में आए बोले और एक तरफा बोले।

नीतीश ने कहा कि वे सभी संवैधानिक संस्था का आदर करते हैं लेकिन यह परस्पर सम्मान और मर्यादा यह सभों पर लागू होती है। बिहार में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर काटजू द्वारा गठित तथ्य अन्वेषण दल के गठन की चर्चा करते हुए नीतीश ने कहा कि सांच को आंच क्या है, हम पर यह सब बंदरघुडकी नहीं चलेगी। उन्होंने कहा कि कौन से तथ्य अन्वेषण दल की बात कर रहे हैं। उनका नाम लेकर वे उनका पद बढ़ाना चाहते हैं। सारी दुनिया जानती है किनके साथ जुड़े हुए किनके लिए काम कर रहे हैं।

पीसीआई अध्यक्ष मार्केंडेय काटजू की गत वर्ष फरवरी में पटना विश्वविद्यालय की यात्रा का जिक्र करते हुए नीतीश ने कहा कि पटना कॉलेज के प्राचार्य ने विरोध किया और वे उनकी सरकार के खिलाफ भाषण देने लगे। उन्होंने कहा कि हम पर भाषण इसलिए दिया क्योंकि कि हमारा बेहतर पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं है। हम एक साधारण किसान वैद्य से हैं। नीतीश ने कहा ‘मान लिया काटजू जी आपके दादा कैलाशनाथ काटजू मध्य प्रांत के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता थे। शायद राज्यपाल और केंद में मंत्री भी रहे। लेकिन हमारे दादा गांव में रहने वाले एक किसान थे।

नीतीश ने कहा ‘‘कम से कम अपना नहीं तो जिन पदों पर आप रहे हैं उसकी गरिमा का तो ख्याल रखना चाहिए।’’ उन्होंने कहा ‘‘मेरे मन में किसी बात का अभिमान नहीं। मैं लोगों से सीखता हूं। आजतक एक भी क्षण इस बात का एहसास नहीं हुआ कि हम सत्ता में है बल्कि हमें यह एहसास हुआ है कि हमें जनता ने जिम्मेदारी दी है।’’ नीतीश कुमार ने कहा कि हम बोलते नहीं हैं, बदार्शत करते हैं और हम भगवान बुद्ध को मानते हैं, अपमान को झेलते हैं लेकिन सदन में कल प्रतिपक्ष के नेता ने इसकी चर्चा की तो आज उस पर बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी को अधिकार मिला हुआ है जो मर्जी में आए बोलते रहे, कोई पद की गरिमा का ख्याल नहीं।’’

उन्होंने कहा कि हमारे यहां भगवान बुद्ध के 2550वें परिनिर्वाण के अवसर पर उनकी स्मृति में बुद्ध स्मृति पार्क की स्थापना की गई है और नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से पुनर्जीवित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने काटजू के बारे में कहा कि उन्होंने गलत नम्बर डायल किया है और कहा कि जरा उनके कॉल डिटेल को देखा जाए कि वे किन लोगों से बातें कर रहें हैं या पीसीआई दल की रिपोर्ट किन लोगों को ईमेल किए गए। (एनडीटीवी)

काटजू कांग्रेस को खुश करने के लिए बयान दिया करते हैं?

नई दिल्ली। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू की नरेंद्र मोदी के खिलाफ टिप्पणी को लेकर बीजेपी पहले ही भड़की हुई थी, लेकिन जैसे ही काटजू के बचाव में कांग्रेस सामने आई, बीजेपी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। बीजेपी संसद के बजट सत्र में इस मुद्दे को जोरशोर से उठाने की तैयारी में है। मार्कंडेय काटजू के साथ कांग्रेस इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा हुआ मामला बता रही है, लेकिन बीजेपी सुनने को तैयार नहीं है। पार्टी ने उनपर इस्तीफे का दबाव भी बढ़ा दिया है तो क्या सियासी टिप्पणी करने वाले मार्कंडेय काटजू अपने पद से इस्तीफा देंगे?

नरेंद्र मोदी के खिलाफ मार्कंडेय काटजू की टिप्पणी से आगबबूला बीजेपी इस मुद्दे को गुरुवार से शुरु होने वाले बजट सत्र में उठा सकती है। लालकृष्ण आडवाणी के घर मंगलवार को हुई कार्यकारी समिति की बैठक में पार्टी ने रणनीति तैयार कर ली है। बीजेपी की मांग है कि या तो मार्कंडेय काटजू प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दें या फिर सरकार उन्हें पद से हटाए। बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद के मुताबिक जिस तरह काटजू कांग्रेस के हाथों में खेल रहे हैं। जुडिशियल पोस्ट पर बैठा आदमी जो पीसीआई का चेयरमैन है। क्या वो राजनीति कर सकता है? अगर काटजू को राजनीति करनी है तो या तो वो इस्तीफ़ा दें या उन्हें हटाया जाए।

वहीं मार्कंडेय काटजू का दावा है कि उन्होंने अंग्रेजी अखबार में मोदी के खिलाफ अपील एक आम आदमी की हैसियत से की थी। वो एजेंडा में स्वीकार कर चुके हैं कि अखबार में छपे लेख के साथ उनके नाम के आगे प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन पद का जिक्र नहीं होना चाहिए था। सवाल ये है क्या काटजू ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया? काटजू के बचाव में खड़ी कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी बेवजह मामले को तूल दे रही है। काटजू ने जो कुछ लिखा वो अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में रहकर लिखा है।

वैसे जस्टिस काटजू पहले भी विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहे हैं। वो देश की 90 फीसदी आबादी को बेवकूफ करार दे चुके हैं। मीडिया में अखिलेश सरकार की आलोचना को उन्होंने गलत ठहराया और ममता बनर्जी के कामकाज पर उन्होंने अजीबगरीब टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से रिटायर होने के 15 दिनों के अंदर काटजू प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन बन गए थे। अब बीजेपी यही सवाल उठा रही है कि गैर कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ काटजू क्या कांग्रेस को खुश करने के लिए बयान दिया करते हैं? (आईबीएन)

दीपक चौरसिया को ‘गेट आउट’ कह दिया काटजू ने… देखें वीडियो

इस देश की राजनीति और मीडिया में गरमी छाई हुई है. इंडिया न्‍यूज, दीपक चौरसिया और जस्टिस काटजू लगातार चर्चा में हैं. इंडिया न्‍यूज और दीपक अरविंद केजरीवाल के बारे में खुलासे कर रहे हैं तो काटजू बीजेपी नेता अरुण जेटली से भिड़े हुए हैं. पर आज एक इंटरव्‍यू के दौरान जस्टिस मार्कंडेय काटजू इंडिया न्‍यूज के एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया पर भड़क गए. भड़क ही नहीं गए बल्कि दीपक को व्‍यवहार सीखने की बात कहते हुए उन्‍हें गेट आउट तक कह दिया.

दीपक चौरसिया कल दोपहर में अपने न्‍यूज चैनल इंडिया टीवी के लिए पीसीआई अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू का इंटरव्‍यू करने गए थे. जस्टिस काटजू गुजरात और नरेंद्र मोदी के एक मामले में लेख लिखने के बाद से अरुण जेटली से भिड़े हुए हैं. दीपक चौरसिया और इंडिया न्‍यूज को भी उम्‍मीद रही होगी कि इससे चैनल के व्‍यूवर की संख्‍या बढ़ेगी, परन्‍तु इंटरव्‍यू के दौरान जस्टिस काटजू जवाब दे रहे थे तो दीपक चौरसिया ने कह दिया कि जस्टिस काटजू आप अधूरा सच बता रहे हैं.

इतना सुनते ही जस्टिस काटजू भड़क गए. उन्‍होंने दीपक से कहा कि अगर इंटरव्‍यू लेना है तो अच्‍छा व्‍यवहार करना सीखिए, पर इस दौरान जस्टिस काटजू ने खुद शालीन व्‍यवहार प्रस्‍तुत नहीं किया. वे अगर चाहते तो शालीनता से भी अपनी बात रखते हुए इं‍टरव्‍यू देने से इनकार कर सकते थे, परन्‍तु उन्‍होंने अपना धैर्य खोया और दीपक चौरसिया जैसे वरिष्‍ठ पत्रकार को गेट आउट कहने से भी नहीं चूके. नीचे देखिए वो वीडियो जिसमें जस्टिस काटजू दीपक पर भड़क गए.

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/666/media-world/dipak-chaurasia-pe-bhadke-katju.html

वीडियो देखने के लिए उपरोक्त लिंक या तस्वीर पर क्लिक कर दें.

क्‍या कांग्रेस के एजेंट हैं जस्टिस काटजू?

नई दिल्‍ली : जस्टिस काटजू-बीजेपी विवाद में कांग्रेस खुलकर काटजू के साथ खड़ी हो गई है. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मारकण्डेय काटजू ने अपने एक लेख में गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर से की थी. इसके बाद से काटजू बीजेपी नेताओं के निशाने पर हैं. कांग्रेस ने कहा है कि दंगों को लेकर मोदी का विरोध हर वर्ग करता है तो क्या सभी कांग्रेस के एजेंट हैं? कांग्रेस प्रवक्‍ता अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक, 'नरेंद्र मोदी की तो कई लोगों ने आलोचना की है तो क्या वो सभी कांग्रेसी हैं. क्‍या वे सभी कांग्रेस के एजेंट हैं?'

उधर, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अरुण जेटली पर निशाना साधने के लिए उनके गुजरात से राज्यसभा सांसद होने का मुद्दा उठाया इस तर्क के साथ कि वो मोदी का बचाव करके उनका एहसान चुका रहे हैं. गौरतलब है कि काटजू ने 15 फरवरी को 'द हिंदू अखबार' में लिखे अपने लेख में मोदी पर निशाना साधते हुए लोगों को जर्मनी के इतिहास से सीख लेने की सलाह दी थी.

काटजू के मुताबिक, 'जो लोग ये कहते हैं कि 2002 में गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में मुस्लिमों का कत्ल हुआ उन्हें जर्मनी में नवंबर 1938 में हुए वाकये को याद रखना चाहिए. तब जर्मनी में सभी यहूदी लोगों पर हमला हुआ था. नाजी सरकार ने दावा किया था कि एक यहूदी युवक ने पेरिस में जर्मन राजनयिक की जो हत्या की थी उसी की प्रतिक्रिया में यहूदियों पर हमला हुआ है. लेकिन सच तो ये है कि नाजी सरकार ने साजिश के तहत लोगों की भावनाओं को भड़काया और यहूदियों पर हमले करवाए.'

काटजू के इसी लेख के बाद अरुण जेटली ने उनसे इस्तीफा मांगते हुए उनके बारे में लिखा, 'जस्टिस काटजू की अपील पूरी तरह से राजनीतिक है. वो किसी कांग्रेसी से ज्यादा कांग्रेसी दिख रहे हैं.'

वहीं, बीजेपी मांग कर रही है कि जस्टिस काटजू प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष पद से इस्‍तीफा दें, लेकिन देश के मशहूर कानूनविद फली एस नरीमन ने इस विवाद के शुरू होने से पहले ही जस्टिस काटजू को भेजे ईमेल में उनकी तारीफ करते हुए लिखा था, 'मैं आपको फोन पर पहले ही बता चुका हूं कि 'द हिंदू' में छपे आपके लेख से हम कितने खुश हैं. मैं एक बार फिर से कहना चाहता हूं कि ये एक शानदार लेख है. ऐसा लेख वही शख्स लिख सकता है, जो मानवाधिकारों के समर्थन का सिर्फ दिखावा नहीं करता, बल्कि अपने जीवन के हर क्षण में उसे जीता है'. (एबीपी)

काटजू-जेटली के फटे में दिग्‍गी राजा ने घुसाई टांग

नई दिल्ली : कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख मार्कण्डेय काटजू की आलोचना के लिए भाजपा नेता अरूण जेटली पर हमला बोलते हुए उनकी आलोचना को ‘अनावश्यक और अजीब’ बताया। जेटली ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करने पर काटजू को आड़े हाथों लिया था।

सिंह ने एक बयान में जेटली द्वारा उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश काटजू की आलोचना को लेकर आश्चर्य जाहिर करते हुए कहा कि काटजू ने गुजरात में विकास को लेकर एक समाचारपत्र में अपने लेख में जो कहा वह सार्वजनिक रूप से आधिकारिक सूत्रों से मिले तथ्यों पर आधारित है। सिंह ने अपने बयान में कहा कि मैं न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू के खिलाफ अरूण जेटली के अनावश्यक और अजीब बयान से पूरी तरह आश्चर्यचकित हूं। (एजेंसी)

कांग्रेसी नेताओं से भी ज्‍यादा कांग्रेसी हैं काटजू : अरुण जेटली

नई दिल्ली। बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने बिहार और गुजरात सरकारों को निशाना बनाने के लिए प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू की आलोचना की है और उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा है। इस पर काटजू ने पलटवार करते हुए कहा है कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली को इस्तीफा दे देना चाहिए। क्योंकि वो राजनीति के लिए अयोग्य हैं। अरुण जेटली ने बीजेपी की बेवसाइट पर गैर-कांग्रेसी राज्यों पर काटजू के निशाना साधने के बारे में लिखा कि ऐसा लगता है कि काटजू रिटायरमेंट के बाद नौकरी देने वालों का धन्यवाद दे रहे हैं।

जेटली ने कहा कि कि चाहे पश्चिम बंगाल, बिहार या गुजरात की गैर-कांग्रेसी सरकार हो, काटजू हमेशा इनके बारे में अंगुली उठाते रहे हैं। जेटली ने कहा कि ये किसी कांग्रेसी नेता से भी ज्यादा कांग्रेसी है। इधर, काटजू ने जेटली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बीजेपी नेता ने आधा सच ही सामने रखा है और वह निजी हमले को लेकर काफी नीचे उतर आए हैं। काटजू ने कहा, जब फेसबुक प्रकरण को लेकर दो लड़कियों की गिरफ्तारी हुई थी, तब मैंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की भी आलोचना की थी। मैंने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को भी उस वक्त नोटिस जारी किया, जब उन्होंने एक मीडियाकर्मी को कैमरा तोड़ने की धमकी दी थी। इसलिए मैंने कांग्रेसी सरकार की भी आलोचना की है।

ताजा विवाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में एक अंग्रेजी दैनिक में जस्टिस मार्कंडेय काटजू के लिखे लेख के बाद पैदा हुआ। काटजू ने लेख में नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए देश के लोगों से अपील की है कि वे सोच-समझकर प्रधानमंत्री चुनें। (आईबीएन)

टीवी चैनल दूध के धुले नहीं कि उनका नियमन न हो : काटजू

: काटजू ने एन के सिंह को पत्र लिखकर पूछा सवाल : नई दिल्ली : प्रिंट-इलेक्ट्रानिक मीडिया की कार्य कुशलता व मीडियाकर्मियों की योग्यता पर नकारात्मक टिप्पणी कर विवादों में घिरे भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कडेय काटजू ने सोमवार को टीवी चैनलों की निष्पक्षता-विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया।

उन्होंने समाचार प्रसारण सेवा के आत्म नियमन संबंधी तर्क को नकारते हुए कहा, आत्म नियमन कोई नियमन नहीं होता। क्या आप इतने दूध के धुले हैं कि आपके सिवाए कोई और आपका नियमन नहीं कर सकता। यदि ऐसा है तो पेड न्यूज, राडिया टेप आदि क्या हैं। यदि चैनल प्रेस परिषद के तहत नहीं आना चाहते तो उन्हें लोकपाल जैसी अन्य संस्था चुननी पड़ेगी।

काटजू का कहना है कि समाचार संगठन निजी संगठन होते हैं जिनकी गतिविधियों का जनता पर व्यापक असर पड़ता है, उन्हें भी जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। इलेक्ट्रानिक चैनल यह कैसे कह सकते हैं कि वे किसी के प्रति नहीं सिर्फ अपने प्रति जवाबदेह हैं। रविवार को काटजू ने न्यूज ब्राडकास्टिंग एसोसिएशन सचिव एन के सिंह को पत्र लिखकर उनसे पूछा था कि क्या समाचार प्रसारणकर्ता लोकपाल के तहत आने के इच्छुक हैं। काटजू ने लिखा, मैं जानना चाहता हूं कि क्या न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन, जिसके संभवत: आप सचिव हैं, लोकपाल के तहत आना चाहते हैं। लोकपाल का गठन संसद के शीतकालीन सत्र में किया जाना प्रस्तावित है। आप भारतीय प्रेस परिषद के तहत आने के अनिच्छुक जान पड़ते हैं। क्या आप लोकपाल के तहत आने के लिए भी अनिच्छुक हैं।

उन्होंने कहा, आप आत्म नियमन के अधिकार का दावा करते हैं। क्या मैं आपको याद दिला सकता हूं कि सुप्रीमकोर्ट एवं हाईकोर्ट के जजों तक के पास पूर्ण अधिकार नहीं होते। कदाचार के लिए उन पर भी महाभियोग चल सकता है। महाभियोग के कारण हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश और एक न्यायाधीश ने हाल में इस्तीफा दिया था। काटजू ने कहा, वकील बार कांउसिल के तहत आते हैं और पेशेवर कदाचार के कारण उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। इसी तरह, डाक्टर मेडिकल कांउसिल, चार्टर्ड एकाउंटेंड अपनी काउंसिल के तहत आते हैं। तो फिर आपको लोकपाल या किसी ऐसे अन्य नियामक प्राधिकरण के तहत आने से आपत्ति क्यों होनी चाहिए।

उन्होंने अपने पत्र में कहा, हाल के अन्ना हजारे आंदोलन को मीडिया में व्यापक प्रचार दिया गया। अन्ना की मांग क्या है। यही कि नेताओं, नौकरशाहों, न्यायाधीशों आदि को जनलोकपाल विधेयक के तहत लाया जाए। आप किस तर्क के साथ लोकपाल के दायरे से बाहर रखे जाने के दावा कर रहे हैं। आपने आत्म नियमन का दावा किया है। इसी तर्क के अनुसार नेता, नौकरशाह आदि भी आत्म नियमन का दावा करेंगे। साभार : एजेंसी

हिटलर जैसा बर्ताव करने वाला मीडिया आईना देखे : काटजू

नई दिल्ली : मीडिया पर देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का आरोप लगा चुके भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू ने इस बार भारतीय मीडिया को आईना देखने की सलाह दी है। काटजू के पूर्व के बयानों पर पत्रकारों के संगठन द्वारा आपत्ति दर्ज कराने के बाद भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष ने इस बार कहा है कि मीडिया अपने अंदर भी झांक कर देखे। खास बात यह है कि उनके ताजा बयान को इंटरनेट पर काफी समर्थन मिल रहा है।

एक ऑनलाइन टिप्पणी में कहा गया है कि मीडिया का बर्ताव जर्मनी के तानाशाह हिटलर की तरह है। वह बिना किसी पुख्ता जानकारी के कुछ भी प्रकाशित कर देता है। गौरतलब है कि एक महीने पहले प्रेस परिषद के प्रमुख का पद संभालने वाले काटजू ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा था कि मीडिया के लोगों के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है। मीडिया देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का काम करता है। मुझे नहीं लगता कि उन्हें आर्थिक नीतियों, राजनीतिक सिद्धांतों, साहित्य और दर्शनशास्त्र की जानकारी होती है।

काटजू के बयान के समर्थन में पूर्व पत्रकार व मीडिया विश्लेषक वीके वरदराजन ने कहा कि काटजू ने सही परिप्रेक्ष्य में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं। मीडिया लोगों तक सूचनाएं पहुंचाने व समाज की बुराइयों से परिचित कराने की अपनी प्रतिबद्धता से विमुख हो चुका है। उसे अपना आत्म मूल्यांकन करना चाहिए। दूसरी ओर द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की महासचिव कूमी कपूर के मुताबिक, काटजू उन लोगों के लिए बहुत ही अपमानजनक रवैया अपना रहे हैं, जिनके साथ उन्हें अगले तीन वर्षों तक काम करना है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस काटजू द्वारा पत्रकारों पर की गई नकारात्मक टिप्पणियों से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए), न्यूज ब्रॉडकास्ट एसोसिएशन एंड प्रेस एसोसिएशन में काफी रोष है। साभार : जागरण