बिना सवाल का साक्षात्कार

तमाम कोशिशों और कई दिन के इंतजार के बाद श्रीमती उज्ज्वला शर्मा से इंटरव्यू का दिन, समय और जगह तय हो पाये थे। यह बात रही होगी सन् 2012 के मध्य किसी महीने की। जगह थी दक्षिणी दिल्ली में उज्जवला शर्मा का घर। समय दोपहर बाद यही कोई 3 बजे का रहा होगा। मुझे बात करनी थी डॉ. उज्ज्वला शर्मा से। बातचीत का मुद्दा था उज्ज्वला शर्मा और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एनडी तिवारी के बीच रहे निजी-संबंधों पर।

एनडी तिवारी और उज्ज्वला शर्मा की निजता से जन्म लेने वाले रोहित शेखर से। उस रोहित शेखर के भविष्य को लेकर जो जैविक पिता के नाम को खोजने के लिए वर्षों से कोर्ट-कचहरी के धक्के खा रहा था। बात करनी थी, श्रीमती उज्ज्वला शर्मा से उनके और एनडी तिवारी के उस अतीत की, जो कभी उन दोनो के जीवन का स्वर्णिम काल रहा होगा।

खैर छोड़िये मुद्दा और वजह पाठक समझ गये होंगे। ज्यादा भूमिका बनाने की कोई जरुरत महसूस नहीं करता हूं। क्योंकि भूमिका बांधने में वक्त तो जाया होता ही है, साथ ही विषय से भी लेखक भटकने लगता है। उज्ज्वला शर्मा को पहले कभी कहीं नहीं देखा था। चूंकि वो रोहित शेखर की मां और एनडी तिवारी की कभी सबसे विश्वासपात्र थीं। उनका बेटा रोहित पिता का नाम पाने की कानूनी लड़़ाई अदालतों में लड़ रहा था। एक पुरुष और एक महिला के बीच पनपे "अनाम" रिश्ते का बोझ, आखिर वो युवा कैसे अपने कंधों पर ढो रहा है, जिसका इन रिश्तों से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक ही नज़र नहीं आता। बस यही जिज्ञासा खींचकर उज्ज्वला शर्मा की देहरी तक ले गयी। उनकी कोख से जन्म लेने वाले रोहित शेखर का पिता कौन है? इस सवाल का जबाब भला उसकी मां (डॉ. उज्ज्वला शर्मा) से सटीक और दे भी कौन सकता था?

पहुंचा तो सही समय। सही जगह। सही इंसान के सामने। कोठी के दरवाजे पर श्रीमती उज्ज्वला शर्मा से भेंट हुई। पहली नज़र में अपना ही मन मानने को तैयार नहीं हुआ, कि सामने मौजूद महिला ही उज्ज्वला शर्मा है, जो कई साल से बेटे (रोहित शेखर) को पिता के नाम का ह़क दिलाने की लड़ाई लड़ रही है। मुझे ड्राइंग रुम में बैठाकर, उज्ज्वला शर्मा घर के अंदर चलीं गयीं। ड्राइंगरुम में वो वापिस लौटीं, तो उनके साथ एक बुजुर्ग महिला भी थीं, जोकि उज्ज्वला शर्मा का सहारा लेकर ही चल पा रही थीं। उज्जवला ने उनका संक्षिप्त परिचय दिया….

'संजीव जी ये मेरी मां हैं श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित। करीब 85 साल की हो चुकी हैं। मेरे और तिवारी जी (एनडी) के बीच क्या रिश्ते थे? और क्या है पूरा किस्सा रोहित के जन्म का…और रोहित द्वारा अपने जैविक पिता के नाम की अदालतों में चल रही लड़ाई का….आपको मुझसे (उज्ज्वला) ज्यादा यह (प्रभात शोभा) ज्यादा खुलकर बतायेंगी…ये जो बतायेंगी वो मैं भी आपको नहीं बता पाऊंगी….मैं हो सकता है कि अपने अतीत के बारे में कुछ भूल जाऊं…मेरी मां को मेरे अतीत के बारे में मुझसे ज्यादा याद है।'

जब तक उज्ज्वला शर्मा ने मां प्रभात शोभा को अपने कंधों का सहारा देकर सोफे पर इत्तमिनान से बैठा नहीं दिया, वे लगातार मां के संबंध में ही मुझे "ब्रीफ" करती रहीं। बिना यह सोचे-देखे, कि मैं उनकी बात सुन भी रहा हूं या नहीं। उज्ज्वला शर्मा मुझसे कुछ और कहें, इससे पहले ही उनकी मां बोल पड़ीं….तो हां आप जानना चाहते हैं उज्ज्वला शर्मा, एनडी तिवारी के करीबी रिश्तों और फिर उस रिश्ते से जन्म लेने वाले रोहित शेखर के अतीत का सच। मैं बताती हूं। अपनी भी कमजोरियां-कमियां और अपनी बेटी की भी कमजोरियां-कमियां। और एनडी की चालाकियों की सच्ची कहानी।

श्रीमती प्रभात शोभा पंण्डित को पहली नज़र में देखा और फिर चंद मिनट उन्हें जब सुना, तो अपने मन ही में उनसे सवाल करने का इरादा छोड़ दिया। सोचा कि जो महिला 85-86 साल की उम्र में इस कदर जिंदादिली से बोलने का दम रखती हैं, तो वो मेरे सवालों में से ही सवालों को जन्म देने का भी दम-खम रखती होंगी। और उनसे सवाल करने का इरादा छोड़ देने में ही भलाई समझी। चुप्पी साधकर उन्हें सुनने लगा। करीब एक घंटे चले "इंटरव्यू" के दौरान कई लम्हे ऐसे भी आये, जब उज्ज्वला शर्मा की मां ने ही मुझे टोंका.."अरे आप तो चुपचाप मुझे ही सुने जा रहे हैं। आप तो कुछ पूछ ही नहीं रहे हैं।"

उनके इस सवाल का मैंने छोटा सा जबाब दिया…"मुझे आपकी मुंह-जुबानी सुनने में ही आनंद आ रहा है। और ऐसा कुछ आप छोड़ ही नहीं रही हैं, अपनी और अपनी बेटी के अतीत के बारे में, जिससे संबंधित मैं कोई सवाल करुं।" इसके पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना था, कि जब सब-कुछ बिना मांगे ही मिल रहा है, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा झोली में आ रहा है, तो फिर बे-वजह बोलकर, आती हुई "खबर" को खुद ही वापिस भेजने की मूर्खता क्यों करुं?

करीब एक घंटे तक उज्ज्वला शर्मा की मां जिस तरह से अपने और अपनी बेटी के अतीत और उज्ज्वला शर्मा के एनडी तिवारी के संबंधों पर खुलकर बोलीं, तो ऐसा लगा कि उस दिन शायद मैं किसी का इंटरव्यू लेने नहीं गया था। या यूं कहूं कि गया तो इंटरव्यू लेने ही था, मगर सामने वाला मुझ पर भारी था…इसलिए चुप रहकर भी वो सब जानकारियां बटोर लाया, जो उज्ज्वला शर्मा-एनडी तिवारी के संबंधों के बाबत अब तक न तो किसी को पता थी, न अब आगे पता चल पायेंगी, श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित की मुंह-जुबानी। क्यों अब यह भद्र महिला इस मायावी दुनिया को छोड़कर जा चुकी हैं। मुझ अदना से इंसान को एक ऐसा "इंटरव्यू" देकर, जिस इंटरव्यू में कोई सवाल किया न गया हो, और जबाब मिलते रहे हों।

अपने सबसे लंबे और जहां तक मुझे याद आता है, अपने आखिरी इंटरव्यू में श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित ने जो कुछ बताया, अगर वो न बताना चाहतीं, तो शायद मैं उनके "जबाबों" के सवाल कम से कम इस जीवन में तो कभी भी तैयार नहीं कर पाता।

2 अगस्त सन् 1925 को लाहोर (पाकिस्तान) में जन्मीं श्रीमती प्रभात शोभा पण्डित को 31 जनवरी 2013 को गंभीर बीमारी के चलते दिल्ली के एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया था। 22 फरवरी 2013 को सुबह करीब साढ़े सात बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। श्रीमती शोभा पण्डित आर्य समाज के मशहूर नेता पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार की बेटी, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्राप्त वर्ल्ड कान्फ्रेंस फार रिलिजन एण्ड पीस के भारतीय अध्याय की संयोजक और अखिल भारतीय नशाबन्दी परिषद की अध्यक्ष  थीं।

लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

नभाटा में संजीव सक्सेना की खबर में संजीव भट्ट की फोटो

पत्रकारिता। यानि लोकतंत्र का चौथा खंभा। चौथा खंभा। यानि जिस पर गिर जाये, उसे कहीं का न छोड़े। मतलब। न जीने में और न मरने में। हां आज की पत्रकारिता का यही सच है। मैं भी इसी पत्रकारिता की कौम का कीड़ा हूं। मेरी तो गिनती कहीं नहीं होगी, उन बड़े-बड़े कीड़ों के सामने जिन्होंने, जिंदगी भर करा-धरा कुछ नहीं। समय गुजरा तो जबरदस्ती बैठ गये हैं, घेरकर "मठाधीश" की कुर्सी पर। हम पुराने हैं, इसलिए हमारे सामने, तुम (पत्रकारिता में आज की या मौजूदा पीढ़ी) कुछ नहीं हो, का राग अलापने।

जी हां इतना लिखने की जरुरत मुझे नहीं थी। न मेरे पास वाहियात विषय पर, कुछ लिखने के लिए वक्त है। लेकिन मीडिया के कुछ उन मठाधीशों ने लिखने को मजबूर कर दिया है, जो खुद से काबिल किसी को मानने को तैयार ही नहीं हैं। तो लीजिए देखिये नमूना। मीडिया जगत के इन्हीं में से कुछ कथित ठेकेदारों की निगरानी में पेश किये गये, इनकी अपनी कथित-अनुभवीपत्रकारिता का नमूना।

10 नवंबर 2011 के "नवभारत टाइम्स" नई दिल्ली संस्करण (एनसीआर, उत्तर-प्रदेश) का पेज नंबर 8 खोलिये। सीधे हाथ पर आधे पेज से नीचे खबर का शीर्षक पढ़िये। "संजीव की जमानत याचिका पर पुलिस को नोटिस"। अब आगे इस खबर को पढ़िये। खबर है लोकसभा में "कैश-फॉर-वोट" मामले में संजीव सक्सेना के बारे में।  खबर के मुताबिक कल तक अमर सिंह के करीबी रहे संजीव सक्सेना ने दिल्ली हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की। इस याचिका पर दिल्ली पुलिस को हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया है।

अब एक नज़र डालिये इसी खबर के बीच में लगी फोटो पर। ये फोटो है तो संजीव की है, लेकिन संजीव सक्सेना की नहीं। संजीव भट्ट की फोटो है। संजीव भट्ट भारतीय पुलिस सेवा(आईपीएस) के अधिकारी हैं। फिलहाल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जुबान खोलने का अंजाम भुगत रहे हैं। मुख्यमंत्री से सीधे भिड़ गये हैं। सो कोर्ट कचहरी के चक्कर में भी आ गये हैं। अब देखिये देश की राजधानी से छपने वाले इस अखबार की कलाकारी। जिसके संपादकीय प्रमुख जाहिर सी बात है, बीते कल की पत्रकारिता के काबिल ही रहे हों। क्या गुल खिला रही है अखबार में छपी ये खबर। खबर संजीव सक्सेना की और फोटो संजीव भट्ट की। जब अखबार में काबिलों की भरमार है, तो फिर इतनी बड़ी भूल क्यों और कैसे?

अब इसके पीछे दो तर्क हो सकते हैं। अपना अखबार। अपनी गलती। इसमें संपादक क्या करेगा? संपादक ने तो फोटो का चयन किया नहीं। जिसने फोटो लगायी है, उसे नोटिस देकर जबाब मांग लेंगे। दूसरा तर्क ये कि गलती इंसान से होती है। हो गयी गलती। अब क्या सिर कटवा दें या काट लें। जी नहीं। मैं इस पक्ष में नहीं हूं, कि बदहाल मौजूदा पत्रकारिता छिड़ी गला-काट जंग में कोई किसी का गला काटे। लेकिन सोचिये कि अगर ऐसी ही गलती किसी आम या खास इंसान से हो गयी होती (पत्रकारिता के क्षेत्र से बाहर)। तो अखबार उसे कैसे चटकारे लेकर छापता और बेचता। लेकिन गलती खुद से हुई है। तो बात भी अपनों तक ही सिमट जायेगी। या फिर बात ज्यादा बढ़ती नज़र आयेगी तो जिसने संजीव सक्सेना की जगह पर संजीव भट्ट की फोटो चिपकाई उसकी नौकरी खा ली जायेगी, या फिर उसे कहीं इधर उधर दफ्तर में ही किसी कोने में फेंक दिया जायेगा। इसलिए क्योंकि पत्रकारिता में गलती हमेशा छोटे ही करते हैं, बड़े और या फिर मठाधीश नहीं।

लेखक संजीव चौहान वरिष्‍ठ पत्रकार तथा चैनल न्‍यूज एक्‍सप्रेस में क्राइम एडिटर हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

वे एजुकेटेड हैं और परखने के बाद शादी कर रही हैं : बिट्टा कराटे

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ-आर) के चेयरमैन और पूर्व आतंकवादी फारुख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे घर बसाने जा रहे हैं। माशूका के साथ। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में खौफ का दूसरा नाम रहे बिट्टा करीब 16 साल देश की तमाम जेलों में रहे हैं। जम्मू में जेल तोड़कर भागने की कोशिश का मामला अभी भी बिट्टा कराटे पर चल रहा है।

बिट्टा की मंगेतर असाबा अर्जमंद खान पत्रकारिता में एमए हैं। असाबा जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं। मौजूदा वक्त में वह जम्मू कश्मीर के लोक प्रशासन विभाग में प्रशिक्षु-अधिकारी हैं।1 नवंबर 2011 को असाबा से निकाह होने से कुछ रोज पहले (4 अक्टूबर 2011 को) न्यूज-एक्सप्रेस चैनल के एडिटर (क्राइम) संजीव चौहान ने कश्मीर घाटी में बिट्टा कराटे से लंबी गुफ्तगू की। इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बिट्टा कराटे से उनकी निजी-जिंदगी (प्रेम-प्रसंग, शादी) पर भी खुलकर बातचीत हुई। पेश हैं इंटरव्यू के खास अंश-

– बिट्टा कराटे की नज़र में प्यार क्या है?

— प्यार के आगे कुछ भी नहीं है। प्यार इंसान ऊपर वाले से भी कर सकता है। मां, बहन, माशूका और बीबी से भी।

– बिट्टा कराटे के तो बीबी है नहीं, तो फिर प्यार किससे किया?

— नहीं। इंगेजमेंट है मेरी। इंगेजमेंट हो चुकी है।

– कैसे हुई इंगेजमेंट..मतलब किसके साथ?

— इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहूंगा।

– आप नाम मत खोलिये किसी का। मैं किसी का नाम खुलवाना नहीं चाहता। मैं ये जानना चाहता हूं कि सलाखों के पीछे, हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़े बिट्टा कराटे को कभी किसी से मोहब्बत हुई? प्यार हुआ!

— बाहर आकर (जेल से) मैं किसी को पसंद करता हूं। कोई मुझे पसंद करता है।

– बात कहां तक पहुंची है?

— मैं विलीव करता हूं, जिससे शादी करो उसी से प्यार भी करो। इसमें मैं बिलीव करता हूं।

– इसका मतलब शादी उसी से कर रहे हैं, जिससे प्यार किया है?

— माशाअल्लाह। उसी से शादी करुंगा।

– क्या सोचकर वो आपसे शादी करेगी? आपका इतिहास तो रुह कंपा देने वाला है?

— ये सवाल तो आप उससे ही करें तो बेहतर रहेगा।

– उसे सब कुछ पता होगा आपके इतिहास के बारे में, जिससे आपको मुहब्बत हुई है?

— सही सवाल पूछा आपने। वो पढ़ी-लिखी है। एजूकेटिड है। उसको सबकुछ पता है, मेरे बारे में। वो 'मैच्योर' है।

– कैसे मिले थे आप लोग? प्यार की शुरुआत कैसे हुई? बिट्टा कराटे ने खुद उनको (होने वाली बेगम) अपनी असलियत बताई थी?

— उनको पता था। जाहर सी बात है। वो पढ़ी-लिखी है। उसी प्रोफेशन (पत्रकारिता) से जुड़ी रही है, जिससे आप ताल्लुक रखते हैं। उसको सबकुछ पता है कि मैं (बिट्टा कराटे) क्या था, क्या हूं।

– बिट्टा कराटे में क्या देखकर वो लड़की मर-मिटी?

— मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। इस पर। न मैंने इस पर ध्यान दिया।

– कभी तो पूछा होगा?

— हां जी। पूछा था उन्होंने। कहा आप(बिट्टा कराटे) स्टेट फारवर्ड हो, आपकी ईमानदारी पसंद आयी।

– जिस लड़की से शादी कर रहे हैं आप, उसमें क्या नज़र आया था आपको? जिससे बात शादी तक आ पहुंची।

— दिल की बराबरी। दिल को अच्छी लगी। उनका उठना-बैठना। बात करने का ढंग।

– जेल-डायरी और प्यार की कहानी में से पहले किसे लिखेंगे?

— जाहिर सी बात है, जो प्यार के मुतल्लिक बातें हैं, वो बाद में लिखूंगा। पहले तो मैं जेल चला गया। उसके बाद बाहर (जेल से) आया, तो वो (असाबा) मेरी जिंदगी में आ गई।

– बिट्टा कराटे का ये पहला प्यार है, दूसरा या तीसरा? कितने प्यार अब तक किये हैं बिट्टा कराटे ने?

— एक ही प्यार किया है मैंने जिंदगी में।

– ये (असाबा) पहला और आखिरी प्यार है?

— आई विलीव इन वन लव। मैं आवारा नहीं हूं। मेरा दिल आवारा नहीं है।

– लड़की को कैसे समझा पाये कि मैं (बिट्टा कराटे) ठीक इंसान है। उसके साथ शादी गलत साबित नहीं होगी।

— पहले उसने मुझे परखा। हम बैठे। बातें हुईं।

– आपने उसे प्रपोज किया या लड़की ने आपको पहले प्रपोज किया?

— जाहिर सी बात है लड़की प्रपोज नहीं करती है अपनी तरफ से। मर्द ही प्रपोज करता है। लड़कियां अगर किसी को प्यार करती हैं, तो प्रपोज नहीं करती हैं। साभार : न्‍यूज एक्‍सप्रेस

वे एजुकेटेड हैं और परखने के बाद शादी कर रही हैं : बिट्टा कराटे

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ-आर) के चेयरमैन और पूर्व आतंकवादी फारुख अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे घर बसाने जा रहे हैं। माशूका के साथ। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में खौफ का दूसरा नाम रहे बिट्टा करीब 16 साल देश की तमाम जेलों में रहे हैं। जम्मू में जेल तोड़कर भागने की कोशिश का मामला अभी भी बिट्टा कराटे पर चल रहा है।

बिट्टा की मंगेतर असाबा अर्जमंद खान पत्रकारिता में एमए हैं। असाबा जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं। मौजूदा वक्त में वह जम्मू कश्मीर के लोक प्रशासन विभाग में प्रशिक्षु-अधिकारी हैं। 1 नवंबर 2011 को असाबा से निकाह होने से कुछ रोज पहले (4 अक्टूबर 2011 को) न्यूज-एक्सप्रेस चैनल के एडिटर (क्राइम) संजीव चौहान ने कश्मीर घाटी में बिट्टा कराटे से लंबी गुफ्तगू की। इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में बिट्टा कराटे से उनकी निजी-जिंदगी (प्रेम-प्रसंग, शादी) पर भी खुलकर बातचीत हुई। पेश हैं इंटरव्यू के खास अंश-

– बिट्टा कराटे की नज़र में प्यार क्या है?

— प्यार के आगे कुछ भी नहीं है। प्यार इंसान ऊपर वाले से भी कर सकता है। मां, बहन, माशूका और बीबी से भी।

– बिट्टा कराटे के तो बीबी है नहीं, तो फिर प्यार किससे किया?

— नहीं। इंगेजमेंट है मेरी। इंगेजमेंट हो चुकी है।

– कैसे हुई इंगेजमेंट..मतलब किसके साथ?

— इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहूंगा।

– आप नाम मत खोलिये किसी का। मैं किसी का नाम खुलवाना नहीं चाहता। मैं ये जानना चाहता हूं कि सलाखों के पीछे, हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़े बिट्टा कराटे को कभी किसी से मोहब्बत हुई? प्यार हुआ!

— बाहर आकर (जेल से) मैं किसी को पसंद करता हूं। कोई मुझे पसंद करता है।

– बात कहां तक पहुंची है?

— मैं विलीव करता हूं, जिससे शादी करो उसी से प्यार भी करो। इसमें मैं बिलीव करता हूं।

– इसका मतलब शादी उसी से कर रहे हैं, जिससे प्यार किया है?

— माशाअल्लाह। उसी से शादी करुंगा।

– क्या सोचकर वो आपसे शादी करेगी? आपका इतिहास तो रुह कंपा देने वाला है?

— ये सवाल तो आप उससे ही करें तो बेहतर रहेगा।

– उसे सब कुछ पता होगा आपके इतिहास के बारे में, जिससे आपको मुहब्बत हुई है?

— सही सवाल पूछा आपने। वो पढ़ी-लिखी है। एजूकेटिड है। उसको सबकुछ पता है, मेरे बारे में। वो 'मैच्योर' है।

– कैसे मिले थे आप लोग? प्यार की शुरुआत कैसे हुई? बिट्टा कराटे ने खुद उनको (होने वाली बेगम) अपनी असलियत बताई थी?

— उनको पता था। जाहर सी बात है। वो पढ़ी-लिखी है। उसी प्रोफेशन (पत्रकारिता) से जुड़ी रही है, जिससे आप ताल्लुक रखते हैं। उसको सबकुछ पता है कि मैं (बिट्टा कराटे) क्या था, क्या हूं।

– बिट्टा कराटे में क्या देखकर वो लड़की मर-मिटी?

— मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा। इस पर। न मैंने इस पर ध्यान दिया।

– कभी तो पूछा होगा?

— हां जी। पूछा था उन्होंने। कहा आप(बिट्टा कराटे) स्टेट फारवर्ड हो, आपकी ईमानदारी पसंद आयी।

– जिस लड़की से शादी कर रहे हैं आप, उसमें क्या नज़र आया था आपको? जिससे बात शादी तक आ पहुंची।

— दिल की बराबरी। दिल को अच्छी लगी। उनका उठना-बैठना। बात करने का ढंग।

– जेल-डायरी और प्यार की कहानी में से पहले किसे लिखेंगे?

— जाहिर सी बात है, जो प्यार के मुतल्लिक बातें हैं, वो बाद में लिखूंगा। पहले तो मैं जेल चला गया। उसके बाद बाहर (जेल से) आया, तो वो (असाबा) मेरी जिंदगी में आ गई।

– बिट्टा कराटे का ये पहला प्यार है, दूसरा या तीसरा? कितने प्यार अब तक किये हैं बिट्टा कराटे ने?

— एक ही प्यार किया है मैंने जिंदगी में।

– ये (असाबा) पहला और आखिरी प्यार है?

— आई विलीव इन वन लव। मैं आवारा नहीं हूं। मेरा दिल आवारा नहीं है।

– लड़की को कैसे समझा पाये कि मैं (बिट्टा कराटे) ठीक इंसान है। उसके साथ शादी गलत साबित नहीं होगी।

— पहले उसने मुझे परखा। हम बैठे। बातें हुईं।

– आपने उसे प्रपोज किया या लड़की ने आपको पहले प्रपोज किया?

— जाहिर सी बात है लड़की प्रपोज नहीं करती है अपनी तरफ से। मर्द ही प्रपोज करता है। लड़कियां अगर किसी को प्यार करती हैं, तो प्रपोज नहीं करती हैं। साभार : न्‍यूज एक्‍सप्रेस