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सुख-दुख...

नभाटा में संजीव सक्सेना की खबर में संजीव भट्ट की फोटो

पत्रकारिता। यानि लोकतंत्र का चौथा खंभा। चौथा खंभा। यानि जिस पर गिर जाये, उसे कहीं का न छोड़े। मतलब। न जीने में और न मरने में। हां आज की पत्रकारिता का यही सच है। मैं भी इसी पत्रकारिता की कौम का कीड़ा हूं। मेरी तो गिनती कहीं नहीं होगी, उन बड़े-बड़े कीड़ों के सामने जिन्होंने, जिंदगी भर करा-धरा कुछ नहीं। समय गुजरा तो जबरदस्ती बैठ गये हैं, घेरकर "मठाधीश" की कुर्सी पर। हम पुराने हैं, इसलिए हमारे सामने, तुम (पत्रकारिता में आज की या मौजूदा पीढ़ी) कुछ नहीं हो, का राग अलापने।

पत्रकारिता। यानि लोकतंत्र का चौथा खंभा। चौथा खंभा। यानि जिस पर गिर जाये, उसे कहीं का न छोड़े। मतलब। न जीने में और न मरने में। हां आज की पत्रकारिता का यही सच है। मैं भी इसी पत्रकारिता की कौम का कीड़ा हूं। मेरी तो गिनती कहीं नहीं होगी, उन बड़े-बड़े कीड़ों के सामने जिन्होंने, जिंदगी भर करा-धरा कुछ नहीं। समय गुजरा तो जबरदस्ती बैठ गये हैं, घेरकर "मठाधीश" की कुर्सी पर। हम पुराने हैं, इसलिए हमारे सामने, तुम (पत्रकारिता में आज की या मौजूदा पीढ़ी) कुछ नहीं हो, का राग अलापने।

जी हां इतना लिखने की जरुरत मुझे नहीं थी। न मेरे पास वाहियात विषय पर, कुछ लिखने के लिए वक्त है। लेकिन मीडिया के कुछ उन मठाधीशों ने लिखने को मजबूर कर दिया है, जो खुद से काबिल किसी को मानने को तैयार ही नहीं हैं। तो लीजिए देखिये नमूना। मीडिया जगत के इन्हीं में से कुछ कथित ठेकेदारों की निगरानी में पेश किये गये, इनकी अपनी कथित-अनुभवीपत्रकारिता का नमूना।

10 नवंबर 2011 के "नवभारत टाइम्स" नई दिल्ली संस्करण (एनसीआर, उत्तर-प्रदेश) का पेज नंबर 8 खोलिये। सीधे हाथ पर आधे पेज से नीचे खबर का शीर्षक पढ़िये। "संजीव की जमानत याचिका पर पुलिस को नोटिस"। अब आगे इस खबर को पढ़िये। खबर है लोकसभा में "कैश-फॉर-वोट" मामले में संजीव सक्सेना के बारे में।  खबर के मुताबिक कल तक अमर सिंह के करीबी रहे संजीव सक्सेना ने दिल्ली हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की। इस याचिका पर दिल्ली पुलिस को हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया है।

अब एक नज़र डालिये इसी खबर के बीच में लगी फोटो पर। ये फोटो है तो संजीव की है, लेकिन संजीव सक्सेना की नहीं। संजीव भट्ट की फोटो है। संजीव भट्ट भारतीय पुलिस सेवा(आईपीएस) के अधिकारी हैं। फिलहाल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जुबान खोलने का अंजाम भुगत रहे हैं। मुख्यमंत्री से सीधे भिड़ गये हैं। सो कोर्ट कचहरी के चक्कर में भी आ गये हैं। अब देखिये देश की राजधानी से छपने वाले इस अखबार की कलाकारी। जिसके संपादकीय प्रमुख जाहिर सी बात है, बीते कल की पत्रकारिता के काबिल ही रहे हों। क्या गुल खिला रही है अखबार में छपी ये खबर। खबर संजीव सक्सेना की और फोटो संजीव भट्ट की। जब अखबार में काबिलों की भरमार है, तो फिर इतनी बड़ी भूल क्यों और कैसे?

अब इसके पीछे दो तर्क हो सकते हैं। अपना अखबार। अपनी गलती। इसमें संपादक क्या करेगा? संपादक ने तो फोटो का चयन किया नहीं। जिसने फोटो लगायी है, उसे नोटिस देकर जबाब मांग लेंगे। दूसरा तर्क ये कि गलती इंसान से होती है। हो गयी गलती। अब क्या सिर कटवा दें या काट लें। जी नहीं। मैं इस पक्ष में नहीं हूं, कि बदहाल मौजूदा पत्रकारिता छिड़ी गला-काट जंग में कोई किसी का गला काटे। लेकिन सोचिये कि अगर ऐसी ही गलती किसी आम या खास इंसान से हो गयी होती (पत्रकारिता के क्षेत्र से बाहर)। तो अखबार उसे कैसे चटकारे लेकर छापता और बेचता। लेकिन गलती खुद से हुई है। तो बात भी अपनों तक ही सिमट जायेगी। या फिर बात ज्यादा बढ़ती नज़र आयेगी तो जिसने संजीव सक्सेना की जगह पर संजीव भट्ट की फोटो चिपकाई उसकी नौकरी खा ली जायेगी, या फिर उसे कहीं इधर उधर दफ्तर में ही किसी कोने में फेंक दिया जायेगा। इसलिए क्योंकि पत्रकारिता में गलती हमेशा छोटे ही करते हैं, बड़े और या फिर मठाधीश नहीं।

लेखक संजीव चौहान वरिष्‍ठ पत्रकार तथा चैनल न्‍यूज एक्‍सप्रेस में क्राइम एडिटर हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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