शुक्र है सब ठीक ठाक है

शेषजीअमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद एशिया का कूटनीतिक माहौल बदलना तय है. नए समीकरण उभरेगें और शक्ति का संतुलन बदलेगा. अमरीका की इस इलाके में बढ़ती ताक़त को बैलेंस करने के लिए चीन ने भी अमरीका विरोधियों का एक खेमा तैयार करना शुरू कर दिया है. म्यांमार और इरान के प्रति अमरीकी चिढ़ का उल्लेख कर के ओबामा ने साफ़ संकेत दे दिया है वे भारत की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ा रहे हैं उसमें बहुत सारी शर्तें नत्थी हैं. अपने देश का सौभाग्य है कि यहाँ प्रिंट मीडिया में कुछ बहुत ही समझदार किस्म के पत्रकार नौकरी कर रहे हैं. जिसकी वजह से घटना के अगले दिन सही खबर का पता चलता रहा. वरना टेलीविज़न की ख़बरों वाले तो सच्चाई को इतनी मुहब्बत से और बिलकुल अपने दिल की बात समझ कर पेशकर रहे थे कि लगता था सब उल्टा पुल्टा हो रहा था. लेकिन जब अगले दिन अखबारों में खबरें पढ़ी जाती थीं तो सारी बात सही सन्दर्भ में पता लग जाती थीं.

टेलीविज़न वालों की एक अच्छाई को मानना पड़ेगा कि जब अखबार पढ़कर उन्हें भी सच्चाई का पता चलता था तो वे भी बिना किसी संकोच के अखबार में छपी खबर को सच मानकर नयी बात कहने लगते थे. एक दिन पहले की अपनी ही खबर को गलत बताते टेलीविज़न वालों की छंटा अवर्णनीय होती थी. सबसे मजेदार बात वह थी जब मुंबई में एक दिन की यात्रा पूरी होने के बाद टीवी वालों ने कहना शुरू कर दिया कि ओबामा ने भारत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, काम की कोई बात नहीं की. जब उन्हें बताया गया कि अभी तो राजनीतिक यात्रा शुरू होने वाली है, तब तक इंतज़ार कर लेते. तो सब ने कुछ और राग अलापना शुरू कर दिया. पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट को कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया कि लगने लगा कि सब कुछ इन्हीं दो मुद्दों पर आधारित था.

दिल्ली में जब राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद दोनों की बात कर दी तो भाई लोग खुश हो गए और जय जयकार करने लगे. वह तो जब लगभग हर चैनल पर अवकाश प्राप्त राजनयिकों ने सच्चाई को सही सन्दर्भ में रखा तब जा कर के टीवी पत्रकारिता के महान विचारकों ने कुछ समझदारी की बात करना शुरू किया. अब सब कुछ ठीक है. ओबामा जा चुके हैं और सारी बात अखबारों में छप चुकी है. टीवी वालों को भी सब कुछ पता चल चुका है. लेकिन एक विचार मन में बार-बार आता है कि ओबामा से यह निवेदन किया जाना चाहिए था कि हमारे टीवी पत्रकारों को भी अपने टीवी वालों की तरह बनाने की ट्रेनिंग दिलवाने का कोई प्रस्ताव रख देते.

ओबामा की भारत यात्रा के कूटनीतिक घटना थी. कूटनीति का पहला सिद्धांत है कि वह अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रख कर संचालित की जाती है. ओबामा ने भी वही किया. उनके दिमाग में अमरीकी राष्ट्रीय हित था. जब उन्होंने मुंबई में करीब दस अरब डालर के अमरीकी निर्यात की बात को पुख्ता किया तो उनके मन में सौ फीसदी अमरीकी हित काम कर रहा था. दिल्ली आ कर उन्होंने पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद की बात भी कर दी. यहाँ भी वे शुद्ध रूप से अमरीकी राष्ट्र हित को ध्यान में रख कर काम कर रहे थे. हाँ इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत की चार दिन की यात्रा करके और उसके नेताओं के कान में संगीत का असर देने वाली बातें कह कर माहौल को बहुत ही खुशनुमा बना दिया.

भारत में मीडिया और राजनीतिक नेताओं का एक वर्ग है जो पाकिस्तान का नाम लेकर अपने आपको जिंदा रख रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि पाकिस्तान एक गरीब मुल्क है और अब भारत की विकास यात्रा में उसका कोई महत्व नहीं है. पाकिस्तान अब अमरीका का भी मित्र नहीं है. वह अब अमरीका के ठेकेदार के रूप में काम कर रहा है. अमरीका ने उसकी फौज को ठेका दिया है कि वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमरीकी हितों की रक्षा करे. इसके लिए उसे बाकायदा मजदूरी दी जा रही है. अमरीका से उसका बराबरी के धरातल पर कोई सम्बन्ध नहीं है. जबकि भारत के साथ अमरीका को अलग तरह से सम्बन्ध रखना पड़ रहा है. भारत को अब अमरीका एक पूंजीवादी देश के रूप में अपना मित्र मानता है. अमरीका की कोशिश है कि भारत में समाजवाद शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करवाया जाय. उसके लिए हालांकि काम शुरू से ही चल रहा था लेकिन 1991 में जब पीवी नरसिम्हा राव की सरकार आई तो अमरीका ने उस दिशा में ज़बरदस्त दखल दिया.

वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के किसी भी पैरोकार के सपनों की ताबीर के रूप में देखे जा सकते हैं. जब वित्त मंत्री के रूप में डॉ मनमोहन सिंह ने काम संभाला था तो अपने छात्रों की एक बड़ी टीम को महत्वपूर्ण जगहों पर स्थापित कर दिया था. उनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद तो सब कुछ पूंजीवादी तरीके से चल निकला. निजी जीवन में बहुत ही ईमानदार प्रधानमंत्री ने मुल्क पर ऐसी अर्थव्यवस्था को लागू कर दिया जो मूल रूप से आम आदमी के विरोध में ही काम करती है. आज भारत पूरी तरह से अमरीकी डिजाइन का पूंजीवादी देश है और अमरीकी राष्ट्रपति ऐसे देशों का आक़ा होता है. ओबामा की यात्रा को इस सन्दर्भ में देखा जाय तो बात सही समझ में आ जाती है.

पाकिस्तान संघी राजनीति की जीवनदायिनी शक्ति है इसलिए दक्षिण पंथी मीडिया ख़बरों के डोमेन से पाकिस्तान को मरने नहीं देगा. और सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के लिए सभी पार्टियां बराबर की मशक्क़त कर रही थीं क्योंकि इस तरह की सजावटी बातों की वजह से ही जनता का ध्यान गरीबी और अन्य ज़रूरी मुद्दों से हटाया जा सकता है. इस तरह साफ़ नज़र आता है कि अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के नतीजों के अन्दर बहुत सारी अंतर्कथाएँ हैं. जो भी हो अब पूंजीवादी राजनीतिक का अनुयायी, भारत सही अर्थों में अमरीका का मित्र है और वह एशिया में अपने दुशमनों के खिलाफ भारत का इस्तेमाल करना चाहता है. उसके लिए जो भी ज़रूरी होगा अमरीकी हुकूमत करेगी.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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