मेरी हालत पे तरस खाने वालों मुझे मुआफ करो

मेरे जैसे एक पत्रकार के लिए इससे ज्‍यादा दुर्भाग्यपूर्ण और क्‍या हो सकता है कि मुझे आलोक जी के इस दुनिया से जाने की खबर तब मिली जब उनका अंतिम संस्कार हो चुका था। हुआ यह की पिछले दो दिन मैं कुछ ऐसे काम में लगा था कि मैंने न तो कोई खबर सुनी और न ही मुझे किसी से फोन पर आलोक जी की मौत का पता चला।

अक्‍सर होती है ऐसी गलती

[caption id="attachment_19269" align="alignleft" width="74"]एएन शिबलीएएन शिबली[/caption]यह एक हक़ीक़त है कि उर्दू बहुत ही प्यारी और मीठी ज़बान है। यही कारण है कि उर्दू नहीं जानने वाले भी उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं और करते रहते हैं। मीडिया में भी उर्दू के शब्द खूब इस्तेमाल होते हैं, मगर अफसोस की बात यह है कि उर्दू के कुछ शब्द ऐसे हैं जो हिन्दी मीडिया में हमेशा ग़लत ही इस्तेमाल होते है। चाहे वो टेलीवीजन का एंकर हो या फिर हिन्दी अखबार। यहाँ उर्दू के शब्द इस्तेमाल तो खूब होते हैं मगर अफसोस की बात यह है कि वो अक्‍सर ग़लत होते हैं।

दिल्ली से एक और उर्दू अखबार

जदीदभारत में उर्दू के समाचार-पत्रों की हालत कभी भी अच्छी नहीं रही। इस के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों खास तौर पर दिल्ली से उर्दू अखबारों के निकलने का सिलसिला हर दौर में जारी रहा। अखबार निकलते रहे और साल दो साल या फिर चार साल के बाद बंद होते रहे। हाल ही में दिल्ली से उर्दू का एक और अखबार ‘जदीद मेल’ के नाम से निकला है। वैसे तो शुक्रवार को यह अखबार पहली बार मार्केट में आया मगर उस पर अंक नंबर 61 लिखा हुआ है। इसके चीफ एडिटर जाने माने पत्रकार जफर आग़ा हैं जबकि एडिटर हाजी अब्दुल मलिक हैं, जो इस अखबार के मालिक भी हैं।