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वो मेरे साथी नहीं, गुरु थे

सरताज : सन 69 के आसपास तब नैनीताल जिले के किच्छा कस्‍बे के एक हाई स्कूल में पढ़ता था मैं. और नौंवीं दसवीं में मेरा एक सहपाठी था, सरताज जैदी. उसकी हथेलियाँ राजनाथ सिंह से भी बड़ी थीं. बहुत खूबसूरत गाता था वो. मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ उसपे किसी भी अनवर या सोनू निगम से कहीं ज्यादा फब्ती थी. वैसी ही मुर्कियाँ लेता था वो. उसे सुनना रफ़ी साहब के साथ जीने जैसा था.

सरताज : सन 69 के आसपास तब नैनीताल जिले के किच्छा कस्‍बे के एक हाई स्कूल में पढ़ता था मैं. और नौंवीं दसवीं में मेरा एक सहपाठी था, सरताज जैदी. उसकी हथेलियाँ राजनाथ सिंह से भी बड़ी थीं. बहुत खूबसूरत गाता था वो. मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ उसपे किसी भी अनवर या सोनू निगम से कहीं ज्यादा फब्ती थी. वैसी ही मुर्कियाँ लेता था वो. उसे सुनना रफ़ी साहब के साथ जीने जैसा था.

कुछ तो गायन की प्रतिभा मुझे अपने पूज्य पिता जी से विरासत में मिली थी. कोई पेशेवर गायक नहीं थे वे. लेकिन संगीत के प्रति प्रेम उनमें बहुत अधिक था. पाकिस्तान से विस्थापित होकर आये थे ’47 में. मेहँदी हसन को रेडियो पे गाँव के दीवान चंद ग्रोवर अंकल के साथ वे रात रात भर सुनते थे. शौक इतना था कि उसे पूरा करने के लिए खुद का सिनेमा लगा लिया था शहर में. मुगले आज़म उन्होंने उस छोटे से कस्‍बे में कोई तीन हफ्ते चलाई और कुल इकसठ में से कोई पचास शो तो उन्होंने खुद भी देखे थे. ऐसे में सरताज के साथ पढ़ना, रहना और अक्सर उसके साथ युगलबंदी करना जैसे एक आसान और सुखद अनुभव हो गया था. उसी ने सलाह दी कि आवाज़ मुकेश जी से ज्यादा मिलने की वजह से मैं उनके गीत गाया करूं. स्कूल से बाद में यूनिवर्सिटी के कार्यक्रमों तक मैं मुकेश को ही गाता और उस की वजह से अपने गुरुओं, साथियों और दोस्तों का प्यार पाता रहा. वो शौक धीरे-धीरे मुकेश जी के प्रति अपार श्रद्धा में परिवर्तित हो गया. बाद में सन ’76 में अपने दोस्त और सहपाठी ज़फर मूनिस के साथ टिकट उपलब्ध न हो पाने के बावजूद इलाहाबाद में मुकेश जी के एक कार्यक्रम में घुसना और उनसे स्टेज के पीछे जा कर मिलना आज भी जैसे रोमांचित कर देता है.

बघेल : प्लस वन टू को तब यूपी में इंटरमीडिएट कहा जाता था. वो करने मैं पंतनगर गया तो सुभाष भवन (होस्टल) में कमरा मिला. पलिया कलां के दो भाई प्रेम और सुनील मिल गए. दोनों मुझसे एक साल जूनियर थे. लेकिन खासकर प्रेम को संगीत बहुत प्रिय था. दस्तक फिल्म आई ही आई थी और हम लोग हल्द्वानी के लड़कियों की तरह गोरे, पतले और वैसे ही नाज़ुक बिरेंदर को नायिका मान कर ‘तुमसे कहूं एक बात परों से हलकी’ गाया करते थे. तब यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष जयराम वर्मा सहित सीनियर कुछ शायद मुझे और मेरे एक दोस्त रवितेज गोराया को इस लिए भी अपने साथ रखते थे कि हम दोनों ही कुल बारह किलोमीटर दूर ज़मींदारों के बेटे थे. रवितेज के दारजी (पिता जी) सरदार गुरबचन सिंह गोराया यूपी स्टेट अकाली दल के अध्यक्ष हुआ करते थे. कुछ उसके बड़े भाई साहब सर्वजीत सिंह उन दिनों बाद में गन्ने की प्रजाति में क्रान्ति ले आने वाले टिश्यू कल्चर पे शोध कर रहे थे. उनका बहुत नाम और सम्मान था यूनिवर्सिटी में. ये वजहें थीं कि रवितेज कुछ ज्यादा ही एक्टिविस्ट सा और दबंग था. वर्मा जी जब भी ज़रूरत पड़ती अगल बगल के गाँवों से लड़के लुड़के खूब मंगा लेते थे.

डील डौल में मुझ से काफी हल्का मगर एक साल सीनियर बिहार एक लड़का आर.एस.बघेल पता नहीं बड़ों की हमारी संगत से मुझे खुद से सीनियर मान कर हर बार पहले नमस्कार करने लग गया था. तब बड़ों का सम्मान कुछ ऐसा था कि लाबी में अगर सामने से कोई सीनियर आता हो तो सम्मानस्वरूप एक किनारे रुक जाना होता था. अभिवादन करना होता था और उनके पास से निकल जाने के बाद जाना होता था. बघेल भाई ये करते रहे. उनकी मुझ से वरिष्ठता से पूरी तरह अनभिज्ञ मैं वो अभिवादन स्वीकार भी करता रहा. पता तब चला कि जब आर.एस.बघेल एक दिन सुबह सवेरे दनदनाते हुए मेरे कमरे के बाहर आये. गरियाते हुए. मैं नींद से जागा. बाहर निकला तो उनका सवाल था कि मेरी हिम्मत कैसे हुई उन से नमस्ते करवाते रहने की. रवितेज ने उनको उनकी वरिष्ठता का ज्ञान हो जाने के बाद भी पटक ही दिया होता अगर मैंने उसे रोका और बघेल ‘सर’ से माफ़ी नहीं मांग ली होती. उन्हें जब लगा कि जैसे उन्हें, वैसे ग़लतफ़हमी मुझे भी थी तो उन ने अपने कहे को ये कह के समेटा कि कोई नमस्ते करवाने नहीं, उस लायक हो जाने से बड़ा होता है. बघेल ‘सर’ से मिली वो सीख मुझे आज भी याद है.

दिनेश मोहन : कुछ ही दिन बाद चितरंजन भवन का एक ब्लाक तैयार हो गया तो हम इंटर कालेज वाले वहां शिफ्ट हो गए. कुल 456 कमरों वाला वो होस्टल दरअसल इसी नाम से मशहूर था. इस होस्टल के लिए मारामारी कुछ ज्यादा रहती थी. लड़कियों का होस्टल सरोजिनी इसके बगल में था. ‘चिंगारी कोई भड़के’ गाना जब भी रेडियो पर आता तो सैकड़ों ट्रांज़िस्टर फुल वाल्यूम के साथ बाहर बालकनी में आ विराजते थे. मैं 65 नंबर कमरे में था. मेरी बगल में मुझसे एक साल सीनियर बी.एस.सी.-एजी कर रहे दिनेश मोहन कंसल थे. एक दिन डेढ़ सौ लड़कों से भरे कैफेटेरिया (कैंटीन) में खाना खाते समय उन्होंने अपनी पूरी भरी थाली मुझ पे ये कहते हुए दे मारी थी कि अगर खाना मैंने थाली में बचा ही देना था तो उतना लिया क्यों? उन ने कहा था, मालूम है जितना खाना तुमने छोड़ा उतना सिर्फ अगर इसी होस्टल के लोग छोड़ दें तो सामने वाली पूरी कालोनी आज रात पेट भर के सो सकती थी. एक दिन मैं कामन बाथरूम में वाश बेसिन खाली होने के इंतज़ार में ‘ठाड़े रहियो…’ की व्हिसलिंग कर रहा था. जैसे ही रुका तो उन्हीं कंसल ‘सर’ ने पूरे गाने की व्हिसलिंग करने को बोला. वे मुझे वहां से कोई पचहत्तर किलोमीटर दूर बरेली ले कर गए. पाकीज़ा दिखाई. यूनिवर्सिटी की कल्चरल सोसायटी का मेम्बर बनवाया और एक दिन यूनिवर्सिटी के आडिटोरियम में गाना गवाया.

महेंद्र सिंह पाल : यहाँ से ग्रेजुएशन करने मैं नैनीताल गया तो आसानी से कहीं कोई होस्टल या कोई प्राइवेट कमरा तक नहीं मिला. एक दोस्त ने कहा ऐसा करते हैं प्रेजिडेंट (छात्र संघ के) महेंद्र सिंह पाल के कमरे में चलते हैं. वो नेता हैं, अच्छे आदमी हैं. किसी को मना नहीं करते. वहां और भी बहुत से लोग रहते हैं. वहीं रह लेते हैं. हम लंग्हम हाउस (होस्टल) के उनके उस कमरे में रहने और नीचे ही कारपेट पे सोने लगे. उन ने कहीं मुझे गुनगुनाते सुन लिया होगा. उनकी बदौलत मैं एनुअल फंक्शन के दौरान आडिटोरियम की स्टेज पे चढ़ और हीर गाने के बाद छा गया. इसके बाद तो सारा कालेज जानने पहचानने लगा. काशीपुर के विजय भटनागर ने नाल बजानी सिखा दी. मैं गाने के साथ-साथ बजाने भी लगा. गुरुओं से भी प्यार मिला. पढ़ाई में भी ठीक-ठाक था. हमारी टीम छात्रसंघ चुनाव जीत गई. कल्चरल एसोसिएशन के चुनाव में मुझे खड़ा कर दिया. स्टेज पे उधर गाने बजाने से लेकर अनाउन्समेंट तक सब मैं ही करता था. चुनाव में जैसे मुकाबले जैसा कुछ था ही नहीं. मतदान से दो दिन पहले मैंने ‘अमरप्रेम’ देखी. सुबह कालेज आया तो नीचे से पहाड़ चढ़ती आती लड़कियों की तरफ मुंह करके खड़े अपने ही छात्रसंघ वाले साथियों पर राजेश खन्ना का डायलाग मार दिया…’ इन्हें देख कर तुम्हें अपनी बहनों की याद नहीं आती?’ ..अगले दिन मतदान था. मैं चुनाव हार गया.

गुड्डो : ग्रेजुएशन कम्प्लीट हो गई. मैं इलाहाबाद चला गया, ला पढ़ने. यहाँ मिला ज़फर मूनिस. पाकिस्तान से आने के बाद से पिता जी का मन मुसलामानों में ज्यादा रमते देखा था. अपना भी बचपन कई मुसलमान चचाओं और चचियों की गोद में गुज़रा था. ऊपर से सरताज की हर जगह तलाश. बस ज़फर अपना दोस्त हो गया. इस लिए भी कि उसके अब्बा हुज़ूर तब इलाहबाद के नामी वकील थे और अपने को सीखने के लिए ज़फर के घर जैसा कोई और हो नहीं सकता था. मैं अक्सर उसके घर आने जाने लगा. उसकी तब छोटी सी बहन ने एक दफे राखी का मतलब पूछा. मैंने बताया कि कैसे इस बहाने से बहन भाई की लम्बी दुआ के बदले में उस से अपनी हिफाज़त का वायदा लेती है. एक दिन वो हमेशा की तरह उछलती कूदती आई और कुर्सी के पीछे लटके मेरे हाथ की कलाई पे धागा सा बाँध कर तालियाँ बजाती, ये चिल्लाती हुई भीतर चली गई कि अब आप भी भाई जान हो गए. वो गुड्डो अब कोई पैंतीस साल से लगातार राखी बांधती आ रही है.

इलाहाबाद में मैं अपने ही एक प्रोफ़ेसर सी.एस.सिन्हा के साथ कर्नलगंज में रहता था. उनकी पत्नी के बारे में मुझे कुछ नहीं पता. लेकिन अम्मा आती थीं कभी कभार बनारस से. हर आधे घंटे बाद पान के लिए बाज़ार रपटाते थे सिन्हा सर. इलाहाबाद की गर्मी बड़ी भयंकर होती है. एक दिन मैं चार पान इकट्ठे ही बंधवा लाया. तीन बाहर छुपा, एक उनको थमा दिया. आधे घंटे बाद फिर आदेश हुआ तो नीचे श्रीवास्तव के कमरे में बीस मिनट बिता मैं ऊपर आया. उन तीन में एक बीड़ा उठाया. दिया. जैसे उन ने मुंह में डाला तो खूब गरियाए. बोले, बे गधे मुझे पागल समझता है तू. जितनी तेरी उम्र है उस से ज्यादा साल मुझे पान खाते हो गए. जा, ताज़ा पान लगवा के ला.

श्रीवास्तव जी : यहाँ मुझे असली गुरु मिला नीचे वाला श्रीवास्तव. उसके कमरे पे मेरी नज़र बहुत दिन से थी. एक तो वो ग्राउंड फ्लोर पे होने के कारण ठंडा रहता था. दूसरे सरकारी नल उसके कमरे के ठीक बाहर लगा था. पता लगा कि श्रीवास्तव का सलेक्शन हो गया डाक्टरी के लिए. मैंने सुबह ही उन्हें ऊपर से आवाज़ दी. वे ब्रश मुंह में डाले डाले बाहर निकले. जैसे ही उन ने ऊपर देखा, मैंने पूछा कब तक जाओगे आप कमरा छोड़ के?…श्रीवास्तव ने अधबीच में ही ब्रश मुंह से निकाला. कुल्ला किया. ऊपर देखा और बड़े प्यार से कहा, “मुझे बहुत अच्छा लगता अगर आप पूछते कि मैं कब तक यहाँ हूँ”. वो दिन और आज का दिन. कुछ भी लिखने और बोलने से पहले आज मैं दस बार सोचता हूँ. उस आदमी ने मेरी सोच बदल दी. मैं अपने उन सभी मित्रों का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझे मुझ जैसा होने में मदद की.

दुर्भाग्य ये है कि बहुत तलाश के बावजूद मैं सरताज, दिनेश मोहन कंसल और श्रीवास्तव जी को ढूंढ नहीं सका. पर, मुझे यकीन है कि वे जहां भी होंगे मेरे जैसे लोगों को तराश रहे होंगे.

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहने के बाद इन दिनों न्यू मीडिया में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम समेत कई पोर्टलों के जरिए सक्रिय हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. mahandra singh rathore

    October 20, 2011 at 12:23 pm

    Aapne apne doston ki itine purni baaten likhkj undhe yaad kiya. ho sakta hai inme se kuch log aapse sampark bhi kere. lekh bahut accha hai. kamal ki yaadhad hai. sartaj, se leker shrivastav tak sabhi se aapne kuch na kuch sikha hai. aap esse terah ke lekh likhte rehe.

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