मुझे तो आना ही था, शादी नहीं तो मौत पर ही सही

अमिताभ ‘पत्रकार भी कभी मरता है. जो मर गया समझो डर गया’… इस तरह के डॉयलाग सुनने में तो बहुत अच्छे लगते हैं पर असल जीवन में शायद इनका कोई मतलब नहीं है. असल जीवन बहुत अधिक सामान्य किस्म का होता है, जिसमें आदमी जिन्दा है तो जिन्दा है, मर गया तो बस मर गया और इसी के साथ उसकी कहानी खतम हो गयी.