वे युवाओं के लिए आदर्श थे और रहेंगे

आलोक जी के निधन की ख़बर सुनकर पहली चिंता हुई कि कौन लिखेगा अब बेबाक बातें। पत्रकारिता को अपने कर्म से कौन करेगा सार्थक। शाययद वही एक स्तम्भ थे, जो निडर पत्रकारिता को थामे हुए थे। मेरी व्यक्तिगत पहचान उनसे नहीं थी। लेकिन एकबार उनसे मिला था। वो हमारे कॉलेज आए थे। हम नौसिखिए पत्रकारों को ये बताने कि वो तिहाड़ क्यों गए थे? साथ ही साथ ये भी कह गए कि अगर जरूरत पड़ी तो तुम लोग भी ना घबराना, क्योंकि तिहाड़ से निकलने के बाद वो सीधा भोपाल माखनलाल विश्वविद्यालय ही आऐ थे।