लौट आओ मनेन्‍द्र, चाय पीने चलेंगे

नई सदी का नया सवेरा नया वर्ष, नया उत्साह, नया हर्ष, नई उम्मीदें, आशा की नई किरण. जो कल था वो आज नहीं रहा, और जो आज समय है वो कल नहीं रहेगा, वक़्त तो अपनी रफ़्तार से दौड़ता ही रहता है, लेकिन जो वक़्त कि रफ़्तार के साथ कदम मिला के चला, वही तो बनता है सिकंदर… लेकिन पत्रकारिता विश्वविद्यालय का एक योद्धा दौड़ने के पहले ही कदम ठिठका कर खड़ा हो गया. दोस्तों ने कहा तुझे चलना होगा, तुझे पत्रकारिता जगत को नया आयाम देना है, तुझे बोलना होगा, उठना होगा, मौत से जीतना होगा, लड़ना है जमाने से, देखो पूरा विश्वविद्यालय बुला रहा है तुम्हें, उठो मनेन्द्र, चलो, परीक्षाएं ख़त्म हुईं. घर पर सब इंतजार कर रहे हैं. जाने नहीं देंगे तुझे, जाने तुझे देंगे नहीं. मां ने ख़त में क्या लिखा था, जिए तू जुग-जुग ये कहा था, चार पल भी जी न पाया तू, लेकिन वो ऐसे नींद के आगोश में सोया कि फिर उठ नहीं पाया.

पत्रकारिता कॉलेज खा गया छात्रों का पैसा!

को खां क्या चल रिया हेगा? केन लगे, कन्ने कट गए, सर पर दे रिया हे मिला मिला के… झीलों की नगरी भोपाल का अपना एक खास अंदाज है. भोपाल शहर अपनी खूबसूरती के लिए पूरे देश में जाना जाता है. साथ ही पत्रकारों की उद्गम स्थली अगर भोपाल को कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. भोपाल में समय के साथ बहुत तरक्की हुई… मध्य प्रदेश में इसे एजुकेशन हब की उपाधि मिली… तो कई प्राईवेट समूहों ने यहाँ अपना वर्चस्व कायम किया.