पत्रकार कहीं क्रांतिकारी हिंसा की ओर न जाने लगे

पत्रकारिता में जिस तरह से पूंजीवादी शक्तियों का शोषण बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसी संभावना बन सकती है कि पत्रकार क्रांतिकारी हिंसा का रास्ता अपनाकर चुन-चुन कर उन लोगों को मारे जो इस मानवीय क्षेत्र को पाशविक शोषण का शिकार बनाए हुए हैं. पत्रकारिता में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं, जिनके अंदर खुदी राम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह वाला ज़ज्बा पलता है, लेकिन इस देश में उस ज़ज्बे की चिंगाड़ी को शोला बनाने वाली विचारधारा का अभाव है.