जागरण के जयचंद ही इसका बेड़ा गर्क कर रहे

[caption id="attachment_20264" align="alignleft" width="99"]सोमदत्‍तसोमदत्‍त [/caption]यशवंत भाई जी नमस्कार, दैनिक जागरण आगरा में अपने जीवन के करीब 24 साल देने वाले श्रीमान विनोद भारद्वाज द्वारा लिखी गई व्यथा कथा पढ़ कर दिल तड़प कर रह गया। मात्र कलम के सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं उनकी मदद करने के लिए क्योंकि मैं जिस दौर से आज गुज़र रहा हूं, किसी की आर्थिक रूप से मदद भी नहीं कर सकता।

किसी पत्रकार साथी का मजाक बनाने की बजाय उसकी मदद की सोचें

यशवंत भाई जी, सर्वप्रथम मैं आपका और पत्रकारों की अपनी भड़ास का दुखी मन से शुक्रिया करना चाहता हूं, क्योंकि आपने मेरी व्यथा ‘क्‍या ईमानदारी का यही सिला मिलता है?‘ को प्रमुखता से भड़ास पर प्रकाशित किया। दुखी मन से ऐसा कह रहा हूं कि मेरे द्वारा भेजी गई पोस्ट पर कुछ पत्रकारों ने यह कह उलाहने देने शुरू कर दिए कि देर हुई पछता रहे हो कि काश मैं भी बेइमानों की कतार में शामिल हुआ होता तथा अब पछताए क्या होत है जब चिडिय़ां चुग गई खेत? तथा बहती गंगा में हाथ धो लेते जैसी दिल दुखाने वाली बातें कह कर मेरे दिल को ठेस पंहुचाने की पूरी कोशिश की है।