एकल बोली की भेंट चढ़ गईं 11 चीनी मिलें, करोड़ों का हुआ घाटा

 : नीलामी में नहीं दिखी प्रतिस्पर्धा, दो कंपनियों ने एक ही बैंक से बनवायी गारंटी : सीरियल नम्बर में हैं टेंडर के लिए जमा ड्राफ्ट, पोंटी चड्ढा ग्रुप से जुड़ी हैं बोली लगाने वाली कंपनियां : इलाहाबाद। भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार (सीएजी) ने हजारों करोड़ के चीनी मिल बिक्री घोटाले में अपनी रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी मिलों के विनिवेश में पारदर्शी तरीके नहीं अपनाए गए, नतीजतन चीनी मिलों को खरीदने की बोली में पर्याप्त संख्या में खरीदार नहीं आए, नतीजतन बोलियों में प्रतिस्पर्धा नहीं रही। घपले-घोटालेबाजी को केवल एक ही तथ्य से समझा जा सकता है कि 11 चीनी मिलों के लिए केवल एकल बोली ही प्राप्त हुई।

ग्यारह चीनी मिलों के लिए केवल एकल बोली ही प्राप्त हुई। इस तरह 11 चीनी मिलों से केवल 91.61 करोड़ ही राशि प्राप्त हुई जबकि इनकी अनुमानित कीमत 173.63 करोड़ आंकी गई थी। इस तरह 81.98 करोड़ रुपए की क्षति हुई। दरअसल इंडियन पोटाश लिमिटेड के अलावा जिन कंपनियों ने चीनी मिलों की खरीद के लिए बोलियां लगाईं उनमें से अधिकांश के तार पोंटी चड्ढा से जुड़े हुए थे। यानी बेनामी कंपनियों के माध्यम से औने-पौने दाम में चीनी मिलें पोंटी चड्ढा ग्रुप को दे दी गईं।

2 जुलाई 2010 के सरकारी आदेशों से स्पष्ट है कि इन सभी मिलों के लिए सिर्फ 2 कंपनियों ने बोलियां लगाईं हैं, में पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड व वेव इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड वास्तव में दोनों कंपनियों का मालिक पोंटी चड्ढा ग्रुप ही है जो सिद्ध करती है कि बोली प्रक्रिया किसी भी रूप में पारदर्शी नहीं थी। वेव ने अपनी सहयोगी पीबीएस फुड्स से कुछ ही कम 8.40 करोड़ रुपए की बोली लगाई जो पूरी प्रक्रिया को पूर्वनियोजित, संदेहास्पद व मजाकिया बनाती है। उत्तर प्रदेश के शराब व्यापारी के पक्ष में उत्तर प्रदेश में चीनी मिलें मायावती सरकार के खास शराब के ठेकेदार पोंटी चड्ढा के पक्ष में बेचा गया। सभी फायदे की मिलों को आरक्षित कीमतों से कम में बेचा गया। केन्द्र सरकार के पीएसयू इंडियन पोटाश लिमिटेड व पोंटी चड्ढा को 10 चीनी मिलें बेची गईं। बिजनौर, अमरोहा, बुलंदशहर, चांदपुर और सहारनपुर की 5 चीनी मिलें चड्ढा को मिलीं। चड्ढा को सभी मिलें आरक्षित मूल्य से कम दामों पर मिलीं जबकि इंडियन पोटाश लिमिटेड को आरक्षित मूल्य से अधिक कीमत चुकानी पड़ी। चड्ढा को दी गई इकाइयों की गन्ना पेराई क्षमता 2500 टीपीडी थी जो कहीं अधिक अत्याधुनिक थी। इस तरह सैकड़ों करोड़ों रुपए की जमीन पोंटी चड्ढा को अनियमित तरीके से उपहार स्वरूप दे दी गई।

सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि भारत सरकार की इंडियन पोटाश लिमिटेड ने केवल तीन मिलों खड्डा, रोहमकला और सकोनी टांडा के लिए बोली लगाई थी। वेव इंडस्ट्रीज व पीवीएस फूड्स ने अमरोहा, बिजनौर, सहारनपुर तथा बुलंदशहर चीनी मिलों के लिए बोलियां लगाई थीं जबकि ये पोंटी चड्ढा की ही कंपनियां हैं। ये इन चारों मिलों की बोलियों में प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने आई थीं।

ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार वेवइंडस्ट्रीज व पीवीएस फूड्स ने एक ही बैंक ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स, कनाट प्लेस नई दिल्ली से 28 अगस्त को गारंटी बनवाई थी और उनकी क्रम संख्या 119636 व 119637 थीं। कानपुर स्थित रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के अभिलेखों के अनुसार एक नम्बर 1998 से 4 मई 2006 तक त्रिलोचन सिंह दोनों कंपनियों के निदेशक थे। यही नहीं इन दोनों कंपनियों के निदेशक और अंशधाराओं में भूपेन्दर सिंह, जुनैद अहमद, शिशिर रावत और मनमीत सिंह का नाम शामिल है। इस तरह वेव इंडस्ट्रीज व पीवीएस फूड्स का आपस में बहुत घनिष्ठ संबंध है। इन दोनों कंपनियों का पता भी एक ही है, ए-129 न्यू फ्रेंड्स कालोनी, नई दिल्ली है।

ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार इस तरह तीन मिलों बिजनौर, सहारनपुर और बुलंदशहर चीनी मिलों को मूल्यांकित राशि 291.55 करोड़ थी लेकिन वेव इंडस्ट्रीज व पीबीएस फूड्स की मिलीभगत से लगाई गई बोलियों के अनुसार केवल 124.70 करोड़ रुपए ही मिले। बोलियों को स्वीकार करते हुए यह भी नहीं देखा गया कि आखिर अनुशासित कीमत से इतनी कम कीमत क्यों लगाई गई।

यही नहीं जिन कंपनियों को ये चीनी मिलें बेई गईं उनमें वेव इंडस्ट्रीज, निलगिरी फूड्स प्राडक्ट प्राइवेट लिमिटेड, त्रिकाल फूड्स एवं एग्रो प्राडक्ट लिमिटेड द्वारा टेंडरों की खरीद के लिए जमा किए गए 11 ड्रॅाफ्टों में सात पंजाब नेशनल बैंक और चार स्टेट बैंक के थे जिनके लगातार सीरियल नम्बर हैं। ये सभी एक ही तिथि में जारी किए गए हैं। निलगिरी, त्रिकाल, नम्रता और एसआर बिल्डर तथा वेव इंडस्ट्रीज और गिरासो कंपनी लि. भी आपस में संबंधित हैं जिनका मालिकाना कहीं न कहीं से पोंटी चड्ढा से जुड़ा हुआ है।

जारी…

जेपी सिंह द्वारा लिखी गई यह खबर लखनऊ-इलाहाबाद से प्रकाशित अखबार डीएनए में छप चुकी है, वहीं से साभार लिया गया है.

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