अखिलेश ने आजम खां पर काबू किया और चलने लगी सपा की लहर

: चुनावी बहस और टेलीविज़न की दुनिया : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१२ ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दिल्ली में बैठे राजनीतिक पंडितों को कुछ पता नहीं रहता कि राज्य में क्या हो रहा है. टेलीविज़न चैनलों पर बहस के प्रहसन में भाग लेने वाले राजनीतिक विश्लेषकों की भी यही स्थिति होती है. चुनाव की घोषणा के साथ ही विद्वान पत्रकारों की मंडली में चर्चा शुरू हो गयी थी कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को १५० के करीब सीटें मिलेगीं, बहुजन समाज पार्टी को १३० के आसपास, बीजेपी ९० तक जा सकती है और कांग्रेस की झोली में ५० के आसपास सीटें आयेंगी.

लगभग सब का ऐलान यही था कि उत्तर प्रदेश में इस बार त्रिशंकु विधानसभा आयेगी, किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा. इन स्वनामधन्य विश्लेषकों से जब कभी पूछा गया कि भाई आपको यह इलहाम कैसे हो रहा है तो एक सर्वज्ञ मुद्रा वाली मुस्कराहट के साथ बता देते थे कि उन्हें सब मालूम है, ठीक उसी तरह जैसे आजकल एक विज्ञापन में बीते ज़माने की अभिनेत्री नीतू सिंह कहती पायी जाती हैं कि 'आई नो एवरीथिंग'. लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी को कुछ नहीं मालूम था और उत्तर प्रदेश की जनता किसी भी कीमत पर बदलाव चाहती थी. उसकी बदलाव की यह इच्छा मायावती के राज के दो साल के अंदर ही नज़र आने लगी थी लेकिन यह जनता की समझ में यह नहीं आ रहा था कि जाना किधर है. 

उत्तर प्रदेश की जनता ने जब २००९ के लोकसभा चुनावों में देखा कि सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी के अलावा कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी ने भी लगभग बराबर सीटें हासिल की हैं तो यह तय हो गया कि मायावती की सत्ता को बदलने के अवसरों की कमी नहीं है. उस चुनाव के बाद राज्य के बहुत सारे इलाकों के लोगों से बात करके पता लगा कि विधान सभा चुनाव में बदलाव का हवा बहेगी.

बहरहाल अब चुनावों के नतीजे पब्लिक डोमेन में हैं. और सभी विश्लेषक और पत्रकार उसकी माकूल व्याख्या कर रहे हैं और बता रहे हैं कि उनसे चूक क्यों हुई. लेकिन ३ मार्च २०१२ के दिन कोई भी ऐसा विश्लेषक नज़र नहीं आया था जो इन नतीजों को किसी भी तरह से संभव मानने को तैयार होता. अंग्रेज़ी के सबसे नामी न्यूज़ चैनल में चुनाव विश्लेषण के लिए बुलाये गए लोगों से मैंने कहा कि उत्तर प्रदेश के चुनाव बहुत ही अलग माहौल में हुए हैं, कहीं किसी का कोई दबाव नहीं पड़ा है, लोगों ने अपने मन से वोट दिया है और दो बातें तय हैं. पहली तो यह कि मायावती सत्ता से बाहर चली जायेंगी और जो दूसरी बात तय है वह यह कि समाजवादी पार्टी को २२० से एकाध ज्यादा ही सीटें मिलेंगी.

मेरी इस बात को सुनकर जिस तरह के अविश्वास का माहौल हवा में तैर गया वह बहुत ही दमघोंटू था. कुछ लोगों ने मुझे समझाने की कोशिश की कि मैं अपनी राय बदल लूं. पैनल में मौजूद पंजाब की राजनीति के जानकार एक आदरणीय मित्र से मैंने गंभीरता से कहा कि भाई मेरे पास राय बदलने का विकल्प नहीं है. यह सच्चाई है. और यह सच्चाई मैंने हर दौर के चुनाव के बाद की हालत को समझ कर जानी है. लेकिन खंडित जनादेश के विमर्श से आगे जाने को कोई तैयार नहीं था. पूरे तीन दिन बहस इस बात पर होती रही कि समाजवादी पार्टी को जब १८० के आस पास सीट मिलेंगी तो मुलायम सिंह किसके समर्थन से सरकार बनायेंगे, या नहीं बनायेंगे.

ज़ाहिर है कि मुझे इस सिद्धांत की परिकल्पना पर ही विश्वास नहीं था इसलिए मैं बहस से लगभग बाहर ही रहा. चुनाव के नतीजों के बाद देश के चोटी के पत्रकार कुमार केतकर ने मेरी तारीफ़ की और कहा कि हालांकि शुरू में उन्होंने भी मेरी बात पर बहुत विश्वास नहीं किया था लेकिन नतीजों के बाद उन्होंने मुझे इस बात पर शाबासी दी कि न केवल मैंने समाजवादी पार्टी के नतीजों का सही आकलन किया था, बल्कि सभी चारों पार्टियों की संभावित सीटों का भी लगभग सही अनुमान लगाया था. मैंने बहस के दौरान भी बार-बार यह कहा था कि इस बार उत्तर प्रदेश में बाहुबली भी नहीं जीत पायेंगे. चार दिन तक चर्चा में शामिल कई मित्रों ने इस बात की भी तारीफ़ की. पत्रकारिता के एक शीर्ष पुरुष और मेरे आदर्श पत्रकार ने मुझसे कहा है कि मैं ३ मार्च २०१२ के दिन किये गए के अपने आकलन के कारणों पर चर्चा करूँ, इसलिए यह लेख लिखा जा रहा है.

उत्तर प्रदेश की जनता ने २००७ में मुलायम सिंह यादव की पार्टी के जोर ज़बरदस्ती के राज से बचने के लिए मायावती को स्पष्ट बहुमत दिया था. लेकिन मायावती ने जनता को निराश किया. लोग उन्हें हटाना चाहते थे लेकिन यह नहीं पता लग पा रहा था कि रास्ता किधर से है. २००९ के चुनावों के बाद से यह बात साफ़ हो गयी थी कि सत्ता बदल दी जायेगी. मुलायम सिंह की पार्टी २००९ के लोक सभा चुनाव तक पस्त हिम्मत की शिकार थी. उसी के बाद फिरोजाबाद संसदीय क्षेत्र में ही उपचुनाव में हुई अखिलेश यादव की पत्नी की हार के बाद समाजवादी पार्टी में चारों तरफ निराशा थी. मुलायम सिंह यादव शारीरिक रूप से कुछ कमज़ोर भी हो गए थे. पार्टी का और कोई नेता बाहर नहीं निकल रहा था. अमर सिंह ने मीडिया के ज़रिये हमला बोल रखा था.

ज़ाहिर है पार्टी में निराशा और मायूसी का माहौल था. कांग्रेस को लोक सभा २००९ में पहले से ज्यादा वोट मिले थे लेकिन कांग्रेस के नेताओं को भी मालूम था और जनता को भी मालूम था कि ज्यादातर सीटों पर चौथी या पांचवीं और कहीं कहीं तो सातवीं या आठवीं जगह पर रही कांग्रेस पार्टी मायावती को चुनौती नहीं दे सकती थी. एक दौर में तो ऐसा लगता था कि भारतीय जनता पार्टी ही मायावती को चुनौती दे सकती थी. उनके पास लगभग हरेक मंडल में कार्यकर्ता थे, आरएसएस की मौजूदगी थी और सारे इलाकों में मज़बूत नेता थे. यह सारा माहौल तब बदला जब समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मैदान ले लिया और सड़कों पर निकल पड़े. मायावती से नाराज़ लोगों को उम्मीद नज़र आने लगी कि समाजवादी पार्टी को वोट देने से मायावती से पिंड छूट जाएगा.

इसके पहले तो यूपी के राजनीतिक माहौल में साफ़ नज़र आ रहा था कि २०१२ की लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और मायावती के बीच होगी और मायावती को हराने के लिए तड़प रही जनता बीजेपी के सिर पर ताज रख देगी. इस पर ब्रेक लगाया नागपुर के नेता और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने. उन्होंने यूपी के बीजेपी नेताओं राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, विनय कटियार, मुरली मनोहर जोशी, ओम प्रकाश सिंह, सूर्य प्रताप शाही और केशरी नाथ त्रिपाठी को पीछे कारके मध्य प्रदेश की नेता उमा भारती को आगे कर दिया. राज्य के स्थापित नेताओं के समर्थक बीजेपी के अभियान से अलग हो गए और जो बीजेपी मायावती को चुनौती देने वाली थी, वह तीसरे स्थान की लड़ाई में चली गयी. अखिलेश यादव की सभाओं में भीड़ होने लगी और साफ़ नज़र आने लगा कि मायावती को चुनौती समाजवादी पार्टी से मिल रही है. इस बीच राहुल गांधी ने भी राज्य में धुंआधार प्रचार किया. लेकिन उनके चुनावी प्रबंधन में बहुत सारी गड़बड़ियां हुईं. उन्होंने बाराबंकी के नेता बेनी प्रसाद वर्मा को बहुत महत्‍व दे दिया. बेनी प्रसाद वर्मा भी पूरे फार्म में आ गये. उन्होंने करीब १३५ सीटों पर अपनी पुरानी समाजवादी पार्टी से आये हुए चेलों को टिकट दे दिया, जिसके कारण कांग्रेस के मुकामी नेता तो नाराज़ हुए ही, कांग्रेस के कई एमपी बेनी प्रसाद वर्मा के खिलाफ हो गए. ऐसे माहौल में समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के नेतृत्व में चुनाव में झंडे गाड़ने शुरू कर दिए.

चुनाव आभियान शुरू होने के बाद भी बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं ने थोक में गलतियां की. मायावती के बहुत करीबी रह चुके और भारी भ्रष्टाचार में फंसे बाबू सिंह कुशवाहा को चुनाव अभियान के दौरान भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लेने से रामदेव और अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के कारण बीजेपी की तरफ मुड़ रहे नौजवानों ने बीजेपी के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया. कांग्रेस ने साम्प्रदायिक आधार पर जनता के ध्रुवीकरण की कोशिश की. जिसका फायदा भी समाजवादी पार्टी को मिल गया. मुसलमान लगभग एकतरफा समाजवादी पार्टी में चले गए. राष्ट्रपति राज की चर्चा करके भी कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत की ज़रुरत को रेखांकित किया.

इस बीच समाजवादी पार्टी के बड़े नेता आज़म खां ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली डीपी यादव को पार्टी में भर्ती करने की कोशिश की. अखिलेश यादव ने बहुत ही निर्णायक तरीके से हस्तक्षेप किया और डीपी यादव की भर्ती पर लगाम लगा दिया. उनके इस एक क़दम ने उत्तर प्रदेश में कई सन्देश दिए. एक तो यह कि अब अपराधी पृष्ठभूमि के लोगों को वे साथ नहीं आने देंगे और दूसरा सन्देश राज्य के सरकारी कर्मचारियों को दिया गया. उन्हें साफ़ बता दिया गया कि समाजवादी पार्टी के पिछले कार्यकाल की तरह की स्थिति नहीं रहने वाली है. उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के बीच आज़म खां की छवि एक ऐसे नेता की है, जो मंत्री बनने के बाद लोगों को डांटते फटकारते रहते हैं. उनको काबू करके अखिलेश यादव ने ऐलान कर दिया कि आज़म खां की मनमानी नहीं चलेगी. इसके बाद तो समाजवादी पार्टी के पक्ष में लहर चलने लगी.

इस बीच समाजवादी के घोषणा पत्र ने बाकी काम पूरा कर दिया. आमतौर पर पार्टी के घोषणा पत्रों पर विश्वास नहीं किया जाता लेकिन मुलायम सिंह यादव की उस बात पर लोगों ने विश्वास किया जहां उन्होंने कहा था कि अगर सरकार बनी तो १००० रुपये महीने का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा. उनकी बात पर लोगों ने विश्वास इसलिए किया कि अपने पिछले कार्यकाल के अंतिम छह महीनों में उन्होंने ५०० रूपये महीने का बेरोजगारी भत्ता दिया था. मैंने देखा था कि पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के बहुत सारे इलाकों में नौजवान और बेरोजगार युवकों ने मुलायम सिंह को इसलिए वोट दिया था कि वे १००० महीने के बेरोजगारी भत्ते के चक्कर में थे. बड़ी संख्या में नौजवानों के वोट इसी कारण से मुलायम सिंह को मिले. चुनाव ख़त्म होने के बाद जिला रोज़गार कार्यालयों में बेरोजगार नौजवानों की भीड़ को जिसने भी देखा था, उसे पक्का भरोसा था कि मुलायम सिंह यादव की पार्टी का स्पष्ट बहुमत आ रहा है. इसके अलावा मैंने हर दौर के चुनाव के पहले और बाद में जिला स्तर के पत्रकारों से बात करके सही स्थिति का जायज़ा लिया था. और लगभग हर सीट के ज़मीनी समीकरणों को समझा था शायद इसी लिए सही आकलन कर सका था.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. कई मीडिया संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रहे हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्‍स के साथ रोविंग एडिटर के रुप में कार्यरत हैं.

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