अखिलेश यादव की सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं दिल्‍ली दरबार के कुछ पत्रकार

: सीएम को मायावती जैसा साबित करने की हो रही है कोशिश : करीब डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश में नई सरकार ने शपथ ली थी. इन पैंतालीस दिनों में बहुत कुछ बदला है. लेकिन अजीब बात है कि उस परिवर्तन के बारे में कुछ भी लिखा नहीं जा रहा है. दिल्ली के सत्ता के गलियारों में जहां कहीं भी एकाध लोग यह कहते पाए जाते हैं कि उत्तर प्रदेश में हालात पहले से बेहतर हैं, उन्हें फ़ौरन नकेल लगाने की कोशिश की जाती है. उन्हें डांट दिया जाता है कि सरकार की चापलूसी करने की ज़रूरत नहीं है. पत्रकार के रूप में हमारा कर्त्तव्य है कि हम सरकारों के खिलाफ लिखते रहें, उनको हमेशा चौकन्ना रहने के लिए मजबूर करते रहें. यह उपदेश देने वालों में वे लोग भी शामिल होते हैं जो राहुल गांधी के दलित प्रेम के बारे में टेलीविज़न पर राग दरबारी में राहुल रासो गाया करते थे. दिल्ली में एक अजीब माहौल बन रहा है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ लिखना ज़रूरी है वरना निष्पक्ष पत्रकार के रूप में पहचान नहीं बन पायेगी.

यहाँ इस विषय पर बात नहीं की जायेगी कि राहुल गांधी की छींक को भी खबर बनाकर अभिभूत होने वालों और अखिलेश यादव के राजनीतिक निर्णयों को मामूली बताने वालों की मानसिकता क्या है. अभी डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश की जनता ने इस मानसिकता वालों को उनकी औकात बता दी थी और राजनीति के जनवादीकरण की मिसाल पेश की थी. दिल्ली में एक ऐसा वर्ग है जो लगातार कोशिश कर रहा है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार को राज्य की पिछली सरकार के खांचे से बाहर ही न आने दिया जाए. दोनों सरकारों की तुलना ऐसे बिन्दुओं पर की जाए जिन पर डेढ़ महीने में कोई बदलाव हो ही नहीं सकता. मसलन अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ साथ ही टेलीविज़न चैनलों पर हाहाकार मच गया था कि राज्य में अपराध बढ़ रहा है. अब सब को मालूम है कि जिस राज्य में अपराध और राजनीति में चोली दामन का साथ है वहां बिजली के स्विच ऑन या ऑफ़ करने से अपराध पर रोक नहीं लग जायेगी. उन मुद्दों पर चर्चा होने ही नहीं दी जा रही है जहां मौलिक परिवर्तन हो रहे हैं. इसके साथ ही एक और कोशिश हो रही है कि अगर कोई पत्रकार अखिलेश यादव की सकारात्मक बातों का उल्लेख करता है तो उसे हड़का कर यह बता दिया जाये कि भाई अखिलेश यादव की तारीफ़ करोगे तो पत्रकारिता की कसौटी पर खरे नहीं उतरोगे.

ऐसे माहौल में राज्य में पिछले ४५ दिनों की राजनीति का सही आकलन करना बहुत पेचीदा काम हो गया है लेकिन आकलन होना ज़रूरी है क्योंकि दिल्ली में बैठे अकबर रोड या अशोक रोड वाली पार्टियों के कृपापात्र पत्रकारों के नागपाश से तो राजनीतिक विश्लेषण को बाहर लाना ही पड़ेगा. इस काम को करने के लिए उन नौजवान पत्रकारों को भी आगे झोंकना ठीक नहीं होगा जो अभी पत्रकारिता में अपनी रोज़ी रोटी तलाश करने के लिए मजबूर हैं और उनके अखबार में शीर्ष पदों पर वही लोग विद्यमान हैं जो अपनी सोच को ही राजनीतिक विश्लेषण बना कर पेश कर देते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार और उसके मुख्यमंत्री के काम काज की जांच परख के लिए किसी ऐसे विश्लेषक की ज़रुरत है, जिसे दिल्ली के सत्ताधीश पत्रकार मजबूर न कर सकें और जिसे वेब पोर्टल की वैकल्पिक मीडिया की दुनिया में सर पर कफ़न बाँध कर घूम रहे नौजवान पत्रकार, अपना बंदा मानते हों. वैकल्पिक मीडिया के उन्हीं सूरमाओं की सदिच्छा के पाथेय के साथ यह विश्लेषण करने की कोशिश की जा रही है.

डेढ़ महीने पहले सत्ता में आई सरकार ने बहुत कुछ बदलने की शुरुआत की है. सबसे महत्वपूर्ण तो यह कि लखनऊ में एकाधिकारवादी सत्ता का पर्याय बन चुके पंचम तल के आतंक को कम किया है. पिछली सरकार में सब कुछ पंचम तल से ही तय होता था और उसमें किसी से भी राय सलाह नहीं ली जाती थी. मुख्यमंत्री का सीधा संवाद केवल एक अफसर से था और उसको भी केवल हुक्म सुनाया जाता था. उसकी ड्यूटी थी कि वह मुख्यमंत्री के हुक्म का पालन करवाए. बताते हैं कि हुक्म का पालन करवाने के चक्कर में वह अफसर जिलों में तैनात आईएएस और आईपीएस अफसरों को भद्दी-भद्दी गालियाँ भी देता था. जब मुझे यह पता लगा तो मैं सन्न रह गया था क्योंकि आईएएस या आईपीएस में भर्ती होना कोई हंसी खेल नहीं है. वैसे भी इन सेवाओं में आते वक़्त नौजवान केवल संविधान को लागू करने की शपथ लेता है और उसके अनुसार ही काम करने की क़सम के साथ सरकार में प्रवेश करता है. उसे गाली देने का हक किसी को नहीं है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उसे अपनी गरिमा का रक्षा खुद ही करनी चाहिए. अगर उसने गाली खाकर प्रतिरोध नहीं किया तो वह भी अपनी हालत के लिए जिम्मेवार है.

हो सकता है कि रिश्वत की गिज़ा के चक्कर में वह फजीहत झेल रहा हो. क्योंकि उसी लखनऊ में ऐसे बहुत सारे अफसर हैं जो अपनी गरिमा के साथ राज्य सरकार की सेवा कर रहे हैं. किसी भी पंचम तल वाले की बेअदबी के मोहताज नहीं है. पिछले डेढ़ महीने में यह परिवर्तन आया है. अब कोई भी कलेक्टर या पुलिस कप्तान, पंचम तल के किसी अफसर की गाली नहीं खा रहा है. यह बड़ा परिवर्तन है. इसी से जुड़ा हुआ एक और परिवर्तन भी पता चल रहा है कि ट्रांसफर पोस्टिंग का धंधा भी बंद हो चुका है. पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन लोगों ने यूपी पर नज़र रखा है उन्हें मालूम है कि किसी भी मलाईदार तैनाती के लिए तत्कालीन पंचम तल के किसी एजेंट के पास रक़म पंहुचा कर ही अफसर चैन की साँस लेता था. किसी भी सरकार की नीतियों को लागू करने का काम अफसरों का ही होता है. अगर वे ही घूस की ज़िंदगी जी रहे हों तो जनहित का काम कर पाना उनके बूते की बात नहीं है. अगर कोई सरकार अफसरों को भय मुक्त माहौल में काम करने की सुविधा दे रही है तो उत्तर प्रदेश की समकालीन हालात में यह भी अपने आप में बड़ी उपलब्धि है.

पिछले डेढ़ महीने में एक और संकेत बिकुल साफ़ नज़र आ रहा है. पंचम तल का आतंक खतम होने के साथ ही लखनऊ में सत्ता का विकेंद्रीकरण हो रहा है. अब किसी भी विभाग में हो रही गड़बड़ियों के लिए सम्बंधित मंत्री की आलोचना हो रही है. इसका मतलब यह है कि अब मंत्री लोग अपने विभागों की फाइलें निपटा रहे हैं और फैसले ले रहे हैं. उत्तर प्रदेश के बाहर वालों को यह बात अजीब लग सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि मायावती की सरकार में हर फैसला मुख्यमंत्री के दफ्तर में ही होता था. किसी भी मंत्री की औकात नहीं थी कि वह कोई फैसला ले ले. मंत्रियों को उनके विभाग के फैसले की जानकारी तक नहीं दी जाती थी. हाँ कुछ मंत्री पंचम तल तक अपना रसूख बनाये रहते थे तो उन्हें अपने विभाग के फैसलों के बारे में अखबारों में छपने के पहले पता लग जाता था. मायावती के राज में पंचम तल पर जो बहुत सारे अफसर तैनात थे उन के बीच सरकार के विभाग बाँट दिए गए थे और वे ही फैसले लेते थे. मंत्री बेचारे को तो अखबारों के ज़रिये ही पता लगता था या अगर उसने अपने विभाग के प्रमुख सचिव की कृपा अर्जित कर रखी थी तो उसे अखबारों में जाने के पहले खबर का पता लग जाता था. आज स्थिति बिलकुल अलग है. हर विभाग का मंत्री अपने फैसले ले रहा है लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं कि मुख्यमंत्री के अधिकार में किसी तरह की कमी आई है.

नौकरशाही को उसकी सही जगह पर लाने की जो कोशिश मौजूदा मुख्यमंत्री ने की है उसके नतीजे अभी आना शुरू नहीं हुए हैं. लेकिन यह तय है कि नौकरशाही को उसकी ज़िम्मेदारी  निभाने के लिए जो स्पेस चाहिए वह बहुत दिन बाद मिलना शुरू हो गया है. उत्तर प्रदेश से मुहब्बत करने वालों को उम्मीद हो गयी है कि अब सरकारी अफसर भी अपना काम नियमानुसार करेंगे और अपने मातहत अफसरों को अपना काम करने देंगे. पिछले पंद्रह वर्षों में जो भी मुख्यमंत्री आया है उसने गौतम बुद्ध नगर जिले के नॉएडा और ग्रेटर नॉएडा का खूब आर्थिक दोहन किया है. मायावती के राज में यह काम खुद माननीय मुख्यमंत्री या उनके भाई साहब की सरपरस्ती में होता था. मुलायम सिंह यादव के राज में यह काम उनके बहुत करीबी नेता और बाबू साहब के नाम से विख्यात उनकी पार्टी के महामंत्री जी किया करते थे. बीजेपी के सत्ता में रहने पर तो कई ऐसे केंद्र थे जहां से गौतमबुद्धनगर जिले की आर्थिक घेराबंदी की जाती थी.  अखिलेश यादव की सरकार आने के साथ ही इलाके में एक अफवाह फैल गयी कि अब गौतमबुद्धनगर जिले का काम समाजवादी पार्टी के महामंत्री, प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव देखेंगे.

दिल्ली में रहकर उत्तर प्रदेश या समाजवादी पार्टी की बीट कवर करने वाले पत्रकारों को मालूम है कि राजनीतिक शब्दावली में राम गोपाल यादव होने के क्या मतलब है. सबको मालूम है कि वे कभी भी एक पैसे की हेराफेरी नहीं होने देंगे. बहुत लोगों को यह भी मालूम है कि जब मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते बाबू साहब का लूट युग चल रहा था तो रामगोपाल यादव चुप रहते थे लेकिन कभी भी उस तंत्र को अपने करीब नहीं आने दिया. जानकार बताते हैं कि बाबू साहब को पार्टी से निकालने का सख्त फैसला भी राम गोपाल यादव की प्रेरणा से ही लिया गया था. जो भी हो, इस अफवाह का फायदा यह हो रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भूमाफिया के लोग आजकल डरे हुए हैं और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अखिलेश यादव सरकार में किस तरह से लूट तंत्र वाली पुरानी व्यवस्था को कायम किया जाए. सबको मालूम है कि राम गोपाल यादव इस खेल को कभी नहीं होने देंगे. ज़ाहिर है अपनी छवि को सही तरीके से पेश करने में अखिलेश यादव को इस स्थिति का निश्चित फायदा होगा.

अखिलेश यादव ने जो पिछले डेढ़ महीने में सबसे अहम काम किया है वह यह है कि उन्होंने आबादी के लोकतन्त्रीकरण की कोशिश शुरू कर दी है. मायावती के राज में ऐसा माहौल बना दिया गया था कि मुख्यमंत्री तक कोई भी नहीं पहुंच सकता. अगर कोई उनसे मिलने की कोशिश करता तो उसे भगा दिया जाता था. मुख्यमंत्री और आम आदमी के बीच बहुत ही भारी डिस्कनेक्ट था. चुनावी विश्लेषणों के दौरान यह बात कई बार चर्चा में आई भी कि इसी डिस्कनेक्ट के कारण मायावती चुनाव हार गयी थीं. हो सकता यह सच भी लेकिन मायावती की आम आदमी से दूरी बनाए रखने की नीति के कारण आम आदमी की सत्ता से किसी तरह की भागीदारी ख़त्म हो गयी थी. अब वह सब कुछ इतिहास है. अब महीने में दो बार मुख्यमंत्री अपने घर पर मेला लगाकर लोगों से मिलेंगे. इसका फायदा यह होगा कि नौकरशाही पर राजनीतिक सत्ता की हनक बनी रहेगी और सरकारी अफसर मनमानी नहीं कर सकेगा. उसको मालूम है कि पीड़ित इंसान मुख्यमंत्री के पास पहुंच जाएगा और मुख्यमंत्री की नाराज़गी का भावार्थ उत्तर प्रदेश के सरकारी अफसरों से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता. उन्होंने पिछले पांच वर्षों में उसको बाकायदा झेला है.

ज़ाहिर है कि राज्य में शासन का लोकतंत्रीकरण एक बड़ी शुरुआत है और इसके चलते ही अपराध भी ख़त्म होंगे और भ्रष्टाचार भी ख़त्म होगा. पिछले डेढ़ महीने के सरकारी फैसलों पर नज़र डालें तो साफ़ लग जाएगा कि उत्तर प्रदेश की सरकार ने इस काम को करने का संकल्प लिया है. इसलिए किसी जिले में होने वाली अपराध की घटना को मुख्यमंत्री की असफलता के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी. लोकतंत्र में लाजिम है कि अपराध खत्म करने का एक संस्थागत ढांचा बनाया जाय. अब तक की प्रगति से तो यही लगता है कि मौजूदा मुख्यमंत्री उसी ढाँचे की तलाश में है. 

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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