”अगर कोई पंजाबी उर्दू बोलता है तो ऐसा लगता है जैसे वो झूठ बोल रहा हो”

शायद पहली बार इतनी लंबी सोहबत उनकी पायी थी। लगभग पूरी शाम। विनोद दुआ इसलिए हमेशा अलग लगते रहे हैं क्‍योंकि टीवी पत्रकारिता में जब किसी भी तरह से बोलने, बहस करने और रॉ दिखने को काबिलियत माना जाने लगा हो – वे कभी असंपादित नहीं लगे। कल IIC में जब बात भाषा के साथ शुरू हुई, तो उन्‍होंने पूछा कि आप भाषाई प्रयोग करते हैं या जबानी इस्‍तेमाल। मेरी समझ ये थी कि भाषा को ज्‍यादा लोकप्रिय बनाना तो उसके जबानी इस्‍तेमाल से ही संभव है। फिर उन्‍होंने प्रयोगों के कई सारे संदर्भ सामने रखे, जिन पर हमने कभी गौर नहीं किया था।

उन्‍होंने पूछा कि चोटिल शब्‍द है क्‍या, जो खिलाड़ियों के लिए इस्‍तेमाल होता है? जख्‍मी, घायल तो समझ में आता है – लेकिन चोटिल का इस्‍तेमाल कब और कैसे शुरू होने लगा। इसी तरह उन्‍होंने "नॉट आउट" के लिए नाबाद शब्‍द के प्रयोग का स्रोत भी जानना चाहा, पर मैं अपना सर खुजाने लगा।

हिंदी पत्रकारिता में कई नये शब्‍दों के ईजाद का और उसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया को जाता है। ऐसा राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर और रघुवीर सहाय के दौर में ज्‍यादा हुआ। बाद में जनसत्ता के जरिये प्रभाष जोशी ने कई सारे नये शब्‍द चलाये। रविवार में एसपी सिंह ने भी पत्रकारिता की भाषा को नया तेवर, नया अंदाज दिया। इन दिनों ओम थानवी और कमर वहीद नकवी भी फेसबुक पर भाषा-चिंतन करते रहते हैं। शमशेर कहते थे – बात बोलेगी हम नहीं। आशय शायद यह था कि भाषा टूटी-फूटी भी हो तो चलेगी, लेकिन बेबुनियाद बातें नहीं चलेगी। बहरहाल…

लगभग तीन घंटे हम चार लोग बैठ कर शाम-ए-मय में डूबे रहे। फैज और फराज से लेकर फिराक और इकबाल तक बीच बीच में आते-जाते रहे। विनोद दुआ ने फैज की एक बेहतरीन पंजाबी नज्‍म सुनाते हुए मंटो की बात कोट की – अगर कोई पंजाबी उर्दू बोलता है तो ऐसा लगता है जैसे वो झूठ बोल रहा हो। आखिर में डीपीटी आकर बैठे और उन्‍होंने इकबाल की कुछ चीजें सुनायी और गीता पर विनोबा की मशहूर टीका से कुछ टिप्‍पणियां भी साझा की।

कल की बैठक के खुमार को और गहरा करते हुए ओम जी का एक मेल आज सुबह सुबह आया। ज्‍यों का त्‍यों वह मेल आप सबके लिए…

हारून हवेली में डॉ शौकत को (जिनके नाम पर अब कराची का सरकारी अस्पताल है) फैज अपनी रचनाएं सुनाते थे। कुछ गजलें फैज ने डॉ शौकत को लेकर लिखी हैं, ऐसा माना जाता है। वे डाक्टर को ‘मसीहा’ कहकर पुकारते थे। अरशद महमूद के मुताबिक गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले डॉ शौकत के लिए लिखी गजल है। अगस्त 1968 में जब शौकत चल बसीं और रावलपिंडी में होटल फ्लैशमेन्स में फैज को यह खबर दी गयी तो उन्होंने कमरा भीतर से बंद कर लिया। वे तभी बाहर निकले जब डॉ शौकत पर एक मर्सिया लिख सके: चांद निकले किसी जानिब तेरी जेबाई का, रंग बदले किसी सूरत शबे-तनहाई का।

chand nikle kisi janib teri zebai ka
rang badle kisi surat shab-e-tanhai ka

daulat-e-lab se phir ai khusraw-e-shirin-dahan
aj riza ho koi harf shanasai ka

dida-o-dil ko sambhalo k sar-e-sham-e-firaq
saz-o-saman baham puhuncha hai ruswai ka

अरशद कहते हैं कि उर्दू में यह सबसे मार्मिक मर्सियों में एक है। इस मर्सिये को पढ़ते वक्त बरबस मुझे गालिब का मर्सिया याद हो आया, जो उन्होंने अपने दत्तक पुत्र की असमय हुई मृत्यु पर लिखा था।

डॉ शौकत हारून के घर में भले मैं इस प्रसंग में कोई बात छेड़ने का साहस नहीं जुटा पाया, लेकिन हमीद हारून ने घर की जो रेकार्डिंग दीं, उसमें फैज को अपनी रचनाएं पढ़ते हुए सुनना मेरे लिए उनकी दुनिया में जैसे फिर से दाखिल होने का अनुभव था। मानो किसी गुफा की देहरी पर वे खुद आपको लिवा रहे हों; और फिर धीरे-धीरे अपनी आवाज की लालटेन से हर इबारत को इतना रोशन करें कि आगे आपको भीतर और बाहर दोनों आंखों से आप दिखाई देने लगे।

अविनाश दास के फेसबुक वॉल से साभार.

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