अगर बड़ी कुर्सी पर बैठना है तो मोदी जी जवाब तो देना होगा

Deepak Sharma : कुर्सी सबसे बड़ी चाहिए तो दिल भी सबसे बड़ा होना चाहिए. माफ़ी मत मांगिये जनाब ….पर कोई नाराज़ है तो उसे मना तो सकते है. किसी को मनाने से क्या कद छोटा हो जायेगा? भरी महफ़िल में आपसे कोई पूछता है कि २००२ के गुजरात दंगों के लिए क्या आपको अफ़सोस है? तो ये सवाल आपको तिलमिला देता है और आप झुंझलाकर कहते है कि इस सवाल का जवाब मैं पहले दे चुका हूँ ..अब नही दूंगा. ये तो कोई बात नहीं हुई. ये तो कोई जवाब नहीं है. ये अंदाज़ तो जिद से भरा है जनाब ….अंग्रेजी में इसे arrogance कहते है और arrogance नेता की शक्सियत में ज़हर घोल देती है.

सवाल ये है कि अगर बड़ी कुर्सी पर बैठना है तो मोदी जी जवाब तो देना होगा और हर बड़े मंच पर देना होगा क्यूंकि सवाल देश के २५ करोड़ मुसलमानों का है और ये गिनती मामूली नहीं है. बाबरी मस्जिद गिरने के बाद ये गिनती अडवाणीजी को भी समझ आई थी. और तब वो पहली बार अजमेर शरीफ गए. तभी उन्होंने दिल्ली के इस्लामिक सेंटर बनवाने में ग्रांट जारी की थी. और तभी वो जिन्नाह की तारीफ़ करने के लिए मजबूर भी हुए थे.

25 करोड़ की गिनती का एहसास कई साल बाद RSS को भी हुआ और तभी मुसलमानों के लिए संघ से जुड़े लोगों ने राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच की स्थापना की. 1977 में ये गिनती तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बहरी वाजपेयी ने समझी और पहली बार पाकिस्तान जाने के लिए वीजा के नियमों को सहज किया और खुद पाकिस्तान गए. 10 साल पहले जनसंघ के अध्यक्ष और पार्टी विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने इसी गिनती के मर्म को समझकर कहा था कि भारतीय समाज में हिंदू और मुस्लमान अलग नहीं किये जा सकते क्यूंकि एक ही खून से पैदा हैं.

बहरहाल मोदी जी आपका कद आज बीजेपी से बड़ा हो सकता है इसलिए आपको अडवाणी, अटल और पंडित दीन दयाल उपाध्याय की राजनीति अप्रसांगिक लग सकती है पर निश्चित तौर पर आपका कद देश से बड़ा नहीं है. मोदी जी हो सकता है आप मनमोहन सिंह से कई गुना बेहतर हुक्मरान हो…और ये भी हो सकता है कि आप देश को चीन की बराबरी पर लाकर खड़ा कर दे पर सच ये भी है कि बिना २५ करोड़ मुसलमानों को मना कर आप देश की गद्दी पर नही बैठ सकते.

गुजरात दंगों पर सुप्रीम कोर्ट ने अब तक आपको क्लीन चिट् दी है और आप कानून की नज़र में कसूरवार नहीं है पर २५ करोड़ दिलों में आपको लेकर जो संदेह और डर है उसे दूर करना ही होगा.
इसलिए अगली बार जावेद अंसारी जैसा कोई पत्रकार किसी बड़े मंच पर आपसे २००२ गुजरात दंगों पर सवाल पूछे तो आप मनमोहन सिंह की तरह चुप्पी न साध लीजियेगा. आपको जिगर बड़ा कर के अपने दिल की बात कहनी चाहिए….और बार बार कहनी चाहिए. दिल से निकलेगी तो दूर तलक जायेगी. फिलहाल एक शेर अर्ज है शायद आपके काम आये.

जो मुखालिफ आज हैं मुमकिन है कल साथ चलें
सजदा न सही, पर मिजाज़ तो बदलकर देखिये

वरिष्‍ठ पत्रकार दीपक शर्मा के एफबी वॉल से साभार.

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