अगर मीडिया को कोई कार्पोरेट घराना ईंधन दे रहा है तो उसकी पूजा होनी चाहिए!

पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ, फिर बलात्कार की घटना को लेकर और अब कश्मीर में दो भारतीय सैनिकों के सिर काटने की घटना को लेकर भारत–पाकिस्तान के संबंधों की शल्य-क्रिया करते हुए मीडिया ने खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपना काम पूरी निष्ठा व ईमानदारी से किया. यह अलग बात है कि किसी ने पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात कही तो किसी ने शालीनता बरतने के साथ ही दौत्य साधनों के ज़रिये पाकिस्तान को सख्त सन्देश की बात कही.

 

इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि इन तीनों घटनाओं ने भारतीय जन-मानस को झकझोरा है और इतिहास के टर्निंग पॉइंट के रूप में देखा जा रहा है. शायद ही कोई यह आरोप लगाये कि मीडिया में इतने जबरदस्त कवरेज के पीछे भी कोई कॉर्पोरेट हित रहा हो या भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कोई आर्थिक लाभ किसी कॉर्पोरेट घराने से मिला हो. भ्रष्टाचार के खिलाफ जनान्दोलन को क्यों कोई कॉर्पोरेट घराना ईंधन देगा? और अगर देता है तो देश में इन घरानों की पूजा होनी चाहिए.

लेकिन इतना सब होने के बावजूद मीडिया को मिली आलोचना. प्रधानमंत्री ने कहा “भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना-आन्दोलन मीडिया की उपज है”. जब इस मुद्दे को लेकर दोबारा जनता में वही उत्साह नहीं दिखा और मीडिया ने यह रिपोर्ट किया तो अन्ना और टीम अन्ना ने आरोप लगाया कि कॉर्पोरेट घरानों के दबाव में मीडिया चुप हो गयी है. बलात्कार के मुद्दे पर जब मीडिया ने कड़कड़ाती रातों में भी पीडिता को छुपा कर ले जाने के सारे उपाय पर पानी फेर कर जनता को एक-एक सत्य बताया तो उन्हें मंत्रालय ने एडवाइजरी के ज़रिये कंटेंट कोड एवं लाइसेंसधारी होने की याद दिलाई और “संतुलित रिपोर्टिंग” करने की ताकीद की.

मीडिया के मूल कर्तव्यों में एक है “जनता के सामने हर पक्ष रखा जाना”. लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिनका “अन्य” पक्ष नहीं होता. उदाहरण के लिए बलात्कार को यह कह कर उचित नहीं ठहराया जा सकता कि महिलाएं बाहर ना निकले या छोटे कपड़े ना पहने. सती-प्रथा उन्मूलन, या गुलाम परम्परा के खिलाफ आन्दोलन का दूसरा पक्ष नहीं हो सकता और उसी तरह भ्रष्टाचार का भी कोई दूसरा पक्ष नहीं हो सकता. यानि कोई मीडिया संस्था यह नहीं कह सकती कि एक अमीर उद्योगपति जो हजारों लोगों को नौकरी देता है और देश की जीडीपी में योगदान देता है वह अगर थोड़ा सा भ्रष्टाचार कर लेता है तो कौन सा क़यामत बरपा हो जाता है. उपरोक्त सभी मामले ऐसे थे जिनमें दूसरा पक्ष नहीं था केवल कौन कितना दिखा रहा है इस पर चर्चा हो सकती थी.

मीडिया के खिलाफ सत्ता पक्ष का अनुदार ही नहीं बल्कि दमनकारी भाव नया नहीं है. संविधान अंगीकार होने के एक साल के भीतर हीं तमाम बंदिशें प्रेस पर असंवैधानिक रूप से लगायी गयी. उदहारण के तौर पर जहाँ अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के मौलिक अधिकार (१९(१) (अ) को लेकर संविधान निर्माताओं ने मात्र चार प्रतिबन्ध— राज्य की सुरक्षा, नैतिकता व डीसेन्सी, मान-हानि एवं अदालत की अवमानना. लेकिन एक साल में हीं संविधान-सभा के फैसले को दरकिनार करते हुए तत्कालीन सरकार ने पहले संविधान संशोधन के ज़रिये तीन नए प्रतिबन्ध — जन-व्यवस्था (पब्लिक आर्डर), विदेशी राष्ट्र से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध और अपराध करने के लिए उकसाना शामिल कर लिया. जन-व्यवस्था रुपी प्रतिबन्ध महज इसलिए लाया गया क्योंकि तत्कालीन शासन को सुप्रीम कोर्ट का रोमेश थापर बनाम मद्रास में प्रेस के पक्ष में किया गया फैसला पसंद नहीं आया.

संविधान-निर्माताओं की भावना के साथ शायद इतना बड़ा खिलवाड़ पहले और बाद में भी नहीं हुआ था. संविधान के अनुच्छेद १३(२) में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि राज्य ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाएगा, जिससे किसी भी प्रकार से मौलिक अधिकार बाधित होते हों. इसके बावजूद संसद में प्रथम संसोधन के ज़रिये प्रेस स्वतंत्रता को जबरदस्त तरीके से बाधित किया गया. इस संसोधन के तत्काल बाद प्रेस (आब्जेक्श्नेबुल मटेरियल) एक्ट १९५१ लागू किया गया और १८५ अखबारों के खिलाफ सरकार ने कार्रवाई की.

इस संविधान संशोधन से कुपित होकर आचार्य कृपलानी ने जो की संविधान-सभा के सदस्य थे संसद में बोलते हुए कहा, “यह संशोधन एक विचित्र छलावा (स्ट्रेंज जगलेरी) है और सरकार की ऐसी मंशा के बारे में संविधान सभा सोच भी नहीं सकती थी.” उनका मानना था कि अनुच्छेद १३(२) के स्पष्ट मत के बाद भी अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को बाधित करना संविधान की आत्मा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है. इन सब बातों से बिना विचलित हुए सत्ताधारियों ने १९७१ में एक अन्य संशोधन के ज़रिये १३(२) के प्रभाव को ख़त्म कर दिया. बाद में भी कुछ ऐसे प्रयास हुए जिनके माध्यम से प्रेस को पंगु बनाने की कोशिश की गयी परन्तु इमरजेंसी के बाद से शासकों को यह अहसास हो गया कि इसे छेड़ना देश की प्रजातंत्र –पसंद जन-भावनाओं से खिलवाड़ करना होगा.

लेकिन यूपीए सरकार इमरजेंसी की घटना से सबक ले चुकी है और उसका मीडिया –विरोध हाल के कुछ वर्षों में शालीन व सहयोगी भाव का रहा है. मीडिया ने भी जब –जब कोई सरकारी एडवाइजरी औपचारिक या अनौपचारिक रूप में आई है उसका पूर्ण व सादर संज्ञान लिया है. स्व-नियमन के जिस मार्ग पर आज का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चल रहा है उसकी पहली ही शर्त है हर सलाह को खुले मन से आने देना और अपने प्रति समाज के हर वर्ग की राय को बगैर किसी पूर्वाग्रह के देखना. बलात्कार पीडिता की शव-यात्रा ना कवर करने या परिजनों का इंटरव्यू ना लेने (ताकि पीडिता की पहचान उजागर ना हो) के पीछे यही भाव था.

मीडिया की आलोचना करने में तीन तरह के लोग होते हैं. एक जो आलोचना करके मीडिया के खिलाफ एक सरकारी नियामक /नियंत्रक संस्था बनाने के मंसूबे को हवा दे कर खुद उसका प्रमुख बन दिन-रात टीवी में अपना चेहरा दिखाना चाहते हैं और साथ हीं अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक, मायावती से ममता तक हर मुद्दे पर देश को अपनी बात मनवाने का भाव रखते हैं और अगर देश ना माने तो उसे अज्ञानी कहते हैं. दूसरे वो जो इसकी निंदा के नियमित लेख लिख कर आर्थिक आमदनी करने के अलावा समाज में बौद्धिक जुगाली के ज़रिये बने रहना चाहते हैं. तीसरा वह वर्ग है जो मीडिया में रह कर मोटी तन्खवाह लेकर समाजवादी चेहरा बनाये दाढ़ी खुजलाते हुए मीडिया को हीं गाली देता है और ऐसा करके यह बताना चाहता है कि “देखो हम नैतिक रूप से कितने मज़बूत हैं कि उसी मीडिया में रह कर उसी की बुराई भी करते हैं यानि हम वह सब नहीं करते जो अन्य करते हैं”.

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्व-नियमन के मार्ग पर काफी आगे तक बढ़ रहा है और जहाँ ब्रिटेन में यह स्व-नियमन असफल साबित हुआ था, भारत विश्व मीडिया को एक नयी रह दे सकता है शर्त यह है कि इसकी निंदा सकारात्मक भाव से हो नाकि दूकान चमकाने के लिए.

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हो चुका है. 

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *