”अगर यही पत्रकारिता है तो आलोक मेहता और इस तरह की खबरें गढने वाले धन्य हैं”

यशवंत जी, ''हद के कांग्रेसी चाटुकार हो गए हैं आलोक मेहता'', शीर्षक वाले लेख में लेखक के विचार बेहद मौजू हैं। यह कोई नया बदलाव नहीं है। अगर आलोक मेहता के पिछले एक दशक की पत्रकारिता पर नजर दौड़ाएं तो आपको मिलेगा कि पत्रकारिता के मानदंडों और नैतिकता के मूल्यों को आलोक जी ने आउटलुट पत्रिका के दौरान ही त्याग दिया था। आलोक मेहता ने कुछ साल पहले ''पत्रकारिता की लक्ष्मणरेखा'' नाम से एक पुस्तक लिखी थी। ऐसा लगता है कि इस पुस्तक का उद्देश्य पत्रकारों की नई पीढी को भ्रम में रखना और उन्हें आलोक मेहता जैसे स्वनामधन्य पत्रकारों की कारगुजारियों से अनभिज्ञ रखने का कुत्सित प्रयास था।

आलोक मेहता के नई दुनिया के कार्यकाल में दौरान अक्सर बेहद हास्यास्पद और निराधार खबरें पहले पन्ने पर देखने को मिलीं। उदाहरण के लिए लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी दक्षिण दिल्ली से लडेंगी चुनाव, अरूण जेतली जाएंगे, राज्य सभा मे नजमा होंगी विपक्ष की नेता और नाना जी से ली थी अण्णा ने दीक्षा जैसी खबरें प्रकाशन के दिन ही फुस्स हो गईं। हास्यास्यपद स्थिति तो उस समय हुई जब टेलीविजन पर चर्चा के दौरान आलोक जी ने दीक्षा की नई परिभाषा गढने का असफल प्रयास किया। नानाजी के साथ दिग्विजय सिंह, मुलायम सिंह यादव और डा एपीजे अब्दुल कलाम की तस्तीरें मीडिया में सामने आने पर आलोक मेहता ने इन्हें नई दुनिया अखबार में प्रमुखता देना उचित ही नहीं समझा।

अब नेशनल दुनिया में भी यही प्रक्रिया अपनाते हुए निराधार खबरों को गढने की कवायद हो रही है। इस सिलसिले में एक पखवाडे के भीतर ही भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के दूसरे कार्यकाल के बारे में अनर्गल खबरें देखने को मिली। पहली खबर में था कि नितिन गडकरी को नहीं मिलेगा दूसरा कार्यकाल। इसके चंद दिन बार फिर खबर छपी संघ की गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं देने की हरी झंडी। अगर यही पत्रकारिता है तो आलोक मेहता और इस तरह की खबरें गढने वाले धन्य हैं।

आलोक मेहता के नई दुनिया में करीब पौने चार साल के कार्यकाल के दौरान इस तरह के ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। ऐसी स्थिति में समझ में नहीं आता है कि राष्ट्रपति की शुभकामनाओं के बावजूद नेशनल दुनिया दिल्ली के पत्रकारिता जगत में किस सीमा तक अपनी विश्वसनीयता बनाने में सफल होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि आलोक मेहता के नेतृत्व में इस प्रकार की खबरें किसी बाहरी व्यक्ति या दल के इशारे पर किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखी गई थीं। ऐसा लगता है कि यह सब कुछ अतिरिक्त पाने की लालसा में आत्म गुणगान की एक शैली है।

लेखक आलोक मेहता के पुराने सहयोगी हैं और इस समय स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे है. उन्होंने अपना नाम प्रकाशित न करने का अनुरोध किया है.

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