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अजमेर हंस रहा था जरदारी के इस ‘लाइव कवरेज’ पर

पत्रकारिता के सर्वमान्य सिद्धांतों में यह भी आता है कि जब आप किसी खबर को कवर करने जा रहे हों तो कम से कम वहां की सामान्य जानकारी तो आप कर ही लें, परंतु लगता है हिन्दी न्यूज चैनल ‘हम नहीं सुधरेंगे’ के अपने अड़ियल सिद्धांत पर कायम रहने की कसम खा चुके हैं। इतवार को भी ऐसा ही हुआ। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उनके बेटे बिलावल की अजमेर यात्रा को लेकर न्यूज चैनल जो ‘लाइव कवरेज’ कर रहे थे, उसे लेकर अजमेर की जनता हंस रही थी। पत्रकारों को कितना सामान्य ज्ञान होता है, यह भी नजर आ रहा था।

पत्रकारिता के सर्वमान्य सिद्धांतों में यह भी आता है कि जब आप किसी खबर को कवर करने जा रहे हों तो कम से कम वहां की सामान्य जानकारी तो आप कर ही लें, परंतु लगता है हिन्दी न्यूज चैनल ‘हम नहीं सुधरेंगे’ के अपने अड़ियल सिद्धांत पर कायम रहने की कसम खा चुके हैं। इतवार को भी ऐसा ही हुआ। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उनके बेटे बिलावल की अजमेर यात्रा को लेकर न्यूज चैनल जो ‘लाइव कवरेज’ कर रहे थे, उसे लेकर अजमेर की जनता हंस रही थी। पत्रकारों को कितना सामान्य ज्ञान होता है, यह भी नजर आ रहा था।

जरदारी का काफिला नई दिल्ली से पाक विमानों के जरिए जयपुर के सांगानेर एयरपोर्ट और उसके बाद भारतीय वायु सेना के हैलीकॉप्टरों के जरिए अजमेर के हैलीपैड पर पहुंचा। वहां से कारों के जरिए गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पहुंचा। यह कार्यक्रम सभी को पता था। अजमेर के स्थानीय अखबार जरदारी की इस यात्रा का मिनट-दर-मिनट कार्यक्रम दो-तीन दिन पहले से छाप रहे थे। तीन दिन से हैलीपैड से लेकर दरगाह तक रिहर्सल चल रही थी। जो मार्ग था उससे शहर दो भागों में बंट चुका था। लोगों को दो-दो घंटे सड़क पार करने का इंतजार करना पड़ रहा था। सारा देश गुड फ्राइडे, शनिवार और रविवार की छुट्टी मना रहा था, जबकि अजमेर के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की छुट्टी रद्द कर दी गई थी। और ‘आईबीएन 7’ पता नहीं किस कीमत पर खबर दे रहा था कि जरदारी की इस यात्रा के लिए खासतौर पर घूघरा हैलीपैड बनाया गया है। अजमेर में आई इस चैनल की संवाददाता जिसे कभी ‘इप्शिता’ संबोधन दिया जा रहा था और कभी ‘इप्सिता’, उसका सामान्य ज्ञान यह था कि वह घूघरा को घूंघरा कह रही थी। अपने कैमरे में दिखाए जा रहे साइनबोर्ड पर भी वह सही नाम ना तो हिन्दी में पढ़ पाई थी ना ही अंग्रेजी में। चैनल भी घूघरा को घुघरा लिख रहा था।

हद तब हो गई जब एंकर ने अपनी इस संवाददाता से पूछा कि घूघरा के लोग तो बड़े ही असमंजस में होंगे? उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा होगा कि आज यहां क्या हो रहा है जो इतनी गाड़िया आई हैं? इतनी भीड़ जुटी हुई है। वे सोच रहे होंगे आखिर कौन वीआईपी आ रहा है? संवाददाता भी एंकर की हां में हां मिलाने लग गई। ‘जी न्यूज’ और ‘आईबीएन 7’ दोनों को यह पता नहीं था कि घूघरा हैलीपैड आज नहीं बना है। यह कई साल पुराना है। जरदारी बेनजीर भुट्टो के साथ यहां पहले भी आ चुके हैं। पिछले दिनों ही राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील भी यहां आकर गई हैं। परवेज मुशर्रफ भी राष्ट्रपति की हैसियत से यहां आए थे। आए दिन कोई ना कोई वीआईपी यहां आता रहता है और कभी कम तो कभी ज्यादा वक्त के लिए अजमेर की जनता को रास्तों पर आवागमन रोक दिए जाने की पीड़ा को भुगतना पड़ता है। और न्यूज चैनल कह रहे थे कि हैलीपैड खास इस यात्रा के लिए ही बनाया गया है।

घूघरा अजमेर नगर निगम की सीमा पर स्थित एक गांव जरूर है परंतु यह कभी का अजमेर का हिस्सा बन चुका है। हालत यह है कि अजमेर का जिला परिवहन कार्यालय और राजस्थान रोडवेज का अजमेर डिपो कारखाना भी घूघरा हैलीपैड के पहले है और ‘स्टार न्यूज’ का हाल यह था कि उसे लिखना पड़ रहा था, ‘जरदारी घूघरा से अजमेर रवाना’ यह ऐसा ही था जैसे लिखा जाता ‘जरदारी पालम से दिल्ली रवाना।’ स्टार न्यूज बार-बार खबर दे रहा था। ‘जरदारी दरगाह पर चादर चढ़ाएंगे’ दरगाह एक लम्बा चौड़ा परिसर है। चादर उस पर नहीं बल्कि ख्वाजा साहब की मजार पर चढ़ाई जाती है। चैनल कहे जा रहे थे। ’जरदारी 20 मिनट दरगाह में रहे’ जबकि हकीकत यह थी कि वे दरगाह में नहीं ‘आस्ताना शरीफ’ में बीस मिनट रहे। आस्ताना वह जगह है जहां गरीब नवाज की मजार है। वहां दुआ की जाती है। चादर चढ़ाई जाती है। गलतियां कहां नहीं हुई? दिल्ली-अहमदाबाद हाइवे पर ठीक उस समय वाहन गुजरते कैमरा दिखा रहा था, जब रिपोर्टर कह रहा था आप देख सकते हैं यातायात बिल्कुल रोक दिया गया है। एक चैनल हैलीकॉप्टरों की संख्या चार-पांच बता रहा था तो दूसरा तीन जबकि कैमरा दो दिखा रहा था।

दिल्ली या जयपुर से कथित बडे़ और विद्वान पत्रकारों को भेजने से तो बेहतर होता कि वे यह काम अजमेर के अपने स्ट्रिंगरों के भरोसे छोड़ देते। उनकी मेहरबानी पर टिके वे ‘निरीह, ’नाकाबिल‘, ’बेचारे‘ स्ट्रिंगर कम से कम ऐसी गलतियां तो नहीं करते। न्यूज चैनलों की भद्द भी पिटने से बच जाती। पत्रकारिता का एक सिद्धांत यह भी है कि गलती या भूल होने यहां तक कि जबान फिसल जाने पर भी उसे स्वीकार कर गलती सुधारी जाती है। कुछ समाचार पत्र गलती स्वीकार करते हैं और सही खबर छापते हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन इस गरिमा को आज भी कायम किए हुए हैं परंतु निजी व्यावसायिक न्यूज चैनल तो गलती होने पर भी गलती स्वीकार नहीं करते। यह तो बेशर्मी की हद है।

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

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