अज़ीज़ बर्नी : एक अबूझ पहेली

उर्दू मीडिया में अज़ीज़ बर्नी एक अजब ही टाइप के इंसान का नाम है। वह कब क्या करेंगे किसी को पता नहीं। सहारा में रहते हुये तो उनहों ने बहुत सारी नौटंकी की अब सहारा से अलग होकर तरह तरह की नौटंकी कर रहे हैं। सहारा उर्दू से अलग होने के बाद वह बहुत दिनों तक किसी अखबार से जुड़े नहीं रहे अलबत्ता तरह का एलान करते रहे। शहर शहर घूमते रहे और आखिर में उनहों ने उर्दू का एक एक अखबार अजीजुल हिन्द निकाल कर यह ज़ाहिर कर दिया कि वह शहर शहर घूम कर आखिर क्या करना चाह रहे थे।
 
कोई माने या न माने बर्नी भारत में उर्दू मीडिया का सबसे बड़ा नाम है। यह बर्नी का ही कमाल है कि उर्दू में भी पत्रकारों को ठीक ठाक तनख्वाह मिलने लगी। बर्नी साहब भारत के ऐसे पहले उर्दू संपादक हैं जिन्हों ने यह साबित करके दिखाया कि उर्दू के अखबार भी बड़े पैमाने पर देश के विभिन्न भागों से निकल  सकते हैं। इसके बावजूद उनमें एक बड़ी खराबी यह थी कि जहां एक तरफ उनहों ने अपने चमचों को अच्छी तनख्वाह दी वही ऐसे लोगों को हमेशा तंग किया जो पत्रकार तो अच्छे थे मगर उनकी चमचागीरी नहीं करते थे। 
 
बर्नी के लाख कमाल के बावजूद ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं है जो बर्नी साहब को गाली देते हैं। उनपर तरह तरह के आरोप लगाते हैं। बर्नी को बुरा भला कहने वालों में ऐसे लोग अधिक हैं, जो हैं तो बर्नी से अधिक योग्य मगर बर्नी ने उनको कभी महत्व नहीं दिया। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनसे बर्नी की मुलाकात भी नहीं है मगर वह सिर्फ बर्नी को इसलिए बुरा भला कहते हैं क्यूंकि  वह बर्नी की शोहरत से जलते हैं। यह भी एक बड़ा सत्य है कि बर्नी साहब को बुरा कहने वालों की संख्या जहां बहुत अधिक है वहीं उनके सामने उनको बुरा कहने वाले शायद ही मिलें। जो लोग उनके खिलाफ उर्दू अखबार में लिखते भी हैं वह भी फर्जी नाम से लिखते हैं।  और जहां तक बर्नी की शोहरत का सवाल है तो यह एक हक़ीक़त है कि भारत में उनसे मशहूर उर्दू का कोई भी संपादक नहीं है। आज भी उर्दू नहीं जानने वाले 10 बड़े पत्रकार से किसी एक उर्दू संपादक का नाम पूछें तो उनमें से 9 बर्नी का ही नाम कहेंगे।
 
खैर अब बात बर्नी के अपने अखबार अजीजुल हिन्द की। जब बर्नी ने यह अखबार शुरू किया तो चूंकि उनका नाम बड़ा था इसलिए बड़ी संख्या में पत्रकार उनके अखबार में नौकरी के लिए उनके यहाँ पहुंचे। इनमें कई तो ऐसे थे जो बर्नी का नोएडा में आलीशान मकान देख कर ही हैरान हो गए। उनहों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उर्दू अखबार का संपादक भी इतना अमीर हो सकता है। मगर नौकरी के लिए गए इन पत्रकारों को बड़ी हैरानी तब हुई जब बर्नी ने उनमें से अधिकतर से यही कहा  कि मेरे साथ अप यह सोच कर शामिल हों कि क़ौम की सेवा करनी है मेरे यहाँ बड़ी तनख्वाह की उम्मीद न रखें। इन पत्रकारों को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई जो बर्नी इतने आलीशान मकान में रहता है और जो इतने महंगे कपड़े पहनता है उसे तनख्वाह देने में परेशानी हो रही है। खैर जिन लोगों को कुछ हद तक मुनासिब तनख्वाह मिली उन्होने बर्नी साहब के साथ काम करा शुरू कर दिया। मगर अभी ज्यादाह दिन नहीं बीते थे कि बर्नी साहब ने अपनी हरकत दिखानी शुरू कर दी। कई को उतने पैसे नहीं दिये गए जीतने के वादे किए गए थे और  किसी को सिर्फ इसलिए नौकरी से निकल दिया गया कि उसने दो दिन कि छुट्टी कर ली थी। कुल मिलाकर उनहों ने अपनी वह हरकत दिखनी शुरू कर दी हैं जिसके लिए वह मशशूर रहे हैं और उनकी जिस हरकत से उनके साथ काम करने वाले नाराज़ रहते थे।
 
कमाल की बात यह है कि एक तरफ जहां वह अपने साथ काम करने वालों को उचित तनख्वाह नहीं दे रहे हैं वहीं दूसरी तरफ वह अखबार चलाने के के लिए लोगों से चंदा मांग रहे हैं। रौजाना अपने अखबार में कुछ न कुछ ऐसा लिखने रहे हैं जो चर्चा का विषय बन रहा है। 26 अगस्त के अखबार में उनहों ने पहले पृष्ट पर दो लड़कियों का पत्र प्रकाशित किया है जो उनको अखबार निकालने के लिए मदद करना छह रही हैं। एक ने तो यहाँ तक लिख दिया है की मैं अपनी ईदी आपको मदद के तौर पर देना चाहती हूँ। हाल ही में उनहों ने अखबार में पूरे एक पेज का विज्ञापन छाप कर विभिन्न पदों के लिए आवेदन मांगे। हद तो तब हो गई जब उनहों ने एक पद के लिए 2 लाख से 5 लाख तक तनख्वाह देने की  बात कही है। इस विज्ञापन के बाद पहले उनसे धोखा खा चुके लोग उन्हें गाली दे रहे हैं और अन्य लोगों को बता रहे हैं की बर्नी के बहकावे में नहीं आयो वह ऐसे ही धोखा बाज़ी कर रहे हैं। श्रीनगर और हैदराबाद के लोगों में भी बर्नी को लेकर गुस्सा है। वहाँ के पत्रकारों का कहना है कि बर्नी ने कई को तनख्वाह नहीं दी और उसके साथ धोखा किया। जो सहारा छोड़ कर बर्नी के कहने पर उनके अखबार में आए थे वह कहीं के नहीं रहे।
 
समझ में नहीं आता कि बर्नी आखिर चाहते क्या हैं। उर्दू में काम करने वालों की वह उचित तरीके से तनख्वाह दे नहीं रहे हैं और दूसरी तरफ हिन्दी और अंग्रेज़ी में भी अखबार लाने की बात कर रहे हैं।  जहां तक अखबार के लिए पैसे का सवाल है तो वह हर रोज़ यही कह रहे हैं कि अब हमने अखबार शुरू कर दिया अब क़ौम की ज़िम्मेदारी है कि वह इस अखबार को चलाये। बर्नी साहब को यह कौन समझाये  कि यदि किसी को पैसों से मदद करनी ही होगी तो वह मदरसों में पढ़ने वाले ग़रीब बच्चों की मदद करेगा या बर्नी साहब को अखबार के नाम पर ऐश करने के लिए देगा। बर्नी की कुछ अलग टाइप की हरकत के कारण ही अब उनसे लोग हटने लगे हैं। जब वह सहारा में थे तो हर बड़ा मुसलमान उनसे मिलना चाहता था मगर अब हर कोई उनसे कट गया है। बहुत से लोग उनसे कट गए हैं। अधिकतर को यही समझ में नहीं आ रहा कि बर्नी साहब असल में चाहते क्या हैं। अगर वह बड़े पैमाने पर अखबार निकालना ही चाहते हैं तो देश के बड़े बड़े अमीरों से बात करें , अच्छा अखबार निकालें ताकि उनका भी नाम हो और पैसा लगाने वालों को आर्थिक लाभ भी हो। कुल मिलाकर बर्नी एक ऐसी अबूझ पहेली हैं जिसे समझना आसान नहीं है। आने वाले दिनों में वह और क्या क्या नया करेंगे यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा।
 
पत्रकार एएन शिबली का विश्लेषण.

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