Ajit Anjum : दरअसल गुवाहाटी के उस अखबार का मालिक ऐसा था, जिसे एक दिन भी झेलना मुश्किल था. किसी तरह दो महीने हमने झेला और जिस दिन लगा कि अब झेलना मुश्किल है, उस दिन खरी खोंटी सुनाकर अपने साथियों के साथ इस्तीफा दिया और दफ्तर से निकल गए …नौकरी छोड़ने की कई वजहें थी. एक वजह कॉलबेल भी था. उस अखबार के मालिक के पैरों तले तीन तरह के कॉलबेल का बटन था. एक चपरासी के लिए, दूसरा संपादकीय विभाग के लिए और तीसरा मार्केटिंग के लिए. हर घंटी की आवाज अलग अलग थी और घंटे बजते ही किसी न किसी को मालिक के कमरे में जाना होता था.
मालिक का नाम था गोवर्धन अटल (जो अटल तो किसी चीज पर नहीं होते थे लेकिन खांटी संघी थे). शायद अटल जी के नाम से प्रभावित होकर उन्होंने अपने नाम के आगे अटल लगा लिया था, हालांकि ये बात मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता). इसी घंटी की आवाज ने एक दिन हमें बगावत करने को मजबूर किया. पटना से गए हम पांच पत्रकारों ने एक साथ नौकरी छोड़ने का फैसला किया. मालिक के कमरे में नौकरी छोड़ने की सूचना देने हम एक साथ गए. मालिक के समझाने – बुझाने – पुचकारने और आखिर में धमकाने का जवाब देते वक्त तक हम पांचों साथ थे. मैं उनमें सबसे युवा था, लिहाजा सबसे ज्यादा गर्म खून भी मेरा था और गोवर्धन अटल के बेवकूफाना फरमानों का विरोध करते हुए बहस भी मैं ही सबसे ज्यादा कर रहा था.
उस कमरे में दाखिल होने से पहले मैंने बाकी साथियों का समर्थन हासिल कर लिया था, सो मैं मानकर चल रहा था कि जो मैं बोल रहा हूं, उसमें सबकी सहमति है. वहां भी किसी ने विरोध नहीं किया. साथ इस्तीफा देने का एलान किया. एक ही साथ वहां से अपने फ्लैट के लिए निकले (फ्लैट भी हमें अखबार मालिक ने ही मुहैया कराया था). घर पहुंचकर हम सब कुछ घंटे तक एक ही राय के थे कि तुरंत इस घर को भी खाली कर देना चाहिए क्योंकि जिस मालिक की नौकरी हमने उसके तौर तरीकों के विरोध में छोड़ी है, उसके घर में एक दिन भी नहीं रहना चाहिए ….
लेकिन कुछ घंटों के भीतर हम पांच दो गुटों में बंट गए. तीन एक तरफ और बाकी दो दूसरी तरफ. दूसरी तरफ वाले दोनों भाई उसी अखबार मालिक के संपर्क में आ चुके थे और हमें बताए बगैर उसके दूत से मिलकर उसी अखबार में वापस जाने का फैसला कर चुके थे. बदले में दोनों की तनख्वाह बढ़ा दी गयी. जिम्मेदारियां बढ़ा दी गयी. दोस्तों से दगा और मालिक से वफादारी की जो कीमत उन्हें मिलनी चाहिए थी, तत्काल प्रभाव से मिली. हमारे देखते – देखते मिली.
22 साल की उम्र में पहली बार नए किस्म का तजुर्बा हुआ. पटना से हम पांच साथ आए थे . दो रह गए . तीन वापस चले. ठगे – ठगे से ….किसी और से नहीं …दोस्तों से ….जिनके साथ हमने गुवाहाटी में झंडे गाड़ने के सपने देखे थे…. दोपहर को जो लोग मालिक के सामने बागी तेवर के वक्त हमारे साथ थे , रात होते – होते उन्हें अखबार मालिक की बातें सही और हमारा तेवर और विरोध गलत लगने लगा था . हमने उसी शाम तय किया कि अब इस फ्लैट में एक मिनट भी नहीं रहेंगे . जिसकी नौकरी छोड़ दी , उसके फ्लैट में क्यों रहें ( अखबार मालिक ने किराए पर लेकर वो फ्लैट हम पांचो को दिया था ) . हमारे दोनों साथियों ने उस शाम हमें मालिक के पक्ष में समझाने के बाद हमारा साथ छोड़ दिया. गुवाहाटी में उन दिनों बोडो आंदोलन चल रहा था. ट्रेनें बंद थी लेकिन हमने सामान पैक किया और घर से निकल पड़े.
मैं, रत्नेश कुमार और हिमांशु. बाकी दोनों साथियों ने लंबे समय तक उसी अखबार में काम किया. उत्तरकाल के नाम से वो अखबार निकला. बाद में उनमे से एक बड़े अखबार के संपादक बने. हम तीन किसी तरह एक होटल में प्रति बेड रुपये रोज पर रात गुजारने और दस रुपये रोज की खुराक पर सात – आठ दिन गुजारने के बाद पटना लौटे . उनमे से एक अभी पटना हिन्दुस्तान में हैं . दूसरे गुवाहाटी के दूसरे अखबार में और तीसरा मैं …
गुवाहाटी में नौकरी मिलने की कहानी तो दिलचस्प नहीं है लेकिन नौकरी छोड़ने और फिर कई दिनों तक दस रुपए रोज वाले होटल में पड़े रहने के बाद पटना लौटने की कहानी दिलचस्प है . मेरे ख्याल से फरवरी 1988 का महीना होगा , जब पटना में गुवाहाटी से निकलने वाले एक अखबार में पत्रकारों के चयन के लिए टेस्ट का आयोजन हुआ . मेरे जैसे कई फ्रीलांसर और बे – नौकरी ( बेरोजगार नहीं था मैं ) लड़कों ने उस टेस्ट में हिस्सा लिया . पटना के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रेश्वर जी उस अखबार के संपादक होकर जा रहे थे . पटना से जिन छह लड़कों ( एक दो सीनियर लड़के भी थे , जिन्हें लड़का कहने पर एतराज हो सकता है ) का चयन हुआ , उसमें मैं भी था ….आठ सौ की तनख्वाह पर मैं बहाल हुआ था . कहानी लंबी है गुवाहाटी की …उस अखबार के मालिक की …
मुझे लगता है कि किसी भी नौकरीशुदा शख्स की जिंदगी में दो तरह के लोगों की भूमिका अहम होती है . एक ऐसे लोगों का , जिन्होंने उसे नौकरी दी . दूसरे ऐसे लोगों का , जिन्होंने नौकरी नहीं दी . मेरी जिंदगी में भी दोनों तरह के लोगों का अहम रोल है . 87-88 में पटना में एक अदद नौकरी के लिए भटक रहा था लेकिन नवभारत टाइम्स और दैनिक हिन्दुस्तान में नौकरी पाना बीपीएससी के इम्तेहान में पास होने की तरह था या फिर ऊपर वाले की मेहरबानी से किस्मत का ताला खुलने की तरह . तो न तो मुझमें इतनी प्रतिभा थी , न ही किस्मत कि इन दो अखबारों में नौकरी मिल पाती.
हम खुद को इतना छोटा और उन अखबारों को इतना बड़ा मानते थे कि कभी पूरी शिद्दत से चाह भी नहीं पाते थे कि इस अखबार में नौकरी मिल जाए….लगता था ये चाहत ऊपरवाले से मनचाहा वरदान मांगने की तरह है और मनचाहा वरदान किसे मिल पाता है …सो हमने ‘ आज’ , ‘ पाटलिपुत्र टाइम्स’ और ‘जनशक्ति’ जैसे अखबारों में अपना ठिकाना तलाशने की कोशिश शुरू की. पटना के छपने वाले ‘आज’ अखबार में एक बार नौकरी – करीब करीब मिल गयी थी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था . आखिरी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई , जिसने मुझे आपादमस्तक घूरकर देखा, नाम पूछा …शहर पूछा …जाति पूछी और चलता कर दिया ….फिर नौकरी तो दूर उस अखबार में छपना भी बंद ही हो गया ….उन साहब के क्लियरेंस के बाद भी ‘आज’ में किसी को नौकरी मिलती थी और उन्होंने मेरा नाम क्लियर नहीं किया था .
ये बात शायद 88 की है . उन दिनों ‘आज’ के समाचार संपादक अविनाश चंद्र मिश्र ( इन दिनों पटना से समकालीन तापमान नामक पत्रिका निकालते हैं ) हुआ करते थे . अविनाश मझे बहुत मानते थे और अपने अखबार में लिखने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे . मैं कभी कुलियों की दुनिया पर तो कभी झुग्गी बस्ती की जिंदगी पर या उनके सुझाए विषय पर रिपोर्ताज लिखकर उन्हें दे आया करता था . अविनाश जी फीचर पन्ने पर उसे छापते थे और कुछ सप्ताह बाद मुझे हर रिपोर्ट के 50 रुपए नकद मिल जाया करते. जिस दिन पैसे मिलते , उस दिन जश्न मनाते …
मुझे याद है जिस दिन मेरा छपना होता था , उसके पहले की रात मेरी आंखों से नींद गायब हो जाती थी और सुबह का इंतजार बेसब्री से करता था . अखबार में अपना नाम देखने के लिए . एक दिन अविनाश जी ने बताया कि एक दो लड़के की वेकेंसी है और आप आवेदन कर दीजिए . मैंने बायोडेटा दे दिया . पहली बार बायोडेटा किसी से टाइप करवाया .तब मेरी सही उम्र थी करीब 22 साल लेकिन सर्टिफिकेट के हिसाब से मैं 19 साल का ही था . मुझे लगा 19 साल नाबालिग जैसा लगेगा , सो मैंने असली उम्र का ही जिक्र किया .
खैर, मुझे तो लगा कि आज अखबार में मैं छप रहा हूं . कई लोग मुझे जानते हैं . समाचार संपादक मुझे पसंद करते हैं . फिर तो मेरी नौकरी पक्की है . लेकिन मुझे क्या पता था कि नौकरी के पैमाने और भी हैं . आज में तब चंद्रेश्वर विद्यार्थी अघोषित संपादक हुआ करते थे . नाम के साथ तो उन्होंने विद्यार्थी लगा रहा था कि अपनी जाति को छोड़कर उन्हें किसी जाति के लड़के में प्रतिभा की कमी बहुत खटकती थी . अखबार के मैनेजर थे ‘ दादा’ . दादा का नाम तो कुछ और था लेकिन आज अखबार के सभी लोग उन्हें दादा ही कहते थे …बंगाली थे …बनारस में रिमोट कंट्रोल लेकर बैठे मालिकों के खास नुमाइंदे थे . मेरा उनसे कभी कोई वास्ता पड़ा नहीं था . संपादकीय विभाग में उनके नाम की धमक सुनता जरूर था .
अविनाश जी एक दिन मुझे दादा से मुलाकात करवाने के लिए आज अखबार के दफ्तर बुलवाया . उस दिन पता चला कि तीन चार और दावेदार वहां आए हुए हैं . मुझे अगर ठीक से याद है तो उसी दिन वहां कुमार भवेश चंद्र भी आए थे और उन्हें नौकरी मिली भी थी (भवेश मेरे बहुत अंतरंग दोस्त रहे हैं. हम बाद में कई सालों तक दिल्ली में साथ रहे. इन दिनों अमर उजाला, लखनऊ में हैं). दादा ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा. शायद वो मेरे बारे में तय पहले कर चुके थे . खारिज करने के बहाने खोज रहे थे .
उन्होंने पहला सवाल पूछा – तुम सरनेम अंजुम क्यों लिखते हो …मैंने कहा – बस , यूं ही नाम के साथ अंजुम जोड़ लिया है …दूसरा सवाल – तो फिर पूरा नाम क्या है – अजीत अंजुम ही लिखता हूं …तीसरा सवाल – असली नाम पूछ रहा हूं …जवाब – अजीत कुमार …चौथा सवाल – अरे पूरा नाम …जवाब – अजीत कुमार …पांचवा सवाल – कुमार के आगे तो कुछ होगा ..पिता जी का क्या नाम है …जवाब – राम सागर प्रसाद सिंह …अब दादा को अपना प्वाइंट मिल चुका था. उन्होंने सीधा पूछा – तो तुम ……..जाति के हो ….मैं कहा – जी …कहां के हो – मैंने कहा – बेगूसराय ..और फिर दादा ने सिर्फ इतना कहा कि अविनाश जी तुम्हारी बहुत तारीफ करते हैं …चलो उनसे बात कर लेना …मैं वहां से निकला तो समझ में नहीं आया कि ये कैसा इंटरव्यू था …मुझे ये भी समझ में नहीं आया कि मैं फेल हुआ या पास ….उस दिन वहां कुछ और लड़के इंटरव्यू के लिए आए हुए थे, सो मैं अविनाश जी से मिले बगैर वहां से चला गया.
अगले दिन मुझे पता चला कि दादा को एक जाति विशेष से नफरत है क्योंकि उस जाति विशेष के एक व्यक्ति विशेष ने कभी उसी अखबार में काम करते हुए उनसे पंगा मोल ले लिया था …वो व्यक्ति विशेष तो वहां शेष रहे नहीं लेकिन दादा के मन में ऐसा अवशेष छोड़ गए कि उस जाति विशेष के हम जैसे लोगों के लिए दादा ने ‘आज’ के दरवाजे बंद कर दिए थे. दादा तो मुझे भूल गए होंगे लेकिन मैं उन्हें कभी भूल नहीं पाया.. आज लगता है कि अच्छा हुआ दादा ने मुझे नौकरी नहीं दी …
मैं पटना में फ्रलासिंग करता रहा . उन दिनों दिल्ली , मुंबई और कलकत्ता से कई पत्रिकाएं निकलती थी . धर्मयुग , रविवार , दिनमान , साप्ताहिक हिन्दुस्तान के आलावा छोटी पत्रिकाएं ( आप चाहें तो छुटभैया कह सकते हैं क्योंकि हम जैसे छुटभैये पत्रकारों को उन्हीं में जगह मिल पाती थी ) . खैर , उन दिनों अली अनवर ( आज के जेडी यू सांसद ) भी वरिष्ठ संवाददाता हुआ करते थे , अनवर साहब जब भी मिलते हैं तो उस दौर की बात जरुर करते हैं , जब हम एक दूसरे की साइकिलों की सवारी किया करते थे ) और हमारे साथी विकास मिश्र भी वहीं काम करते थे . खुद को वामपंथी शक्तियों की एकता का अग्रदूत मानने वाले इस अखबार ने मुझे बहुत हौसला दिया …पूरे पूरे पन्ने की रिपोर्ताज इस अखबार में छपी. …इंन्द्रकात मिश्र रविवारीय पन्ने के इंचार्ज थे और कह सकते हैं मुझ पर खास मेहरबान . वजह चाहे जो हो .
उस जमाने के तमाम नामचीन पत्रकार दैनिक हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स में काम करते थे . हम किसी साथी के साथ इन अखबारों से दफ्तरों में जाते . अखबार में छपने वाले नाम और वहां बैठे चेहरों का मिलान करते. नवभारत टाइम्स में नीलाभ , कुमार दिनेश , गुंजन सिन्हा , वेद प्रकाश वाजपेयी , उर्मिलेश, मणिमाला , आनंद भारती , गंगा प्रसाद , नवेंदु ….ऐसे तमाम चेहरों को हमने नवभारत के दफ्तर में ताक -झांककर ही पहचाना था . दैनिक हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स में छपने के लिए हम जैसे बच्चे कच्चे बहुत चक्कर लगाया करते थे . जिनका फीचर इन अखबारों में छपता , उनसे हम जलते भी और छपने के लिए तरसते भी .कई फ्रीलांसर के नाम आज भी याद हैं , जो खूब छाप करते थे. अपनी समझ और लेखन की सीमाओं का भी अहसास था , सो ऐसे पत्रकारों की रिपोर्ट खूब पढ़ा करते, जिनसे कुछ सीखने को मिले.
दैनिक हिन्दुस्तान में श्रीकांत , अनिल विभाकर , हेमंत , सुकीर्ति समेत कई पत्रकारों को पढ़ता ..अवधेश प्रीत के बारे में सुनता ( अवधेश प्रीत बहुत अच्छे कहानीकार -कवि हैं और बहुत संवेदनशील इंसान भी. अवधेश प्रीत आज भी पटना हिन्दुस्तान में हैं ) इनमें से कई नाम ऐसे थे , जिनका नाम मुझे इतना बड़ा लगता था कि उनसे परिचय की तमन्ना लिए अखबारों के दफ्तर चला जाता था …
तब गूगलावतार (गूगल बाबा का जन्म) नहीं हुआ था इसलिए हम रेफरेंस के लिए कतरनें संभालकर रखते . हर विषय का लिफाफा बनाते फिर उसी विषय पर छपी रिपोर्ट और लेख रखते …दिल्ली में जब पहली बार राम बहादुर राय के घर पर उनसे मिला था तो मैंने उन्हें कैंची और अखबार के बीच काटने और कटने का अदभुत रिश्ता कायम करते हुए देखा था. आस – पास फैले कई अखबारों के बीच राय साहब बैठे थे और लगातार कतरनें तैयार कर रहे थे …..उस दौर में मैंने बहुत से लोगों को देखा था कि वो रेफरेंस इकट्ठा रखने के लिए कटिंग रखा करते थे . आज गूगल ने काम काफी आसान कर दिया है.
बिहार की पत्रकारिता में उन दिनों लड़कियां न के बराबर थी. मणिमाला सबसे तेज तर्रार पत्रकार मानी जाती थी , जयपुर नवभारत टाइम्स में काम करने और धूम मचाने के बाद पटना पहुंचीं थीं. ‘आज’ अखबार में अर्चना झा हुआ करती थीं. इंदु भारती, मानषी, किरण शाहीन जैसी तेजतर्रार महिला पत्रकारों के नाम हम सुना करते थे. हम इन्हें दूर-दूर से ही देखते. इनका लिखा पढ़ते.
तो एक वो नौकरी जो पटना में नहीं मिली, एक वो नौकरी, जिसे कुछ हफ्ते में छोड़नी पड़ी (गुवाहाटी का जिक्र में पहले कर चुका हूं) और एक नौकरी जो मुकेश कुमार ने नहीं दी ….ये बात तब की है, जब मैं गुवाहाटी और पटना छोड़कर दिल्ली आ चुका था. एक दिन किसी ने बताया कि गुवाहाटी से निकलने वाले सेंटिनल अखबार के संपादक मुकेश कुमार दिल्ली आए हुए हैं और कुछ लोगों की तलाश कर रहे हैं ….मैं उनसे मिलने आईएएस बिल्डिंग गया …दो मिनट की संक्षिप्त मुलाकात भी हुई, लेकिन बात नहीं बनी ….और मैं दोबारा गुवाहाटी नहीं जा पाया, दिल्ली ने ठिकाना दे दिया …मुकेश जी अभी भी हमारे प्रिय हैं …दोस्त की तरह हैं …कई सालों बाद हम मिले और बार-बार मिलते रहे …ये कहानी फिर कभी …
करोलबाग के उस कमरे में रहते हुए ही मुझे पहले चौथी दुनिया फिर अमर उजाला में नौकरी मिली . उसी कमरे में रहते हुए दिल्ली में टिकने और कुछ बनने का हौसला पैदा हुआ …और ये सब उन दोस्तों की वजह से हुआ जो उसी कमरे में साथ रहते थे …वन बेडरुम फ्लैट में कोई बेड तो था ही नहीं …हम सबके पास बेड रोल था …चारो दीवारों से सटाकर चार लोग रोज रात को अपना बेड रोल बिछाकर सो जाते और सुबह उसे लपेट कर किनारे लगा देते .. पटना , गुवाहाटी , भोपाल या किसी और शहर से कोई संघर्षशील साथी नौकरी खोजने के लिए जब भी दिल्ली आते तो सीधे हमारे ठिकाने पर टपकते …इस अधिकार के साथ यहां सब अपने हैं …..
ऐसे आगंतुकों के लिए हमारे कमरे में जगह भले ही कम होती लेकिन दिल में जगह की कमी नहीं थी …एक सुबह हमारे कमरे पर छोटा सा सूटकेस लिए गुवाहाटी से एक सज्जन आए …उनके पास गुवाहाटी में रहने वाले अपने मित्र रत्नेश कुमार की एक पर्ची थी , जिस पर लिखा था – ये अपना ……है . इसे दिल्ली में आपकी मदद की जरुरत है ….दो लाइनों की ये पर्ची ही उस शख्स के लिए हमारे ठिकाने को अपना समझने का ऑथरिटी लेटर था …
वो हमारे साथ कई दिन तक रहे …नौकरी खोजते रहे और आज दिल्ली में जमे हैं …हमारे साथ उसी कमरे में हैदराबाद के रहने वाले के ए बद्रीनाथ भी रहते थे …जो उन दिनों एक तेलगू दैनिक में काम करते थे . हिन्दी उन्हें ऐसी आती थी कि हम भी उनके लिए स्त्रीलिंग की तरह ही थे…उनके व्याकरण में पुल्लिंग वर्जित था …लेकिन हम जैसों के साथ रहते हुए उन्होंने इतनी हिन्दी सीख ली थी कि अपनी बात कह सकें …हम सब में एक बात कॉमन थी कि हम एक दूसरे के काम आएंगे …और किसी को जानने वाला अगर काम की तलाश में दिल्ली आएगा तो उसे रहने का ठिकाना देंगे …
बद्रीनाथ बाद में एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स के नामचीन रिपोर्टर बने …सालों बाद आज ही उनकी तलाश करके बात करुंगा …रात को खाना बनाने के लिए रोस्टर डियूटी लगती थी …बद्रीनाथ को सांबर बनाने आता था तो अक्सर सांबर चावल बनाते थे . हमारी बारी आती थी तो सब्जी – चावल और रवि प्रकाश दही का रायता और चावल …रोटी बनाना किसी को आता नहीं था इसलिए डिनर में रोटी तभी मिलती थी , जब हम सभी कभी पास के ढाबे में खाने जाते थे …उन दिनों में दिल्ली में बहुतों से मिला …बहुतों से नौकरी के लिए मिला …बहुतों से छपने – छापने की अर्जी लिए हुए मिला …कभी इस अनुभव पर लिखूंगा …
अक्तूबर 90 में हम सबने मिलकर तय किया अब कोई बड़ा घर लिया जाए …क्योंकि सब ठीक ठाक नौकरी कर रहे थे और हमारे यहां आने वाले आगुंतकों की तादाह हर महीने बढ़ रही थी …तब हमने पटपड़गंज में आशीर्वाद अपार्टमेंट में एक डुप्लेक्स फ्लैट किराए पर ले लिया …बद्री ने साथ छोड़ दिया .यहां दो नए साथी हमारे साथ रहने लगे. आशीर्वाद में हम लोग एक साथ करीब दो साल रहे …चार कमरे के फ्लैट में सबके हिस्से एक एक रुम था …उसका नाम हमने दिया था – अस्तबल …तब तक कई शहरो में हमसे जुड़े पत्रकारों को ये पता चल गया था कि दिल्ली में बैचलर पत्रकारों का ये एक ऐसा अड्डा है , जहां कभी भी आकर गिरा और टिका जा सकता है …
कई बार तो ऐसा होता कि हमारे बाहर वाले कमरे में तीन चार आदमी और हर कमरे में एक एक सहवासी एडजस्ट हो जाते …क्योंकि एक एक करके हफ्ते भर में सात – आठ लोग दिल्ली आ जाते और नौकरी की तलाश में या फिर अपने काम के चक्कर में कई दिन तक यहीं जम जाते …कई लोगों को ये सहूलियत भी उन्हें संबल देती थी कि हमारे अस्तबल में लॉजिंग – फूटिंग का बेहतर इंतजाम था …सूरज नाम का एक लड़का था , जो हम सबके के खाने का ख्याल रखता था …एक बार मैं दफ्तर देर रात को घर पहुंचा .
कॉल बेल बजाया और दरवाजा खुला तो सामने नींद से भकुआए हुए चार – पांच लोग थे ….उनमे से एक ने मुंह बनाते हुए पूछा – किससे मिलना है …अपने ही घर में ऐसे सवाल का जवाब देने से पहले मुझे हंसी आई . मैंने उनसे कहा – जी , मेरा नाम अजीत अंजुम है और मैं भी इसी घर में रहता हूं …तब मुझे अंदर दाखिल होने का रास्ता मिला ….ऐसे मौके कई बार आए, जब बाहर के कमरे में एक साथ पांच – पांच लोग कई हफ्तों तक रहे …ये लोग अलग अलग शहरों से किसी की चिट्ठी या किसी का नाम लेकर दिल्ली आते थे ….उस घर में का खाना – खर्चा कॉमन था . हम चार स्थाई सदस्य ( जिसमें कुमार गिरीश और कुमार भवेश भी रहे ) उस खर्चे को आपस में बांट लेते थे . एक बार पता नहीं मुझे क्या सूझा . हमने घी के एक डब्बे को गुल्लक बनाया . उस पर कागज चिपका कर अस्तबल लिख दिया . साथ में ये भी लिखा कि इस अस्तबल में रहने वाले घोड़े – गधे के चारा -पानी के इंतजाम के लिए आप अपना योगदान कर सकते हैं …हर रोज आने वाले साथियों को मजाक में ही सही वो डब्बा दिखाते …कभी मजाक में ही कोई आने – जाने वाले एकाध सिक्का उसमें डाल जाता लेकिन हम रोज उसमें कुछ – कुछ डाला करते …कई बार ऐसा होता कि नौकरी खोजने के लिए दिल्ली आने वाले साथी उसी डब्बे से दिल्ली में डीटीसी बस का खर्चा निकाल लेते …तो डब्बा में आगुंतकों की तरफ से आता कम था , निकलता ज्यादा था.
बाद में घरेलू राजस्व में घाटे को कम करने के लिए डब्बे की व्यवस्था खत्म कर दी गयी …हम ये तो नहीं ही चाहते थे कि इस डब्बे को कोई गंभीरता से चंदा मांगने वाला समझ ले लेकिन ये भी नहीं चाहते थे कि इस डब्बे की वजह से हमारी अर्थ व्यवस्था खराब हो जाए ….उन दिनों हमारे सामने वाले फ्लैट में Ambrish Kumar और Amitaabh Srivastava रहते थे . पास ही के फ्लैट में संजय कुमार सिंह, संजय सिन्हा और कुमार रंजन रहते थे ….आज भी कई ऐसे साथी पत्रकार दिल्ली और कई शहरों में हैं , जिन्हें पैर जमाने के लिए पहली जमीन हमारे फ्लैट में रहते हुए मिली थी ….
अजीत अंजुम के फेसबुक वॉल से साभार. अजीत अंजुम न्यूज24 के संपादक हैं.





