अजीत अंजुम (दो) : पटना में उन दिनों एक मठ विकास कुमार झा का था, एक अरुण रंजन का

Ajit Anjum : 1989 के मई का महीना रहा होगा ….मैं गुवाहाटी के एक अखबार की नौकरी छोड़कर दिल्ली आया था ….दिमाग में पत्रकारिता का कीड़ा और मन में कुछ करने की जिद के अलावा हमारे साथ कुछ था तो एक छोटा सा ब्रीफकेस, जिसमे दो – तीन कपड़े थे …दिल्ली में पहले से नौकरी कर रहे एक दोस्त का भरोसा था कि यहां आ जाओ कुछ न कुछ तो हो जाएगा ….मुजफ्फरपुर में हमारे साथी रहे रवि प्रकाश मुझसे कुछ पहले दिल्ली आ गए थे और यहां नौकरी कर रहे थे …रवि प्रकाश ने दिल्ली आने का रास्ता न दिखाया होता तो शायद आ भी नहीं पाता….या आता तो कहां गिरता और कहां टिकता, आज सोच भी नहीं पा रहा हूं ….

करोलबाग के देवनगर इलाके में एक तिमंजिले मकान की ऊपरी मंजिल पर एक कमरे में चार पत्रकार रहते थे (उसी कमरे में कई महीनों तक संजय निरुपम भी रहे थे) …मैं भी रवि प्रकाश के कोटे से उस कमरे में सेट हो गया …गर्मी के महीने में चारो तरफ से नंगी दीवारों वाले उस कमरे में रात में भी इतनी गर्मी लगती थी कि सोने से पहले हम तौलिया गीला करके बिस्तर पर बिछाते और रात में कई बार उसे पानी में भिंगोते रहते थे …मुझे याद है कि उस कमरे का पंखा भी पचास रुपए महीने के किराए पर था क्योंकि पत्रकारों के उस डेरे में कोई स्थाई रहने वाला नहीं था इसलिए कोई स्थाई इनवेस्टमेंट करने को न तो तैयार था, न ही किसी को इसकी जरूरत महसूस होती थी..  सुबह का खाना बनाने को एक मेड आती थी और रात के मेनू में अक्सर दही और चावल होता था …उस कमरे में रहने वाले तीन लोग नौकरी करते थे , मैं बेरोजगार था …लिहाजा मेरे हिस्से का खर्च माफ कर दिया गया था..

बाकी लोग नौकरी करने जाते थे और मैं छोटी -बड़ी पत्रिकाओं के दफ्तर लेख – रिपोर्ट लेकर भटका करता था …दरियागंज से लेकर लक्ष्मीनगर और आईएनएस तक ….रात को फिर सब कमरे पर जुटते और दही -चावल खाकर गप्पें मारते हुए सो जाते ….मकान मालिक जैन था इसलिए उसने इसी शर्त पर रवि प्रकाश, संजय निरुपम और अजय श्रीवास्तव को मकान दिया था कि इसमें नॉन वेज नहीं बनेगा …हालांकि जैन पेश से दुकानदार था और अपनी दुकान पर अंडे का अनलिमिटेड स्टॉक रखता था ….लेकिन हम जब अंडे खरीदने जाते तो कहता कि आप इसे नहीं ले जा सकते और घर में तो बना ही बना सकते …हम कहीं और से अंडे लाते और घर में चुपके से बनाते …

किसी किसी रात को मुर्गे को जन्नत नसीब करने का इंतजाम भी कर ही देते थे लेकिन निचले तल्ले पर रहने वाले जैन को जैसे ही मसाले की सुंगध मिलती वो भागता हुआ ऊपर आ जाता और हम पतीले में बंद मुर्गे को इधर – उधर छिपाकर कहते कि देखो हम तो आलू दम बना रहे हैं …और कई बार ऐसा करना भी पड़ता कि एक चूल्हे पर आलू दम चढ़ा देते ताकि जैन साहब को दिखाया जा सके ……दिल्ली में बिताए बहुत खूबसूरत दिन थे वो ….इसी घर में रहते हुए मुझे पहले चौथी दुनिया फिर अमर उजाला की नौकरी मिली थी …रवि प्रकाश अब मुंबई में हैं और कई सालों तक पत्रकारिता करने के बाद अब अपना काम कर रहे हैं ….

आज जब वो लोग याद आ रहे हैं जिन्होंने बीते 25 सालों में मेरी मदद की ….संघर्ष के दिनों के साथी रहे …मेरा साथ दिया …खुशी और गम में मेरे साथ रहे ….तो कुछ ऐसे भी लोग याद रहे हैं, जिनके साथ मैंने सही व्यवहार नहीं किया ….मैं ऐसे लोगों से माफी मांगता हूं, जिन्हें मेरी वजह से कष्ट पहुंचा ….जिन्हें गाहे-बगाहे मेरी बदतमीजियां झेलनी पड़ी ….जिन्हें मेरे तौर-तरीकों से तकलीफ हुई ….जाने-अनजाने में ऐसे लोगों के साथ किए गए वर्ताव के लिए माफी मांगने का जी किया तो लिख दिया …अब आप अचानक और बेमौसम इस माफीनामे को चाहे जैसे समझें…….

मुजफ्फरपुर के दिनों में तो मैं दिल्ली में पत्रकारिता करने का तो सपना भी नहीं देख पाता था…हमारे सपनों की सीमा पटना तक जाकर खत्म हो जाती थी … दिल्ली तो हमारे सपनों की सरहदों से बाहर थी . नवभारत टाइम्स और दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण में रिपोर्टर की नौकरी से बड़ा सपना तीन सालों तक नहीं देख पाया . 1987-88 के दिनों को याद करुं तो पटना के अखबारों में नवेन्दु, श्रीकांत , अनिल चमड़िया , कुमार दिनेश ,उर्मिलेश, सुरेन्द्र किशोर, प्रभात रंजन दीन , वेद प्रकाश वाजेपेयी , अवधेश प्रीत , हेमंत , आनंद भारती , अली अनवर , मणिमाला , सुकीर्ति समेत दर्जनों लोग छपा करते थे ….रविवार , माया , दिनमान और धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं में लिखने वाले पत्रकारों में जयशंकर गुप्त , विकास कुमार झा , अरुण रंजन जैसे नामचीन लोग थे …

इनमें से कोई मुझे नहीं जानता था, लेकिन मैं सबको जानता था . वैसे ही जैसे मुझे मनमोहन सिंह नहीं जानते हैं लेकिन मैं उन्हें जानता हूं …मैं भी इनमें से कईयों जैसा बनने का सपना लिए मुजफ्फरपुर में साइकिल की सैर करता रहता था …सिंगल कॉलम और डबल कॉलम खबर की तलाश में ….मुझे आज भी याद है 1987 के आखिरी महीने में या फिर 88 के शुरुआती महीने में जार्ज फर्नांडीस एक रैली को संबोधित करने मुजफ्फरपुर आए थे . उनके साथ पटना से आए पत्रकारों के दल में रविवार के बिहार ब्यूरो प्रमुख जयशंकर गुप्त भी आए थे . कचहरी में एक स्थानीय पत्रकार ने मेरा उनसे परिचय करवाया . उन्होंने मुझसे हाथ मिलाकर मेरा नाम दो बार पूछा …तो लगा कि मेरा दिन बन गया …मैं कई दिनों तक अपने दो – तीन युवा साथी पत्रकारों को सुनाता रहा कि कैसे जयशंकर गुप्ता से मेरी मुलाकात हुई और वो मुझे नाम से जान गए हैं …..उन दिनों मैं पटना से छपने वाले अखबार पाटलिपुत्र टाइम्स के लिए मुफसिल संवाददाता की तरह काम कर रहा था (कार सेवा – बिल्कुल फ्री) … मणिकांत ठाकुर (अब बीबीसी में हैं) डूबते हुए पाटलिपुत्र टाइम्स के आखिरी कप्तान थे और उन्होंने ही मुझे मुजफ्फपुर के मीनापुर ब्लाक से संवाददाता बनाया था …

एक ही जिले में एक ही अखबार के लिए सात आठ लोग फ्री में काम करते थे … सबको अलग अलग ब्लाक की डेट लाइन से खबरें लिखने का जिम्मा दे दिया जाता था . उनसे में कुछ वसूली लाल भी होते थे ….ऐसे वसूली लाल नहीं चाहते थे कि मैं मुजफ्फरपुर से खबरें भेजूं …लिहाजा कई बार मेरी खबरों का लिफाफा पटना पहुंचने से पहले गायब करवा देते थे . नवभारत टाइम्स औऱ टाइम्स ऑफ इंडिया का मुजफ्फपुर में ब्यूरो दफ्तर हम जैसे लोगों का आदर्श ठिकाना होता था क्योंकि वहां जाने पर अपना भविष्य दिखता था और खुली आंखों से ये सपना भी कि किसी दिन सामने वाले भाई साहब ( नवभारत टाइम्स से तत्कालीन इंचार्ज प्रमोद कुमार ) की कुर्सी पर या इन्हीं की तरह किसी ब्यूरो की कुर्सी पर मैं भी बैठूंगा….

प्रमोद कुमार नाम के प्राणी काफी पहुंचे हुए और घुंटे हुए परजीवी किस्म के पत्रकार थे , जिनकी शहर के सारे बाहुबलियों , रंगदारों और पैसे वालों से रंगीन रिश्ते थे …और जब – तब हम जैसे नवसिखुओं को सामने बैठाकर रौब भी गांठा करते …कभी रघुनाथ पांडे का नाम लेकर तो कभी बृजबिहारी प्रसाद जैसों का नाम लेकर ( रघुनाथ पांडे सबसे बड़े बाहुबली और ठेकेदार थे जबकि बृजबिहारी प्रसाद गुंडागीरी के रास्ते राजनीति में उतर रहे थे , बाद में उनका मर्डर हो गया ) .प्रमोद बाबू काशी के कुलीन पंडे की तरह धोती – कुर्ता और टीका से हमेशा शोभायमान रहा करते थे …ठीक इसके उलट टाइम्स ऑफ इंडिया के ब्यूरो इंजार्च थे . वी वी पी शर्मा टाइम्स ऑफ इंडिया के इंचार्ज थे ( अब हेडलाइंस टुडे में हैं और बहुत अच्छे पत्रकार हैं ) . उन दिनों मैं एल एस कॉलेज में पढ़ता था ..ग्रेजुएशन में पढ़ते वक्त ही पत्रकार बनने की ललक पैदा हुई …पता नहीं ये ललक या सनक कैसे पैदा हुई लेकिन जब हुई तो फिर पढ़ाई की तरफ से ध्यान पूरी तरह उचट गया ..कोर्स की किताबें कम पढ़ता , अखबार और पत्रिकाएं ज्यादा तलाशने लगा …रविवार , दिनमान , माया , धर्मयुग , साप्ताहिक हिन्दुस्तान से लेकर दिल्ली से आने वाला जनसत्ता तक ….हमारी एक टोली बन गई थी …विकास मिश्र, रवि प्रकाश …जैसे साथी थे और रमेश पोद्दार (जिनका जिक्र मैंने पहले किया है) हमारे गुरु की तरह थे.

जवाहर लाल रोड में एक पाइप की दुकान हुआ करती थी ( जो आज भी है ) . रमेश मोदी उस दुकान के मालिक के साले थे और इसी नाते मालिक ने उन्हें गद्दीनसीन कर रखा था . मोदी जी और पोद्दार जी की पारिवारिक दोस्ती की वजह से हम जैसे पैदल और नवोदित पत्रकारों के लिए ( नौकरी से ) पाइप की वो दुकान एक ठीहे की तरह था . मोदी जी की दुकान पर बैठकर ही हम खबर लिखते और पटना भेजते …कुछ रिपोर्ट दिल्ली की छोटी – बड़ी पत्रिकाओं के लिए भी रवाना करते …रोज यही सोचा करते कि कैसे नवभारत टाइम्स ( पटना ) या दैनिक हिन्दुस्तान ( पटना ) में नौकरी मिल जाए या मुजफ्फपुर से रिपोर्टिंग का मौका मिल जाए . चाहे कुछ महीने फ्री में ही काम क्यों न करना पड़े .

पिता जी मुजफ्फपुर में सब जज के तौर पर पोस्टेड थे इसलिए खाने – खर्चे की समस्या नहीं थी . तभी एक दिन पता चला कि नवभारत टाइम्स पटना के संपादक दीनानाथ मिश्रा मुजफ्फरपुर आने वाले हैं और कुछ नए लड़कों से मिलकर परिसर संवाददाता नियुक्त करने वाले हैं …मुझे पता नहीं कि ये आइडिया किसका था लेकिन नवभारत टाइम्स ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में परिसर संवाददाता बनाने की एक अच्छी परंपरा उन दिनों शुरु की थी . इसी पहल से दर्जनों लड़के पत्रकार बने. हमें जब खबर मिली तो लगा कि नवभारत टाइम्स के दरवाजे हमारे लिए खुल सकते हैं , अगर हम किसी तरह से दीनानाथ मिश्रा जी के पैमाने पर खरे उतर जाएं और परिसर संवाददाता बन जाएं …नवभारत टाइम्स मुजफ्फपुर के दफ्तर में हम जैसे कई लड़के दीनानाथ मिश्र से मिलने पहुंचे .

उनके साथ गुंजन सिन्हा और उदय कुमार भी आए थे ( उदय कुमार इन दिनों अमर उजाला के संपादक हैं ) . परिसर संवादादाता के तौर पर तीन लड़के चुने गए . मैं , हरि वर्मा और रवि प्रकाश . कहा गया कि आप लोग अपनी खबरें भेजिए . जिसकी खबर छपने लायक होगी , हम छापेंगे ….तो ऐसे हमारी शुरुआत हई …लेकिन परिसर संवाददाता के तौर पर मैं ज्यादा टिक नहीं पाया क्योंकि विश्वविद्यालय की खबरों की गुंजाइश भी कम थी और हरि वर्मा हमसे ज्यादा तेज या संपर्कों वाला था . उसकी ज्यादा खबरें छपती और तो हमें कई बार ये भी लगता कि पटना में डेस्क पर बैठे लोग उसकी ज्यादा मदद कर रहे हैं …हम दोनों अच्छे दोस्त थे लेकिन भीतर से कंपीटीशन की एक भावना भी थी ….एक दूसरे को पछाड़ने के लिए छोटी – मोटी साजिशें ( अपनी खबर नहीं बताना , या उसकी खबर सुनकर उससे पहले वही खबर भेज देना..) हम करते रहे …

पटना में जब मैं एक अदद नौकरी की तलाश में आज , जनशक्ति , नवभारत टाइम्स और पाटलिपुत्र ( जो डूबने की कगार पर था ) भटक रहा था , तब हम जैसे संघर्षशील युवाओं का एक ग्रुप बन गया था . पटना जंक्शन के पास हुंकार प्रेस और उसके पास चाय की दुकान हमारा ठिकाना हुआ करता था. उन दिनों संतोष सुमन दैनिक हिन्दुस्तान में स्ट्रींगर थे और इंची टेप के हिसाब से खबरें लिखा करते थे ( उनकी खबरों को इंच के हिसाब से प्रति इंच एक रुपया दिया जाता था, हम लोग ऐसे साथियों को इंची – टेप वाला पत्रकार कहते थे , ये चलन कई अखबारों में था यहां तक कि दिल्ली के जनसत्ता में भी , जितने इंच की खबर , उतने रुपये ) . संतोष सुमन हमसे काफी सीनियर थे लेकिन कई सालों तक जूता और कलम एक साथ घिसने के बाद भी उन्हें दैनिक हिन्दुस्तान में स्टाफ रिपोर्टर की नौकरी नहीं मिली थी . उन दिनों भी अखबारों में नौकरी मिलने और पाने के कई पैमाने थे . संतोष सुमन उन पैमानों पर फिट नहीं होते थे . जातिवाद , व्यक्तिवाद और चाटुकारिता की जैसी मिसालें तब हमने अखबारों में देखी , उसे आज तक नहीं भूल पाया हूं .

दैनिक हिन्दुस्तान बिहार में सबसे पढ़ा जाने वाला अखबार था ( आज भी है ). हरि नारायण निगम उसके संपादक और चंद्र प्रकाश समाचार संपादक हुआ करते थे . संतोष जी अक्सर अपने संपादकों के किस्से सुनाया करते . उनकी किस्सागोई का अंदाज निराला था . मगहिया अंदाज में ( मगध की बोली ) में संतोष जी अपने समाचार संपादक चंद्र प्रकाश को मूनलाइटवा कहकर उसके किस्से सुनाते । चंद्र प्रकाश का अंग्रेजीकरण था मून लाइट . चंद्र – मून और प्रकाश – लाइट . इसी तरह से वो हरि नारायण निगम ( जो बाद में प्रधान संपादक भी बने ) को वो ग्रीन गॉड कॉरपोरेशन कहते. ठेंठ अंदाज में हिन्दुस्तान के भीतर की राजनीति और पत्रकारों के किस्से सुनाते . इंची -टेप के हिसाब से कम पैसे पाकर भी खुश रहते और हमें चाय पिलाने में कभी कंजूसी नहीं करते . हुंकार प्रेस के उस ठीहे पर अरुण सिंह , प्रमोद दत्त , विकास मिश्र , रवि प्रकाश , अभिमनोज समेत कई पत्रकार रोज अड्डा जमाते . प्रमोद दत्त उन दिनों भूभारती और दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं के लिए बिहार से काम करते थे .

विकास देश भर की पत्र पत्रिकाओं के लिए थोक भाव से लिखते थे. रवि प्रकाश जनशक्ति में थे . सबके अपने – अपने संघर्ष थे फिर भी कभी -कभी शाम को मयनोशी का प्रोग्राम बन ही जाता था . सब आपस में दस – दस रुपए चंदा करते . फिर दारु की बोतल और दो दर्जन उबले हुए अंडे के साथ कहीं बैठकी जम जाती …मैं पीता नहीं नहीं था सो अपने दस रुपए का हिसाब बराबर करने के लिए सात – आठ अंडे खा जाता …लोग धीरे – धीरे पीते और मैं तेजी से अंडे खाता …रवि प्रकाश और अभिमनोज भी नहीं पीने वालों में थे लेकिन अंडों के प्रति उनका कोई खास लगाव नहीं था …..उन दिनों हम जैसे युवा संघर्षशील पत्रकारों के लिए साइकिल सबसे आदर्श सवारी थी और मोटरसाइकिल – स्कूटर संपन्न पत्रकारों की पहचान…कार वाले किसी पत्रकार से अपना परिचय नहीं था. कुछ कार वाले थे भी तो वो हमें परिचय करने लायक नहीं मानते थे . सो दूरियां दोनों तरफ से बन जाती थी . पटना में उन दिनों नामचीन और बड़े पत्रकार के कई मठ थे .

एक मठ विकास कुमार झा का था , जो माया के ब्यूरो चीफ थे . एक अरुण रंजन का था , जो नवभारत टाइम्स दिल्ली के लिए लिखते थे ( बाद में पटना के संपादक बने और अब दिल्ली में रहते हैं) . और भी कई ऐसे नामधारी पत्रकार ….ये नामधारी लोग आसानी से किसी को पनाह नहीं देते थे , जब तक डीएनए से लेकर लायलटी टेस्ट न ले लें . गुटाधीशों के दरवाजे जातीय आधार पर भी खुलते थे. जनसत्ता के ब्यूरो चीफ सुरेन्द्र किशोर वैसे बहुतों से अलग थे. शांत , विनम्र और बहुत कम बोलने वाले. सुरेन्द्र जी बोलते कम थे लेकिन लिखते बहुत थे . दिखने – बोलने में जितना विनम्र और सरल , लिखने में उतने ही मारक …उनसे पहली मुलाकात और परिचय के बाद उनका काफी स्नेह मिला .. 1989 के मई महीने में मगध एक्सप्रेस से दिल्ली आने के पहले मुजफ्फरपुर , बेगूसराय , पटना और गुवाहाटी तक में हमने बहुत धक्के खाए …बहुत हिचकोले खाए…मुजफ्फरपुर से पटना यूं तो मैं आता – जाता रहता था लेकिन पत्रकारिता करने के लिए बोरिया बिस्तर लेकर पटना में जमने का फैसला Abhimanoj Mcij Vikas Mishra और रवि प्रकाश के शिफ्ट होने पर किया.

पटना से दिल्ली की ट्रेन पकड़ने से पहले गुवाहाटी में भी दो महीने नौकरी की थी . गुवाहाटी में पहली नौकरी मिलने की खबर जब पिता जी को मिली तो वो बहुत खुश हुए . पिताजी ने सोचा जिस बेटे को उनका समाज और उनसे साथी अफसर अवारा – अबंड और नालायक ( क्योंकि मैं बाकी लड़कों की तरह पीओ – सीओ वाले कंपीटीशन की तैयारी नहीं कर रहा था ) मान रहे थे, उसे अगर नौकरी मिल गयी है तो क्यों न इसे सेलिब्रेट करके जमाने को बताया जाए . मां के कहने पर पिता जी ने बेगूसराय में सत्यनारायण भगवान की पूजा – पाठ का आयोजन किया और साथ में पड़ोसियों और रिश्तेदारों को खिलाने – पिलाने का इंतजाम भी . जितने लोग पूजा और खाने पर आए , सबको मां – पिता जी बताते रहे कि बेटे को गुवाहाटी से निकलने वाले एक अखबार में नौकरी मिल गयी है.

आधे लोग तो मुझे और मेरी नौकरी को ऐवैं ही समझकर खाए और खिसक लिए . बाकी भी रहस्यमय नजरों से मेरी ओर देखते रहे और आते – जाते रहे. पिता जी मेरी नौकरी को दुनिया की किसी भी नौकरी से ज्यादा असरदार और शानदार साबित करने की नाकाम कोशिश कईयों के सामने करते रहे . उन्हें क्या पता था कि बेटा फिर नालायक निकलेगा . जिस नौकरी में टिके रहने के लिए पूजा – पाठ और पंडितों से कथा करवाकर मुझे रवाना कर रहे हैं , वो नौकरी दो महीने में छूटने वाली है. दो महीने बाद जब मैंने गुवाहाटी से फोन पर मां को बताया कि मैंने अखबार मालिक के रवैये के विरोध में नौकरी छोड़ दी है तो मां समझने को ही तैयार ही नहीं हो रही थी कि नौकर का मालिक से क्या विरोध हो सकता है. पांच मिनट में झल्लाकर मैंने इतना ही कहा था कि तुम नहीं समझोगी. मैं आ रहा हूं , बस. पिता जी को बताया तो ठंढे स्वर में उन्होंने कहा – चलो, कोई बात नहीं …लेकिन बेटा, नौकरी में तो कुछ देह दाबकर रहना पड़ता है न …लेकिन मैं उन दोनों की तकलीफ समझ रहा था. पड़ोसियों और रिश्तेदारों को मेरी नौकरी का भोज देकर उन्होंने मुझे गुवाहाटी भेजा था, अब वो किस मुंह से कहते कि बेटा दो ही महीने में बेरोजगार होकर घर आ रहा है …यही वो एक बड़ी वजह थी कि मैंने तय किया कि अब बिना नौकरी के घर नहीं लौटूंगा. पटना में नहीं रहूंगा. अब दिल्ली जाऊंगा ….दिल्ली में हमारे साथी रवि प्रकाश थे. गुवाहाटी से ही उन्हें फोन किया और दिल्ली आने का फैसला भी ….

अजीत अंजुम के फेसबुक वॉल से. अजीत अंजुम न्यूज24 चैनल के संपादक हैं.

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