अटल की ऐतिहासिक पहल को अपनी कारगिल साजिश से रौंदने वाले तानाशाह मुशर्रफ को अच्छा सबक मिला

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ इन दिनों बुरे हाल में हैं। दुनियाभर के तानाशाहों को जनरल मुशर्रफ से सबक जरूर मिलना चाहिए। एक दौर में उनके इशारे पर पूरा मुल्क  नाचता नजर आता था। वे अपने को देश के कानून से ऊपर समझते रहे हैं। अब इस्लामाबाद के अपने शानदार फार्म हाऊस के दो कमरों में ‘कैद’ हो गए हैं। इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में बना उनका ऐशगाह, अब उपजेल में तब्दील हो गया है।

अदालत के निर्देश पर यहां दो अधिकारी तैनात कर दिए गए हैं, जो कि निगरानी कर रहे हैं कि कहीं मुशर्रफ ‘जेल’ के नियमों को तोड़ तो नहीं रहे? जाहिर है, यहां नौकरों-चाकरों की फौज उनके काम की नहीं रही। अपने ही घर में उन्हें मनचाहा खाना भी नसीब नहीं हो पा रहा है। आगे आने वाले दिनों में मुशर्रफ को अपने पुराने ‘पापों’ का तमाम हिसाब देना पड़ेगा। इसकी तैयारी चल रही है। उन पर जो आपराधिक आरोप लगे हैं, उनमें उन्हें फांसी तक की सजा संभव है।

हमारे पड़ोसी मुल्क पाक में आगामी 11 मई को आम चुनाव होने जा रहा है। मुशर्रफ ने अरमान पाला था कि इस चुनाव में भागीदारी करके वे लोकतांत्रिक मुखौटे के सहारे नई भूमिका में आ जाएंगे। यही सपना लिए वे चार साल के बाद अपने स्व निष्कासन से स्वदेश लौटे थे। चुनाव में हिस्सेदारी के लिए मुशर्रफ ने ‘आॅल पाकिस्तान मुस्लिम लीग’ पार्टी बना ली है। रणनीति यही रही है कि जज्बाती मुद्दों को उछालकर ज्यादा से ज्यादा सीटें जीत ली जाएं। इसी मंसूबे को लेकर वे पिछले महीने पाकिस्तान लौटे थे। स्वदेश वापसी के मौके पर उनके हजारों समर्थकों ने जिस गर्म जोशी से उनका स्वागत किया था, इससे उनका हौसला एकदम बढ़ गया था। इस मौके पर उन्होंने बड़े-बड़े वायदे कर डाले थे। यह भी बता डाला कि कैसे उन्होंने अपनी सत्ता के दौर में पड़ोसी मुल्क भारत को जमकर छकाया था?

मुशर्रफ 1999 से 2008 तक यहां सत्ता में रहे हैं। वे राष्ट्रपति भी रहे और सेना के प्रमुख भी। 1999 में सेना प्रमुख की हैसियत से उन्होंने कारगिल की भारतीय धरती पर कब्जे की नापाक साजिश की थी। उन्होंने यह तैयारी इतने गुपचुप ढंग से कर डाली थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी इसकी भनक नहीं लग पाई थी। मुशर्रफ और उनके सिपहसालारों ने कारगिल, द्रास व बाटलिक की पहाड़ियों को जंग के मैदान में तब्दील करा डाला था। पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना को कई दिनों तक जंग लड़नी पड़ी थी। इसमें सैकड़ों युवा सैनिक शहीद हुए थे। उस दौर में पाक सरकार ने यही कहा था कि घुसपैठ के पीछे पाकिस्तान सेना की भूमिका नहीं रही है। लेकिन, अब खुद मुशर्रफ खुलासा कर चुके हैं कि स्थानीय कबीलों के भेष में पाक सेना के लोगों ने ही वह कारनामा किया था। ताकि, भारत को ‘पाठ’ पढ़ाया जा सके।

इसी दौर में मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट दिया था। वे सेना प्रमुख के साथ राष्ट्रपति बन बैठे थे। इस तानाशाह के तमाम किस्से पाक में प्रचलित हैं। कैसे यह शख्स झूठे स्वाभिमान के नाम पर शेखी बघारा करता था। अपने कार्यकाल में उनके सिपहसालारों ने देश की तमाम लोकतांत्रिक बुनियादों को हिलाने की जमकर कोशिश की। जनता में यही संदेश देने की कोशिश की कि केवल पाक की सेना ही देश को बचा पाने की ताकत रखती है। पड़ोसी मुल्क की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि यहां लोकतांत्रिक सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। जब यहां लोकतांत्रिक सरकार मजबूत होती है, तो कोई न कोई जनरल बड़ी साजिश करता रहा है। कई बार फौज ने यहां तख्ता पलट किया है। लेकिन, पहली बार ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ की सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर लेने का रिकॉर्ड बनाने जा रही है।
इस पार्टी के प्रणेता एवं राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का राजनीतिक कौशल इसके लिए खास तौर पर जिम्मेदार माना जा सकता है। हालांकि, इस चुनाव में जरदारी की पार्टी की स्थिति काफी कमजोर मानी जा रही है। इसकी एक वजह बिलावल भुट्टो की नाराजगी भी है। बिलावल, पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पुत्र हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के औपचारिक   प्रमुख भी वही हैं। यह अलग बात है कि पार्टी की कमान उनके पिता जरदारी के हाथ में रहती है। कई मुद्दों पर बाप-बेटे के बीच तीखे मतभेद रहे हैं। इन्हीं के चलते चुनावी मौके पर बिलावल भुट्टो रूठ कर लंदन चले गए थे। अभी तय नहीं हैं कि वे पार्टी के चुनावी अभियान में पूरी तौर पर जुटेंगे या नहीं? हालांकि, जरदारी ने नाराज बेटे को पूरी तौर पर मना लेने का दावा किया है।

जनरल मुशर्रफ का आकलन यही था कि सत्तारूढ़ पीपीपी के नेताओं की छवि काफी खराब हुई है। जरदारी और बिलावल के बीच खींचतान बढ़ी है। ऐसे में, वे जज्बाती मुद्दों के जरिए मुल्क में एक बार फिर सत्ता के दावेदार बन सकते हैं। 2008 में वे महाभियोग का मुकदमा चलने के डर से लंदन भाग गए थे। लंदन और दुबई के अड्डों से ही मुल्क में दोबारा अपनी जड़ें जमाने की कोशिश करते आए हैं। जबकि, उन्हें अच्छी तरह से मालूम रहा है कि उनके खिलाफ बेनजीर भुट्टो की हत्या सहित कई और गंभीर आरोप हैं। ऐसे में, वे पाकिस्तान लौटे, तो सीधे जेल पहुंच जाएंगे। इस जोखिम के बाद भी वे 24 मार्च को पाकिस्तान आ धमके।

यहां आते ही उन्हें अपने तमाम ‘पापों’ का हिसाब देना पड़ रहा है। फिलहाल, वे जिस मामले के खास शिकंजे में है, वह 60 जजों को नजरबंद करने का है। उल्लेखनीय है कि नवंबर, 2007 में तत्कालीन शासनाध्यक्ष मुशर्रफ ने इमरजेंसी के नाम पर देश के तमाम वरिष्ठ जजों को नजरबंद करा दिया था। ताकि, देश में कोई ताकत उनकी सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने की जुर्ररत न करे। लेकिन, मुशर्रफ के खिलाफ विद्रोह की आग इतनी तेज हुई कि उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा था।। तमाम अदालतों में उनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। 2007 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई थी। इस मामले में मुशर्रफ पर साजिश रचने का आरोप है। इनके खिलाफ वारंट भी जारी हो चुका है।

जजों की नजरबंदी के मामले में मुशर्रफ को उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत दे दी थी। समयबद्ध जमानत की अवधि पूरी होने को थी। वकीलों को भरोसा था कि मुशर्रफ की जमानत की अवधि जरूर बढ़ जाएगी। यदि हाई कोर्ट ने अनुकूल फैसला नहीं किया, तो सुप्रीम कोर्ट से जरूर राहत मिल जाएगी। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया। पिछले दिनों इस्लामाबाद हाईकोर्ट में इस मामले की निर्णायक सुनवाई थी। जनरल मुशर्रफ अदालत परिसर में हाजिर थे। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने मुशर्रफ की याचिका खारिज करते हुए गिरफ्तारी का हुक्म दिया। ऐसे में, मौका पाकर मुशर्रफ अपने सुरक्षाकर्मियों की मदद से एकदम भाग खडेÞ हुए। वे भागकर इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में बने अपने शानदार फार्म हाऊस में पहुंच गए। शायद, उन्हें लगा था कि वे अपनी ऐशगाह में आकर सुरक्षित हो गए हैं।

इस्लामाबाद के चक शहजाद इलाके में मुशर्रफ का ऐशगाह पांच एकड़ जमीन पर बना हुआ है। अपनी सत्ता के दौरान उन्होंने इस बंगले को बड़े करीने से बनवाया था। इसमें ऐश करने की तमाम सुख-सुविधाएं जुटाई गई थीं। उन्हें क्या पता था कि यही फार्म हाऊस उनके लिए एक दिन ‘जेलखाना’ बन जाएगा? अदालत के निर्देश पर उन्हें इस फार्म हाऊस के दो छोटे कमरों के उपयोग की इजाजत है। नौकर-चाकर उनसे दूर रहते हैं। वे जो खाना खाते हैं, उसका भी परीक्षण किया जाता है। उनकी मित्र मंडली तो दूर, अब वकील तक बगैर कानूनी इजाजत के उनसे मुलाकात नहीं कर सकते। खबर यही है कि इससे घबराकर यह पूर्व तानाशाह बड़बड़ाता रहता है और अपनी सत्ता के दिनों को याद करता रहता है।

दरअसल, जनरल मुशर्रफ को यह भ्रम था कि सेना के तमाम बड़े अधिकारी उनके पक्ष में जुट जाएंगे। ऐसा होने से अदालतें भी उनके खिलाफ ज्यादा दबाव नहीं बनाएंगी। लेकिन, मुशर्रफ को शायद इस हकीकत का इल्म नहीं था कि कुर्सी खिसकने के बाद पुराने सिपहसालार भी वफादार नहीं रहते। क्योंकि आम तौर पर यह सब सत्ता के साथी होते हैं। यहीं पर मुशर्रफ गच्चा खा गए हैं। इतना जरूर है कि पाकिस्तान की अंतरिम सरकार ने उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी है। चुनावी मौके पर मीरहजार खान खोसो के नेतृत्व में अंतरिम सरकार गठित की गई है। सोमवार को इस सरकार ने अदालत को बता दिया है कि 11 मई के बाद जो चुनी हुई सरकार आएगी, वही इस मामले में फैसला लेगी। क्योंकि अंतरिम सरकार तो केवल काम चलाऊ ही मामले देख रही है।

दरअसल, जिस तरह से 2007 में इमरजेंसी लगाकर जनरल मुशर्रफ ने सभी संवैधानिक व्यवस्थाओं को ठेंगा दिखाया था, यही मामला अब उनके गले की फांस बन गया है। संविधान के साथ मनमानी करने का मामला सीधे-सीधे देशद्रोह का होता है। उच्चतम न्यायालय काफी समय से दबाव बनाए है कि इस मामले में सरकार मुशर्रफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज करे। देशद्रोह के मामले में यहां मौत की सजा का भी प्रावधान है। बेनजीर भुट्टो हत्याकांड के मामले में भी मुशर्रफ की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। जिस तरह से वे गिरफ्तार हुए हैं, ऐसे में, उनका सारा रुतबा मिट्टी में मिलता नजर आ रहा है। माना जा रहा है कि उनकी पार्टी के लोगों के हौसले भी कमजोर पड़ गए हैं। हालात इतने नाजुक होने लगे हैं कि इस पूर्व तानाशाह की पार्टी शायद, एक दर्जन सीटें भी न जीत पाए। वैसे भी चुनाव आयोग ने मुशर्रफ के चुनावी नामांकन रद्द कर दिए हैं। उन्होंने चार सीटों   से पर्चा दाखिल किया था। ऐसे में, वे सांसद भी नहीं बन सकते। यदि कहीं से जीत जाते, तो उन्हें विशेषाधिकार मिल सकते थे। लेकिन, अब जेल में उन्हें साधारण कैदियों के साथ रहना पड़ सकता है। सुरक्षा मामलों की दुहाई भी ज्यादा काम नहीं आने वाली।

इन चुनावों में नवाज शरीफ की पार्टी काफी मजबूत स्थिति में मानी जा रही है। इस पार्टी के अलावा पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी ‘तहरीक-ए-इंसाफ’ की स्थिति भी देश के शहरी इलाकों में काफी मजबूत हो गई है। इमरान खान ने जनरल मुशर्रफ को एक ‘पापी’ जनरल करार किया है। वे प्रचार कर रहे हैं कि इसी शख्स की वजह से कारगिल युद्ध की नौबत आई। जिसकी वजह से पड़ोसी मुल्क से रिश्ते खराब हुए। आतंकवाद के मुद्दे पर भी मुशर्रफ के तौर-तरीकों के चलते दुनियाभर में पाक की छवि खराब हुई है। आज हालात ये हैं कि तालिबानी आतंकी पूरे मुल्क के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं। ऐसे में, मुशर्रफ जैसों को मतदाता सबक सिखा दें। वह कहते हैं कि फौजी सेना प्रमुखों में केवल जनरल जहांगीर करामात ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपनी फौजी ताकत का कोई बेजा इस्तेमाल नहीं किया। बाकि, सभी जनरलों ने अपने-अपने तरीके से देश की जम्हूरियत को ठेंगा दिखाने की कोशिश की है। जरूरी हो गया है कि फौज की ताकत के पैरवीकारों को जनता चुनाव में सबक सिखा दे। क्योंकि, जम्हूरियत कमजोर पड़ी, तो राष्ट्र के लिए बड़ा खतरे सामने खड़े हैं।

पाक के मुख्य न्यायाधीश इफ्तखार चौधरी और मुशर्रफ के बीच वर्षों से तनातनी रही है। अब मुशर्रफ को इसके परिणाम भोगने पड़ रहे हैं। इस समय सेना का शिकंजा देश में पहली बार कमजोर पड़ा है, तो न्याय पालिका काफी पावरफुल हो गई है। जरदारी सरकार से भी न्याय पालिका का कई मुद्दों पर टकराव रहा है। प्रधानमंत्री रहे यूसुफ रजा गिलानी की गद्दी इसी तकरार में चली गई थी। इसके बाद जो प्रधानमंत्री आए, उन्हें भी अदालतों ने कम हलकान नहीं किया। अब मुशर्रफ भी न्याय पालिका के बढ़े हौसले की मार झेल रहे हैं।

यूं तो पाक के चुनावी माहौल में मुशर्रफ और उनकी पार्टी की खास चर्चा नहीं है। लेकिन, भारत के लोगों के लिए मुशर्रफ चर्चा का विषय जरूर हैं। लोग बड़ी दिलचस्पी से यह जानना चाहते हैं कि इस तानाशाह की वहां क्या गति बन रही है? 11 अगस्त, 1943 को पैदा हुए परवेज मुशर्रफ एक कमीशंड अफसर के रूप में 1964 में सेना में शामिल हुए थे। 1998 में वे चार स्टार वाले जनरल बने थे। इस दौरान उन्होंने शेखी बघारने वाले तमाम बयान देकर मीडिया की सुर्खियां बटोरी थीं। मुशर्रफ का जन्म पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौर में वे अपनी पुरानी हवेली का हश्र देखने दिल्ली आए थे। 1999 के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दोनों देशों के रिश्ते ठीक करने के लिए एक क्रांतिकारी पहल की थी। लेकिन, मुशर्रफ नाम के इस शख्स ने इस ऐतिहासिक पहल को अपनी कारगिल साजिश से रौंद डाला। शायद, इतिहास इस कारनामे के लिए मुशर्रफ को कभी माफ नहीं करे। अच्छा यही है कि तमाम कमजोरियों के बावजूद पड़ोसी मुल्क में लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत हो रही है। ऐसे में, शायद मुशर्रफ जैसे तानाशाह वहां दोबारा न पनप पाएं?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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