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अथ गोरखपुर जनसंदेश (सिटी) टाइम्स कथा!

आज से ठीक दो वर्ष पहले गोरखपुर दैनिक जागरण के संपादक/प्रकाशक पद से रुखसती के बाद डा.शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी जनसंदेश टाइम्स लेकर बाजार में आए थे। तमाम उतार-चढ़ाव झेलने और कथित घपले-घोटाले आरोपों के बाद प्रबंधन ने उनसे मुक्ति तो पा ली, लेकिन उनके चहेते जनसंदेश पर कब्जा जमाए बैठे रहे। इधर कुछ दिनों पहले जब शैलेन्द्र मणि सिटी टाइम्स लेकर लखनऊ में अवतरित हुए तो उनके चेलों के लिए आशा की किरण दिखने लगी।

आज से ठीक दो वर्ष पहले गोरखपुर दैनिक जागरण के संपादक/प्रकाशक पद से रुखसती के बाद डा.शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी जनसंदेश टाइम्स लेकर बाजार में आए थे। तमाम उतार-चढ़ाव झेलने और कथित घपले-घोटाले आरोपों के बाद प्रबंधन ने उनसे मुक्ति तो पा ली, लेकिन उनके चहेते जनसंदेश पर कब्जा जमाए बैठे रहे। इधर कुछ दिनों पहले जब शैलेन्द्र मणि सिटी टाइम्स लेकर लखनऊ में अवतरित हुए तो उनके चेलों के लिए आशा की किरण दिखने लगी।

इसी बीच जनसंदेश टाइम्स प्रबंधन ने अपने कर्मियों की मणि के प्रति निष्ठा को देखते हुए एक-एक कर सबको बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया तो हलचल मच गई। सबसे पहले शैलेन्द्र मणि के जागरण से जनसंदेश तक के सफर की चर्चा करते हैं। झूठ की गठरी लिए शैलेन्द्र मणि ने वर्ष 2012 में दैनिक जागरण में तैनात तीन दर्जन से अधिक लोगों को अर्जी-फर्जी वादे करके जनसंदेश टाइम्स से जोड़ लिया। शुरू में तो सबको लगा कि कुछ बेहतर होने वाला है, लेकिन सब फ्लाप हो गया।

शैलेन्द्र मणि ने आरंभ में कहा था कि सभी वरिष्ठों (चार-पांच लोगों) को एक-एक लैपटॉप और कारें दी जाएगी। ज्यों-ज्यों वक्त बितता गया, शैलेन्द्र मणि की झूठ गठरी खुलने लगी और वादे हवा-हवाई साबित होने लगे। उनके द्वारा कथित रूप से आर्थिक अनियमतता किए जाने के कारण धीरे-धीरे कंपनी की दशा भी बिगड़ने लगी। वेतनादि के लिए भी कर्मी परेशान होने लगे।

इस संबंध में उनसे कर्मी जब भी यह पूछते थे कि इस तरह आखिर कबतक कंपनी चलेगी, इसके जवाब में फिर झूठा प्रलोभन दिया जाता था। इस बात की आज भी चर्चा होती है कि मणि जी कहते थे-‘मशीन आने वाली है। बस एक-दो दिन में आ जाएगी। मशीन लगाने के लिए जमीन ले लिया गया है।’ न तो आज तक जनसंदेश की मशीन आई और ना ही जमीन ली गई। इसी अंदाज में वे रोज लोगों का प्रमोशन करते थे, वेतन बढ़ाते थे और तमाम सुविधाए दे दिया करते थे। वादाखिलाफी होने के बाद जब उन पर सवालों के बौछार होने लगे ते वे कभी डेयरी खोलने लगे तो कभी छुट्टी पर रहने लगे। मतलब यह कि नजरें चुराकर भागने लगे।

अंत में ना तो आज तक किसी का प्रमोशन हुआ, ना ही किसी का वेतन बढ़ा और ना ही कोई सुविधाएं मिलीं। अब माहौल बनाने और पुरानी बातें को भुलाने के लिए उन्होंने फिर से गोरखपुर में सिटी टाइम्स के नाम पर हवा बनाना शुरू किया है। मजे की बात यह है कि मणि की वादाखिलाफी से तंग आकर उन्हें रोज खरी-खोटी सुनाने वाले लोग फिर से उनके आभामंडल के जाल में फंस गए हैं। जनसंदेश टाइम्स के अंदाज में ही रोज वहां भी मशीन लगाई जा रही है। रोज लोगों को कारें और लैपटाप बांटे जा रहे हैं। रोज लोगों को सुविधाएं दी जा रही हैं। अंत में अनसुलझे तमाम मामलों ने कंपनी को इस तरह परेशान किया उसने मणि से मुक्ति पा ली।    

अब चर्चा जनसंदेश टाइम्स से सिटी टाइम्स तक की यात्रा करने वालों की। मणि द्वारा रखे गए लोगों से जनसंदेश टाइम्स प्रबंधन पहले ही मुक्त होना चाहता था, लेकिन उसके लिए यह अच्छा मौका मिल गया कि बहुत सारे लोग अपने-अपने आप ही मणि के खेमे में चले गए। यानी जनसंदेश का काम सिटी टाइम्स जाने वाले लोगों ने आसान कर दिया। एक जानकारी जो बेहद चिंताजनक है कि जनसंदेश छोड़कर हाल ही में जागरण/आइनेक्स्ट ज्वायन करने वाले दो लोग भी सिटी टाइम्स में जाने की तैयारी कर रहे हैं। उक्त दोनों लोगों को सिटी टाइम्स के कैम्पेनिंग के लिए रोज काम करते हुए देखा जा रहा है।

दूसरी तरफ जनसंदेश को पुनर्जीवित करने की योजना पर सीईओ आरपी सिंह द्वारा काम किया जा रहा है। उसका परिणाम भी सामने आएगा। जहां तक कानूनी बवाल का सवाल है तो उससे निपटने की तैयारी भी जनसंदेश टाइम्स ने कर ली है। किसी के कहीं आने-जाने से कंपनी पर कोई असर होने वाला नहीं है। इस बात का अंदाजा अखबार देखकर ही लगाया जा सकता है। अखबार बदस्तूर प्रकाशित हो रहा है। पहले अच्छी खबरें प्रकाशित हो रहीं हैं। फिलहाल, सारे लोग सिटी टाइम्स में आने वाली मशीन और वहां के कर्मियों को मिलने वाली सुविधाओं को देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं।

गोरखपुर से एक पत्रकार की रिपोर्ट.

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