हिंदुस्तान, बनारस से खबर है कि अनिल मिश्रा प्रकरण में उनको बचाने वाली शक्तियां एक बार फिर सक्रिय हो उठी हैं. वही शक्तियां जो पिछले कई सालों से उनको बचाते आ रही हैं. चंदौली जिले के कमालपुर डेटलाइन से प्रकाशित बृजेश सिंह की खबर ने पूरे यूनिट को गर्म कर रखा है. इसकी आंच दिल्ली तक पहुंच चुकी है. सूत्रों का कहना है कि इसमें जेएनई अनिल मिश्रा को बचाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं. हालांकि पुख्ता तौर से ये पता नहीं चल पाया है कि यह पेड न्यूज का मामला है या फिर कार्यालय के भीतर की आपसी अदावत, पर आग तो लगी है और पूरी लगी है. इसी का असर है कि मिश्रा जी को फोर्स लीव पर भी भेजा गया.
सूत्र बताते हैं कि अब बात दिल्ली तक पहुंच गई है तो किसी ना किसी को तो बलि का बकरा बनना ही पड़ेगा. इसके लिए बकरा खोजा जा रहा है ताकि जेएनई साहब को बचाया जा सके. हालांकि सीधे तौर पर गलती उनकी भी नहीं दिख रही है. उन पर पेड न्यूज के आरोप हवा में उछले जरूर हैं, पर सबूत पुख्ता नहीं है. कुछ हद तक यह कार्यालय के भीतर चलने वाले वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा प्रतीत हो रही है. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर चंदौली जिले से इतनी बड़ी खबर आई क्यों, क्या वहां ही सारा खेल हुआ या फिर बनारस के किसी वरिष्ठ के आदेश के बाद बृजेश के सभा की इतनी बड़ी और पेड न्यूज जैसी लगती खबर भेजी गई. क्या यह गलती से हुआ या जानबूझकर किया गया.
वैसे बनारस में सबको पता है कि संपादक कोई आए या जाए चलती तो अनिल मिश्रा एवं उनके सहयोगियों की ही है. अब कारण किसी को नहीं पता. हो सकता है कि मिश्रा जी काबिलियत या फिर प्यार देखकर संपादक उनके अपने हो जाते हों, पर हो तो जाते ही हैं. अनिल भास्कर भी इससे अछूते नहीं हैं. इलाहाबाद में थे तो अच्छी छवि थी, बनारस पहुंचते ही विवादों से घिरने लगे. इस खबर को लेकर सवाल तो उनपर भी उठ ही रहे हैं आखिर वो संपादक हैं और सारी जिम्मेदारी उनकी ही है. सूत्र बताते हैं कि अनिल मिश्रा को बचाने के लिए संपादक जी भी लग गए हैं. बकरा तलाश गया है आलोक राय और रतन सिंह को. हालांकि रतन सिंह का पद बड़ा है तो हो सकता है प्रबंधन उनकी बलि ना चढ़ा पाए पर आलोक की बलि तय मानी जा रही है क्योंकि आलोक छोटे कर्मचारी हैं. गलती ना होते हुए भी वो अपनी फरियाद आखिर किससे कहेंगे?
सूत्रों का कहना है कि उस दिन चंदौली पेज आलोक राय ही देख रहे थे, जबकि डाक इंचार्ज आदर्श शुक्ला छुट्टी पर थे. चंदौली से जब यह खबर आई तो आलोक ने सिटी इंचार्ज रतन सिंह से खबर के बारे में पूछा तो उन्होंने ऐसी खबर ना भेजने को कहा था, इसे छोटी करके और बैलेंस खबर बनाने को कहा. आलोक इसके बाद इसके बाद खबर लेकर अनिल मिश्रा के पास पहुंचे, मिश्रा जी को रतन सिंह की बात बताई तो मिश्रा जी ने पूरी खबर ऐसे ही भेज देने को कहा. बताया जा रहा है कि अनिल मिश्रा एवं रतन सिंह में एक बार सार्वजनिक ऐसी-तैसी हो चुकी है, इसलिए अनिल मिश्रा ने रतन सिंह के आदेश के उलट पूरी खबर ज्यों कि त्यों भेजने का फरमान सुना दिया ताकि वे अपनी औकात रतन सिंह को दिखा सकें. पर मिश्रा जी को भी शायद खबर नहीं थी कि आग इतनी ज्यादा बढ़ जाएगी. अब खुद को झुलसने से बचाने के लिए शिकार भी लगभग तय कर लिया गया है.
बताया जा रहा है कि रिपोर्ट दिल्ली भेजी जा चुकी है, जिसमें संभवत: मिश्रा जी को अभयदान दे दिया गया है. वैसे भी संपांदक के खास माने जाने वाले मिश्रा जी की तूती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एनई के पोस्ट पर रजनीश त्रिपाठी की नियुक्ति होने के बाद भी सारी जिम्मेदारी मिश्रा जी के पास है. पेज और खबर उन्हीं के टेबल से तय होती है. अब ऐसा किस लिए होता है इसको लेकर कई कहानियां हैं. जिनकी मिश्रा जी से नहीं पटती वह हाशिए पर रहता है. हिंदुस्तान के जितने भी पुरनिया जनसंदेश टाइम्स भागे हैं सब मिश्रा जी के सताए हुए हैं. चाहे लारी हों, विजय विनीत हों, जितेंद्र हों या और सारे तमाम लोग हों. मौका मिलते ही इस नरक से भाग लिए, हालांकि वैसे भी जिस तरह की स्थिति जनसंदेश टाइम्स की दिख रही है वह भी हिंदुस्तान के इन पुरनियों के लिए वाटरलू साबित होने वाली ही है.






