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अनिल सौमित्र के साथ हुई कार्रवाई की पंकज झा ने की निंदा

पंकज कुमार झा : विलंब से पता चला कि मध्य प्रदेश में भाजपा की पत्रिका के संपादक अनिल सौमित्र हटा दिए गए हैं. सोचा था अभी डेढ़ महीना बिलकुल अपने प्रदेश पर ही ध्यान एकत्र रखूँगा लेकिन ऐसे मुद्दों पर नहीं बोल कर अपने ज़मीर को जबाब देना थोडा मुश्किल होगा. बिना परिणाम की परवाह किये, बिना ये सोचे कि ऐसी किसी परिस्थिति में कौन आपके पक्ष में बोल पायेगा कौन नहीं, यह दो टूक कहना पडेगा कि सौमित्र पर की गयी कारवाई भर्त्सना के लायक है. प्रकाशन के अध्यक्ष को लिखे पत्र में सौमित्र ने बिलकुल सही लिखा है कि ''भाजपा ही नहीं पूरे विचार परिवार से जुडने और बिछुडने वालों के लिए चरैवेति का यह प्रसंग एक मिसाल की तरह काम करेगा.''

पंकज कुमार झा : विलंब से पता चला कि मध्य प्रदेश में भाजपा की पत्रिका के संपादक अनिल सौमित्र हटा दिए गए हैं. सोचा था अभी डेढ़ महीना बिलकुल अपने प्रदेश पर ही ध्यान एकत्र रखूँगा लेकिन ऐसे मुद्दों पर नहीं बोल कर अपने ज़मीर को जबाब देना थोडा मुश्किल होगा. बिना परिणाम की परवाह किये, बिना ये सोचे कि ऐसी किसी परिस्थिति में कौन आपके पक्ष में बोल पायेगा कौन नहीं, यह दो टूक कहना पडेगा कि सौमित्र पर की गयी कारवाई भर्त्सना के लायक है. प्रकाशन के अध्यक्ष को लिखे पत्र में सौमित्र ने बिलकुल सही लिखा है कि ''भाजपा ही नहीं पूरे विचार परिवार से जुडने और बिछुडने वालों के लिए चरैवेति का यह प्रसंग एक मिसाल की तरह काम करेगा.''

अनिल जी पर लगे आरोप के सत्य-असत्य होने के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है. लेकिन पडोसी प्रदेश में समकक्ष होने के नाते ये ज़रूर जानता हूँ कि जिस 'एमपी' में किसी क्लर्क के घर से भी पांच-दस करोड निकल जाना सामान्य बात हो. जहां किसी मंत्री के पीए का लाइफस्टाइल देख कर कोई उद्योगपति भी रस्क करने लगे. जिन प्रदेशों में एक भी प्रभावशाली नेता के चमचे हो जाने पर किसी लड़के में ये ताकत आ जाय कि वो आईजी-डीआईजी तक को फटकार सकता हो, उसकी तुलना में आखिर कोई संपादक बेचारा आखिर क्या भ्रष्टाचार कर सकता है? उसके पास सिवा सही पते के अभाव में लौट आये पुरानी पत्रिका की कॉपी के अलावा होता ही क्या है?

किसी पत्रकार के लिए विचारधारा विशेष से जुड़ जाना एक जोखिम भरा फैसला होता है. नेता लोग भले टिकट नहीं मिलने पर किसी भी दल में जाने को आज़ाद हों लेकिन किसी पत्रकार के पास भगवा में रंगने के बाद कोई दूसरा विकल्प शेष नहीं रहता. ऐसे में किसी भी विचारधारा के लिए काम करने वाले पत्रकारों के प्रति उसके लोग थोडा मानवीय व्यवहार करें यही अपेक्षा है. वरना ऐसे ही लिखने-पढ़ने वालों का अभाव होते जा रहे राजनीतिक क्षेत्र में कौन आना चाहेगा? बाबा भारती की कहानी की तरह कौन भरोसा करेगा फिर आप पर. अनिल सौमित्र के साथ हुए इस एकतरफा कारवाई की मैं निंदा करता हूँ.

पत्रकार तथा दीप कमल पत्रिका के संपादक पंकज कुमार झा के एफबी वॉल से साभार.

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