अपनी किताब ‘नक्सल लाइव’ के बारे में कुछ बता रहे हैं पत्रकार आरके गांधी

नक्सलवाद, माओवाद, लाल आतंकी ये शब्द बचपन से सुनता आ रहा था. लेकिन पहली तस्वीर जो ये शब्द सुनकर मेरे दिमाग में बनी थी वो "हजार चौरासी की मां"  नाम की एक फिल्म के दृश्यों ने बनाई थी. दरअसल जब मैं 2005 में पं. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से जनसंचार में मास्टर डिग्री की पढ़ाई शुरू की थी, वहीं देश भर से चुन कर आए विद्यार्थियों को गोविन्द निहलानी की फिल्म "हजार चौरासी की मां" दिखाई गई. फिल्म की कहानी सुजाता चैटर्जी की थी जो  बैंक में काम करने वाली साधारण महिला थी, उसका जीवन अपने परिवार और कर्तव्यों के इर्द-गिर्द घूमता है.

उसका सबसे छोटा बेटा व्रती नक्सली बन जाता है और पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है. उसकी लाश का नम्बर होता है 1084. ऐसे में सुजाता बन जाती है हजार चौरासी की मां. सुजाता अपने बेटे के जीवनकाल में उसके नक्सली सम्बन्ध के बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ रहती है. फिल्म की मुख्य पात्र सुजाता की तरह मैं भी नक्सल मुद्दे को लेकर अनभिज्ञ था. लेकिन इसी फिल्म ने इस मुद्दे को नजदीक से समझने की उत्सुकता पैदा की.

भोपाल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र), हैदराबाद में काम करते हुए इसकी रिपोर्टिंग करने की इच्छा हमेशा रही. मौका तब लगा जब हैदराबाद से छत्तीसगढ़ मेरा ट्रांसफर हुआ. पहली बार नक्सल रिपोर्टिंग जो कि वह रायपुर कोर्ट में माओवादियों की पेशी की थी.यहीं पर पहली बार मैंने आमने-सामने किसी नक्सली को देखा. इसके बाद से नक्सलियों के शहरी नेटवर्क  से लेकर पूरी तरह से नक्सल प्रभावित बीहड़ जंगलों में अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से इस मुद्दे को नजदीक से जाना और समझा. अब जो तस्वीर मेरे दिमाग में इसे लेकर बनती है वो हजार चौरासी की मां के दृश्यों से बिल्कुल अलग है. उत्सुकता इतनी बलवती होती गई कि कहीं भी नक्सल घटना की सूचना मिलते ही उसकी लाइव कवरेज के लिए अपनी टीम के साथ तुरंत  घटनास्थल के लिए निकल पड़ा. कई बार तो पुलिस-फोर्स से भी पहले घटनास्थल पर पहुंचा.इस दौरान मौके पर पहुँचने की बात ही दिमाग पर रहती थी.

श्रीलंका के कैनडी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में पत्रकार आर.के. गाँधी की किताब 'नक्सल लाइव' का विमोचन करते श्रीलंका में भारतीय राजनयिक विनोद पाशी, प्रसिद्ध आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर और माँरीशस की ख्यात लेखिता डा. रेशमी रामधोनी.
श्रीलंका के कैनडी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में पत्रकार आर.के. गाँधी की किताब ‘नक्सल लाइव’ का विमोचन करते श्रीलंका में भारतीय राजनयिक विनोद पाशी, प्रसिद्ध आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर और माँरीशस की ख्यात लेखिता डा. रेशमी रामधोनी.

घटना की रिपोर्टिंग के बाद पुलिस के अधिकारियों एवं साथी पत्रकारों के द्वारा जब यह बताया जाता था कि मैंने घटनास्थल पर पहुँचने की उत्सुकता के चलते अपनी और अपने टीम के लोगों की जान कैसे जोखिम में डाल दी थी. लेकिन इसे मैं आज तक नहीं जान पाया कि हर समझाइश के बाद अगली घटना होने पर बैसे ही घटनास्थल पर पहुँचते रहा. अपने 12 साल की पत्रकारिता में मैंने आधे से अधिक सफर लाल गलियारे का कवरेज करते हुए बिताया. इस गलियारे में कई बार घुसने का दुस्साहस किया. दुस्साहस ऐसा जहां मैं अपनी और अपनी टीम की जान जोखिम में डालने से गुरेज तक नहीं किया. बेखौफ और निडरता के साथ किसी नक्सली हिंसा के बाद घटनास्थल पर पहुँचना और वहां से लाइव कवरेज करना.

ऐसा कई बार मौका आया जब किसी घटना के बाद रात में ही राजधानी से निकलना और सूरज की पहली किरण के साथ घटनास्थल पर मौजूदा रहना अपनी फितरत में शुमार हो चुका था. खैर मेरे इस काम में मेरे कैमरापर्सन संजीव सिन्हा और परवेज अहमद खान का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने हमेशा उत्साहवर्धन किया. ओबी इंजीनियर गोविंद राव और दिलीप राय के बिना दुर्गम इलाके से लाइव करना मुमकिन ही नहीं था. उन्होंने हर विषम परिस्थिति में साथ दिया. कच्ची-पक्की दुर्गम राहों पर ओवी को ले जाने में ओवी ड्राइवर दीपक की भी अपनी मास्टरी थी. कभी वो थक जाता तो टीम का कोई भी मेम्बर ड्राइवरी पर भी हाथ अजमा लेता था. 2008 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पण्डेवार मतदान केन्द्र पर नक्सलियों के बूथ कैप्चरिंग की लाइव कवरेज से लेकर 2013 के विधानसभा चुनाव तक लगातार कई बड़ी नक्सली घटना की कवरेज में हम सबसे आगे रहे.

कई एक्सक्लूसिव फुटेज रहें जिसे पूरे देश की मीडिया ने पंच किया. ईटीवी और साधना न्यूज के वरिष्ठ सहयोगियों के मार्गदर्शन के बिना यह काम नामुमकिन था. उन्होंने हर मोड़ पर हर तरीके से हर संभव हमारा हौसला अफजाई किया. ऐसे में जहां चारपहिया गाड़ी से पहुँचना जोखिम भरा होता था, उस दुर्गम इलाके से लाइव करते थे. पगडंडी रास्ते, पहाड़ की ऊंची-नीची राहें, नुकीले पत्थर, घुमावदार रास्ते, जहां एक छोटी सी चूक का मतलब मौत से सीधा सामना हो सकता है. ऐसे में इन्ही रास्तों पर सफर करना और घटनास्थल पर पहुँचना हमारी टीम के लिए खतरों से कम नहीं रहता था. ऊंची पहाड़ियों पर बढ़ते-बढ़ते कभी-कभी ऐसा लागता था कि बस अब नहीं, आगे नहीं जाया जा सकता. उस वक्त टीम का हर सदस्य एक-दूसरे का हौसलाअफजाई करते हुए ओवी को आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता. रात का सन्नाटा और कभी कभी अजीबोगरीब आवाजें. कहीं नक्सलियों द्वारा बिछाए गए बारूदी सुरंग की चपेट में आने की अनहोनी इन तमाम डरावने पलों के बीच हम सफल होकर ही राजधानी लौटते थे. जोखिम भरे कवरेज के दौरान मैंने कई आलेख लिखें. जिसे देश भर के अलग-अलगल वेब पोर्टल और अखबरों ने जगह दी जिसे एक किताब में रखने की कोशिश मात्र है.

जब-जब मैं नक्सल इलाकों में कदम रखता, आदिवासियों के मुरझाए चेहरे हमसे सैकड़ों सवाल करते नजर आते. नक्सल इलाकों में अभी भी आदिवासियों का शोषण जारी है, पर हिंसा के जरिए इस शोषण को खत्म नहीं किया जा सकता. लोकतांत्रिक तरीके से ही लोगों को जागरूक करके समस्या को खत्म किया जा सकता है. नक्सल समस्या निदान के बारे में ऐसा मुझे लगता है कि यदि आम जनता को तकलीफ हुई, तो उनका विश्वास अर्जित कर पाना संभव नहीं है. वैश्वीकरण के समय में शोषण एवं गरीबी बढ़ी है और सरकार इस मुद्दे पर न तो संवाद करना चाहती है, और न ही हिंसा पूरी तरह से खत्म करना चाहती है. ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों के ऊपर बैठे आदिवासियों पर सामान्य हिंसा के साथ-साथ नक्सली हिंसा भी बढ़ी है, ऐसा मैंने सुन रखा था रिपोर्टिंग में नक्सल प्रभावित इलाके के आम व्यक्ति की बात उठाने पर भी सरकार नक्सली मान लेती है. लेकिन पिछले कई सालों से रिपोर्टिंग करते हुए मुझे ऐसा कुछ भी एहसास नहीं हुआ. नक्सल इलाकों की रिपोर्टिंग को लेकर अपनी चुनौतियों हैं और इन्हीं चुनौतियों के द्वंद से उभरी मेरी किताब है 'नक्सल लाइव'.

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