‘अपनों’ ने भी चलाए तीरः गरीबी के ‘सुहावने’ आंकड़े कराने लगे हैं सरकार की फजीहत

योजना आयोग द्वारा जारी गरीबी की नई ‘सुहावनी’ तस्वीर, सरकार के लिए मुसीबत बनने लगी है। क्योंकि, गरीबी घटने का नया जादुई आंकड़ा कोई हजम करने को तैयार नहीं है। यहां तक कि यूपीए सरकार के कई घटक भी खुलकर आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल दागने लगे हैं। सरकार के रणनीतिकारों ने तैयारी तो यही की थी कि गरीबी के नए आंकड़े के जरिए सरकार की वाहवाही के ढोल जमकर बजाए जाएंगे। इससे यह संदेश जाएगा कि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चलने वाली सरकार ने कम से कम गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल कर ली है। लेकिन, मुश्किल यह है कि कांग्रेस के दिग्गज भी गरीबी की नई तस्वीर को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं। सरकार के सहयोगी दल एनसीपी ने तो खुलकर गरीबी के सरकारी मापदंडों पर सवाल खड़े किए हैं। केंद्रीय मंत्री एवं एनसीपी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने कह दिया है कि उनकी पार्टी गरीबी को लेकर आयोग के मापदंड से सहमत नहीं है।

विपक्षी दलों को सरकार के खिलाफ निशाना साधने का यह एक नया मुद्दा मिल गया है। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद कहते हैं कि पिछले कई सालों से देश की आम जनता कमरतोड़ महंगाई से त्रस्त है। इसके बावजूद योजना आयोग ने दावा किया है कि देश में तेजी से गरीबों की संख्या घटी है। चुनावी साल में सरकार ने यह प्रचार किस मकसद से कराया है? इसे समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। लेकिन, इस कोशिश के जरिए गरीबों के साथ एक भद्दा मजाक जरूर किया गया है। सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी इस बात पर हैरानी जताते हैं कि सरकार ने तमाम विवादों के बावजूद गरीबी का मापदंड सुरेश तेंदुलकर समिति के फॉर्मूले से करा दिया है। जबकि दो साल पहले यह तय किया गया था कि गरीबी की परिभाषा तय करने के लिए नए मापदंड तैयार होंगे। नया फॉर्मूला बनाने के लिए एक सलाहकार समूह का गठन किया गया था। जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन को सौंपी गई थी।

उल्लेखनीय है कि सी. रंगराजन की पहली रिपोर्ट अगले साल जून तक आएगी। जबकि, लोकसभा के चुनाव इसके पहले ही हो जाएंगे। माना जा रहा है कि सरकार के रणनीतिकारों ने वाहवाही बटोरने के लिए गरीबी का नया आंकडा पुराने फॉर्मूले के जरिए ही जारी करवा दिया। ताकि, सरकार को इसका राजनीतिक लाभ मिल सके। दरअसल, योजना आयोग ने मंगलवार को यह दावा किया कि देश में गरीबों की संख्या 2004-05 के मुकाबले 2011-12 में तेजी से घटी है। पहले देश की कुल आबादी में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 37.2 प्रतिशत थी। जबकि, यह घटकर 21.93 प्रतिशत तक रह गई है।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया का मानना है कि सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के चलते तेजी से आर्थिक तस्वीर बदली है। इसके चलते भुखमरी जैसी स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है। आहलुवालिया को इस बात की हैरानी हो रही है कि लोग गरीबी के मापदंड को लेकर इतने आक्रामक क्यों हो गए हैं? आखिर, इनका दृष्टिकोण सकारात्मक क्यों नहीं हैं? आयोग ने गरीबी की जो नई सीमा तय की है, इसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में रोज 27.20 रुपए प्रतिदिन से अधिक कमाने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा के बाहर माना जाएगा। इसी तरह शहरी क्षेत्र में रोजाना 33.33 रुपए से ज्यादा कमाने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा के बाहर माना जाएगा। इस मापदंड के आधार पर देश में गरीबों की संख्या 40.73 करोड़ से घटकर 26.84 करोड़ रह गई है। यह आंकड़ा तेंदुलकर फॉर्मूले के आधार पर तय किया गया है। उल्लेखनीय है कि दो साल पहले भी इसी मापदंड के अनुसार, गरीबी का जो आंकड़ा तैयार हुआ था, उसको लेकर सरकार की जमकर फजीहत हुई थी।

सरकार ने उस दौर में यह स्वीकार कर लिया था कि गरीबी का स्तर तय करने के लिए नए मापदंड बनाने की जरूरत है। विपक्ष के दबाव में सरकार ने इस काम के लिए रंगराजन समिति बना दी है। चूंकि, इसकी रिपोर्ट आने में देरी है। ऐसे में, इसका इंतजार   किए बगैर ही योजना आयोग ने नया आंकड़ा जारी कर दिया है। एनसीपी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल कहते हैं कि योजना आयोग द्वारा पेश किए गए गरीबी के ये आंकड़े स्वीकार नहीं किए जा सकते। एनसीपी के एक राष्ट्रीय महासचिव ने अनौपचारिक बातचीत के दौरान नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि योजना आयोग की इस तरह की ‘बाजीगीरी’ से सरकार अपनी और फजीहत करा लेती है। इससे सरकार की राजनीतिक साख भी खतरे में पड़ रही है। बीजद के वरिष्ठ नेता जया पांडा ने कहा है कि उनकी पार्टी यह मामला संसद सत्र में उठाएगी। क्योंकि, कांग्रेस के इशारे पर योजना आयोग गरीबी के मुद्दे पर एकदम फरेबी तस्वीर पेश कर रहा है। ऐसा ही चलता रहा, तो योजना आयोग के दूसरे आंकड़ों की विश्वसनीयता भी बहुत कमजोर हो जाएगी।

भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर का सवाल है कि आखिर, योजना आयोग को गरीबी का आंकड़ा पुराने विवादित फॉर्मूले से ही जारी करने की क्या इमरजेंसी हो गई? इस मामले में साफ दिखाई पड़ता है कि सरकार आम लोगों को झांसा देने के लिए योजना आयोग को भी अपना राजनीतिक औजार बना रही है। यूपीए सरकार पहले भी सीबीआई से लेकर कई और महत्वपूर्ण सरकारी संस्थाओं की साख गिरवा चुकी है। इसी क्रम में उसने योजना आयोग का भी दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है। जावड़ेकर का दावा है कि गरीबी कम होने की जो तस्वीर पेश की गई है, वह खुद कई तरह के अंतरविरोधों का शिकार है।

सीपीएम की वरिष्ठ नेता वृंदा करात कहती हैं कि यदि वाकई में गरीबों की संख्या इतनी तेजी से कम हो गई है, तो फिर यूपीए सरकार 67 प्रतिशत लोगों को खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी के जरिए सस्ती दरों पर अनाज देने की कोशिश क्यों कर रही है? वे कटाक्ष करती हैं कि आखिर जब देश के लोग तेजी से ‘अमीर’ हो रहे हैं, तो उन्हें दो-तीन रुपए किलो की दर पर अनाज देने की क्या जरूरत है? कई आर्थिक विशेषज्ञों को भी योजना आयोग का ताजा आंकड़ा बहुत विश्वसनीय नहीं लग रहा। इन लोगों का सवाल है कि योजना आयोग पहले यह जानकारी दे कि गरीबी उन्मूलन की कौन सी नीतियां कारगर रही हैं? सच्चाई तो यह है कि सरकार से लेकर योजना आयोग के बीच गरीबी उन्मूलन की नीतियों को लेकर मतभेद बरकरार हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री सालों से गुहार लगा रहे हैं कि भारी अनुदान वाली योजनाओं में कटौती जरूरी है। क्योंकि, इसके बिना देश की आर्थिक गाड़ी पटरी पर नहीं आ सकती। लेकिन, दूसरी तरफ सरकार खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून को लागू करने के लिए बेताब है। जबकि, इसमें हर साल करीब सवा से डेढ़ लाख करोड़ रुपए का घाटा सरकार को उठाना पड़ेगा। जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्यन सेन ने भी अपने एक लेख में इस योजना के कई पहलुओं पर सवाल उठाए हैं। यह कहा है कि गरीबी रेखा से ऊपर की श्रेणी में आने वालों को बेहद सस्ता अन्न देने की क्या जरूरत है?

संसद का मानसून सत्र पांच अगस्त से शुरू होने जा रहा है। विपक्ष ने तैयारी शुरू कर दी है कि गरीबी के नए आंकड़ों पर भी सरकार को घेरा जाए। भाजपा के रविशंकर प्रसाद का दावा है कि हड़बड़ी में आंकड़ों की जो तस्वीर जारी की गई है, उसकी सच्चाई वे लोग संसद में बताएंगे। कई राज्यों के नए गरीबी के आंकड़े विवादों के घेरे में आ रहे हैं। 2004-05 में बिहार में गरीबों की संख्या 54.7 प्रतिशत बताई गई थी। जबकि, 2009-10 के सर्वेक्षण में जानकारी दी गई कि बिहार में गरीबी की स्थिति में मामूली बदलाव आया है इसी के चलते यह आंकड़ा 53.5 प्रतिशत पहुंचा है। अब 2011-12 का जो आंकड़ा जारी किया गया है, उसमें चमत्कारिक ढंग से बड़ा बदलाव दर्शाया गया है। आंकड़ा है कि यहां गरीबी की दर 33.07 प्रतिशत तक आ गई है। राजद प्रमुख लालू यादव को भी योजना आयोग की ताजा तस्वीर बहुत विश्वसनीय नहीं लग रही। उन्होंने कहा है कि उन्हें तो पूरे राज्य में बदहाली ही ज्यादा दिखाई पड़ती है, ऐसे में वे यह नहीं मान सकते कि बिहार में ‘अमीरों’ की संख्या ज्यादा बढ़ रही है। वे याद दिलाते हैं कि लोग अभी सरकार की अर्जुन सेन समिति का वह बहुचर्चित जुमला नहीं भूले हैं, जिसमें इस विशेषज्ञ समिति ने बताया था कि देश के 84 करोड़ लोग सिर्फ 20 रुपए रोजाना में गुजर करने के लिए मजबूर हैं। इस जुमले की गूंज राजनीतिक हल्कों में कई सालों तक सुनाई भी पड़ी थी। बहरहाल, योजना आयोग का यह सुहावना आंकड़ा इस बार कांग्रेसी दिग्गजों को भी खुश नहीं कर पाया। पार्टी का कोई बड़ा नेता सरकार की इस ‘उपलब्धि’ पर इतराने की हिम्मत करते नहीं देखा जा रहा। यहां तक कि कांग्रेस के बहुचर्चित महासचिव दिग्विजय सिंह भी इस मुद्दे पर ज्यादा कुछ नहीं बोल पा रहे।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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