Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal

विविध

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी

दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति को देखकर आज राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा लिखी गई कविता “अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी” याद आ गयी. कितनी प्रासंगिक लगती है ये कविता आज भी. जिस समय लिखी गयी थी उस समय की बात तो समझ में आती है कि उस समय की स्थितियां ऐसी रही होंगी. पर अगर आज भी ये उतनी प्रासंगिक है तो सवाल बन जाती है. एक ऐसा सवाल जो आज खड़ा हो गया है. आखिर महिलाओं कि स्थिति में कब सुधार होगा, क्या महिलाएं निकट भविष्य में भी बाबा आदम के जमाने में जीती रहेंगी? और भी न जाने कितने ही सवाल है महिलाओं से जुड़े जो यहाँ खड़े हो जाते हैं. निरंतर विकास के नए सोपानों को छूती दुनिया में महिलाओं कि स्थिति आज भी उतनी ही दयनीय है जितनी आज से दो सौ-तीन सौ साल पहले थी जो बड़ी विडम्बना की बात है.

दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति को देखकर आज राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा लिखी गई कविता “अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी” याद आ गयी. कितनी प्रासंगिक लगती है ये कविता आज भी. जिस समय लिखी गयी थी उस समय की बात तो समझ में आती है कि उस समय की स्थितियां ऐसी रही होंगी. पर अगर आज भी ये उतनी प्रासंगिक है तो सवाल बन जाती है. एक ऐसा सवाल जो आज खड़ा हो गया है. आखिर महिलाओं कि स्थिति में कब सुधार होगा, क्या महिलाएं निकट भविष्य में भी बाबा आदम के जमाने में जीती रहेंगी? और भी न जाने कितने ही सवाल है महिलाओं से जुड़े जो यहाँ खड़े हो जाते हैं. निरंतर विकास के नए सोपानों को छूती दुनिया में महिलाओं कि स्थिति आज भी उतनी ही दयनीय है जितनी आज से दो सौ-तीन सौ साल पहले थी जो बड़ी विडम्बना की बात है.

हाल ही में महिलाओं की स्थिति के बाबत अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘वूमेन्स रीजनल नेटवर्क’ (डब्लूआरएन) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि आज भी महिलाएं वही जीवन जी रही है जैसा वह पिछले बहुत से सालों से जीती आ रही हैं. यह रिपोर्ट तो यही प्रदर्शित करती है. इस संस्था ने भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कॉन्फ्लिक्ट जोन (संघर्ष वाले क्षेत्रों) में निवास करने वाली महिलाओं की स्थिति का सैन्यीकरण, सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे तीन महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर आंकलन किया और पाया कि महिलाओं कि स्थिति कितनी दयनीय है. आज महिलाएं हवा में उड़ने लगी हैं, पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं, पुरुषों की बराबरी कर चुकी हैं, हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. फिर हर वर्ष आने वाली रिपोर्ट यह क्यों नही दर्शाती? ये एक बड़ा सवाल है ज़मीनी हकीकत कुछ और है ये रिपोर्ट हमें साफ़ तौर पर यह दर्शाती हैं. सरकार कहने को कुछ भी कहती रहे, मामला सरकार की नज़रों में रहते हुए भी नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. भारत में ही नहीं दुनिया भर में ऐसा ही है.     

इस रिपोर्ट के लिए किये गए शोध में भारत के जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा और उड़ीसा राज्यों की महिलाओं, अफगानिस्तान के काबुल, बल्क, बामयान, फरयाब, हेरात, कांधार, नांगरहर और कुंडुज इलाकों की महिलाओं, और पाकिस्तान के स्वात और बलूचिस्तान को शामिल किया गया है. इस शोध से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि तीनों देशों में महिलाओं के साथ सैन्य बलों द्वारा बलात्कार, मारपीट और प्रताड़ित करने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है. शोध से जुड़ी अफगानिस्तान की ‘जज नजला अयूबी’ का कहना है कि अफगानिस्तान में महिलाओं को जानवरों के समान आँका जाता है. इस्लामिक देश होने और शरीयत लागू होने के कारण महिलाओं को पति की इजाजत के बगैर घर से बाहर निकलने या बुर्का न पहनने जैसी छोटी-छोटी बातों पर मौत के घाट उतार दिया जाता है. पाकिस्तान में भी कुछ ऐसा ही हाल है. पाकिस्तान में मलाला तो मात्र एक उदाहरण है वहां न जाने कितनी ही युवतियां अपनी जान से हाथ धो चुकी हैं. जिन्होंने ने भी महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की है उसे मौत के घाट उतार दिया गया है. इसी बाबत अगर भारत पर नज़र डालें तो त्रिपुरा में हालात इतने खराब और बदतर हैं कि सैनिक जब चाहे किसी महिला को उठा ले जाते हैं, उसके साथ बलात्कार करते हैं. महिलाओं का शोषण करते हैं, और विडम्बना तो ये है कि इन घटनाओं का जिक्र ना तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया करती है और ना ही स्थानीय पुलिस पीड़ितों की कुछ मदद करती है।

अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों इन घटनाओं को तवज्जो नहीं दी जाती है, क्या साबुन और परफ्यूम के कुछ ज्यादा एड है मीडिया के पास? ऐसा भी नहीं है कि मीडिया अपना काम नहीं करती पर जब इतनी महत्त्वपूर्ण घटनाएं जिनपर तुरंत कोई फैसला लेना चाहिए, रह जाती हैं और दम तोड़ देती हैं मायूसी में, क्यों इस मुद्दे को लेकर एक बड़ी बहस नहीं की जाती? बस एक सुर्खी के बाद मानो खबर का अस्तित्व ही मिट जाता है, गायब हो जाती हैं ये खबरें एक बार सामने आने के बाद, तब लगता है कि क्या हमारी मीडिया भी इन छिपे मुद्दों को नहीं उठाना चाहती? इनको सबके सामने लाना नहीं चाहती? अब असल कारण का पता चलना तो बड़ा मुश्किल हो गया है.

महिलाओं से जुड़ा हर मुद्दा आज विभिन्न मुद्दों को पीछे छोड़ चुका है. अगर हम भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा और अत्याचार की बात करें तो कोई ऐसा राज्य नहीं होगा जहां महिलाएं प्रताड़ित न होती हों. उन पर विभिन्न मान्यताएं न थोपी जाती हों, पहले तो महिलाएं अपने घरों से बाहर सुरक्षित नहीं थीं परन्तु आज तो महिलाएं अपने घरों में अपने परिवार की छाया में भी सुरक्षित नहीं हैं. आये दिन खबरों में पढ़ने को मिलता है कि आज एक पिता ने अपनी बेटी के साथ दुष्कर्म किया, आज एक भाई ने बहन के साथ, आज एक जीजा ने साली के साथ, आज एक ससुर ने बहू के साथ, और भी न जाने क्या क्या सुनने में आता है. रिश्ते तार-तार हो रहे हैं. क्या कहें इसे मानसिकताओं का बदलना या हवस का परवान चढ़ना?

अगर भारत में पिछले कुछ सालों में दुष्कर्म के आंकड़ों पर गौर करें तो चौंकना सम्भव है क्योंकि पिछले कुछ सालों में आंकड़ें केवल बढ़े हैं. 2011 में जहाँ महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों की संख्या 228650 थी, वहीं 2012 में यह संख्या बढ़कर 244276 हो गयी, वहीं जहां 2011 में 19 फीसदी अपराध सामने आये थे, 2012 में 42 फीसदी का आंकड़ा पार हो गया. अगर राज्यों में इन अपराधों पर नजर डालें तो असम में 89.5 फीसदी, आन्ध्र प्रदेश में 40.5 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 20.7 फीसदी, दिल्ली में 14.2 फीसदी एवं बेंगलुरू और कोलकाता में क्रमशः 6.2 और 5.7 फीसदी अपराध सामने आये, जबकि 2012 में ही मध्य प्रदेश में सबसे अधिक दुष्कर्म 3425 और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं, जिसमें दहेज के लिए हत्या के 27.3 फीसदी, 2244 मामले सामने आये, इनके बाद अगर हरियाणा की बात करें तो आंकड़े बेहद ही चिंताजनक हैं.

अब अगर ऐसे ही अपराधों का बढ़ना निरंतर जारी रहा तो अंदाजा लगा लीजिये, क्या हालात होंगे आने वाले समय में? और क्या होगी महिलाओं की स्थिति दुनियाभर के देशों में? अब चुप रहने से काम चलने वाला नहीं है. कुछ करना होगा, कदम आगे की ओर बढ़ाना होगा. वरना हालात तो और भी बदतर होने वाले हैं. प्रकाश की एक किरण तब सामने आयी थी जब निर्भया फण्ड की घोषणा की गयी थी पर एक साल बीतने वाला है, न जाने क्या हुआ उस फण्ड का? शायद सारी योजना ही ठण्डे बस्ते में चली गई, और हम हैं कि आज तक चुप ही हैं और शायद आगे भी ऐसे ही मूकदर्शक बनकर जीते रहेंगे.

               लेखक अश्विनी कुमार एक निजी कंपनी में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं. वे विभिन्न पत्र-                    पत्रिकाओं में लेखन का कार्य भी करते हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

सुख-दुख...

Shambhunath Shukla : सोनी टीवी पर कल से शुरू हुए भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप के संदर्भ में फेसबुक पर खूब हंगामा मचा।...

प्रिंट-टीवी...

सुप्रीम कोर्ट ने वेबसाइटों और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट को 36 घंटे के भीतर हटाने के मामले में केंद्र की ओर से बनाए...

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

Advertisement