अबोधता और निश्छलता की मिसरी घोलती अग्निवेश झा की चार कविताएं

: ढाई नहीं, तीन आखर की कविताएं : जैसे कोई चिंगारी सी है अग्निवेश झा की कविताओं में। एक बरसती आग सी है अग्निवेश की कविताओं में। अभी उम्र जैसे ज़्यादा नहीं है अग्निवेश की, पचीस साल के हैं वह, वैसे ही उन के पास कविताएं भी ज़्यादा नहीं हैं। लेकिन ललक और जोश बहुत ज़्यादा है। जैसे उन्हों ने अपना बालपन और कैशोर्य अभी पार किया है ठीक वैसे ही उन की कविताओं में भी अभी यह उछाह शेष है। उम्र की यह उछाल भी उन की कविताओं में दर्ज है। अनकही। वह जब अपनी कविताएं पढ़ते हैं तो लगता है जैसे कोई चूल्हा धधक रहा हो। लकड़ी वाला चूल्हा। और मन जैसे किसी बटुली में रखे अदहन सा खौल रहा हो।

सीतामढ़ी, बिहार के रहने वाले अग्निवेश के पिता चिकित्सक हैं । लेकिन अग्निवेश इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद इन दिनों दिल्ली में रह रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के मद्देनज़र। वह अकसर मेरा ब्लाग सरोकारनामा पढ़ते रहते हैं। और फिर मुझे फ़ोन भी करते रहते हैं। अकसर कहते रहते थे कि कभी दिल्ली आइए तो बताइएगा, मिलूंगा। बीते महीने मैं दिल्ली के रास्ते में था तो उन्होंने फिर फ़ोन किया। और पूछा, सर्वदा की तरह कि कब आ रहे हैं? मैंने बताया उन्हें कि मैं दिल्ली के रास्ते में ही हूं। वह चहक पड़े। पूछने लगे कि कब मिलूं, कहां ठहरेंगे आदि-आदि। मैंने उन्हें बताया कि दो दिन तक तो बिलकुल समय नहीं है। पर तीसरे दिन का उन्होंने शाम का समय मांग लिया। वह द्वारिका में अपनी बड़ी बहन के साथ रहते हैं।

मैं नोएडा में ठहरा था। वह तय समय के मुताबिक मेरे ठहरने की जगह आ गए। लेकिन उस समय मैं वहां था नहीं। अपने पत्रकार मित्र गिरीश मिश्रा जी के घर पर था। उन्हें देखने गया था। दुर्भाग्य से वह लकवा के शिकार हो गए हैं। अग्निवेश का फ़ोन आया। मैंने उन्हें बताया कि तीन घंटे तो लगेंगे ही वापसी में। वह मारे उत्साह में बोले, कोई बात नहीं। मैं इंतज़ार करता हूं। खैर जब मैं तीन घंटे से भी ज़्यादा देरी से पहुंचा तो अग्निवेश मिले। बिलकुल अपनी कविताओं की तरह। टटकापन, उत्साह और जोश से भरे हुए। दूर ज़मीन से/ देखते दिवा-स्वप्न/ गूंथते-शब्द बीनते हार,/ मॉल,मार्ट-वाल में/ बाँचते-बेचते/ जिस्म की तरह/गड़ती ज़मीन में/ गट-गट निहारती कविता। बिलकुल अपनी इस कविता के ही अंदाज़ में वह मुझे गट-गट निहारते मिले। गोया वह मेरी प्रेमिका हों। गोया वह मेरी अम्मा हों। वह टुक-टुक ऐसे देख रहे थे गोया कोई अबोध शिशु हों। उनके देखने की जो भंगिमा थी वह निरंतर कई-कई शेड्स में थीं। वह भाऊकता में इतने डूबे हुए थे कि सब कुछ एक साथ जान लेना चाहते थे किसी एक्सरे मशीन की तरह, कि किसी स्कैनर की तरह, कि सिटी स्कैन की तरह समझना मुश्किल था।

मैंने उन से कहा कि कुछ बोलेंगे भी। वह सकुचाए और फिर कुरेदने पर बोलने लगे। अब वह सब कुछ मुझे बता देना चाहते थे। किसी हरहराती नदी की तरह वह बतियाते जा रहे थे। फिर अचानक चुप हो गए। मैं ने कहा कि अपनी कुछ कविताएं सुनाइए। वह अपने बैग से एक कापी निकाल कर अपनी कविताएं सुनाने लगे। इस तरह का काव्य-पाठ सुनना मेरे लिए नया था, बिलकुल नया। भाऊकता में कविताएं तो सनी ही थीं, उन के सुनाने में भी नदी का वेग था। वह ताबड़तोड़ कविता सुना रहे थे। अपने बिहारी उच्चरण में ओतप्रेत! अचानक लगा कि वह मुझे कविता नहीं सुना रहे हों, मुझ पर चढ़ाई कर रहे हों, अपना सारा गुस्सा मुझ पर न्योछावर कर देना चाह रहे हों, 'बेचैन रात भर/ लड़ता भिड़ता शब्दों से/ पहुँच जाता नंदीग्राम, अंधड़ में चीखता चिल्लाता जैसे शापित कोई दशरथ ।' वह जैसे जोड़ रहे हों, 'सन्नाटे को गूंजता/ कहीं दूर दांतेवा्ड़ा-बस्तर/ जैसे डाल दिया हो ,/ दोनों कान में ताज़ा/ पूरे बत्तीस रुपए का पिघला गर्म लोहा ।' अग्निवेश जैसे भीतर ही भीतर छटपटा रहे थे और कविता पढ़ रहे थे ऐसे जैसे किसी गुफा से कोई सोता फूटना चाह रहा हो। उसी अकुलाहट में, उसी छटपटाहट में वह जैसे अफना रहे थे, 'क्षुधा से आकुल-व्याकुल/ मैं भोर तक दौड़ता ,/ जैसे पटकते पालो ढले शाम लौटे/ हरवाही से बैल होरी का ।/ चिढ़ा जाता मुँह ,/ कई शब्दों का टक्कर ,/ जैसे सूखी नदी में/ देता मूत कोई दोगला अजित पवार ।' उन की आंखें जैसे फैल जाती हैं, मन ग्लानि से भर जाता है, 'शर्म की बात है ,मै लिखता हूं/ कविता जैसा कुछ/ हाँ जैसे खुदा / देता घुसेड़ आदिम के साथ/ पेट जैसा कुछ ।'

मैं हिल गया हूं यह सुन कर। अग्निवेश कविता पढ़ते जा रहे हैं, ऐसे जैसे झपट कर मुझ से कुछ छीन लेना चाहते हों। उन की कविताओं से ज़्यादा ताप उन के काव्य-पाठ में हैं। आप पढ़ेंगे जब अग्निवेश की कविताएं तो खुद यह बात जान पाएंगे। अग्निवेश की कविताएं असल में एक शिशु की कविताएं हैं। उन की कविताओं में शास्त्रीयता या बिेंब या प्रतीक आदि ढूंढना नादानी ही है। लेकिन कविता का स्वाद और नदी का बहाव उस के ताप के साथ अगर किसी को किसी कविता में ढूंढनी हो तो अग्निवेश की कविता में हेर सकता है। उन की इन कविताओं में अबोधता और निश्छलता की मिसरी भी है। जब रात हो गई तो मैंने घड़ी देखी और उनसे कहा कि, 'आप को द्वारिका जाना है, दूर है, अब आप चलिए। वह बोले, 'थोड़ी देर बाद। अभी आप के साथ और बैठना चाहता हूं।'

फिर वह अपने घर परिवार के बारे में भी बताने लगे। बताने लगे कि कैसे परीक्षाओं की तैयारी के साथ वह पढ़ने और लिखने यानी साहित्य में भी हाथ-पांव मारते रहते हैं। मैं ने उन्हें समझाया कि, 'अभी वह अपनी तैयारी में ही सारा समय लगाएं। यह सब तो बाद में भी संभव हो सकता है। नौकरी ठीक रहेगी तो यह सब भी ठीक रहेगा। नहीं जो समय आ गया है उस में बिना अच्छी नौकरी के कुछ नहीं संभव है।' वह बड़ी लापरवाही से बोले, 'यह तो हो ही जाएगा, पर इस के बिना मैं नहीं रह सकता।' मैं भी जब युवा था तो ऐसे ही कुछ सोचता था। लेकिन तब की गलती अब समझ में आती है। सो मैं ने जब उन्हें और समझाने की कोशिश की तो वह बोले, 'मैं ने पढ़ा है आप का हजारी प्रसाद द्विवेदी वाला संस्मरण भी। जैसे आप उन से मिलने गए थे, उसी भाव में मैं भी आप से मिलने आया हूं और कि जैसे उन्हों ने आप को समझाया था, आप भी वैसे ही समझा रहे हैं, मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है।'

मैं ने कहा भी कि, 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मेरी तुलना नहीं कीजिए। वह बहुत बड़े आदमी थे, मैं बहुत साधारण आदमी हूं। वह आचार्य थे, मैं कुछ भी नहीं।' वह ज़रा चुप रहे फिर मेरी बात मान गए। फिर वह बताने लगे कि मैं ने नेट पर जितना भी कुछ आप का है, सब का सब, एक-एक लाइन पढ़ा है। आदि-आदि। और भाऊकता की नदी में बहते-बहाते रहे। फिर जब मैं ने घड़ी दुबारा देखी तो वह बोले, 'ठीक है, आप परेशान मत होइए मैं चल रहा हूं।' मैं ने उन्हें कहा कि घर पहुंच कर मुझे फ़ोन कर के बताएं ज़रुर कि वह घर पहुंच गए हैं।' घर पहुंच कर उन्हों ने वैसा किया भी। लेकिन जब चलने लगे तो मेरे पैर छूने लगे। जैसे आने पर भी छुआ था। फिर मेरे गले लग गए। ऐसे जैसे बेटा पिता के सीने से लिपट रहा हो।

फिर वह चले भी तो अपनी कविता ही की तरह : 'याद है भादो / बांस-खेत/ उफनते पोखर / पांव और कादो/ बांचते पोथी-पन्ना / पात-फूल नोचते/लौटती बेटियाँ गॉव की ।' पात-फूल नोचते जाते हुए उन्हें मैं देखता ही रह गया। उस रात सोते समय भी अग्निवेश की कविताएं मेरे भीतर गूंज रही थीं : 'मै फिर मिलूंगा/ तुम्हारे बिछड़ने के अलावा/ मेरी शर्तों पे/ बैठेंगे पूरे भर हाथ दूर/प्रेयसी,अबकी सीधा तीन आखऱ पढ़ आऊंगा मैं/ एक बार फिर मिलूंगा मैं !' पढ़िए आप भी सीधा तीन आखर में डूबी अग्निवेश झा की कविताएं। इस लिए भी कि अग्निवेश की कविताएं भले अभी शिशु प्रयास लगें, पर संभावनाएं उन में असीम हैं, अनंत हैं। उन को कविता का अनंत आकाश और पृथ्वी की सारी दिशाएं गुंजायमान करनी ही हैं। यहां बहुत स्नेह के साथ आप के लिए अग्निवेश की कुछ कविताएं पढ़वा रहा हूं, जिन्हें मैं ने बड़े इसरार के साथ उन से मांगी हैं। क्यों कि उन की कविताओं की चिंगारी में फैलने की बड़ी क्षमता है, उन की कविताओं में भाऊकता भरी आग भी खूब दहकती है, जिस में मन का अदहन भी खूब खौलता मिलता है।

आप हैरान हो रहे होंगे कि ढाई आखर तो ठीक है, यह तीन आखर क्या बला है भला? मैं ने भी हैरान हो कर तो नहीं पर एक उत्सुकता में पूछा था अग्निवेश से कि, ' ढाई आखर तो जानता हूं पर यह तीन आखर क्या बला है?' वह जैसे संकोच में पड़ गए। सकुचा कर ही बोले, ' प्रेम तो ढाई आखर है, पर उस के बाद का जो विक्षोभ है ना, वही तीन आखर है !' अब इस के बाद मैं क्या कहता? चुप ही रहा। पर अग्निवेश की कविताएं चुप नहीं हैं, बोलती हुई सी हैं। आंच देती हुई।

तुम शब्द शिल्पी

तुम शब्द शिल्पी
टाँकते
वृत्ताकार शब्द
बैठ शीशमहल में
चकोरमुख से
देखते पार शहर के
ग्राम कृषक-मेघ
अमर-बेल

तुम शब्द शिल्पी,
ठोंकते कील
स्वप्न लोक में
बनाते छंद
आया करते
सदियों से
कागद कारे

तुम शब्द शिल्पी,
हो सकते नहीं
दूर ज़मीन से
देखते दिवा-स्वप्न
गूंथते-शब्द, बीनते हार,
मॉल, मार्ट-वाल में
बाँचते-बेचते
जिस्म की तरह
गड़ती ज़मीन में
गट-गट निहारती कविता
नीर से दूर
नयन शुष्क
जैसे
प्रज्वलित "अग्नि"
तुम शब्द शिल्पी •••••••!

पेट जैसा कुछ !

बेचैन रात भर
लड़ता भिड़ता शब्दों से
पहुँच जाता नंदीग्राम , अंधड़ में
चीखता चिल्लाता जैसे शापित कोई दशरथ |
सन्नाटे को गूंजता
कहीं दूर दांतेवा्ड़ा-बस्तर
जैसे डाल दिया हो ,
दोनों कान में ताजा
पूरे बत्तीस रुपए का
पिघला गर्म लोहा |
क्षुधा से आकुल-व्याकुल
मैं भोर तक दौड़ता ,
जैसे पटकते पालो ढले शाम लौटे
हरवाही से बैल होरी का |
चिढा जाता मुँह ,
कई शब्दो का टक्कर ,
जैसे सूखी नदी में
देता मूत कोई दोगला अजित पवार ।
शर्म की बात है ,मै लिखता हूं
कविता जैसा कुछ
हाँ जैसे खुदा / देता घुसेड़ आदिम के साथ
पेट जैसा कुछ |

मै फिर मिलूंगा

मै फिर मिलूंगा
सूरज के उस पार
समीप हिमगिरी के
तापित न देह होगी,
न होगी देह गंध |

हाँ बादलों की ओट में
दफना दूंगा तब तलक
कोंपले तमाम
जो अनफुटी होगी ,
रख आऊंगा पिछली यादों को
घर के ताख पर ,
गांठ आना तुम भी
जमा कुल झूठ-सच
किसी पुरानी साड़ी के कोर से |
मै फिर मिलूंगा
बाद दोपहर के
जब खत्म हो चुकेगी
मेरी तुम्हारी तमाम देह' अग्नि
मैं फिर मिलूंगा
तुम्हारे बिछड़ने के अलावा
मेरी शर्तों पे
बैठेंगे पूरे भर हाथ दूर
प्रेयसी,अबकी सीधा तीन आखऱ पढ़ आऊंगा मैं
एक बार फिर मिलूंगा मै !

पुरानी स्मृतियां !

पुरानी स्मृतियों से
लौटा हूं / खड़ी होगी
बिछाए अंखियाँ
पगडंडियाँ / क्या ! चुप रहो
जो कोई कविता नहीं
कि खींच दूं / आड़ी-तिरछी पक्तियाँ फिर न पूछना / भूलते क्यों नहीं
पेड़ बेर के / महुईया-खजूर
बौराई मंजरी / दादा की छड़ी
पुरानी पगडंडी |

याद है भादो / बांस-खेत
उफनते पोखर / पांव और कादो
बांचते पोथी-पन्ना / पात-फूल नोचते
लौटती बेटियाँ गॉव की |
उधार की साँसों पे / अभिशप्त आज
पगडंडी
अब छोड भी दी / हमेशा की तरह
इस बार भी तुम्हें / पार गॉव तक
पगडंडी
हाँ वहीं पुरानी पगडंडी |

आप को अगर अग्निवेश की कविताएं सचमुच अच्छी लगती हैं तो आप उन्हें चिट्ठी इस पते पर लिख सकते हैं agnivesh.mechanical@gmail.com या फिर उन्हें इस नंबर पर 08010454302 फ़ोन भी कर सकते हैं।


लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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