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अब के दौर में लेखक को लेखक होने की चिंता खाए जा रही है : डा. माधव

चित्तौड़गढ़। यथार्थ को संजोते हुए जीवन की वास्तविकता का चित्रण कर समाज की गतिशीलता को बनाये रखने का मर्म ही कहानी हैं। सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता शक्ति एक कथाकार की विशेषता है और स्वयं प्रकाश इसके पर्याय बनकर उभरे हैं। उनकी कहानियों में खास तौर पर कथा और कहन की शैली खासतौर पर दिखती हैं। यही कारण है कि पाठक को कहानियों अपने आस-पास के परिवेश से ही मेल खाती हुई अनुभव होती हैं। अपनी विलग अन्दाज की भाषा शैली के कारण स्वयंप्रकाश पाठकों के होकर रह जाते हैं। वे अपनी कहानियों के जरिये किसी विचारधारा को थोपते या ढोते नहीं है बल्कि अन्दर ही अन्दर अपनी बात कहते हुए समकालीन विमर्श और स्थितियों को ठीक ढंग से उकेरने का कौशल रखते हैं।

चित्तौड़गढ़। यथार्थ को संजोते हुए जीवन की वास्तविकता का चित्रण कर समाज की गतिशीलता को बनाये रखने का मर्म ही कहानी हैं। सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता शक्ति एक कथाकार की विशेषता है और स्वयं प्रकाश इसके पर्याय बनकर उभरे हैं। उनकी कहानियों में खास तौर पर कथा और कहन की शैली खासतौर पर दिखती हैं। यही कारण है कि पाठक को कहानियों अपने आस-पास के परिवेश से ही मेल खाती हुई अनुभव होती हैं। अपनी विलग अन्दाज की भाषा शैली के कारण स्वयंप्रकाश पाठकों के होकर रह जाते हैं। वे अपनी कहानियों के जरिये किसी विचारधारा को थोपते या ढोते नहीं है बल्कि अन्दर ही अन्दर अपनी बात कहते हुए समकालीन विमर्श और स्थितियों को ठीक ढंग से उकेरने का कौशल रखते हैं।

एक्जीक्यूटिव क्लब जिंक नगर, चित्तौड़गढ़ में आयोजित समकालीन हिन्दी कथा साहित्य एवं स्वयं प्रकाश विषयक राष्ट्रीय सेमीनार में मुख्यतः यह बात उभरकर आयी। विभिन्न सत्रों में आयोजित इस सेमीनार में निकलकर आया कि रचनाशीलता ही कहानी की जान है। वहीं कहानी सार्थक हैं। जो मन में उत्कण्ठा जगाती हैं। उद्घाटन सत्र में आयोजक संस्थान की गतिविधियों के बारे में हिन्दू कॉलेज दिल्ली के सहआचार्य डॉ. पल्लव ने आत्मीय अन्दाज में संस्मरणनुमा वक्तव्य दिया। सेमीनार से संयोजक डॉ. कनक जैन के अनुसार बीज वक्तव्य के माध्यम से ही डॉ. माधव हाड़ा ने कहा कि आज के दौर में लेखक को स्वयं लेखक होने की चिन्ता खाये जा रही है, वहीं मनुष्य एवं मनुष्य की चिन्ता स्वयं प्रकाश की कहानियों में परिलक्षित होती है। शुरुआत में अतिथियों को माल्यार्पण और शॉल ओढ़ाकर श्रमिक नेता घनश्याम सिंह राणावत, जी.एन.एस. चौहान, जेपी दशोरा, अजयसिंह, योगेश शर्मा ने अभिनन्दन किया।

उद्घाटन सत्र का सबसे रोचक पक्ष कथाकार स्वयंप्रकाश द्वारा ‘कान दांव’ कहानी का पाठ रहा, जिसमें स्वयंप्रकाश के कहानी को कहने और पढ़ने के कौशल से भी श्रोता वाकिफ हुए। इस कहानी पाठ के जरिये स्वयंप्रकाश ने साम्प्रदायिकता पर गहरी चोट थी। सत्र के समापन पर सम्भावना के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने औपचारिक रूप से तमाम अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए आगे भी इस तरह के आयोजन जारी रखने का विश्वास जताया।

सेमीनार के दूसरे सत्र में जबलपुर विश्वविद्यालय की मोनालिसा और राजकीय महाविद्यालय मण्डफिया के प्राध्यापक डॉ. अखिलेश चाष्टा ने पत्रवाचन कर स्वयंप्रकाश की कहानियों को समकालीन परिदृश्य में गहरे तक विश्लेषित किया। विमर्श के दौरान पार्टीशन, चौथा हादसा, नीलकान्त का सफर जैसी कहानियों की खूब चर्चा रही। इसी सत्र के मुख्य वक्ता युवा कवि, अलोचक और अनुवादक अशोक कुमार पाण्डय ने अपने वाम पंथीय विचारधारा से औत-प्रौत अभिभाषण के जरिये समकालीन कथा साहित्य के कईं उदाहरण श्रोताओं के सामने रखे। उन्होंने समय के साथ बदलती परिस्थितियों और संक्रमण के दौर में भी स्वयंप्रकाश के अपने लेखन को लेकर बने रहने पर खुशी जाहिर की। सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि और चिंतक डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय ने कहा कि कोइ भी व्यक्ति दूसरों की पीड़ा और व्यथा को समझकर ही साहित्यकार बन सकता है और सही अर्थों में समाज को कुछ दे सकता हैं। उन्होंने अपने भीनमाल प्रवास को आत्मिय अन्दाज में एक संस्मरण पढ़कर सबके सामने रखा। इस सत्र का संचालन माणिक ने किया।

तीसरे सत्र में कहानी के नये रूपबन्ध और स्वयंप्रकाश जैसे विषय को लेकर चर्चा हुई। इस सत्र में दिल्ली की रेखासिंह ने पत्र वाचन किया। मुख्यवक्ता के रूप में युवा आलोचक कामेश्वर प्रसादसिंह ने स्वयंप्रकाश को उनके समय के दूसरे कथाकारों के साथ रखकर देखा। काशीनाथ सिंह, नामवरसिंह और राजेन्द्र यादव जैसे प्रख्यात लेखकों के हवाले देते हुए उन्होंने स्वयंप्रकाश की कहानी परम्परा को व्याख्यायित किया। सत्र का संचालन करते हुए युवा विचाकर डॉ. रेणु व्यास ने कहा कि स्वयंप्रकाश की कहानी के पात्रों में हमेशा पाठक भी शामिल होता है यही उनकी कहानी की ताकत होती है।

समापन सत्र में डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि जब तक मनुष्य और मनुष्यता है जब तक साहित्य की आवश्यकताओं की प्रासंगिकता रहेगी। उन्होंने कहा कि मानवता सबसे बड़ी विचारधारा है और हमें यह समझना होगा कि वामपंथी हुए बिना भी प्रगतिशील हुआ जा सकता है। सामाजिक यथार्थ के साथ मानवीय पक्ष स्वयंप्रकाश की कहानियों की विशेषता है एवं उनका सम्पूर्ण साहित्य, सृजन इंसानियत के मूल्यों को बार-बार केन्द्र में लाता है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात आलोचक प्रो. नवलकिशोर शर्मा ने बहुत बारिक ढंग से स्वयंप्रकाश की कहानियों पर आलोचना के अन्दाज में व्यक्तव्य दिया। इस सत्र का संचालन करते हुए राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर के प्राध्यापक हिमांशु पण्डया ने कहा कि गलत का प्रतिरोध प्रबलता से करना ही स्वयंप्रकाश की कहानियों को अन्य लेखकों से अलग खड़ा करती है। चित्रकार और कवि रविकुमार ने इस सत्र में कहा कि किसी भी कहानी में विचार की अनुपस्थिति असंभव है और साहित्य व्यक्ति के अनुभव के दायरे को बढ़ाता हैं।

रावतभाटा के रंगकर्मी रविकुमार द्वारा निर्मित स्वयंप्रकाश की कहानियों के खास हिस्सों पर केन्द्रित करके पोस्टर प्रदर्शनी इस सेमीनार का एक और मुख्य आकर्षण रही। यहीं बनास जन, समयांतर, लोक संघर्ष सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। सेमीनार में प्रतिभागियों द्वारा अपने अनुभव सुनाने के क्रम में विकास अग्रवाल ने स्वयंप्रकाश के साथ बिताये अपने समय को संक्षेप में याद किया।

सभी सत्रों में अतिथियों का अभिनन्दन प्रवीणकुमार जोशी, फजलु रहमान, प्रकाश खत्री, रेखा जैन, हरिश लड्ढ़ा, योगेश शर्मा, जयप्रकाश भटनागर, नन्दकिशोर निर्झर, डॉ. ए.एल. जैन, रामेश्वर शर्मा, अब्दुल जब्बार, गजेन्द्र मीणा ने किया। आखिर में आभार आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने दिया।

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