अब पत्रकारिता झोले से नहीं, लक्‍जरी गाडि़यों से निकलती है

सोनभद्र : धुंधली किन्तु तल्खी तलाशती आंखों पर सैद्धांतिक फ्रेम का मोटा चश्‍मा, अतिविस्तारित क्षेत्र का आंकलन करता लहराता हुआ लम्बा कुर्ता एवं परम्पराओं की कसौटी पर अनेक सूत्रों में बंधा पायजामा, एक अनूठे सामाजिक दायित्वों का बोझ उठाते कन्धों पर लम्बा सा झोला और अन्त में एक अदभुत शक्ति का सृजन करने वाली कुर्ते की जेब रूपी म्यांन से झांकती तलवार रूपी कलम। ऐसे सैद्धांतिक स्वरूप की परिकल्पना किसी ऐसे भविष्‍य की धरोहर नहीं रही, जिसे गाड पार्टिकल्स जैसी अदभुत एवं आश्‍चर्यजनक उपलब्धि मानकर किसी युग पुरूष के अभ्युदय की अपेक्षा की जाय बल्कि यह वह स्वरूप है जो अब विलीनता के कगार पर खड़ा होने के बावजूद बेहयाई की बांहे सिकोड़ता प्रतीत होने लगा है।

हां, बेशक तथ्यों की जंग और वैश्‍वीकरण का सहारा कुछ भी साबित करने पर आमादा हो परन्तु सच यह है कि तेजी से उत्पन्न होती सामाजिक विकृतियां, खोखली हो चली निष्‍ठा, बेइमान हो चले नजरिये और खरीद फरोक्त की बेबसी पर थिरकती दलीलें यह साफ बता रही हैं कि निष्‍पक्ष पत्रकारिता में व्यावसायिक चाटुकारिता के दखल ने पत्रकार एवं पत्रकारिता के मायने अब बदल दिये हैं। अब न तो सड़कों पगडंडियों से जूझती चप्पलें रहीं न ही दायित्वों कतर्व्यों को समेटने वाला लम्बा झोला रहा और न ही पत्थरों को पिघला देने वाली निष्‍ठा ही शेष रही। हर पग के साथ एक अनूठे संघर्ष का निर्धारण करने वाली पत्रकारिता अब आलिशान लग्जरी गाड़ियों में ठहर गयी है। जहां से झांकने पर बाहर तो सब कुछ साफ ही नजर आता है परन्तु अंदर झांकने पर काले शीशे के बाद का अंधेरा हर पल नियत पर संदेह ही व्यक्त करता है।

खैर पत्रकारिता के परिपेक्ष्य में वैचारिक द्धंद को निरर्थक साबित होने का एक बड़ा कारण निश्चित रूप से मीडिया का विस्तार एवं विस्तार जनित वैश्विक प्रतिस्पर्धा हो सकती है, परन्तु इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण नैतिक विचारों का पतन भी है, जहॉ वैश्विक प्रतिस्पर्धा का बहाना बनाकर पत्रकारिता के वास्तविक स्वरूप एवं गरिमा को तहस नहस करने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें कोई संदेह नही कि लगातार तकनीकी सफलताओं एवं विकास स्तर ने संचार माध्यमों को सशक्‍त स्वरूप प्रदान किया है, परन्तु आखिर क्यों इस उन्नति ने विपरीत परिणाम देते हुए पत्रकारिता के स्तर को स्वमं कलमकारों के ही बहस का मुद्दा बना दिया। हां, यह अवश्‍य है कि जहां संख्या की बात होती है वहां उन्नति एवं अवनति के वैचारिक द्धंद की अवधारणा पूर्णरूप से निरर्थक ही साबित होती है। कुछ चैतन्य विद्वान एवं विचारक इसे बदले समय की सहमति बतातें हैं, तो फिर क्या? पत्रकारिता के लगातार गिरते स्तर को बदले समय का स्वरूप मानकर सहजता से स्वीकार कर लेना चाहिए। यह समीक्षा अब हर रोज के विवाद को जन्म देने लगी है। जहॉं चन्द रुपये ही पत्रकारिता की योग्यता का निर्धारण साबित होने लगे हैं वही यह निर्धारण समाज सेवा, सत्यनिष्‍ठा से परे अनैतिकता का मापदण्ड साबित होने लगा है।

एक कागज के टुकडे पर प्रेस मालिको द्वारा पत्रकारिता की संवैधानिक संस्तुति तमाम गोरख धंधों की वैकल्पिक सुरक्षा उपलब्ध करा रही है। हर तीसरी गाड़ी पर प्रेस के चमचमाते स्टीकरों का भावार्थ अब सत्यतता की कसौटी नही बल्कि वास्तविक अर्थों में प्रेस एक ऐसा दबाव बन कर रह गया है, जिसे देखकर सामाजिक नियमों के कार्यपालक अनजाने भय से भयाक्रांत हो उठते हैं। ये और बात है कि कार्यपालकों का यह अनजाना भय समीक्षा का एक अलग बिन्दु हो सकता है। परन्तु सामाजिक प्रहरी के तौर पर प्रेस शब्द से जुड़ी अपेक्षाएं एवं मूल्य किसी अन्य अनैतिकता से जुड़ी समीक्षा को अत्यधिक सूक्ष्म ठहराती हैं। ऐसे में प्रतिष्‍ठा बटोरने वाली पत्रकारिता के संज्ञात्मक स्वरूप में परिवर्तन जैसे दलाल, ब्लैकमेलर जैसी उपमाओं पर भी आश्‍चर्य अभिनय ही नजर आता है। आश्‍चर्यजनक तो अब यह भी नहीं लगता कि वाणी और लेखनी पर अपना नियंत्रण खो चुकी पत्रकारिता अब हर चट्टी चौराहे पर अपना मूल्य तय करने लगी है। बेशक यहॉं आपत्ति यदि तार्किक हो तो जायज ही कही जायगी कि पत्रकारिता का विस्तार मात्र तकनीकी क्षेत्रों मे नहीं रहा बल्कि इस परिवर्तित पत्रकारिता ने ट्रेनों, चाय-पान की दुकानों, यहां तक कि खोमचे वालों तक को अपने दायरे में शामिल कर लिया है। और इसका श्रेय भी जाता है ऐसे चन्द कथित पत्रकारों को जिनकी दिलचस्पी कभी पत्रकारिता की पवित्रता में रही ही नहीं बल्कि सुखमय वैभवपूर्ण जीवन की तलाश और पत्रकारिता के वैश्विक दुर्भाग्य ने उन्हे पत्रकार शब्द से नवाज दिया।

पेट पर 20 किलो की गठरी, होठों के बांध तोड़ने को आतुर पान के गुल्ले, लग्जरी गाडियां, व्यवहार की अभद्रता एवं वाणी की अमर्यादा, मदिरा की अर्द्धविक्षिप्तता कुछ ऐसा ही है आधुनिक पत्रकार का स्वरूप। मेनफोर्स के सहारे अपने पुरुषत्‍व का सृजन करने वाले ये पत्रकार कब अपने अमर्यादित शब्‍दों से किसी के मां बहन को प्रणाम कर दें ये भी अनिश्चित ही मान लेना चाहिए। ऐसे में जहां योग्यता का आधार शिक्षा होना चाहिए था, वहॉं चन्द रुपयों की ताकत ने मोर्चा सम्भाल लिया, लिहाजा जिसे ‘क’ लिखने नहीं आया वो कुरान लिखने बैठ गया, जिसे ‘ब’ लिखने नही आया वो बाइबल लिखने बैठ गया और जिसे ‘र’ तक लिखने नही आया वो रामायण का रचयिता बन बैठा। ऐसे पत्रकारों ने पत्रकारिता के मूल्यों का जमकर सौदा किया। चुनाव आया तो, त्यौहार आया तो, जन्म हुआ तो, मौत हुई तो, सत्कार हुआ तो, बलात्कार हुआ तो ये पत्रकार हर बार कीमत वसूलते रहे और पत्रकारिता की उस सृजित गरिमा को सरेराह बेशर्म बनकर बेचते रहे जिसकी वास्तविक परिभाषा ने समुचे देश की जागरूकता तय कर दी और गुलाम भारत को स्वतंत्र मुल्क का दर्जा दिला दिया।

माफ कीजिएगा मेरी खुद की कमजोरी एवं भटकाव से उपजे आक्रोश ने पत्रकारिता के उद्देश्‍यों के प्रति बेशक मेरे विचारों को पूर्णरूप से नकारात्मक बना दिया हो परन्तु यदि अत्यधिक सर्तकता स्वरूप सकारात्मक पहलू पर भी प्रकाश डाला जाय तो भी बस इतना ही निकला कि बना भी रही पत्रकारिता, गिरा भी रही पत्रकारिता और फिर से दिखा भी रही पत्रकारिता। वैसे भले ही स्वेच्छाचारिता एवं व्यावसायिकता के इस दौर से गुजर रही प्रभावहीन पत्रकारिता इन तमाम नकारात्मक परिणीती को सिरे से नकारती हो, परन्तु क्या? संविधान का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली गौरवमयी पत्रकारिता के संदर्भ में चिंतकों की निश्‍चेतना समाज को सही दिशा एवं दशा दिला पायेगी। क्या? खरीद फरोक्त की गिरफ्त मे फॅंसती जा रही पत्रकारिता कलम को लगातार बिकने के लिए प्रेरित नहीं कर रही परन्तु इन सबसे उपर एक सवाल यह भी तो है जो मुझे पत्रकार शब्द पर गौरवान्वित करता है कि आखिर मैं क्यूं नही बिकता।

लेखक एसपी पांडेय सोनभद्र में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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