अब बड़ा आदमी राममनोहर लोहिया या सफदरजंग या एम्स में नहीं बल्कि मेदांता या रॉकलैंड या फोर्टिस में मरता है

मेनस्ट्रीम मीडिया ये बहुत पहले मान चुका है कि सरकारी अस्पताल का काम पोस्टमार्टम रिपोर्ट देना और मृत्यु प्रमाण पत्र देना भर है, इलाज करना नहीं. ऐसे में विपदा में जो ममता के सागर पिक्चर ट्यूब से निकलकर हम तक बहते हैं, वो बहुत ही घिनौना लगता है.

कमाल खान ने श्रवास्ती के पूर्व विधायक भगवती बाबू पर ईमानदारी की मिसाल बताते हुए, गरीबी से मौत होने को लेकर मार्मिक रिपोर्ट बनायी. जाहिर है रिपोर्ट का एक पक्ष ये बताता है कि कैसे भगवती बाबू ने गरीबी में लेकिन ईमानदारी के साथ जीवन जिया लेकिन दूसरा पक्ष बेहद ही क्रूर है. पहले उन्हें सरकारी अस्पताल में दाखिल किया गया लेकिन बाद में सुधार न होने पर निजी अस्पताल में और उनके पास सिर्फ पांच हजार रुपये थे और पैसे के अभाव में उनकी जान चली गई.

भगवती बाबू अचानक नहीं मरे, पर्याप्त वक्त था जिसमें कई लोग आगे आते लेकिन उस सरकारी अस्पताल की कुव्यवस्था को लेकर कोई छानबीन नहीं हुई और न ही उस निजी अस्पताल पर सवाल उठाए गए कि पैसे के आगे उसने कैसे मरीज की जान जाने दे दी?

मीडिया सर्किल के लोग बड़े शान से बताते हैं फलां को रॉकलैंड में, चिलां को मेदांता में,ढिमकाना को फार्टिस में देखने जाना है या मेको यहां एडमिट होना पड़ा. ऐसे किसी भी अस्पताल का नाम लेते मैं कभी नहीं सुनता जिनकी फुटेज वो चलाते हैं, जिनके विज्ञापन चलाते हैं, वहां का ही नाम लेते हैं. उन्हें पता है कि फुटेज चलाने लायक और इलाज कराने लायक दो अलग-अलग अस्पताल होते हैं. उन्होंने अपने को इस अस्पताल से अलग कर लिया है. शायद ही कभी पलटकर यहां स्टोरी की तलाश में जाते होंगे लेकिन जैसे ही मौत की खबर आती है, सबके भीतर ममता और करुणा का सागर उमड़ पड़ता है. ममता की ये बांध फिर झटके में टूटकर सिस्टम की ओर लपकती है और सारा कुछ कांग्रेस-बीजेपी की दाल-मखनी बनकर रह जाता है.

पहले जब भी किसी बड़े व्यक्ति के इलाज होने या मौत होने की खबर आती थी तो राम मनोहर लोहिया, सफदरजंग, एम्स का नाम आता था लेकिन अब मेदांता, रॉकलैंड, फोर्टिस. आपको क्या लगता है, ये सिर्फ नाम बदल जाने का मामला भर है.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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