अब शहरों में नहीं मिलती साहित्‍य की पुस्‍तकें : विकास नारायण

मुंबई पुस्तक मेले के अवसर पर आई.आई.टी. मुंबई के सभागार में “पुस्तक संस्कृति क्यों नष्ट हो रही है”- विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें जाने-माने साहित्यकार विकास नारायण राय, सुधा अरोड़ा, सूर्यबाला, ओमा शर्मा, रामजी यादव, सत्यदेव त्रिपाठी, रवीन्द्र कात्यायन, अर्जुन महतो, सुमन सारस्वत, जनार्दन गौड़, विकास पाण्डेय आदि उपस्थित हुए।

इस गोष्ठी में सबसे पहले बोलते हुए श्री विकास नारायण राय ने कहा कि पुस्तक संस्कृति का क्षरण इस कारण से है कि पुस्तक पाठक तक ठीक से पहुँचती ही नहीं है। पहले हर शहर में साहित्य की पुस्तकें मिलती थीं लेकिन अब नहीं मिलतीं। कथाकार रामजी यादव ने कहा कि केवल पुस्तक संस्कृति ही नहीं बल्कि सारा विश्व ही पूँज़ी से संचालित हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था पिछलग्गू अर्थव्यवस्था बन गई है।

प्रसिद्ध कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबालाजी ने कहा कि संपादकों ने लेखक को दयनीय बना दिया है, फिर भी वह लिख रहा है। प्रकाशक और संपादक लेखकों का दोहन कर रहे हैं। कथाकार ओमा शर्मा ने कहा कि अध्ययन की पहली सीढ़ी है- बच्चों में भाषा के प्रति रुचि को जगाया जाय, जबकि हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को भाषा से दूर भगा रही है। साहित्यकार सत्यदेव त्रिपाठी, रवीन्द्र कात्यायन, आई.आई.टी. के हिंदी अधिकारी श्री अर्जुन महतो तथा आई.आई.टी. के छात्र विकास पाण्डेय ने भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार सुधा अरोड़ा जी ने कहा कि लेखक-पाठक के बीच की कड़ी है प्रकाशक जिसे अपने मुनाफ़े के अलावा किसी से मोह नहीं है। असंगत पाठ्यक्रम भी पढ़ने की संस्कृति को नष्ट करने की भूमिका निभाते हैं। हमें कई स्तरों पर सोचना होगा और सक्रियता से इस मुहिम को आगे बढ़ाना होगा। कार्यक्रम का संचालन रवीन्द्र कात्यायन ने किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *