‘अब शोषण के खिलाफ उठने वाली आवाज टर्मिनेशन लेटर से दबने वाली नहीं’

मैंने तो सिर्फ काम की मजबूरियों के दबाव में चल रहे शारीरिक मानसिक शोषण के खिलाफ खड़ा रहने का फैसला किया था. मीडिया जितना कुछ बाहर साफ़ दिखाने का काम करता है, अन्दर उतनी  गंदगी को छुपाए हुए है. मैंने उस गंदगी को साफ़ करना भर चाहा था.

आज ऐसे दौर में जब लोग स्त्री स्वतन्त्रता की बात कर रहे हैं, यौन हिंसा के खिलाफ एक साथ खड़े हो रहे हैं, मैंने आँखों के सामने  हो रहे खामोश शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी.. जिस संस्‍थान में काम कर रहा था, वह बाहर से दिखावे के लिए शोषितों के हक़ की लड़ाई लड़ने का बेहतर नाटक कर रही है, लेकिन खुद अन्दर   उसके शोषण की घुटती आवाजें गूंज रही है जो तमाम दवाब, मजबूरियों के कारण उभर नहीं पाती, मैंने उसे आवाज़ देने की सोची थी.

मैंने फॉरवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक के द्वारा किये जा रहे अन्याय, शोषण, भ्रषटाचार, पेड़ न्यूज़ को बढ़ावा देने के विरोध में आवाज उठाई. बस इन कारणों से आज मुझे इस्तीफा देने का मौका भी नहीं मिला और टर्मिनेट कर दिया गया. लेकिन समाज, देश और आम नागरिकों के हित के लिए एक क्या एक हजार टर्मिनेट लेटर लूँगा.

शायद यही वजह है कि मीडिया पर तमाम आरोप तो लगते  हैं, लेकिन कभी कुछ बाहर नहीं आ पाता, शायद मेरी ही तरह  बाहर कर दिए जाने के कारण..पर मैं रुकुंगा नहीं.. जब हजारों साथी स्त्री स्वतंत्रता के लिए इंडिया गेट से बथानी टोले तक आवाज़ उठा सकते हैं, इसके लिए लाठियां, आंसू गैस चख सकते हैं, तो मैं भी  पीछे नहीं हटूंगा.. लड़ता रहूँगा.. काम करते हुए, गलत के खिलाफ आवाज़ उठाया जा सकता है, क्या कोई इसका उदाहरण पेश कर सकता है?

जितेन्द्र कुमार ज्योति

टर्मिनेट पत्रकार

फारवर्ड प्रेस 

8882132820

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *