संजय शर्मा अब यूपी के जाने पहचाने पत्रकार बन चुके हैं. वीकएंड टाइम्स के संपादक के रूप में बनी पहचान अब उससे कहीं आगे निकलकर एक सरोकारी पत्रकार की बन चुकी है. अब संजय शर्मा शासन एवं प्रशासनिक तंत्र को केवल खबरें लिख कर बताते ही नहीं हैं बल्कि जरूरत पड़ने पर कोर्ट जाकर गूंगी बहरी व्यवस्था को जगाते भी हैं. पिछले दिनों उन्होंने एक पीआईएल दाखिल करके प्रमुख सचिव नियुक्ति को ही इस पद पर नियुक्त किए जाने पर सवाल उठाया था. इस पीआईएल को खारिज करवाने की लाख कोशिशों के बाद भी यह सरकार एवं सरकारी मशीनरी को असहज कर गई.
कोर्ट ने इस मामले 28 को सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है. हालांकि सरकार की तरफ से इस याचिका को खारिज करवाने का पूरा प्रयास हुआ परन्तु न्यायाधीश उमानाथ सिंह एवं वीके दीक्षित की खंडपीठ से मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दो सप्ताह के भीतर राज्य सरकार से जवाब मांगा है. आज के दौर में जब तमाम बड़े और शातिर पत्रकार अधिकारियों की नियुक्ति और पोस्टिंग कराकर माल बना रहे हैं, उस दौर में संजय शर्मा सरोकारी पत्रकारों के अगुवा साबित हो रहे हैं. संजय शर्मा के इसी प्रयास पर वरिष्ठ पत्रकार एवं यूपी राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने अपने कलम के माध्यम से आड़ी-तीरछी रेखाएं खींचने की कोशिश की है.
संजय शर्मा को खारिज करने वाले खुद खारिज हो चुके हैं
कोई 9 साल पहले जब मेरी संजय शर्मा से पहली बार मुलाकात हुयी थी तो औरों की तरह मैनें भी उनकी बुद्धि पर तरस ही खाया था और मन ही मन इरादों पर शंका जतायी थी। प्रतिष्ठित मीडिया घराने में काम करने के बाद और बहुत ज्यादा पूंजी न होते हुए राजधानी से एक रंग बिरंगे साप्ताहिक निकालने का फैसला लेने वाले के बारे में जिसके पास सरकारी विज्ञापन पाने का कोई पुख्ता जुगाड़ न हो, उसे लोग क्या समझेंगे।
खैर, साल दर साल गुजरते रहे मेरे जैसे राजधानी के सैकड़ों पत्रकारों को और देश प्रदेश के हजारों लोगों को संजय का अखबार वीकएंड टाइम्स बिला नागा पहुंचता रहा। वीकएंड टाइम्स उस जैसे बकाया वीकली अखबारों की तरह पश्चगामी नहीं बल्कि अग्रगामी की भूमिका में नजर आया। अखबार रंगीन चमकीले पन्नों पर निकलने लगा पर ये उसकी मंजिल नहीं थी। अखबार की खूबी बनी उसकी धारदार खबरें, सपाटबयानी, बेबाक अंदाज और सबसे बढ़कर संपादक संजय शर्मा की न झुकने वाली पत्रकारिता। संजय को राजधानी की पत्रकारिता का एक चेहरा बनने में कुछ साल लगे। उनको खारिज करने की मुहिम भी चली और महफिलों में उनकी मौजूदगी पर छींटाकशी भी हुयी। पर खारिज करने वाले खुद खारिज हुए और महफिल में उनकी मौजूदगी एक जमाने में छींटाकशी करने वालों को असहज बना देती है।
बीते दो सालों में मैने देखा कि संजय ने कई घटनाओं, स्कैंडलों को सबसे तेज अखबारों से कहीं पहले खोल कर रख दिया। हालांकि जब विनम्रता से उन्होंने कभी सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर इसका श्रेय लेना चाहा तो वहां भी दोस्तों ने ही उसे नकारने का प्रयास किया। अभी पिछले अंक में वीकएंड टाइम्स ने 9वें साल में प्रवेश किया है। इन 9 सालों में उनकी पूंजी क्या रही इसे सत्ता के गलियारे में किसी से पूछा जा सकता है। हाल ही में एक शादी समारोह में एक अधिकारी (जिन पर संजय ने कुछ छापा था) ने कहा कि वीकली की उम्र तो एक हफ्ते होती है पर वीकएंड टाइम्स जिस पर पिल जाता है उसे तकलीफ साल भर होती है।
आज अदालत से सजा पाए और केवल सजा के लागू होने पर स्टे पा चुके उत्तर प्रदेश सरकार के एक बड़े अधिकारी राजीव कुमार पर दायर याचिका के चलते संजय देश भर में चर्चा में आ गए हैं। यहां भी याचिका के दायर होने पर कुछ बड़े अखबारों ने इसका नोटिस नही लिया था, पर आज वो इसे पहले पन्ने पर प्रमुखता से छाप रहे हैं। जाहिर है एसा कदम उठाने पर संजय पर दबाव भी पड़े होंगे, धमकी भी मिली होगी और प्रलोभन भी पर वो डिगे नहीं। संजय का अपना कारोबार भी है जिसे वो पूरी ईमानदारी के साथ करते हैं वरना वहां भी उन्हें उखाड़ने की कोशिश हो चुकी होती। हालिया
मामले के बाद तो मानो उनमें जबरदस्त आत्मविश्वास आ चुका है और वो अब भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम को और धार देने में जुटे हैं। कहना गलत न होगा कि जनपक्षधर पत्रकारिता की दौड़ में संजय उस एथलीट की तरह हैं, जो हर सुबह अपनी फिनिशिंग लाइन को कुछ मील और आगे रख देता है।
लेखक सिद्धार्थ कलहंस वरिष्ठ पत्रकार एवं उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव तथा बिजनेस स्टैंडर्ड के यूपी के ब्यूरोचीफ हैं.





