”…अभी आपको मीडिया का अनुभव कम है”

मित्तल सर, आपको बार-बार परेशान करने में संकोच होता है। आपने कहा- “वेट फॉर वीक एंड सो” मैं रविवार को इलाहाबाद जा रहा हूं। वीक तो इस बीच पूरा हो जाएगा, लेकिन ये “…एंड सो” की सीमा शायद न आपको मालूम है और मुझे तो बिल्कुल भी नहीं मालूम। आपसे मुलाकात किए भी ये तीसरा हफ्ता ही तो बीत रहा है। इतना सब कुछ जानने के बावजूद मैं आपको फिर लिख रहा हूं। क्यों कि सब्र साथ छोड़ रहा है। मुलाकात के दौरान आपने एक चैनल और उनके कर्ता-धर्ता का जिक्र किया था। उसकी कहानी आपको सुनाई तो आपने फिर से ट्राई करने की सलाह दी।

आपकी सलाह पर मन-बुद्धि दोनों एक होते दिखाई दिए तो मैंने उसी मध्यस्थ से फिर आग्रह किया जिसने पहली बार मुझे उन साहब का कॉनटेक्ट नम्बर दिया था। उसने संबंधों की मर्यादा को रखते हुए मेरी मीटिंग फिक्स भी करवा दी। मीटिंग का नतीजा मेरे 25-26 साल के करियर का सबसे बड़ा झटका था। टेबुल के इस तरफ रखी कुर्सी पर बैठने के इशारे के बाद उनका पहला स्वर-

हुं…बताइए…!!!

मैं स्तब्ध था। जिस व्यक्ति से सारी बात हो चुकी है, वो ये बोल रहा है।

बहरहाल,

मैंने कहा- यशवंत जी ने आपको फोन किया था।

चैनल बंद हो गया न…!!

मैंने कहा- जी, जनवरी से..

सीवी लाए हो- उनका अगला सवाल था।

मैंने उनसे कहा- आज सिर्फ आपसे मुलाकात करनी थी… फिर भी कहीं और भेजे गए सीवी की कॉपी है…

हां…हां… ठीक है, सिर्फ देखना है।

मैंने सीवी पर लगे कवर नोट को हटाकर ब्रीफ सीवी के पन्ने उनकी ओर बढ़ा दिए।

सर, मेरा वो ब्रीफ आपके पास भी है। पढ़ने और समझने में कम से कम तीन से चार मिनट का समय तो लगेगा ही, लेकिन उन साहब ने 30 सेकेंड से भी कम समय लिया पन्ने पलटने और पढ़ने में, और बोले-

“मेरे पास आपके लायक कोई जगह नहीं है” “…और दूसरी बात ये कि अभी आपको मीडिया का अनुभव कम है।”

 सर, मेरा ये दुर्भाग्य, संबंधों का अभाव या डेस्टिनी…हाई एंड पर बैठे किसी भी तुर्रम खां जर्नलिस्ट (लायजनर नहीं) को मेरे सामने बिठा दीजिए, चैनल चलाने के सभी फार्मूलों में वो मुझे हरा दे तो पत्रकारित क्या सामाजिक जीवन से संन्‍यास ले लूंगा। टेक्नोलॉजिकल, मैकेनिकल, फायनेंसियल, जनरल एडमिनिस्ट्रेशन हो या फिर जर्निलस्ट या नॉन जर्नलिस्टिक… क्या प्राब्लम्स हैं, उनका समाधान क्या है…सर, मैंने जो सीखा-समझा और जाना है वो शायद एक दो लोग और जानते होंगे।

सर, विद आउट पेड न्यूज, एक न्यूज चैनल को कैसे सरवाइव किया सकता है..ब्रेक ईवन पर चल सकता है मेरे कहने का मतलब है कि कैसे प्रॉफिट वेंचर बनाया जा सकता है, इसका फार्मूला है मेरे पास…लेकिन सर मेरे पास कोई फायनेंनसर नहीं है…

सर, आप या कोई भी कह सकता है कि आपने अपने मौजूदा चैनल मालिक को ये समय रहते ये सलाह क्यों नहीं दीं…

सर, आपसे बात-चीत के दौरान भी मैं अपने मृत प्रायः चैनल के लिए स्ट्रैटेजिक/फयनेंससियल पार्टनर खोज रहा था। पार्टनर मिल भी गया, लेकिन जिस दिन उस भावी पार्टनर से मीटिंग तय थी, ठीक उसी दिन मेरे चैनल मालिक को दांत की तक्लीफ भी होनी थी (हांलांकि ये कहना कठिन है कि वो मीटिंग और दांत की तक्लीफ दोनों, एक ही संयोग या दुर्योग से उसी दिन तय थे) अब हालात ये हैं कि किसी को भी कुछ भी सलाह देने का कोई मायने नहीं बचा है।

सर, आपको क्या-क्या बताऊं, मैं कोई टेलिकॉस्ट इंजीनियर नहीं हूं, कोई टेक्निकल डिप्लोमा या डिग्री भी नहीं है…इसके बावजूद एक पीसीआर और एक एमसीआर से दो-दो चैनल ऑन एयर किए हैं। स्टाफ के अभाव में स्टोरी एंकर से लेकर एक-एक घंटे के प्रोग्राम बनाए-एडिट करवाए और ऑन एयर करवाए हैं…टेक्निकल हेड और उसके स्टाफ के साथ एक दिन या दो दिन नहीं, कई दिन-रात एक करके उनका विश्वास जीता और हौंसला पाया कि किसी भी सूरत में… फिर कह रहा हूं कि किसी भी सूरत में चैनल ऑफ एयर नहीं रहेगा… और जब तक हैसियत रही चैनल ऑफ एयर नहीं रहा। भले ही चैनल के रोजाना के खर्चे न मिले हों या मालिक ने महीनों तक चैनल की तरफ मुंह करके भी नहीं देखा हो।

सर, ऐसे हालात कई बार बने कि कभी टेक्निकल डिपार्टमेंट की वजह से तो कभी न्यूज डिपार्टमेंट की वजह से चैनल ऑफ एयर के हालात में पहुंचा, लेकिन उस स्थिति पर नियंत्रण किया गया। चैनल ऑन एयर रहा। एक बार तो अर्थ स्टेशन में ही आग लग गई इसके बावजूद चंद घंटों के भीतर चैनल ऑन एयर करवा दिया।

सर, एक बार तो हालात ऐसे थे कि मालिक भी नहीं थे कई महीनों तक…चैनल चला बिना मालिक के.. चैनल के अस्तित्व के साथ चैनल के साथ जुड़े प्रत्यक्ष 175 और अप्रत्यक्ष एक हजार लोगों की रोजी रोजगार और परिवारों के भरण-पोषण का मुद्दा सामने था। उस वक्त भी अपनी कुल जमा पूंजी और मित्रों से उधार लेकर चैनल चलाया, 24×7 चलाया। ….कोई नहीं जानता कि मेरी जमा पूंजी वापस मिली भी कि नहीं, उधार चुकता हुआ कि नहीं, होगा तो कब तक होगा, कैसे होगा, कौन देगा वो रकम…!!!

सर मैं एक जर्निलिस्ट हूं…पूंजिपति तो नहीं…छह साल के कार्यकाल में मैं अपनी कमाई से एक पैंट-शर्ट भी नहीं खरीद पाया, वेतन के नाम पर जो मिला वो या तो सहकर्मियों की जरूरत पूरी करने में लग जाता, क्यों कि उनके बिना चैनल चलना असंभव था या फिर मेरी मारुति 800 के ईंधन-तेल-पानी में खर्च हुआ। इस दौरान मेरा व्यक्तिगत खर्च, यूएन की तरफ से मनरेगा में कंसलटेंट मेरे छोटे भाई और कुछ दोस्तों की कृपा पर निर्भर रहा। कहने का तातपर्य सिर्फ इतना है कि अब न तो मेरा छोटा भाई दिल्ली में है और सहायता करने वाले चार दोस्तों में से एक अकाल काल का ग्रास बन चुका है…दो अन्य के सामने भी व्यवसायिक संकट है। संकट के इस समय मुझे मदद करने वाले मित्रों में से सिर्फ एक बचा है। उसकी नई-नई गृहस्थी है…वो पहली बार पितृत्व सुख का अनुभव करने वाला है…ऐसी परिस्थितियों में किसके कंधों पर अपने दुर्भाग्य-दुर्योग्यता का बोझ डालूं…।

सर, इन दुर्गम्य परिस्थितियों में जब मैंने जाना कि आप किसी खास चैनल में मैनेजिंग एडिटर हो बन गए हैं तो लगा कि अंधे को आंखें, छछूंदर को सौंठ की गांठ या किसी मवाली को रियासत में मनसबदारी सरीखा कुछ मिल गया है। पहली मुलाकात के वक्त नेहरू-अंबेडकर कार्टून वाली स्टोरी मेरे बैग में थी…संकोच वश या कहिए कि ज्वाइन करने के साथ ही धमाका करने के लालच वश उस वक्त वो स्टोरी आपको नहीं दी। आपको क्या बताऊं, कि आपके आग्रह और यशवंत की सिफारिश के साथ जिन सज्जन से मिलने गया तो ऐसी ही एक नहीं ऐसी ही आधा दर्जन रेडिमेड स्टोरीज लेकर गया था…वो स्टोरीज आज भी वर्जिन हैं…मेरी सोच है कि हाई एंड ओहदे पर ज्वाइन करने के वक्त आपके पास ऐसी स्टोरीज होनी चाहिए, जिनसे आपके समकक्ष, जूनियर्स और चैनल मालिक समझ सकें कि खबरों के मामले में आपका कोई सानी नहीं है…और वो आपको अपना सहयोगी, सीनियर या साथी बताते वक्त गर्व महसूस कर सकें।

सर, किसी भी खबर के बदले कोई डील कर लेना ये मेरे वश की बात नहीं, लेकिन उन खबरों के प्रसारण के बाद अगर मार्केटिंग विभाग उन्हें भुना ले तो ये उसकी हुनरमंदी होगी…मेरा इस प्रक्रिया में कोई एतराज भी नहीं होगा और न रेवेन्यु कलेक्शन में मेरा कोई प्रत्यक्ष योगदान। किसी तरह के इंसेटिव पर भी मेरा या मेरी टीम में काम करने वालों का दावा नहीं हो सकता। अपनी उम्र-पेशे और अनुभव के साथ बताइए और क्या समझौता कर सकता हूं…बताइए, इतना सब कुछ होने-करने के बाद भी मैं कथित रूप से रोजगार वृत्ति के लिए दर-दर ठोकरें खा रहा हूं (कथित इसलिए क्यों कि वेतन न मिलने बावजूद चार अन्य सहयोगियों के साथ अपने मृत चैनल को तब तक को कंधों पर उठाएं हैं जब तक कोई ठौर न मिल जाए)।

भड़ास4मी़डिया के चौथे स्थापनादिवस पर एक बात निकल कर आई कि कार्पोरेट मीडिया के चंगुल से निकल कर कुछ नया किया जाए…तो जनाब, कुछ करने के लिए फिक्स्ड कैपिटल और रनिंग कैपिटल की जरूरत है… और आज वो मेरे पास नहीं है, तो नौकरी कहिए या चाकरी फिलहाल यही मेरा विकल्प है… और आप मेरे आलम्ब। आपकी कृपा से नौकरी मिल जाए तो फिर आगे सोचने का शायद मौका मिले। सर, दिल्ली छोड़ कर भागने की परिस्थितियां लगभग साल भर पहले से बनी हुई हैं… अब तक नहीं भागा तो भागूंगा आगे भी नहीं… यहीं लड़ूंगा-जुझुंगा और सरवाइव भी कर के दिखाउंगा… अनफेयर मींस के बिना न्यूज चैनल को, न्यूज चैनल की हैसियत से झंडे गाड़ता भी दिखाउंगा….!!!

सादर,

राजीव शर्मा

लेखक राजीव शर्मा कई अखबारों और चैनलों में काम कर चुके हैं. हालफिलहाल तक एस1 न्यूज चैनल के हेड हुआ करते थे. उन्‍होंने यह चिट्ठी अपने एक वरिष्‍ठ को लिखी है, जिसे हू-ब-हू प्रकाशित किया जा रहा है.


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