अमरउजाला वालों, डर कर जीना, वरना पीटे गए तो राजुल माहेश्वरी पूछेंगे तक नहीं, छापना लड़ना दूर की बात है…

प्रिय यशवंत भाई, नमस्कार, आपने अमर उजाला के पत्रकार भाई धर्मवीर सिंह के मामले को जिस हिसाब से उठाया है, निःसंदेह बधाई के पात्र हैं. अमर उजाला के स्थानीय संपादक मृत्युंजय ने गोरखपुर के पत्रकारिता के अधाय्य में एक स्याह पन्ना जोड़वा दिया है. जाहिर है, उन्होंने यह काम अपने मन से नहीं बल्कि अपने मालिक राजुल माहेश्वरी के इशारे पर किया है. अमर उजाला के पत्रकार धर्मवीर की लड़ाई में भड़ास4मीडिया के योगदान की सराहना पूर्वांचल का हर कलमकार कर रहा है. लोग अमर उजाला के स्थानीय संपादक को भला बुरा कहने में परहेज नहीं कर रहे हैं.

पूर्वांचल के पत्रकार एसएसपी द्वारा रिपोर्टर पर किए गए हमले की निंदा कर रहे हैं, साथ में डरपोक स्थानीय संपादक और शीर्ष प्रबंधन की भी. अमर उजाला के पत्रकार को एसएसपी द्वारा पीटे जाने के बाद आसपास के कई जिलों में पत्रकार आंदोलित हो गए और सबने निंदा, विरोध आदि की खबरें अमर उजाला के गोरखपुर आफिस भेजीं. सिद्धार्थनगर प्रेस क्लब, खड्डा, आदि जगहों से पत्रकार आन्दोलन की खबरें आईं लेकिन संपादक ने उन्हें नहीं छपने दिया. अमर उजाला के लिए यह काफी घातक सिद्ध होगा.

इस अखबार में काम करने वाले कर्मी अब सोचेंगे कि उनके मुश्किल में उनका ही अखबार नहीं खड़ा होगा. इससे पत्रकार डरकर काम करेंगे जिससे पत्रकारिता की धार कुंद होगी. कोई भी आदमी पत्रकार को सड़क पर पीटेगा और संपादक के केबिन में माफ़ी मांग लेगा. न चाहते हुए भी हम उजाला की निंदा करते है और निंदा करते हैं उस संपादक की जिसने पत्रकारिता के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ा. नौकरी की बात नहीं होती तो अपना नाम भी इस खबर के साथ लगाता. कृपया इस पोस्ट को प्रकाशित कर धर्मवीर के संघर्ष को मजबूती प्रदान करें.

कुछ और जानकारी देना चाहूंगा. गोरखपुर प्रेस क्लब का अध्यक्ष एसपी सिंह एसएसपी के पक्ष में खड़ा दिखा. वह समझौता कराने गया हुआ था. आज अखबार, चेतना और जनसंदेश टाइम्स में अमर उजाला रिपोर्टर को एसएसपी द्वारा पीटे जाने की खबर छपी जबकि हिंदुस्तान, दैनिक जागरण और खुद अमर उजाला में यह खबर नहीं छपी. कल पत्रकार दोपहर को इकट्ठा हुए लेकिन कोई फैसला नहीं हो सका. मंडलायुक्त को ज्ञापन देने की बात तय हुई लेकिन यह पता नहीं चल सका है कि ज्ञापन दिया गया या नहीं. धर्मवीर भी नौकरी के डर में चुप्पी साध गए हैं इससे आंदोलन करने के लिए तैयार बैठे लोगों का मनोबल गिरा है. धर्मवीर पर अमर उजाला प्रबंधन का दबाव है कि वह इस मामले को खत्म समझे और कहीं कोई बयान आदि न दे. देखना है कि इस मामले में आगे कुछ होता भी है या नहीं.

-एक भड़ासी, गोरखपुर

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