अमर उजाला का विज्ञापन रोके जाने का विरोध करती है श्रमजीवी पत्रकार यूनियन

लोकप्रिय न्यूज पोर्टल "भड़ास4मीडिया" में प्रकाशित एक समाचार के मुताबिक- उत्‍तराखंड की प्रदेश सरकार ने अमर उजाला का सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया है। खबर के अनुसार उत्‍तराखंड में अमर उजाला के साथ ऐसा दूसरी बार हो रहा है। भाजपा के शासनकाल में खंडूड़ी के मुख्यमंत्री रहते भी कुछ वक्त के लिए अमर उजाला को सरकारी विज्ञापन देने पर अघोषित रोक लगा दी गई थी।"

प्रथम दृष्टि में यह मामला एक अख़बार और उसके अर्थतन्त्र से जुड़ा लग सकता है। हालाँकि सरकारी विज्ञापन रुकने से अमर उजाला को मामूली माली नुकसान हो सकता है। चूँकि अमर उजाला एक बड़ा समाचार समूह है। लिहाजा वह इस नुकसान को आसानी से झेल सकता है। मेरी समझ से सरकार के इस निर्णय से अमर उजाला समूह को बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ने वाला है। यूँ भी अमर उजाला के पास व्यावसायिक विज्ञापनों की कोई कमी नहीं है। पर यहाँ सवाल सिर्फ अमर उजाला या उसको सरकार से विज्ञापन मिलने या नहीं मिलने का नहीं है। अहम सवाल प्रदेश सरकार की सोच और तंग नजरिये का है।

कोई समाचार-पत्र सरकार के मन माफिक खबरें नहीं छापे या जिन खबरों से सरकार बहादुर को परहेज हो, उन खबरों को प्रकाशित कर दे, तो क्या इस सूरत में सरकार को बिना किसी युक्ति-युक्त और जायज कारणों के किसी भी समाचार-पत्र के सरकारी विज्ञापन पर अघोषित या घोषित रोक लगाने का नैतिक/संवैधानिक हक है? क्या सरकार का यह कदम किसी समाचार-पत्र को आर्थिक चोट पहुंचा कर उसे रुग्ण बना देने की असफल कोशिशों का हिस्सा नहीं है? बिना किसी ठोस वजह के किसी भी समाचार-पत्र का सरकारी विज्ञापन रोकना अभिव्यक्ति की आजादी पर अपरोक्ष हमला नहीं है? 

मान लीजिये, यदि सरकार ने किसी लघु या मध्यम समाचार-पत्र के प्रति ऐसा रवैया अपनाया तो उस लघु या मध्यम समाचार-पत्र को कितना आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उत्तराखंड से प्रकाशित तमाम लघु या मध्यम श्रेणी के समाचार-पत्र इस आर्थिक क्षति को झेलने की हालत में हैं? यहाँ एक सवाल स्वाभाविक तौर पर उठ सकता है कि अमर उजाला के सरकारी विज्ञापन पर रोक से आम श्रमजीवी पत्रकारों का क्या वास्ता? जी हाँ, अमर उजाला ही क्यों, किसी भी बड़े समाचार समूह के सरकारी विज्ञापनों पर रोक से प्रत्यक्ष में आम श्रमजीवी पत्रकारों को कोई वास्ता नहीं है। पर अप्रत्यक्ष रूप से वास्ता है और गहरा वास्ता है। क्योंकि सभी समाचार समूहों में काम कर रहे पत्रकार और गैर पत्रकार विशुद्ध रूप से "श्रमजीवी" हैं। यह बात दीगर है कि इनमें से ज्यादातर पत्रकारों को अपने को "श्रमजीवी" कहने और कहलाने में शर्म महसूस होती है। अगर किसी समाचार समूह की अर्थ-व्यवस्था पर चोट पहुँचती है, तो अंतत: इसका खामियाजा देर-सबेर किसी न किसी रूप में उस समाचार समूह में कार्य करने वाले सभी पत्रकार और गैर पत्रकारों को भी उठाना पड़ता है। इस लिहाज से यह मामला प्रत्यक्ष रूप से न सही अप्रत्यक्ष रूप से श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है।

माना कि अधिकांश समाचार समूह श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों की एकजुटता के पक्षधर नहीं है। समाचार समूहों को श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकारों का एका और उनकी यूनियनें कतई रास  नहीं आती हैं। "किसी यूनियन के सदस्य नहीं बनना" अब ज्यादातर समाचार-पत्रों में नियुक्ति पाने की पहली शर्त होती है। भले ही ज्यादातर समाचार-पत्रों की नीति यूनियन विरोधी हो। इसका मतलब यह कतई  नहीं है कि अभिव्यक्ति और समाजोन्मुख जनपक्षीय पत्रकारिता की प्रबल पक्षधर पत्रकार यूनियनों को ऐसे मामलों में चुप्पी साध लेनी चाहिए। लिहाजा उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन सरकार की इस सोच और कार्यवाही की कड़े शब्दों में निंदा करती है।

लेखक प्रयाग पाण्‍डे उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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