अमर उजाला के रिपोर्टर के मुंह में एसएसपी आशुतोष ने डंडा डाल दिया था, तस्वीर स्वतंत्र भारत में छपी

गोरखपुर अमर उजाला के पत्रकार धर्मवीर सिंह के साथ बड़े कप्तान की बदसलूकी और मारपीट की घटना और गोरखपुर के बड़े अखबारों में खबर न छपना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है. यहाँ तक कि अमर उजाला ने खुद ही खबर नहीं छापी. क्या किसी अखबार का संपादक यदि लातियाया गया होता तो ऐसे ही खबर व घटना को मैनेज करने का खेल होता? गोरखपुर में आज अखबार, स्वतन्त्र चेतना, स्वतंत्र भारत और जन सन्देश ने धर्मबीर के साथ हुयी घटना को अपने अखबार में जगह देकर पत्रकारिता की मशाल को जलाये रखा.

लेकिन दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, हिंदुस्तान .. आदि ने खबर को मैनेज कर इसका बायकाट कर दिया. क्या यह भी एक तरह का पेड न्यूज नहीं है? एक घटना, जिसकी जानकारी पाठकों को होनी चाहिए, उसे अखबार का प्रबंधन और संपादक पी गया, कितना शर्मनाक है. पेड न्यूज सिर्फ पैसे लेकर खबर छापना ही नहीं होता बल्कि किसी बड़ी घटना की खबर को किन्हीं दबावों में न छापना भी होता है. इन बड़े अखबारों ने पत्रकारिता का गला ही घोंट दिया. धर्मबीर जी! हम शर्मिन्दा हैं, क्योंकि गोरखपुर में जयचंद जिन्दा है. सबसे अच्छा कवरेज स्वतंत्र भारत ने दिया है. इस अखबार ने वह तस्वीर भी लगायी है, जिसमें धर्मबीर जी के मुंह में कप्तान ने डंडा डाल रखा है. क्या यह तस्वीर इस बात के लिए पर्याप्त नहीं है कि एसएसपी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और उसे सस्पेंड किया जाना चाहिए.

अमर उजाला के लोगों ने ही अन्य बड़े अखबारों में खबर नहीं छपने दी, मैनेज कराया. गोरखपुर के लगभग सभी बड़े अखबारों के संपादकों की आपस में खबर मैनेज करने को लेकर एकता है. खबर न छपने पर आम आदमी भी अब संपादकों को गालियां दे रहा है. कहा जा रहा है कि एसएसपी से सम्बन्ध बना रहे इसलिए गोरखपुर के 4 बड़े अखबारों ने खबर नहीं छापी. पर जिन लोगों ने घटना को खुद अपनी आंखों से देखा, उन्होंने जब अखबार में खबर को नहीं पाया तो उनके मुंह से अखबारवालों के लिए सिर्फ गालियां ही निकल रही है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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